Saturday, 19 March 2016

Transformation in India will come through the villages & farmers: PM Modi at Krishi Unnati Mela


मेरे प्यारे किसना भाइयों और बहनों

यह किसान मेला भारत के भाग्‍य का मेला है, अगर भारत का भाग्‍य बदलना है, तो गांव से बदलने वाला है, किसान से बदलने वाला है और कृषि क्रांति से बदलने वाला है। हम लोग सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी से एक ही प्रकार से किसानी करते आए हैं। बहुत कम किसान हैं जो नया प्रयोग करते हैं या कुछ नया करने का साहस करते हैं। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती  यही है कि हम हमारी किसानी को आधुनिक कैसे बनाएं, टेक्‍नोलॉजी युक्‍त कैसे बनाएं, हमारी युवा पीढ़ी जो आधुनिक आविष्‍कार हो रहे हैं, उन आधुनिक आविष्कारों को खेत तक कैसे पहुंचाएं। किसान के घर तक कैसे पहुंचाएं। इस किसान मेले के माध्‍यम से एक प्रशिक्षण का प्रयास है। और मुझे खुशी है कि आज कृषि विभाग ने यह कार्यक्रम ऐसा बनाया है कि न सिर्फ यहां बैठे हुए लोग लेकिन पूरे हिंदुस्‍तान के हर गांव में किसान इस कार्यक्रम को देख रहे हैं।

और सिर्फ प्रधानमंत्री का भाषण सुनना है इसलिए देख रहे हैं ऐसा नहीं है। तीन दिन तक यहां जितनी चर्चाएं होने वाली हैं वो सारी चर्चाएं गांव में बैठा हुआ किसान भी उसको देख सकता है, सुन सकता है, समझ सकता है। क्‍योंकि जब तक हम इन बातों को किसान तक पहुंचाएंगे नहीं, किसान में विश्‍वास पैदा नहीं करेंगे तो वो अगल-बगल में जो देखता है वो ही करता रहता है। और किसान का स्‍वभाव है अगर पड़ोसी ने अपने खेत में लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाली तो यह भी जा करके लाल डिब्‍बे वाली दवाई लाकर डाल देगा। बगल वाले ने पीली दवाई डाल दी तो यह भी पीली दवाई डाल देगा। उसको ऐसा लगता है उसने किया तो मैं भी कर लूं। और जो बेचने वाले हैं उनको तो इसकी चिंता ही नहीं है कोई भी माल जाओ बेच दो, एक बार बिक्री हो जाए। बाद में कौन पूछने वाला है किसान का क्‍या हुआ।

और इसलिए कृषि क्षेत्र को एक अलग नजरिये से develop करने की दिशा में यह सरकार प्रयास कर रही है। हमारे देश में पहली कृषि क्रांति हुई वो पहली कृषि क्रांति अधिकतम जहां पानी था उस पानी के भरोसे हुई। लेकिन दूसरी कृषि क्रांति सिर्फ पानी के भरोसे करने से बात पूरी तरह संतोष नहीं देगी। और इसलिए दूसरी कृषि क्रांति विज्ञान के आधार पर, टेक्‍नोलॉजी के आधार पर, आधुनिक आविष्‍कारों के आधार पर करना आवश्‍यक हो गया है। पहली कृषि क्रांति हिंदुस्‍तान के पश्चिमी छोर पर, पश्चिमी उत्‍तर भाग में हुई। पंजाब, हरियाणा इसने नेतृत्‍व किया दूसरी कृषि क्रांति उन प्रदेशों में संभावनाएं पड़ी  है। जिस पर अगर हमने थोड़ा सा भी ध्‍यान दिया तो बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है और वो है पूर्वी उत्‍तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, नॉर्थ ईस्‍ट, ओडि़शा ये सारे हिंदुस्‍तान का पूर्वी इलाका, जहां पानी भरपूर है, जमीन की विपुलता है, जमीन ऊपजाऊ है, लेकिन वो पुराने ढर्रे से वो सब जुड़ा हुआ है और इसलिए इस सरकार का प्रयास है कि भारत के पूर्वी इलाके से एक दूसरी कृषि क्रांति कैसे हो, उस दिशा में हम कदम बढ़ा रहे हैं।

भारत की आर्थिक धारा भी गांव की धुरा से जुड़ी हुई है। अगर गांव में गांव के गरीब व्‍यक्ति के द्वारा अगर आज वो पांच हजार रुपया का माल बाजार से खरीदता है साल में और अगली बार दस हजार का खरीदता है, तो economy को वो ताकत  देता है। देश आगे बढ़ता है। और  यह अगर करना  है तो गांव के लोगों  की खरीद शक्ति बढ़ानी पड़ेगी, उनका purchasing power बढ़ाना पड़ेगा। और वो purchasing power तब तक नहीं बढता है जब तक कि गांव आर्थिक रूप से गतिशील न हो। गांव में आर्थिक गतिविधि का कारोबार न हो तो यह संभव नहीं है।

और इसलिए आपने इस बार देखा होगा चारों तरफ इस सरकार के बजट की तारीफ ही तारीफ हो रही है। कुछ लोग मौन हैं क्‍योंकि उनके लिए तारीफ करना मुश्किल है, लेकिन विरोध में बोलने के लिए कुछ है नहीं। पहली बार जिन जिन लोगों ने इस विषय के ज्ञाता है, उन्‍होंने लिखा है कि एक बड़े लम्‍बे अरसे के बाद एक ऐसा बजट आया है जो पूरी तरह गांव, गरीब और किसान को समर्पित किया गया है।और यह काम इसलिए किया है अगर भारत को आर्थिक संपन्न बनना है, आने वाले 25-30 साल तक लगातार आगे बढ़ना है, रूकना ही नहीं है, तो वो जगह सिर्फ गांव है, गरीब है, किसान है।

हमारा एक सपना है, लेकिन वो सपना मेरा होगा उससे बात बनेगी नहीं। वो सपना सिर्फ दिल्‍ली  सरकार का होगा तो बात बनेगी नहीं। चाहे केंद्र सरकार हो,  चाहे राज्‍य  सरकार हो,  चाहे हमारे किसान भाई-बहन हो, हम सबका मिला-जुला सपना होना चाहिए, हम सबकी जिम्‍मेदारी वाला सपना होना चाहिए। और  वो सपना है 2022 छह साल बाकी है, जब भारत की आजादी के 75 साल होंगे, क्‍या हम हमारे देश के किसानों की आय दोगुना कर सकते हैं क्‍या? किसानों की आय डबल कर सकते हैं क्‍या? अगर एक बार किसान, राज्‍य सरकार, केंद्र सरकार यह मिल करके तय कर लें तो काम मुश्किल नहीं है, मेरे भाईयों-बहनों। कुछ लोगों को लगता है कि यह मुश्किल काम है। मैं इस विभाग में जाना नहीं चाहता। लेकिन यह करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए इसमें कोई दुविधा नहीं हो सकती, कोशिश जरूर करनी चाहिए।

अब तक हमने देश को आगे बढाने में कृषि उत्‍पादन के growth को ही केंद्र में रखा है। हम कृषि उत्‍पादन के growth तक सीमित रह करके किसान का कल्‍याण नहीं कर सकते हैं। हमने किसान का कल्‍याण  करना है तो हमने और पचासों चीजें उसके साथ जोड़नी होगी, और तब जा करके 2022 का सपना हम पूरा कर सकते हैं। अब हम यह सोचे कि हमारी धरती माता बेचारी बोलती नहीं है, पीड़ा है तो रोती नहीं है, आप उस पर जितने जुल्‍म करो वो सहती रहती है। अगर हम धरती मां  की आवाज़ नहीं सुनेंगे, तो धरती मां भी हमारी आवाज़ नहीं सुनेगी। अगर हम धरती माता की पीड़ा महसूस नहीं करेंगे तो धरती मां भी हमारी पीड़ा कभी महसूस नहीं करेगी। और इसलिए हम सबका सबसे पहला दायित्‍व है कि हम हमारी धरती माता की पीड़ा को समझे। हमने कितने जुल्‍म किये हैं उस पर, न जाने कैसे कैसे कैमिकलों से उसको  नहला दिया। न जाने कैसी-कैसी दवाईंया पिलाई उसको, न जाने कितने-कितने जुल्‍म किये हैं उस पर अगर हम भी बीमार हो जाते हैं न तो अड़ोस-पड़ोस के लोग कहते हैं कि बेटा बहुत दवाइयां मत खाओं और ज्‍यादा बीमार हो जाओगे। डॉक्‍टर भी कहते है कि भई ठीक है बीमार हो दवा की जरूरत है लेकिन ऐसा नहीं कि एक गोली की बजाए 10 गोली खा जाओगे, ठीक  हो जाओगे। जो हमारे शरीर का हाल है, वो ही हाल यह हमारी धरती माता का भी है। और इसलिए हम कभी कम से कम देखे तो सही कि हमारी धरती माता की तबीयत कैसे है, कोई  बीमारी तो नहीं है? क्‍या कारण है कि हम फसल बोते हैं लेकिन जितनी मेहनत करते हैं उतना मिलता नहीं है, मां रूठी क्‍यों है।

और इसलिए आपकी मदद से एक बड़ा अभियान पूरा करना है वो Soil health card. हमारी जमीन की तबीयत कैसी है, उसकी परत  कैसी है, उसके अंदर ताकत कौन सी  है, उसके अंदर कमियां कौन सी है, उसके अंदर बीमारियां कौन सही है। यह हमने जांच करवानी चाहिए और यह regular करवानी चाहिए। यह कोई  महंगा काम नहीं है, सरकार आपकी मदद कर रही है। और जांच करवा ली, लेकिन हम उस रिपोर्ट को एक खाते में डालकर कागज पड़ा है, पड़ा रहे, फायदा नहीं होगा। अगर कोई  इंसान बीमार रहता है, laboratory में जाकर टेस्‍ट  करवाया और पता चला  कि diabetes है वो आ करके कागज घर  में रख दे और खाता है जैसे ही मिठाई मिले खाता रहे, जितना मिले उतना खाता रहे तो क्‍या diabetes उसको जाएगा क्‍या? बीमारी बढ़ेगी कि नहीं बढ़ेगी। मौत निश्चित हो जाएगी कि नहीं हो जाएगी।

और इसलिए soil health card के द्वारा हमें जमीन की जो कमियां नजर आई है। जमीन की जो ताकत ध्‍यान में आई है। जमीन की जो बीमारियां ध्‍यान  में आई  है, उसके अनुसार हमें खेती करनी चाहिए तो आपकी आधी समस्‍याएं तो वहीं सुलझ जाएगी। मैं दावे से कहता हूं मेरे किसान भाईयों-बहनों आपकी आधी समस्यायें, अगर जमीन की ठीक देखभाल कर दी, तो आपकी आधी समस्‍या वहीं सुलझ जाएगी। और एक बार धरती माता का ख्‍याल रखोगे न तो धरती माता तो आपका चार गुना ज्‍यादा ख्‍याल रखेगी। कभी आपको पीछे मुड़ करके देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 

दूसरी बात है पानी, किसान का स्‍वभाव है अगर उसको पानी मिल जाए तो वो मिट्टी में से सोना पैदा कर सकता है। उसे और कुछ नहीं चाहिए। और इसलिए हमने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना पर बल दिया है। किसानों को पानी कैसे पहुंचे? और कम से कम पानी बर्बाद हो, उस रूप में कैसे पड़े, इस पर काम चल रहा है। आपको हैरानी होगी मैं जरा हिसाब लगा रहा था कि हमारे किसान को पानी पहुंचाने की इतनी योजनाएं बनी  हाल क्‍या है। मेरे किसान भाईयों-बहनों आपको हैरानी होगी कि हम कुछ भी करते हैं तो हमारे विरोधी यह कहते हैं कि यह तो हमारे समय का है। यह तो हमारे जमाने का है। उनके जमाने का हाल क्‍या है मैं बताता हूं किसानों का मैंने करीब 90 प्रोजेक्‍ट ऐसे खोज कर निकालें कि जहां पानी तो भरा पड़ा लेकिन किसान को पानी पहुंचाने के लिए कोई व्‍यवस्‍था ही नहीं है। अब मुझे बताइये भइया अगर कहीं डैम भरा पड़ा है। हजारों, लाखों, करोड़ों रुपया खर्च कर दिया गया है, लेकिन अगर किसान के खेत तक पानी ले जाने का प्रबंध नहीं है वो सिर्फ दर्शन करने के सिवा किसी काम आएगा क्‍या? हमने 90 ऐसे प्रोजेक्‍ट हाथ में लिए है। और उस पर बड़ा जोर लगाया है कि वो पानी किसान तक पहुंचे। जितनी उसकी capacity है पानी कैसे पहुंचे, काम लगाया है। जब यह काम पूरा कर लेंगे करीब 80 लाख हेक्‍टेयर भूमि को पानी पहुंचना शुरू हो जाएगा भाईयों-बहनो। और पानी पहुंचेगा तो वो जमीन कितना कुछ देगी आप अंदाज कर सकते हैं।

20 हजार करोड़ रुपया, इस काम के लिए लगाने की दिशा में काम कर रहा हूं मैं। इतना ही नहीं मनरेगा, बड़ी चर्चा होती है,  लेकिन कहीं asset create नहीं होता है। इस सरकार ने बल दिया है। और मैं चाहूंगा इन गर्मी के दिनों में गांव-गांव मनरेगा से एक ही काम होना चाहिए, एक ही काम और सिर्फ तालाब है तो तालाब गहरे करना, मिट्टी निकालना, जहां पर  पानी रोक सकते हैं रोकना। इस बजट में पांच लाख तालाब बनाने का सपना है, पांच लाख  तालाब।

जहां हमारे छोटे-छोटे पर्वतीय इलाके होते हैं, पहाड़ी इलाके होते हैं, जहां तीन या चार पहाड़ इकट्ठे  होते हैं, वहां अगर थोड़ी सी खुदाई कर दें तो बहुत बड़े तालाब बनने की संभावना हो जाती है। मैंने forest department को भी कहा है जंगलों को बचाना है तो वहां छोटे-छोटे तालाब का काम किया जाए, ताकि पानी होगा तो हमारे जंगल भी बचेंगे। जंगल होंगे तो वर्षा बढ़ेगी, वर्षा बढेगी तो हमारी ज़मीन में पानी ऊपर आएगा। जो 12 महीने मेरे किसान को फायदा करेगा। हम गांव-गांव इस गर्मी के दिनों में पानी बचाने के साधन कैसे तैयार करें और जितना ज्‍यादा पानी बचाने का प्रयास करेंगे, पहली बारिश में यह सब भर जाएगा। और फिर कभी बारिश इधर-उधर हो गई तो भी वो पानी हमारी खेती को बचा लेगा। उसी प्रकार से जितना महात्‍मय जल संचय का है, उतना ही महात्‍मय जल सिंचन का है।

पानी यह परमात्‍मा ने दिया हुआ प्रसाद है। इसको बर्बाद करने का हमें कोई  अधिकार नहीं है। एक-एक बूंद पानी का उपयोग होना चाहिए। और इसलिए per drop more crop एक-एक बूंद से फसल कैसे ज्‍यादा पैदा हो, उस पर काम करना है। हम micro irrigation में जाए, हम drip irrigation में जाए छोटे-छोटे पम्‍प लगा करके पानी पहुंचाने के लिए प्रबंध करे। liquid fertilizer दें। आप देखिए मेहनत कम हो जाएगी। खर्चा कम हो जाएगा और उत्‍पादन बढ़ जाएगा। कुछ लोगों की गलतफहमी है कि sugar में भी बहुत पानी चाहिए, जमाना चला गया। अब तो micro irrigation से sugar भी हो सकता है, paddy भी हो सकता है।

और इसलिए जो हमारी पुरानी मान्‍यता है कि अगर पूरा लबालब पानी से खेत भरा होगा तभी फसल होगी, ऐसी जरूरत नहीं है। अब विज्ञान बदल गया, टेक्‍नोलॉजी बदल गई। आप आराम  से बदलाव करके कर सकते हैं। और इसलिए मेरे किसान भाईयों-बहनों, यह हमारी रोजमर्रा के काम है, इस पर अगर हम ध्‍यान देंगे। हम हमारे खर्च को कम कर पाएंगे। और हमारी आय को बढ़ा पांएगे। और उसी से किसान का कल्‍याण होने वाला है।
हमारे यहां फसल के लिए मार्केट, यह 14 अप्रैल को बाबा साहेब अम्‍बेडकर की जन्‍म जयंती पर भारत सरकार एक ई प्‍लेटफॉर्म शुरू कर रही है, ताकि किसान को अपना माल कहां बेचना, सबसे ज्‍यादा दाम कहां मिलते हैं वो अपने मोबाइल फोन पर देख सकता है कि मुझे मेरा माल किस मंडी में कैसे बेचना और उसके कारण उसको दाम ज्‍यादा मिले। आज किसान बेचारा अगर गाँव से निकला, दो बजे अगर मंडी में पहुंचा, मंडी वाले अगर चले गए वो अपना माल बेच नहीं पाता है अगर वो सब्‍जी वगैरह लाया है तो वहीं छोड़कर चला जाता है, क्‍योंकि कोई खरीददार नहीं होता है। अगर हम इस प्रकार की व्‍यवस्‍था का उपयोग करेंगे, और आज मैंने अभी एक किसान सुविधा लॉन्च किया है। किसान अपने मोबाइल फोन पर आज के आधुनिक विज्ञान डिजिटल के माध्‍यम से अपनी आवश्‍यकताओं की जानकारी वो पा सकता है। weather का रिपोर्ट ले सकता है,  मार्केट का रिपोर्ट ले सकता है। बाजार में कहां पर अच्‍छा  बीच मिल  सकता है ले सकता है। कृषि के कौन वैज्ञानिक है किसका संपर्क करना चाहिए, यह सारी जानकारियां आपकी हथेली में देने का प्रयास किया है।

अगर हम उसका प्रयोग करेंगे तो मेरे किसान को आज जो अकेलापन महसूस होता है, उसको लगता है कि मेरा कोई नहीं है। यह सरकार कंधे से कंधा मिला करके किसान के सुख-दुख का साथी है और हम आपके साथ मिल करके काम करना चाहते हैं, क्‍योंकि हमें बदलाव लाना है उस दिशा में हम काम करना चाहते हैं। उसी प्रकार से अब समय की मांग है कि हम मूल्‍य वृद्धि करे। value addition करे, processing करे। जितना ज्‍यादा food processing होगा, उतना ही ज्‍यादा हमारे किसान की आय बढ़ने वाली है। जितना ज्‍यादा value addition करेंगे, उतनी कमाई बढ़ने वाली है। अगर आप दूध बेचते हैं, कम पैसा मिलता है, लेकिन अगर दूध का मावां बना करके बेचते हैं, तो ज्‍यादा पैसा मिलता होगा। दूध  में से घी बना करके बेचते हैं ज्‍यादा पैसा मिलता है। अगर आप कच्‍चा आम बेचते हैं कम पैसा मिलता है, लेकिन अगर कच्‍चे आम का अचार बना करके बेचे तो ज्‍यादा पैसा मिलता है। आप हरी मिर्ची बेचे, कम पैसा मिलता है। लेकिन लाल हो करके पाऊडर बना करके पैकिंग करके बेचे तो ज्‍यादा पैसा मिलता है। हमारे किसान की आय बढ़ाने का यह एक उत्‍तम से उत्‍तम से मार्ग है कि हम food processing को बल दें और food processing के लिए भारत जैसे देश में दुनिया की बहुत बड़ी टेक्‍नोलॉजी की जरूरत है, ऐसा नहीं है, हमारे यहां आमतौर पर इन चीजों को करने का स्‍वभाव बना हुआ है। उसको बल देने की जरूरत है। और गांव मिल करके करेगा। तो बहुत बड़ी ऊंचाईयों पर चला जा सकता है गांव। और आज हमने देखा है कि ऐसी चीजों ने अपने जगह बना ली है।

आज दुनिया के अंदर.. मुझे अभी गल्‍फ कंट्रीज के अमीरात के क्राउन प्रिंस यहां आए थे UAE के । उन्‍होंने एक बड़ी महत्‍वपूर्ण बात बताई। उन्‍होंने कहा हमारा जो गल्‍फ कंट्रीज है प्रट्रोलियम के पैसे तो बहुत है हमारे पास, लेकिन हमारे पास पेट भरने के लिए खेती के लिए कोई संभावना नहीं है हमारी जमीन रेगिस्‍तान है। हमारी जनसंख्‍या बढ़ रही है। हमें आने वाले दिनों में जैसे-जैसे जनसंख्‍या बढ़ेगी, हमारा पेट भरने के लिए भारत से ही अन्‍न मंगवाना पड़ेगा। इसका मतलब यह हुआ कि हिंदुस्‍तान का किसान जो पैदा करेगा दुनिया के बाजार में जाने की संभावनाएं बढ़ रही है। एक बहुत बड़ा ग्‍लोबल मार्केट हमारा इंतजार कर रहा है हम अगर अपनी व्‍यवस्‍थाओं को उस स्‍टेंडर्ड की बना दें तो दुनिया हमारी चीजों को स्‍वीकार करने के लिए तैयार हो जाएगी।

इन दिनों holistic health care. हर किसी को लगता है आप भले तो जग भला। और इसलिए लोग organic खाना खाना पसंद करते हैं। कैमिकल से आया हुआ उनको खाना नहीं है। आम भी बिकता है तो पूछते हैं organic है। चावल भी लाए तो पूछते हैं organic है, गेंहू लाए तो पूछते हैं organic है। वो कहता है साहब पैसा डबल होगा, वो बोले डबल ले लो भाई दवाई खाने से ज्‍यादा अच्‍छा है कि महंगा चावल खा लूं, लेकिन दवाई खाने के लिए मुझे केमिकल वाला नहीं खाना। लोग सोच रहे हैं कि दवाई में जो पैसे जाते हैं उसके बजाय अगर वो पैसे organic चीजों को खाने में जाते हैं तो स्‍वास्‍थ्‍य भी अच्‍छा रहेगा और खर्चा भी कम होने लगेगा। लेकिन यह तब संभव होगा, जब हम organic farming की तरफ प्रयास करें। हम कोशिश करें।

आज मैं सिक्‍कम प्रदेश को बधाई देता हूं| पहाड़ों में 2003 से उन्‍होंने मेहनत चालू की, 2003 से और दस साल के भीतर-भीतर सिक्किम के पूरे प्रदेश को उन्‍होंने organic state बना दिया। आज वहां chemical fertilizer का नामो-निशान नहीं है। और उनका उत्‍पादन बड़ा है, दवाईयां डालनी नही पड़ती है। जमीन में सुधार आया, पहले जो जमीन जितना देती थी। वो जमीन आज दोगुना, तीनगुना देने लग गई है। और उनका बहुत बड़ा ग्‍लोबल मार्केर्टिंग हो रहा है। क्‍या हमारे देश में हम organic farming को बल दे सकते हैं? ये तरीके हैं जो हमने आधुनिक कृषि की तरफ जाना है।

मैं किसानों से एक और आग्रह करना चाहता हूं। हमारी किसानी को तीन हिस्‍सों में बांटना यह अनिवार्य हो गया है। आज हम हमारी किसानी एक ही खम्‍बे पर चलाते हैं और उसका कारण जिस समय आंधी आ जाए वो खम्‍बा हिल जाए, ओले गिर जाए वो खम्‍बा गिर जाए, बहुत बड़ी बारिश आ जाए, वो खम्‍बा गया तो पूरी साल बर्बाद हो जाती है, पूरा परिवार बर्बाद हो जाता है। लेकिन अगर तीन खम्‍बों पर हमारी किसानी खड़ी होगी तो आफत आएगी तो एक-आध खम्‍बा गिरेगा। दो खम्‍बे पर तो हमारी जिंदगी टिक पाएगी भाई।

और इसलिए तीन खम्‍बे कौन से हैं जिस पर हमें किसानी करनी चाहिए एक तिहाई हम जो regular खेती करते हो वो, जो भी करते हो, मक्‍का हो, धान हो, फल हो, फूल हो, सब्‍जी हो जो करते है वो करें। एक तिहाई ताकत जहां आपके खेत की सीमा पूरी होती है। जहां boundary पर आप बाढ़ लगाते हैं बड़ी-बड़ी, एक-एक, दो-दो मीटर जमीन बर्बाद करते हैं। इधर  वाला भी जमीन बर्बाद करता हैं, उधर वाला भी जमीन बर्बाद करता है, दोनों पड़ोसी बीच में जमीन बर्बाद करते हैं। क्‍या हम वहाँ पर टिम्‍बर की खेती कर सकते हैं क्‍या? ऐसे पेड़ उगाए जिससे फर्नीचर बनता है, मकान बनाने में काम आता है। ऐसे वृक्षों की खेती करे। ऐसे पेड़ लगाए। 15-20 साल में घर में बेटी शादी हो करने योग्‍य जाएगी, यह एक पेड़ काट दोगे, बेटी की शादी हो जाएगी। आज हिंदुस्‍तान बहुत बड़ी मात्रा में टिम्‍बर import करता है। विदेशों में पैसा जाता है हमारा। अगर हमारा किसान तय कर ले कि खेत के किनारे पर जो जमीन आज बर्बाद हो करके पड़ी है, सिर्फ demarcation के लिए पड़ोसी ले न जाए इसलिए बाढ़ लगा करके बैठे हैं दो-दो, तीन-तीन मीटर खराब हो रही है, जमीन। आप देखिए कितनी बड़ी income हो सकती है।
और तीसरा, तीसरा महत्‍वपूर्ण पहलू है animal husbandry. दूध के लिए कुछ करे, अण्‍डों के लिए पॉल्‍ट्री फार्म करे। मधुमक्‍खी का पालन करे, मधु का निर्माण करे, शहद का निर्माण करे। इसके लिए अलग ताकत नहीं लगती है। सहज रूप से साथ-साथ चलता है। और यह भी बहुत बड़ा ताकत देने वाला काम है।

और मैं चाहूंगा कि भारत जो कि दुनिया में सबसे ज्‍यादा दूध उत्‍पादन करता है, लेकिन यह दुर्भाग्‍य है कि प्रति पशु जितना दूध उत्‍पादन होना चाहिए वो अभी हमें पार करना बाकी है। और इसलिए हमारे पशु की दूध की productivity कैसे बढ़े, उस पर हमने बल देना है। पशु  को आहार मिले, उस आहार के लिए अलग से प्रबंध करना है। पशु को आरोग्‍य की सुविधाएं मिलें उस पर ध्‍यान केंद्रित करना है। हमारे पशु की नस्‍ल बदलें इसके लिए सरकार बड़ा मिशन ले करके काम कर रही है। ऐसे अनेक प्रयास है जिन-जिन प्रयासों के परिणामस्‍वरूप हम हमारे पशुधन की ताकत को बढ़ा सकते हैं। उससे हम अपनी आय बढ़ा सकते हैं।

आज शहद दुनिया में शहद का बहुत बड़ा मार्केट है। भारत का किसान शहद के उत्‍पादन में बहुत कम संख्‍या में है। और शहद ऐसा है कभी खराब नहीं होता। सालों तक घर में रहे, घर में भी काम आता है बेचने के भी काम आता है। दवाईयों में भी बिकता है और एक खेत के कोने में हमारे घर के ही कोई व्‍यक्ति उसको संभाले तो काम चल जाता है।

इन तीनों खम्‍बों पर अगर हम हमारी किसानी को आगे बढ़ांएगे, तो किसान को प्राकृतिक आपदा के कारण संकट आने के बावजूद भी बचने का रास्‍ता निकल आ सकता है, बर्बाद होने से बच सकता है। और इसके लिए सरकार की योजनाएं हैं। इस बार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना मेरे किसान भाईयों-बहनों के चरणों में मैंने रखी है। यह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना यह सिर्फ कागज़ी योजना नहीं है, यह किसान की जिंदगी से जुड़ा हुआ काम है। और मैंने बड़ी भक्ति के साथ मेरे किसानों की भक्ति करने के लिए यह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ले करके मैं आपके पास आया हूं। बड़ा विचार-विमर्श किया है मैंने किसानों से सलाह-मश्‍विरा किया है, अर्थशास्त्रियों से किया है, सरकारों से किया है, बीमा कंपनियों से किया है और तब जा करके योजना बनी  है।
हमारे देश में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने फसल बीमा योजना चालू की। बाद में दूसरी सरकार आई उसने उसमें थोड़ा इधर-उधर कर दिया। मुसीबत यह आई कि किसान का फसल बीमा में से विश्‍वास ही उठ गया। उसको लगता है कि पैसे ले तो जाते हैं लेकिन मुसीबत के समय आते ही नहीं है। किसान की शिकायत सच्‍ची है। मैंने उन सारी शिकायतों को ध्‍यान  में रख करके योजना बनाई है। और यह पहली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ऐसी है कि जिसमें प्रीमियम कम से कम है। और सुरक्षा ज्‍यादा से ज्‍यादा है। यह पहली बार ऐसा हुआ है।

अब तक हमारे देश में सौ किसान हो, तो 20 किसान से ज्‍यादा फसल बीमा कोई लेता ही नहीं है। और धीरे-धीरे वो भी कम हो रहे थे। कम से कम इतना तो तय करे कि एक-दो साल में गांव के आधे किसान फसल बीमा योजना ले लें। इतना हम कर सकते हैं क्‍या? अब टेक्‍नोलॉजी का उपयोग होने वाला कि प्राकृतिक आपदा आई तो क्‍या नुकसान हुआ, कहां नुकसान हुआ? तुरंत हिसाब लगाया जाएगा। और तुरंत पैसे मुहैया कराने की व्‍यवस्‍था यह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में है। अब दो-दो, तीन-तीन साल इंतजार करने की जरूरत नहीं।
और एक महत्‍वपूर्ण काम है, पहले ओले गिर गए, आंधी आ गई, नुकसान हो गया, उसका भी हिसाब रहता था। लेकिन फसल काटने के बाद खेत में अगर उसका ढेर पड़ा है, और अचानक आंधी आई, बारिश आई, ओले गिरे, बर्बाद हो गया तो सरकार कहती थी कि भई नहीं यह फसल बीमा में नहीं आता, क्‍यों? क्‍योंकि यह तो तुम्‍हारी कटाई हो गई है, तुम घर नहीं ले गए इसलिए खराब हुआ तुमको ले जाना था। इस सरकार ने एक ऐसी फसल बीमा योजना लाई है कि कटाई के बाद अगर 14 दिन तक खेत के अंदर अगर पड़ा है सामान और अगर बारिश आ गई तो उसका भी बीमा मिलेगा, यहां तक निर्णय किया गया है।

और एक निर्णय किया है कि मान लीजिए आपने सोचा कि जून महीने में बारिश आने वाली  है, सारा खेत तैयार करके रखा, बीज ला करके रखे, मेहनत करने के लिए जो भी करना पड़े सब करके रखा, लेकिन जून महीने में बारिश आई नहीं, जुलाई महीने में बारिश आई नहीं, अगस्‍त महीने में बारिश आई नहीं। अब आपका क्‍या होगा भई, जब बारिश ही नहीं आई, तो फसल खराब होने का सवाल ही नहीं होता है, क्‍यों, क्‍योंकि आपने बोया ही नहीं है। अब जब बोया ही नहीं है तो फसल हुई ही नहीं। फसल हुई नहीं तो फसल बर्बाद हुई नहीं और फिर बीमा वाले कह देते हैं अब तुम्‍हारी छुट्टी, कुछ नहीं मिलेगा। इस सरकार ने एक ऐसी योजना बनाई है कि अगर आपके इलाके में बारिश नहीं आई, आपका बोना संभव ही नहीं हुआ तो भी आपको 25 प्रतिशत पैसे मिल जाएंगे, ताकि आपका साल बर्बाद न हो जाए, यह काम हमने सोचा है।

भाईयों-बहनों किसान के लिए क्‍या किया जा सकता है इसकी एक-एक बारीक चीज पर हमने ध्‍यान दिया है। अगर हमारे यहां पहले कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए, तो 50 प्रतिशत अगर नुकसान होता था तब पैसे मिलते थे और वो भी एक पूरे इलाके में 50 प्रतिशत हिसाब बैठना चाहिए। हमने यह सब निकाल दिया और हमने कहा अगर 33 percent भी हुआ तो भी उसको मुआवजा दिया जाएगा। आजादी से अब तक सभी सरकारों में इस विषय की चर्चा हुई। हर किसानों ने इसकी मांग की, लेकिन किसी सरकार ने इसको किया नहीं था। हमने इसको कर दिया।

भाईयों-बहनों प्राकृतिक आपदा में किसान को मदद कैसे मिले? इसके सारे norms बदल दिये। सारी परंपराएं निकाल दी है। और किसान को विश्‍वास  दिलाया है और दूसरा यह भी किया है कि जनधन अकाउंट खोलो, मदद सीधी आपके खाते में जाएगी। कोई बिचौलिए के पैर आपको पकड़ने नहीं पड़ेंगे। हम सब जानते हैं यूरिया के लिए क्‍या-क्‍या होता था। रात-रात कतार में किसान खड़ा रहता था। कल यूरिया आने वाला है। और यूरिया की काला-बाजारी होती थी। कहीं-कहीं पर यूरिया लेने के लिए लोग किसान आते थे, लाठी चार्ज होता था। और मेरा तो अनुभव है मैं प्रधानमंत्री बन करके बैठा तो पहले तीन, चार, पांच महीने सारे मुख्‍यमंत्रियों की एक ही चिट्ठी आती थी कि हमारे प्रदेश में यूरिया कम है यूरिया भेजो, यूरिया भेजो, यूरिया भेजो। भारत सरकार यूरिया क्‍यों देती नहीं है। जो हमारे विरोधी लोग थे वो बयान देते थे अखबारों में भी छपता था कि मोदी सरकार यूरिया नहीं देती। पिछले दिनों यूरिया पर इतना काम किया, इतना काम किया कि गत वर्ष मुझे एक भी मुख्‍यमंत्री ने यूरिया की कमी है ऐसी  चिट्टी नहीं लिखी। पूरे देश में कहीं पर भी यूरिया को ले करके लाठी चार्ज नहीं हुआ है। कहीं पर किसान को मुसीबत झेलनी पड़ी।

और अब तो और कुछ किया है हमने यूरिया को नीम कोटिंग किया है। यह नीम कोटिंग क्‍या है? यह जो नीम के पेड़ होते हैं, उसकी जो फली होती है उसका तेल यूरिया पर लगाया गया है, उसके  कारण जमीन को ताकत मिलेगी। अगर आज आप दस किलो यूरिया उपयोग करते हैं, नीम कोटिंग है, तो छह किलो, सात किलो में चल जाएगा, तीन किलो, चार किलो का पैसा बच जाएगा। यह किसान की income में काम आएगा। किसान की income डबल कैसे होगी, ऐसे होगी। नीम कोटिंग का यूरिया। और इससे एक और फायदा है जहां-जहां नीम के पेड़ हैं वहां अगर लोग फली इकट्ठी करेंगे तो उस फली का बहुत बड़ा बाजार खड़ा हो जाएगा, क्‍योंकि यूरिया बनाने वालों को नीम कोटिंग के लिए चाहिए, क्‍योंकि भारत सरकार ने hundred percent यूरिया नीम कोटिंग का कर दिया है। इसका दूसरा परिणाम यह होगा पहले क्‍या होता था यूरिया सारा लिखा जाता था तो किसान के नाम पर। सरकार के दफ्तर में लिखा जाता था कि किसान को यूरिया की सब्सिडी में इतने हजार करोड़ गए। लेकिन क्‍या सचमुच में वो किसान के लिए जाते थे क्‍या? सब्सिडी जाती थी, यूरिया के लिए जाती थी, लेकिन यूरिया किसान तक नहीं पहुंचता था वो केमिकल के कारखाने में पहुंच जाता था। क्‍योंकि उसको सस्‍ता माल मिलता था, वो उस पर काम करता था और उसमें से वो चीजें बना करके बाजार में बेचता था और हजारों-लाखों रुपये की कमाई हो जाती थी। अब नीम कोटिंग के कारण एक ग्राम यूरिया भी किसी केमिकल फैक्‍ट्री को काम नहीं आएगा। चोरी गई, बेईमानी गई और किसान को जो चाहिए था वो किसान को पहुंच गया।

मेरे कहना का तात्‍पर्य यह है मेरे किसान भाईयों-बहनों कि अब हमें आधुनिक विज्ञान का उपयोग करते हुए कृषि के क्षेत्र में आगे बढ़ना है। हमने प्रयोग करने की हिम्‍मत दिखानी है। आज सब कुछ विज्ञान मौजूद है। आज जो सरकार ने initiative लिए हैं, वो आपके दरवाजें पर दस्‍तक दे रहे हैं। मैं खास करके युवा किसानों को निमंत्रण देता हूं आप आइये, मेरी बात पर गौर कीजिए, भारत सरकार की नई योजनाओं को ले करके आगे बढि़ए। और मैं विश्‍वास दिलाता हूं भारत का ग्रामीण जीवन, भारत के ग्रामीण गरीब का जीवन, भारत के किसान का जीवन हम बदल सकते हैं और उस काम के लिए मुझे आपका साथ और सहयोग चाहिए। मेरी आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं। राधामोहन जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं है। यह कृषि मेला के द्वारा आने वाले दिनों में सभी किसान उसका फायदा

उठाए। यही शुभकामनाओं के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Thursday, 17 March 2016

Sufism is the voice of peace, co-existence, compassion and equality; a call to universal brotherhood: PM Modi


Syed Mohammad Ashraf, Founder President, All India Ulama and Mashaik Board
Shawki Ibrahim Abdel Karim Allam, Grand Mufti of Egypt,
Shaykh Hashimuddin Al Gailani, from Baghdad
Syed Minhaj Ur Rehman from Bangladesh
Diwan Ahmed Masood Chisti from Pakistan
Syed Nizami from Nizamuddin Dargah and Syed Chisti from Ajmer Sharif
My ministerial colleagues,
Scholars and Sufis from India
Our guests from our neighbours and from nations far beyond,

Welcome to a land that is a timeless fountain of peace, and an ancient source of traditions and faiths, which has received and nurtured religions from the world.

Welcome to a people with an abiding belief in Vasudhaiva Kutumbakam, the World is one family.

A belief in harmony with the message of Holy Quran that mankind were one community, then they differed among themselves,

A creed echoed in the words of the great Persian Sufi poet Saadi, written in the United Nations, that human beings come from the same source: We are one family.

Welcome to the ancient city of Delhi - built by the genius of diverse peoples, cultures and faiths.

Like our nation, the city’s heart has place for every faith, from those with few followers to those with billion believers.

Its magnificent shrines include the dargahs of great Sufi saints Mehboob-e-Ilahi and Hazrat Bakhtiyar Kaki, that draw people from all faiths and all corners of the world.

This is an extraordinary event of great importance to the world, at a critical time for humanity.

At a time when the dark shadow of violence is becoming longer, you are the noor, or the light of hope.

When young laughter is silenced by guns on the streets, you are the voice that heals.

In a world that struggles to assemble for peace and justice, this is an assembly of those whose life itself is a message of peace, tolerance and love.

You have come from different lands and cultures, but you are united by a common faith.

You speak different languages, but they blend together in a message of harmony.

And, you represent the rich diversity of the Islamic civilization that stands on the solid bedrock of a great religion

 It is a civilization that reached great heights by the 15th century in science, medicine, literature, art, architecture and commerce.

It drew on the immense talents of its people and also Islam’s engagement with diverse civilizations – ancient Egypt, Mesopotamia and Africa; the Persian, Central Asian and Caucasian lands; the region of East Asia; and, with Buddhism and Indian philosophy and science.

As it enriched itself, it also enriched the world.

It set, once again, an enduring lesson of human history: it is through openness and enquiry, engagement and accommodation, and respect for diversity that humanity advances, nations progress and the world prospers.

And, this is the message of Sufism, one of the greatest contributions of Islam to this world.

From its origins in Egypt and West Asia, Sufism travelled to distant lands, holding aloft the banner of faith and the flag of human values, learning from spiritual thoughts of other civilisations, and attracting people with the life and message of its saints.

In the different settings of Saharan Africa or in Southeast Asia, in Turkey or in Central Asia, in Iran or India, Sufism reflected the universal human desire to go beyond the practice and precepts of religion for a deeper unity with the Almighty.

And, in that spiritual and mystical enquiry, Sufis experienced the universal message of Almighty:

That perfection in human life is reflected in the qualities that are dear to God.

That all are creations of God; and, that if we love God, we must also love all his creations.

As Hazrat Nizamuddin Auliya said, “Almighty holds dear those who love Him for the sake of human beings, and those who love human beings for the sake of Almighty.”

This is the message of oneness of humanity, of all of Almighty’s creations.

For the Sufis, therefore, service to God meant service to humanity.

In the words of Khwaja Moinuddin Chishti, of all the worships, the worship that pleases the Almighty God the most is the grant of relief to the humble and the oppressed.

In a beautiful imagery of human values, he said, human beings must have the affection of the Sun, the generosity of the river and the hospitality of the earth, because they benefit us all, without discrimination and distinction among people.

And, its humanism also upheld the place and status of women in society.

Above all, Sufism is a celebration of diversity and pluralism, expressed in the words of Hazrat Nizamuddin Auliya, that every people has its own path of truth, beliefs and focus of reverence.

These words reflect the divine message to the Holy Prophet that there is no compulsion in religion; And also that to every people we have appointed ways of worship which they observe.

And, it is in harmony with the soul of the Bhakti saint’s saying in the Hindu tradition, “Into the bosom of the one great sea, Flow streams that come from hills on every side.”

And in the wisdom of Bulleh Shah, “Lord is mixed in every heart.”

These values are the need of our times.

This is the reality of Nature. We learn this wisdom in the perfect balance and harmony that exists in the vast diversity of a forest.

Its message is beyond the confines of schools and sects. It’s a spiritual quest that traces its origin from the Holy Prophet and the fundamental values of Islam, which literally means peace.

And, it reminds us that when we think of the 99 names of Allah, none stand for force and violence, and that the first two names denote compassionate and merciful. Allah is Rahman and Raheem.

Sufism is the voice of peace, co-existence, compassion and equality; a call to universal brotherhood.

And, just as India became a principal center of Islamic civilization, our nation also emerged as one of the most vibrant hubs of Sufism.

Sufism became the face of Islam in India, even as it remained deeply rooted in the Holy Quran, and Hadis.

Sufism blossomed in India’s openness and pluralism. It engaged with her spiritual tradition, and evolved its own Indian ethos.

And, it helped shape a distinct Islamic heritage of India.

We see this heritage in the fields of art, architecture and culture that is part of the fabric of our nation and our collective daily lives.

We see it in the spiritual and intellectual tradition of India.

It helped strengthen the inclusive culture that is our great nation’s immense contribution to the cultural tapestry of this world.

In Baba Farid’s poetry or Guru Granth Sahib, we feel the same spiritual connection.

We see compassion in the langars of Sufi shrines and the village tombs of local Pirs that attracted the poor and hungry;

The words of Hindavi were spoken in the Sufi Khanqahs.

Sufism’s contribution to poetry in India is huge. Its impact on the development of Indian music is profound.

None had a greater impact than the Sufi poet-musician Amir Khusrau. Eight centuries later, his poetry and musical innovation continue to be part of the soul of Hindustani music. No one had spoken of Indian music with such passion as he had.

Who else could have expressed love for India so beautifully as he did:

“But India, from head to toe, is a picture of heaven,

Adam came from the palace of paradise,

He could only be sent to an orchard of fruits that is India.

If India is not paradise, how could it be made the abode of the peacock, the bird of paradise?”

It is this spirit of Sufism, the love for their country and the pride in their nation that define the Muslims in India.

They reflect the timeless culture of peace, diversity and equality of faith of our land;

They are steeped in the democratic tradition of India, confident of their place in the country and invested in the future of their nation;

And, above all, they are shaped by the values of the Islamic heritage of India. It upholds the highest ideals of Islam and has always rejected the forces of terrorism and extremism.

Now, as they travel to different parts of the world, they are the ambassadors of the values and traditions of our nation.

As a nation, we stood against colonialism and in our struggle for freedom.

At the dawn of independence some chose to go away; and, I believe, that it also had to do with the colonial politics of that time.

The tallest of our leaders, such as Maulana Azad, and important spiritual leaders, such as Maulana Hussain Madani, and millions and millions of ordinary citizens, rejected the idea of division on the basis of religion.

Now, India is moving forward on the strength of the struggles, the sacrifices, the bravery, the knowledge, the skill, the art and the pride of every member of every faith in our diverse and yet united nation.
Like the strings of sitar that each produces a note, but come together to create a beautiful melody.

This is the spirit of India. This is the strength of our nation.

All our people, Hindus, Muslims, Sikhs, Christians, Jains, Buddhists, the micro-minority of Parsis, believers, non-believers, are an integral part of India.

Just as it once came to India, today Sufism from India has spread across the world.

But, this tradition that evolved in India belongs to the whole of South Asia.

That is why I urge others in the region to nurture and revive this glorious heritage of ours.

When the spiritual love of Sufism, not the violent force of terrorism, flows across the border, this region will be the paradise on earth that Amir Khusrau spoke about.

Let me paraphrase what I have said before: Terrorism divides and destroys us.

Indeed, when terrorism and extremism have become the most destructive force of our times, the message of Sufism has global relevance.

In the centres of conflict in West Asia to calm cities in distant countries, in the remote villages of Africa to the towns in our own region, terrorism is a daily threat.

Each day brings us terrible news and horrifying images:

• of schools turned into graveyards of innocence;
• of prayer gatherings turned into funeral processions,
• of call to prayer or Azaan drowned by the sound of explosion;
• of blood on the beach, massacres in malls and smouldering cars on streets;
• of thriving cities ruined and priceless heritage destroyed;
• and, of parents bearing coffins, entire communities dislocated, millions displaced, and refugees caught between fire and stormy seas.

In this digital century of new promise and opportunities, the reach of terror is growing and its toll is rising every year.

Since the beginning of this century, tens of thousands of families have lost their loved ones in thousands of terrorist incidents globally.

Last year alone, I am talking about 2015, over 90 countries experienced terrorist attacks. Parents in 100 countries live with the daily pain of their children lost to the battlefields of Syria.

And, in a globally mobile world, one incident can claim citizens of many nations.

Every year, we spend over 100 billion dollars on securing the world from terrorism, money that should have been spent on building lives of the poor.

The impact cannot be fully captured in statistics alone. It is changing the way we live.

There are forces and groups that are instruments of state policy and design. There are others recruited to the cause in misguided belief.

There are some who are trained in organized camps. There are those who find their inspiration in the borderless world of cyber space.

Terrorism uses diverse motivations and causes, none of which can be justified.

Terrorists distort a religion whose cause they profess to support.

They kill and destroy more in their own land and among their own people than they do elsewhere.

And, they are putting entire regions to peril and making the world more insecure and violent.

The fight against terrorism is not a confrontation against any religion. It cannot be.

It is a struggle between the values of humanism and the forces of inhumanity.

It is not a conflict to be fought only through military, intelligence or diplomatic means.

It is also a battle that must be won through the strength of our values and the real message of religions.

As I have said before, we must reject any link between terrorism and religion. Those who spread terror in the name of religion are anti-religious.

And, we must advance the message of Sufism that stands for the principles of Islam and the highest human values.

This is a task that states, societies, sages, scholars and families must pursue.

However, to me, the message of Sufism is not just confined to combating terrorism.

The values of harmony, welfare, compassion and love for human beings are the foundation of a just society.
That is the principle behind my creed of “Sab Ka Saath, Sab Ka Vikaas”.

And, these values are important to preserve and nurture diversity in our societies.

Diversity is a basic reality of Nature and source of richness of a society; and, it should not be a cause of discord.

We need just not constitutional provisions or legal safeguards, but also social values to build an inclusive and peaceful society, in which everyone belongs, secure about his rights and confident of her future.

This is also a time of great flux and transition in the world. The middle of the last century was an important turning point in history. A new world order emerged. Many new nations were born.

At the beginning of a new century, we are at yet another point of transformation on a scale rarely seen in human history.

In many parts of the world, there is uncertainty about the future, and how to deal with it as nations and societies.

These are precisely the times that the world is most vulnerable to violence and conflicts.

The global community must be more vigilant than ever before and counter the forces of darkness with the radiant light of human values.

So, let us remember the teaching of Holy Quran that if anyone slew one innocent person, it would be as if he slew a whole people; if anyone saved one life, it would be as if he saved a whole people.

Let us be inspired by the message of Hazrat Moinuddin Chishti,

With your spiritual light, dissolve the clouds of discord and war and spread goodwill, peace, and harmony among the people.

Let us remember the infinite humanism in Sufi poet Jalaluddin Rumi's words, “Contain all human faces in your own, without any judgment of them.”

Let us also live the sermon of Bible that calls us to do good, seek peace and pursue it.

And, oneness in Kabir’s observation that a river and its waves are one.

And, Guru Nanak Devji’s prayer that Lord, may everyone in the world prosper and be in peace.

Let us be inspired by Swami Vivekananda’s appeal against divisions and for people of all religions to hold the banner of harmony, not of dispute.

Let us also reaffirm the enduring message of Ahimsa of Lord Buddha and Mahavira.

And, from this forum, in this land of Gandhi,

And, of timeless prayers that always end with invocation of

Om Shanti; Shanti; Shanti: Peace, Peace, Peace,; Peace within and in the world.

Let us, therefore, send a message to the world:

• A melody of harmony and humanity
• The embrace of diversity, the spirit of oneness
• Of service with compassion and generosity,
• A resolve against terrorism, a rejection of extremism
• And, a determination to advance peace

Let us challenge the forces of violence with the kindness of our love and universal human values.

and Lastly, Let us restore the light of hope and turn this world into a garden of peace.

Thank you for being here. Thank you for what you stand for. Thank you for the role you are playing in building a better world. Thank you very much, Thanks a lot.

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Saturday, 12 March 2016

The nerve centre of India's development lies in eastern India: PM Modi

मंच पर विराजमान सभी महानुभाव और विशाल संख्‍या में पधारे हुए प्‍यारे भाइयो और बहनों, 

ये आपका उत्‍साह देख करके मैं अंदाज लगा सकता हूं कि इस bridge के प्रति आप लोगों के मन में कितना महात्‍मय है, इस bridge के कारण न सिर्फ यातायात लेकिन यहां के आर्थिक जीवन में भी कितना बड़ा बदलाव आ सकता है इसका भली-भांति अंदाज आप सबके उत्‍साह के कारण मैं अनुमान लगा सकता हूं।

मां गंगा उत्‍तरी बिहार और दक्षिणी बिहार, दोनों को जोड़ती है लेकिन नागरिकों को जुड़ने के लिए व्‍यवस्‍थाएं आवश्‍यक होती हैं। अब आप कल्‍पना कर सकते हैं जब नीतीश जी रेल संभालते थे, अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे, तब का ये सपना इतने सालों के बाद आज पूरा हो रहा है। अगर पिछले दस साल में इसको अगर neglect न किया गया होता, routine budget के हिस्‍से से भी अगर काम किया होता तो भी शायद पांच-सात साल पहले ये काम पूरा हो गया होता। 600 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला प्रोजेक्‍ट विलंब होने के कारण 3000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। ये पैसे जनता-जनार्दन के हैं लेकिन कोई न कोई ऐसे कारण आते हैं कि हमारे देश में विकास की प्रक्रिया अलग हो जाती है और बाकी प्रक्रियाएं उभर करके आ जाती हैं। पिछले 18 महीनों में इसका सबसे ज्‍यादा काम इतने कम समय में, 18 महीनों में हुआ। करीब 34 प्रतिशत काम जो अधूरा पड़ा था इसको पूरा किया गया और हम मानते हैं कि अगर भारत का sustainable development करना है, अगर भारत को आने वाले 25 साल, 30 साल तक लगातार विकास के नए-नए आंक पार  करते जाना है वो तब तक संभव नहीं होगा जब तक हमारा पूर्वी हिंदुस्‍तान develop नहीं होगा। चाहे पूर्वी उत्‍तर प्रदेश हो, चाहे बिहार हो, चाहे पश्चिम बंगाल हो, असम हो, नार्थ-ईस्‍ट हो, उड़ीसा हो, ये सारे क्षेत्र जितने तेजी से develop होंगे हिंदुस्‍तान उतनी ही तेजी से आगे बढ़ने वाला है। अब भारत के विकास की जो Nerve centre है वो Nerve centre Eastern India में है और अगर हम पूर्वी भारत को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो हम यह shortcut के रास्‍ते से नहीं कर पाएंगे।

अब तक हम तत्‍कालीन समस्‍याओं को स्‍पर्श करते गए। लोगों की तत्‍कालीन आवश्‍यकताओं को address करते गए लेकिन अब समय की मांग है कि हम लोगों की तत्‍कालीन आवश्‍यकताओं को तो जरूर address करें लेकिन इस पूरे क्षेत्र को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाना है तो लंबे अरसे की व्‍यवस्‍थाओं को भी विकसित करना अनिवार्य है।

Rail और road, infrastructure, उसके अंदर इतनी ताकत होती है कि वह विकास की न सिर्फ नींव रख देते हैं बल्‍कि विकास को गति भी दे देते हैं और इसलिए पिछली सरकार ने पांच साल में रेलवे के पीछे बिहार में जितना खर्चा किया, उससे करीब-करीब ढाई गुना ज्‍यादा पिछले डेढ़ साल में वर्तमान सरकार ने किया है। यह इसलिए किया है कि बिल्‍कुल मेरा यह conviction है कि भारत का भाग्‍य बदलना है तो हमें बिहार का भाग्‍य पहले बदलना होगा। बिहार को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाना होगा। केन्‍द्र और राज्‍य मिलकर के, कंधे से कंधा मिलाकर के इस काम को करेंगे, यह मेरा पूरा विश्‍वास है और इसलिए infrastructure मुख्‍यतः , रेलवे और road आज उत्‍तर बिहार-दक्षिण बिहार को जोड़ने वाले तीन प्रोजेक्‍ट का एक साथ लोकार्पण एवं शिलान्‍यास हो रहा है।
अब आप देखिए, एक काम तो मैं आज वो कर रहा हूं कि जहां पर पहले मोकामा दोनों तरफ डबल लाइन थी लेकिन बीच में bridge ऐसा था कि वहां डबल लाइन नहीं थी और उसके कारण वो दोनों तरफ की डबल लाइन का जो खर्चा है उसका कोई उपयोग ही नहीं है क्‍योंकि वो आकर के bottleneck बन जाता था। अब इस बात को हमने हाथ में लिया है और मुझे विश्‍वास है कि हम समय की सीमा में इसको पूरा करके देंगे और उस इलाके के विकास के लिए भी एक बहुत बड़ी गति आ जाएगी।

मेरे बिहार के नौजवानों, आपकों एक बहुत बड़ा तोहफा इन दिनों मिला है। दो locomotives, इसके बहुत बड़े कारखाने बिहार के धरती पर लग रहे हैं। 2006-07 से यह कागज पर मसला चल रहा है, भाषणों में काम आ रहा है लेकिन धरती पर कुछ हो नहीं पा रहा है। कोई टेंडर के लिए तैयार नहीं होता था। हमने कुछ innovative चीजें कीं टेंडर में। हमने export का लक्ष्‍य तय किया, हमने भारत की requirement का हिसाब लगाकर के order place का निर्णय किया और वह एक ऐसी रचना थी कि दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों को लगा कि अब हम इसके अंदर टेंडर लेकर के जा सकते हैं और अगर मिल गया तो काम हो सकता है। उस प्रक्रिया ने रंग लाया। दुनिया की बहुत बड़ी कंपनियां आईं। 40 हजार करोड़ रुपयों का Foreign direct investment इन दो जगहों पर, बिहार की धरती पर आने वाला है, वो हिन्‍दुस्‍तान के अंदर सबसे बड़ा माना जाएगा। यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और कम समय में यह सरकार बनने के बाद, 18 महीने मिले है हमें दिल्‍ली में लेकिन 18 महीनों में बिहार हमारी प्राथमिकता है क्‍योंकि भारत का विकास करने के लिए बिहार का विकास अनिवार्य है, यह हम मानते हैं। इसलिए इस काम को भी अंजाम दिया गया है और उसका परिणाम भी आने वाले दिनों में मिलने वाला है।

भाइयो-बहनों, आज के युग में गैस पाइपलाइन भी उतना ही महत्‍व रखती है। अगर हम गैस कनेक्‍टिविटी करते हैं, पाइपलाइन का खर्चा बहुत होता है लेकिन उसके बावजूद भी बिहार को गैस कनेक्‍टिविटी से जोड़ने की दिशा में हम तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं जो आने वाले दिनों में यहां के जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव लाने वाला है।
मेरे बिहार के प्‍यारे भाइयो-बहनों, आपने इस बजट में देखा होगा कि हमने गरीब परिवारों को गैस कनेक्‍शन देने का बीड़ा उठाया है। मैं जानता हूं काम कठिन है। गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले पांच करोड़ परिवारों को आने वाले तीन वर्ष के अंदर-अंदर चूल्‍हे की जगह पर गैस का सिलेंडर मिल जाए और उन माताओं-बहनों को धुएं से बचा लिया जाए, उनके आरोग्‍य की चिन्‍ता की जाए, इसके लिए एक अहम जिम्‍मेवारी सिर पर उठाई है। वैज्ञानिक कहते हैं कि चूल्‍हा जलाकर के, लकड़ी जलाकर के, कोयला जलाकर के जो मॉं खाना पकाती है तो खाना पकाते-पकाते जितना धुंआ उसके शरीर में जाता है वो 400 सिगरेट के बराबर होता है। एक दिन में 400 सिगरेट का धुंआ अगर हमारी माताओं के शरीर में जाए तो उनके शरीर का क्‍या हाल होगा, उनके बच्‍चों का क्‍या हाल होगा। यह मानवता का काम है इसलिए हमने सरकार की तिजोरी से जितना खर्चा लगे लेकिन बीड़ा उठाया है कि गरीब परिवारों को अब यह चूल्‍हा, यह कोयला, उसका धुंआ, उससे मुक्‍ति दिलानी है।
मेरे प्‍यारे भाइयो-बहनों, हमारे देश में आजादी के इतने साल हो गए। अब भी गांवों में बिजली नहीं पहुंची है और बिजली पहुंचाना, यह कोई लक्‍ज़री नहीं है। बिजली अब जीवन का हिस्‍सा बन गई है। वो कोई रईसों का खेल नहीं है, गरीबों के लिए जरूरी है। मैंने एक दिन review लिया कि भई क्‍या हाल है? मैं हैरान था आजादी के 70 साल होने आए, 18 हजार गांव ऐसे थे जहां अभी बिजली का खंभा भी नहीं पहुंचा। मैंने अफसरों को कहा, मुझे एक हजार दिन में काम पूरा करना है। जो 70 साल में नहीं हुआ वो एक हजार दिन में पूरा करना है। बीड़ा उठाया। अभी तो हजार दिन पूरा होने में देर है, बहुत दिन बाकी है लेकिन मुझे आज पता चला कि 6,000 से अधिक गांवों का काम पूरा होगा, बिजली पहुंच गई है और उसका सबसे ज्‍यादा लाभ उत्‍तर प्रदेश और बिहार के गांवों को मिला है। मैं नीतीश जी का आभारी हूं कि इस काम को गति देने में उनकी राज्‍य सरकार की तरफ से भी पूरा सहयोग मिलता रहा है और उसके कारण यह काम भारत सरकार गति से कर रही है। मुझे तो विश्‍वास है अगर एक बार भारत सरकार और बिहार सरकार तय कर ले तो पूरे हिन्‍दुस्‍तान में ये जो 18,000 गांवों का काम बाकी है, उसमें से बिहार को सबसे पहले हम पूरा करके एक गौरावान्‍वित बिहार बना सकते हैं और जिस तरह काम चला है, मेरा विश्‍वास है कि हो जाएगा, यह काम हो जाएगा।

मेरे प्‍यारे भाइयो-बहनों, चाहे बिजली हो, सड़क हो, पानी हो, रेल हो, इन चीजों को सामान्‍य मानिवकी की आवश्‍यकताएं हैं और उन आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने का प्रयास है। बिहार से बहुत बड़ी मात्रा में हमारे नौजवान हिन्‍दुस्‍तान के कोने-कोने में आते-जाते रहते हैं। पढ़ने के लिए जाते हैं, रोजी-रोटी कमाने के लिए जाते हैं लेकिन रेलवे में अगर जाना है तो उसका दम उखड़ जाता है। लंबी सफर की ट्रेनों में आरक्षण की सीमा रहती है। इस बार हमारे रेल मंत्री श्रीमान सुरेश प्रभु जी ने एक बड़ा अहम कदम उठाया है और मैं मानता हूं उस अहम कदम का अगर सबसे ज्‍यादा कोई फायदा उठाएगा तो बिहार का नौजवान उठाएगा। वो अहम कदम यह उठाया है कि लंबी सफर की जो ट्रेन है उसमें दो या चार डिब्‍बे ऐसे लगेंगे, दीन-दयाल डिब्‍बे, जिसमें आप last moment भी चढ़ जाना है तो चढ़ जाओ और जहां जाना है पहुंच जाओ। ये इसलिए किया कि गरीब व्‍यक्ति, उसको अगर दूर जाना है, बेटा अगर बिहार से बाहर कहीं काम कर रहा है, अचानक मां‍बीमार पड़ गई और उसको पहुंचना है तो reservation तो संभव नहीं होता है। ये एक ऐसी व्‍यवस्‍था रहेगी कि जिसके कारण ऐसे लोग परेशानी न भुगतें, और समय पर पहुंच सकें। 

विषयों को ऐसे लिया गया है कि जिसके कारण आज हमारे देश में एक neo middle class, middle class उसका bulk भी बहुत बढ़ रहा है। बहुत बड़ी मात्रा में middle class का bulk बढ़ रहा है। वो पहले से थोड़ी plus सुविधा चाहता है। और इसलिए हमने एक हमसफर ट्रेन शुरू करना तय किया है जिसमें तृतीय श्रेणी की air-condition train रहेगी जो सामान्‍य middle class, lower middle class के लोग आर्थिक रूप से उनको ये सुविधा रहेगी और वे अच्‍छी स्‍पीड से चल पाएगी। 

हमारे देश में रेल बहुत पुरानी है। लेकिन रेलवे को हम अब पुरानी रहने देंगे तो रेल बोझ बन जाएगी। जिस रेल ने हिंदुस्‍तान को गति दी, वह रेल अगर वैसे ही पुराने हालात में रही तो वो ही बोझ बनते देर नहीं लगेगी इसलिए रेल का पूरी तरह नवीनीकरण होना चाहिए। उस दिशा में सुरेश जी हमारे बड़े innovative हैं, नए-नए ideas लाते हैं, दुनिया के लोगों से माथापच्‍ची करते रहते हैं। विदेशों से धन भी लाते हैं और मैं विश्‍वास से कहता हूं कि बहुत ही कम समय में पूरी रेल का कायाकल्‍प हो जाएगा, रेल का नवीनीकरण हो जाएगा। चाहे वो infrastructure का मसला हो, चाहे गति का मामला हो, चाहे पैसेंजरों की qualitative सेवा का मसला हो, चाहे रेलवे स्‍टेशनों की सुविधा का मसला हो, चाहे passenger की complaint का मुद्दा हो, चाहे digital technology के द्वारा मोबाइल फोन से रेलवे की सेवाएं लेने की बात हो, अनेक पहलुओं पर एक बहुत ही comprehensive way में रेलवे के नवीनीकरण का काम चल रहा है।

एक बीड़ा उठाया है, तेजस नाम की ट्रेन। ये तेजस ट्रेन 130 की स्‍पीड से चलाने का इरादा है। आज हमारी ट्रेन बहुत कम स्‍पीड से चलती है। इतना बड़ा देश वो अब छुक-छुक गाड़ी से नहीं चल सकता है, उसको गति देने की आवश्‍यकता है इसलिए एक नया concept प्रायोगिक रूप में , तेजस के द्वारा तेज गति से चलाने का इरादा ले करके हम आगे बढ़ रहे हैं।

मैं ये सारी बातों से आपको विश्‍वास दिलाना चाहता हूं, मैं देशवासियों को विश्‍वास दिलाना चाहता हूं कि रेल ये सिर्फ यातायात या आवागमन का साधन नहीं है, रेल भारत के अर्थतंत्र को गति देने वाला एक गतिशील माध्‍यम है और उसको गति देने की दिशा में हम स्‍वयं सरकार को गतिशील बनाये हैं और ये ही आने वाले दिनों में परिणाम देने वाला है। 

आज ये जो तीनों प्रोजेक्‍ट प्रारंभ हुए हैं, मैं मानता हूं पटना के लिए एक बहुत बड़ा वरदान है। आज already ट्रेनें चलनी शुरू हो गई हैं। चाहे मुंगेर हो, चाहे मोकामा हो, ये तीनों पूरे बिहार को एक प्रकार से अपने-आप में समाहित कर लेते हैं। इसका कितना बड़ा प्रभाव पैदा होने वाला है, इसका बिहार के हर व्‍यक्ति को पता है। 
मैं आज बिहार को लाख-लाख शुभकामनाएं देता हूं, बहुत-बहुत धन्‍यवाद देता हूं और Railway ministry को भी बहुत बधाई देता हूं। धन्यवाद ।


Let us make the bar, bench and courts tech savvy: PM Narendra Modi


उपस्थित सभी वरिष्‍ठ महानुभाव!
नीतीश जी ने विस्‍तार से सबके नाम बोले हैं इसलिए मैं पुनरावर्तन नहीं करता हूं लेकिन उन सबका मैं आदर से स्‍वागत करता हूं।

पटना हाईकोर्ट की शताब्‍दी का ये समापन कार्यक्रम है। एक प्रकार से नई सदी की जिम्‍मेवारियों का आरंभ है और इसलिए गत शताब्‍दी में इस हाईकोर्ट ने जिन ऊंचाइयों को प्राप्‍त किया है, जिन परंपराओं के द्वारा सामान्‍य मानविकी में एक विश्‍वास पैदा किया है, जिस कार्य संस्‍कृति के द्वारा समाज में आशा बनती चली गई हैं, उसमें से जो उत्‍तम है, उसको carry forward करते हुए पटना की अगली शताब्‍दी, इस हाईकोर्ट की अगली शताब्‍दी कैसी हो, उसकी नींव मजबूत रखने की जिम्‍मेवारी, यहां उपस्थित सभी की है।

अगर हम आने वाली शताब्‍दी का foundation जितना मजबूत रखेंगे, उतना देश के सामान्‍य मानविकी का व्‍यवस्‍थाओं के प्रति, लोकतंत्र के प्रति विश्‍वास और गहरा होता जाएगा। और इसलिए हम जब इस प्रकार से समारोह का आयोजन करते हैं तो उसके साथ-साथ नए संकल्‍पों का भी अवसर होता है। मैं आशा करूंगा कि आज जब शताब्‍दी वर्ष का समापन हो रहा है तब चाहे Bar हो या bench हो, हम नए benchmark के लिए कैसे आगे बढ़ें, मुझे विश्‍वास है कि जिस व्‍यवस्‍था के पास एक शताब्‍दी की विरासत हो, वो देश को बहुत कुछ दे सकते हैं और ये पटना, यहां का Bar जिसने अनेक महापुरुषों को जन्‍म दिया है, अनेक गणमान्य महापुरुष आप ही के बीच से निकलकर के आए हैं। आने वाले समय में भी उस उज्‍ज्‍वल परंपरा को आप बनाए रखेंगे, ऐसा मुझे आप पर पूरा भरोसा है।

कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे देश में बहुत ही कम जगह ऐसे होती हैं जहां पर लोगों का ध्‍यान रहता है कि उसके 50 साल हुए, 100 साल हुए और उस अवसर को मनाया जाए। मैं एक बार जब मुख्‍यमंत्री था तो एक गांव के स्‍कूल में गया था। वहां शिक्षा बहुत कम थी। Hardly 30-32 percent उस गांव में शिक्षा थी। तो मेरा मन कर गया भई चलो देखें तो सही क्‍या है? मैं जब वहां गया तो मैं हैरान था, वहां जो स्‍कूल बनी थी उस स्‍कूल की उम्र करीब 120 साल थी। यानी जिस गांव में 120 साल पहले स्‍कूल का जन्‍म हुआ उस गांव की शिक्षा 30-32 पर्सेंट के इर्द-गिर्द आ करके अटकी हुई थी। तब हमारे मन में एक चुनौती पैदा होती है कि व्‍यवस्‍थाएं अगर प्राणवान नहीं होंगी, अगर ये व्‍यवस्‍थाएं dynamic नहीं होंगी, अगर ये व्‍यवस्‍थाएं progressive नहीं होंगी, तो हम न समय के साथ चल पाएंगे, न हम समय की मांग को पूरा कर पाएंगे इसलिए हम लोगों के सामने चुनौती हैं कि हमारी व्‍यवस्‍थाओं को हम प्राणवान कैसे बनाएं। कभी-कभी व्‍यवस्‍थाओं का विकास मुश्किल नहीं होता है लेकिन व्‍यवस्‍थाओं को प्राणवान बनाने के लिए बहुत ताकत लगती है, बहुत लंबे अरसे तक जूझना पड़ता है। और इसलिए उस दिशा में इन 100 साल के अनुभव से हम कुछ करें।


आने वाले दिनों में ...मैं एक सुझाव के रूप में सोच रहा हूं। जब मैं यहां बैठा था तो विचार आया, क्‍या हर वर्ष हमारे कोर्ट एक बुलेटिन निकाल सकते हैं क्‍या कि हमारी कोर्ट में सबसे पुराना pending case इतने साल पुराना है| कहीं 50 साल पुराना हो सकता है, कहीं 40 साल पुराना हो सकता है। इससे एक sensitivity पैदा होगी। समाज में भी इसके कारण एक चर्चा होगी, Bar में बैठे हुए लोग भी चर्चा करेंगे, यार हम इतने सालों से यहां बैठे हैं, ये 50 साल से मुकदमा चल रहा है हम लोगों ने कुछ करना चाहिए। एक ऐसा माहौल बनेगा जो परिणाम लक्ष्यीय  काम की योजना के लिए हमें प्रेरित करेगा। और ये कोई मुश्किल काम नहीं है। और ये गलत काम भी नहीं है। अगर मान लीजिए कि कोई 50 साल पुराना कोई केस का नाम निकल गया तो कोई आज बैठे हुए लोगों की जिम्‍मेवारी नहीं होगी, वो तो सब रिटायर्ड हो चुके होंगे। लेकिन अच्‍छा होगा कि उसके कारण pendency की जो चिन्‍ता है उसमें से बाहर निकलने का एक मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार होगा।

दूसरी एक सुविधा है इन दिनों जो आज से पुरानी पीढ़ी के जो Bar के member थे उनको ये सौभाग्‍य प्राप्‍त नहीं हुआ था, जो आज की पी‍ढ़ी को प्राप्‍त हुआ है, आज के Bar को प्राप्‍त हुआ है। और वो है technology. पहले अगर अगर आपको किसी केस को लड़ना है तो लंबे अरसे तक research में टाइम जाता था, पूरी टीम लगी रहती थी पुराने reference ढूंढने के लिए। आज Google एक ऐसा आपका bar member है कि आप जो चाहो वो Google खोज करके निकाल करके दे देता है और आसानी से perfect judgment को quote करके अपनी बात मनवा सकते हो और इसलिए हमारा Bar, हमारी bench, हमारी कोर्ट इसको हम कितने ज्‍यादा techno savy बना सकते हैं, कितनी तेजी से हम digital system को हमारी व्‍यवस्‍था में inject कर सकते हैं और उसके कारण quality of argument, quality of judgments, space of the judgment, इन सबमें एक बहुत बड़ा आमूल-चूल परिवर्तन आ सकता है। और उस दिशा में हम प्रयास करें।

हमारे देश के आजादी के आंदोलन की तरफ देखें तो इस बात को हमें स्‍वीकार करना होगा कि भारत की आजादी के आंदोलन का नेतृत्‍व प्रमुखतया वकीलों के द्वारा, बैरिस्‍टरों के द्वारा हुआ। Bar  के ही member थे जिन्‍होंने देश की आजादी की लड़ाई को लड़ा। अंग्रेज़ सल्‍तनत के सामने अपनी बुद्धि का उपयोग, कानूनी व्‍यवस्‍था का उपयोग करते हुए कैसे लड़ा जा सकता है, यह मिसाल अगर किसी ने कायम की तो इस देश की Bar की परंपरा ने की, वकीलों की परंपरा ने की है और इस इस प्रकार से इस पेश से जुड़े हुए लोगों का एक बहुत बड़ा योगदान भारत की आजादी के आंदोलन से जुड़ा हुआ है। उसके बाद भी जब-जब भारत में संकट आया, मूलभूत बातों पर संकट आया, ज्‍यादातर Bar ने आवाज़ उठाई है, ज्‍यादातर न्‍यायालयों ने उसको एक नई ताकत देने का प्रयास किया इसलिए भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए जहां विविधता इतनी है। समाज को बांधकर रखना है, देश को जोड़कर रखना है तो एक सक्रिय प्रयास और वो भी जो समाज में दूरिया पैदा न करें, समाज को जोड़ने के प्रयास में उपकारक हो, उस प्रकार के हमारे movement की आज समय की मांग है। उसको अगर हम Bar के माध्‍यम से चला दे तो बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।

कभी-कभार एक Intuit democratic values में किस प्रकार का बदलाव आता है। एक घटना मेरे लिए बड़ी.. It was a touchy for me so मैं share करना चाहूंगा। मैं पिछले दिनों UK के प्रवास में था तो वहां के प्रधानमंत्री ने मुझे एक सनद गिफ्ट की। Bar की सनद गिफ्ट की और उसका इतिहास ऐसा था कि भारत की आजादी में जो सशस्‍त्र क्रान्‍ति में विश्‍वास करते थे। दो प्रवाह थे – एक अहिंसा में विश्‍वास करता था, एक सशस्‍त्र क्रान्‍ति में विश्‍वास करता था। सशस्‍त्र क्रान्‍ति में विश्‍वास करने वाले लोगों के क्रान्‍ति गुरु थे, श्‍यामजी कृष्‍ण वर्मा। 1930 में उनका स्‍वर्गवास हुआ और लंदन में अंग्रेजों की नाक के नीचे बैठकर के वो आजादी की लड़ाई लड़ते थे। मदनलाल ढींगरा समेत कई लोगों को प्रेरणा देते रहते थे और इसलिए वहां के Bar ने उनकी सनद को withdraw कर लिया।


मैं इस Bar जब गया तो Bar ने officially पुनर्विचार किया और इतने सालों के बाद, शायद 1920 के बाद, करीब-करीब 100 साल के बाद उस सनद को उन्‍होंने सम्‍मानपूर्वक लौटाया। यानी भारत की आजादी का एक रवैया, अंग्रेजों ने जिसकी सनद को ले लिया था। बाद में ले लिया था लेकिन 100 साल के बाद उस सनद को लौटाया। इस घटना का मैं इसलिए जिक्र करता हूं कि 100 साल के बाद उस व्‍यक्‍ति का कोई रिश्‍तेदार भी वहां मौजूद नहीं है लेकिन न्‍याय व्‍यवस्‍था से जुड़े हुए लोगों के मन में एक था कि यह स्‍थिति बदलनी चाहिए और उन्‍होंने initiative लिया और बदला। भारत का प्रधानमंत्री वहां जाता है तो एक महत्‍वपूर्ण घटना के रूप में उसको लौटाया जाता है। ये है हमारे यहां मूल्‍यों की प्रतिबद्धता के संबंध में पूरी वैश्‍विक सोच, हम उन चीजों को लेकर के कैसे आगे बढ़े।

मैं आज इस शताब्‍दी समारोह के समापन के साथ नई शताब्‍दी के शुभारंभ के समय आप सबको बहुत शुभकामनाएं देता हूं और देश को बहुत-सी अमानत आपकी तरफ से मिलती रहेगी। इसी एक अपेक्षा के साथ सबका बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

 Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

My dream is of a transformed India alongside an advanced Asia: PM Narendra Modi

Madam Lagarde, My Cabinet colleague Shri Jaitley, Ladies and Gentlemen,

 I warmly welcome you all to India and to Delhi. Delhi is a city with a rich heritage, and has several historical landmarks. I hope you will have time to see some of them.

I am very happy that the IMF has collaborated with us in organizing this conference. Madam Lagarde, this event is another example of your fondness for India and Asia. I congratulate you on being appointed as Managing Director for a second term. This reflects the confidence the world has in your understanding of the global economy, and your ability to lead this institution. Madam Lagarde, the long pending quota revisions agreed in 2010 have finally come into effect. The quotas of emerging countries will now better reflect their weight in the world economy. This will give them more say in collective decisions in the IMF. You have demonstrated exceptional leadership, in managing the tensions that emerged due to the delay. You played a major role in finally persuading all members to ratify the decisions taken in 2010.

I am sure, the IMF will be able to build on this success. Reform of global institutions has to be an on-going process. It must reflect changes in the global economy, and the rising share of emerging economies. Even now, IMF quotas do not reflect the global economic realities. Change in quotas is not an issue of increasing the ‘power’ of certain countries. It is an issue of fairness and legitimacy. The belief that quotas can be changed, is essential for the fairness of the system. For poor nations to respect the legitimacy of such institutions, they must be able to aspire and to hope. I am, therefore, very happy that the IMF has decided to finalize the next round of quota changes by October 2017.

India has always had great faith in multi-lateralism. We believe that as the world becomes more complex, the role of multilateral institutions will increase. Some of you may not be aware that India was represented at the Bretton Woods Conference in 1944, which gave birth to the IMF. India’s delegate was Mr. R.K. Shanmukham Chetty, who later became independent India’s first Finance Minister. Our ties, therefore, are more than seventy years old. We are a Founding Member of the Asian Infrastructure Investment Bank and the New Development Bank. We are confident that these banks will play an important role in the development of Asia.

The Fund has built up an immense stock of economic expertise. All its members should take advantage of this. All of us need to pursue policies that provide a stable macro economy, enhance growth and further inclusion. The Fund can be of great assistance in this.

Apart from advice, the IMF can help in building capacity for policy making. I am happy to announce a new partnership with Bangladesh, Bhutan, Maldives, Nepal, Sri Lanka, India and the IMF. We have agreed to set up the South Asia Regional Training and Technical Assistance Centre. The centre will provide training to government and public sector employees. It will enhance their skills and improve the quality of their policy inputs. It will also provide technical assistance to governments and public institutions.

Let me now turn to the theme of this conference. I will touch on two issues: firstly, “Why Asia?” And secondly, “How India”? Why is Asia so important, and how can India contribute?

Many knowledgeable people have said that the twenty first century is, and will be, the Asian Century. Three out of every five people in the world live in Asia. Its share in global output and trade is now close to one-third. Its share in global foreign direct investment is about forty percent. It has also been one of the world’s most dynamic regions. Although Asia has slowed down, it is still growing at a rate three times greater than that of the advanced countries. It is, therefore, the ray of hope for global economic recovery.

When we think about Asia, we must recognize that it is distinct in many ways.

For example, the theme of this conference is ‘Investing for the Future’. Asian Families tend naturally to save more than people in other parts of the world. Thus they invest for the future. Economists have commented on the savings ethic of Asian countries. Asians tend to save to buy a house, rather than borrow to buy a house.

Many Asian countries have relied more on developmental financial institutions and banks than on capital markets. This provides an alternative model for the financial sector.

Social stability built on strong family values is another feature of Asia’s development. Asians tend to leave things behind for the next generation.

Madam Lagarde, you are one of the world’s top women leaders. You will be interested in another unique feature of Asia which is rarely commented upon: which is, the large number of women leaders. India, Sri Lanka, Bangladesh, Pakistan, Indonesia, Thailand, Korea, Myanmar, and Philippines: All of these countries have had women as national leaders. Asia has done so to a much greater degree than other continents. Today, four large states of India – West Bengal, Tamil Nadu, Gujarat and Rajasthan – are headed by democratically elected women. The Speaker of the Lower House of Parliament in India is also a woman.

India has a special place in Asia. It has historically contributed to Asia in several ways. Buddhism spread to China, Japan, and other parts of South East Asia from India. It has had a lasting influence on the continent’s culture. Kingdoms in the South and West of India have engaged in maritime trade with other parts of Asia for over a thousand years. The Indian national movement showed other Asian countries that freedom from colonial rule could be achieved without violence. It also demonstrated clearly that the sense of nationhood, could be broad and inclusive. It need not be defined by narrow linguistic or religious identities. The Sanskrit saying “Vasudhaiva Kutumbakam” – the world is one family - refers to this sense of the oneness of all identities.

India has dispelled the myth that democracy and rapid economic growth cannot go together. India’s growth rate of over seven per cent is being achieved in a country that is also a vibrant democracy. It is sometimes assumed that democracy is a colonial gift to India. But historians tell us that India had produced forms of democratic self governance, many centuries ago, when democracy was unknown in many parts of the world.

India has also shown that a large, diverse country can be managed in a way that can promote economic growth and maintain social stability. One way in which we are doing this is through cooperative and competitive federalism. The states and the Centre come together to pursue common objectives. States which pursue good policies and deliver essential services for the poor, induce others to follow.

Our rapid economic growth is also very distinct in Asia. We have never tried to gain in trade at the expense of our partners. We do not follow “beggar thy neighbour” macro-economic policies. We have never undervalued our exchange rate. We add to world and Asian demand by running current account deficits. We are therefore good Asian and good global economic citizens, and a source of demand to our trading partners.

We all want Asia to succeed. I firmly believe that India can contribute to Asian prosperity and development by being economically strong. Amid global problems, I am happy to say that India is a haven of macro-economic stability and a beacon of hope, dynamism and opportunity. Madam Lagarde, you have referred to India as the “bright spot” in the global economy. I view this as a great privilege and, at the same time, a major responsibility. Let me outline our achievements in the last few months and our priorities for the period ahead.

We have achieved major gains in macro-economic stability. A durable reduction in inflation, steady fiscal consolidation, a comfortable balance of payments position and build-up of foreign exchange reserves are the highlights.

In a difficult external environment and despite a second successive year of weak rainfall, we have increased our growth rate to 7.6 per cent, the highest among major economies in the world.

We have improved our economic governance. Corruption and interference in the decisions of banks and regulators are now behind us.

We undertook a highly successful financial inclusion programme, bringing over two hundred million unbanked people into the banking system within a span of a few months.

Thanks to our financial inclusion programme, we now have the world’s largest and most successful programme of direct benefit transfers, in cooking gas. We plan to extend it to other sectors such as food, kerosene, and fertilizers. This has improved targeting and the quality of public expenditure.

We have opened up nearly all sectors of our economy to FDI.

India achieved the highest ever rank in the World Bank Doing Business indicators in 2015.

India reached an all-time high in many physical indicators in 2015, including

the production of coal, electricity, urea, fertilizer and motor vehicles;  cargo handled at major ports and the fastest turnaround time in ports; award of new highway kilometers;  software export;

Entrepreneurship is booming, following a series of steps we have taken. India is now fourth in the world in the number of technical start-ups, after USA, Britain and Israel. The Economist magazine has called India the new frontier for E-Commerce.

We do not intend to rest on these achievements because my agenda of “reform-to-transform” still needs to be finished. Our recent budget provides a roadmap for our future plans and ambitions. Our underlying philosophy is clear: To create the climate for wealth generation and for that wealth to be spread to all Indians, especially the poor, vulnerable, farmers, and disadvantaged communities.


We have increased investment in the rural and agriculture sector, because that is where a majority of India still lives. But our help to the farmers is not based on giving hand-outs. We aim to double farmer incomes by:
• increasing irrigation,
• better water management,
• creating rural assets,
• boosting productivity,
• improving marketing,
• reducing margins of middlemen,
• and avoiding income shocks.

We are introducing reforms in agricultural marketing and have launched a major crop insurance programme.

In addition to agriculture, we have increased public investment in roads and railways. This will improve the productivity of the economy and the connectivity of our people. Public investment is also essential at a time when private investment remains weak.

We have also made other reforms that will help create wealth and economic opportunity. Given the enormous entrepreneurial potential in the country, my motto is Start Up India and Stand Up India. The budget has provided a further boost to the ecosystem for start-ups.

Ensuring employability of the youth is essential for the success of our Make-in-India campaign. The Government of India has an ambitious agenda for skilling our labour force. Skill creation of the magnitude that we have envisaged, involves institution building, which we have undertaken. Now, we have a skill development programme that cuts across twenty-nine sectors and with a nation-wide coverage.

India is a responsible global citizen in protecting the planet. India played a positive role at the COP 21 Summit. Between now and 2030, we intend to re-write history by growing rapidly and also reducing the emission intensity of our GDP by thirty-three per cent. By then, forty per cent of our installed electric power capacity will be from non-fossil fuel. We will build an additional carbon sink of over 2.5 billion tonnes of carbon dioxide equivalent by 2030, by creating additional forest and tree cover. These initiatives are from a country with very low per capita land availability and a low base of per capita emission. We have taken the lead in launching an international solar alliance, involving 121 solar-resource rich countries falling between the Tropic of Cancer and the Tropic of Capricorn. This will help many developing countries, including those in Asia, to take advantage of developments in renewable energy. India has moved from a regime of significant carbon subsidy to one of carbon taxes. India is one of the few countries to have a carbon tax in the form of a cess on coal. The Coal cess has been doubled in the Budget of 2016-17.

India has a number of cooperative initiatives in Asia. We are transforming the ‘Look East Policy’, into an ‘Act East Policy. Our approach to cooperation is based on flexible geometry. We have integrated in different ways and at different speeds with our neighbours in South Asia, our partners in ASEAN, and our partners in Singapore, Japan, and Korea. We intend to continue doing so.

My dream is of a Transformed India. I lay this dream alongside our common dream of an Advanced Asia – an Asia where more than half of the global population can live with happiness and fulfillment. Our joint heritage and mutual respect, our common goals and similar policies, can and must create sustainable growth and shared prosperity.

Once again, I welcome you all to India. I wish the Conference all success.

Thank you.

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Friday, 11 March 2016

World Culture Festival‬ is a Kumbh Mela of culture: PM Modi

परम पूज्य श्री श्री रविशंकर जी ....सभी वरिष्ठ महानुभाव ,

मैं भारत की धरती पर आप सबका हृदय से स्‍वागत करता हूं। भारत इतनी विविधताओं से भरा हुआ है, विश्‍व को देने के लिए भारत के पास क्‍या कुछ नहीं है। दुनिया सिर्फ आर्थिक हितों से ही जुड़ी हुई है ऐसा नहीं है, दुनिया मानवीय मूल्‍यों से भी जुड़ सकती है और जोड़ा जा सकता है और जोड़ना चाहिए भी।

भारत के पास वो सांस्‍कृतिक विरासत है, वो सांस्‍कृतिक अधिष्‍ठान है जिसकी तलाश दुनिया को है। हम दुनिया की उन आवश्‍यकताओं को कुछ न कुछ मात्रा में, किसी न किसी रूप में हम परिपूर्ण कर सकते है। लेकिन ये तब हो सकता है जब हमें हमारी इस महान विरासत पर गर्व हो, अभिमान हो।

अगर हम ही अपने आप को कोसते रहेंगे , हमारी हर चीज की हम बुराई करते रहेगे तो दुनिया हमारी ओर क्‍यों देखेगी?

मैं श्रीमान श्री श्री रविशंकर जी का इस बात के लिए अभिनंदन करता हूं कि 35 साल से छोटे से कार्यकाल का ये मिशन दुनिया के 150 से ज्‍यादा देशों में इसी ताकत के भरोसे अब फैल चुका है, उन देशों को अपना कर चुका है। आर्ट ऑफ लिविंग के माध्‍यम से विश्‍व को भारत की एक अलग पहचान कराने में इस कार्य ने बहुत बड़ा योगदान दिया है।

मैं अभी कुछ समय पहले जब मंगोलिया गया था। मैं हैरान था मंगोलिया में एक एस्‍टेडियम में आर्ट ऑफ लिविंग के सभी बंधुओं के द्वारा मेरा reception रखा गया था। उसमें भारतीय तो बहुत कम थे। पूरा स्‍टेडियम मंगोलियन नागरिकों से भरा हुआ था और उन्‍होंने भारत का तिरंगा झंडा हाथ में लेकर के जिस प्रकार से भारतीय संस्‍कृति का परिचय करवाया, यह अपने आप में बहुत ही प्रेरक था। जहां पर राजशक्‍ति और राजसत्‍ता की पहुंच नहीं होती है, ऐसे स्‍थानों पर भी अंतर्राष्‍ट्रीय संबंधों में soft power एक बहुत बड़ी अहम भूमिका अदा करता है।

आज हम एक ऐसे कुंभ मेले का दर्शन कर रहे हैं। यह कला का कुंभ मेला है। भारत के पास ऐसी समृद्धि थी कि यहां कला पूर्णतया विकसित हुई थी। यह धरती ऐसी है जहां हर पहर का संगीत अलग है। सुबह का संगीत अलग है तो शाम का अलग है और इसलिए बाजार में संगीत की दुनिया को खोजने जाएंगे, तन को डुलाने वाले संगीत से तो बाजार भरा पड़ा है लेकिन मन को डुलाने वाला संगीत तो हिन्‍दुस्‍तान में भरा है और दुनिया अब मन को डुलाना चाहती है और यही संगीत की साधना है जो दुनिया के मन को डुला सकती है।

जब कला के द्वारा किसी देश को देखा जाता है तो इस देश की अंतर्भूत ताकत को पहचाना जाता है। आज विश्‍व भारत की कला की शक्‍ति और कला साधना सदियों से करते आए हुए लोग आज विश्‍व को एक अनमोल भेंट दे रहे हैं। ऐसे अवसर पर यह समारोह प्रकृति ने भी कसौटी करी लेकिन यही तो आर्ट ऑफ लिविंग है। सुविधा और सरलता के बीच जीने के लिए जी सकते हैं, उसमें आर्ट नहीं होती है। जब अपने इरादे को लेकर के चलते है तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए। जब अपने सपनों को लेकर के चलते है तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए। जब संकटों से जूझते हैं तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए। जब अपने लिए नहीं औरों के लिए जीते हैं तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए। जब स्‍व से समस्‍ति की यात्रा करते हैं तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए। जब मैं से छूटकर के हम की ओर चलते हैं तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए।

हम वो लोग जो अहम् ब्रह्मास्मि से शुरू करते हैं और वसुधैव कुटुम्‍बकम की यात्रा करते हैं यह आर्ट ऑफ लिविंग है। हम वो लोग है जिन्होंने उपनिषद से उपग्रह तक की यात्राएं की हैं और यही जीवन जीने की कला हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने, ज्ञानियों ने, तपस्‍वियों ने हमें विरासत में दी है। संकटों से जूझ रहा मानव, व्‍यक्‍तिगत जीवन में समस्‍याओं से जूझ रहा मानव... भारत की पारिवारिक समस्‍या, परिवार family, यह ऐसी धरोहर हमारी दुनिया जब जानती है उसको अचरज होता है। हमने यह कला सीखी है, सदियों से सीखी है। लेकिन अगर उसमें खरोच आ रही है तो उसको फिर से ठीक-ठाक करने की आवश्‍यकता है |

मैं श्री श्री रविशंकर जी के माध्‍यम से यह जो काम चल रहा है इसका अभिनंदन करता हूं, बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं और सभी कलाकारों को, सभी साधकों को, सभी आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यकर्ताओं को इस भव्‍य समारोह के द्वारा भारत की विशिष्‍ट छवि विश्‍व के सामने पहुंचाने के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं|

धन्‍यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Wednesday, 9 March 2016

PM Modi's reply on the Motion of Thanks on the President's Address in the Rajya Sabha

आदरणीय सभापति जी , आदरणीय सभी सांसद महोदय,

अभिभाषण पर विस्‍तार से चर्चा हुई। करीब 30 माननीय सदस्‍यों ने इस चर्चा में हिस्‍सा लेकर करके अपने अनुभव का अपने ज्ञान का, देश को लाभ पहुंचाया। श्री जगत प्रकाश नड्डा जी, श्री अरूण जेटली जी, श्री गुलाम नबी आजाद जी, डॉ. विजयलक्ष्‍मी जी, प्रमोद तिवारी जी, श्रीमती रजनी जी, श्रीमान देसाई, श्री शरद यादव जी, श्री गोपाल पटेल, सीताराम जी, डी राजा जी, के केशोराम जी, कई सारे नाम हैं, सभी महानुभावों ने सदन को, और देश को लाभान्वित किया है।

राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण में एक बात जो कही गई थी जिसका इतना सकारात्‍मक प्रभाव इतना तुरंत होगा ये बात हम सबको प्रसन्‍न करती है। राष्‍ट्रपति जी ने कहा था सदन चलना चाहिए, सदन में संवाद होना चाहिए और हम सभी सदस्‍यों ने राष्‍ट्रपति जी की बात को शिरोधार्य माना और सदन को सभी ने बहुत ही सुचारू रूप से सबने मिला करके चलाया और इसके लिए मैं विशेष रूप से विपक्ष के सभी बंधुओं का मैं आभार व्‍यक्‍त करना चाहूंगा कि उन्‍होंने इस काम को आगे बढ़ाया और राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण का ये जो असर है कि मैं समझता हूं कि अपने आप में गौरव देने वाला है। मैं राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्‍यवाद करने के लिए खड़ा हुआ हूं, लेकिन सदन के साथ-साथ सदन के माननीय सदस्‍यों से भी इस बात से आग्रह करना चाहूंगा। एक तो खुशी की बात है कि सदन में सभी सदस्‍य सक्रिय हैं। अपने-अपने विचारों के लिए आग्रही हैं, करीब 300 के करीब Amendments आए हैं और हर Amendments का अपना महत्‍व भी है। लेकिन मैं सबसे आग्रह करूंगा कि हम राष्‍ट्रपति जी के wisdom पर भरोसा करते हुए समय की सीमा में जितने विषय आ सकें आ सके, इसका मतलब यह नहीं कि वो महत्‍व के नहीं हैं और इसलिए राष्‍ट्रपति पद की गरिमा और उनके wisdom पर भरोसा करते हुए मैं सभी आदरणीय सदस्‍यों से प्रार्थना करूंगा कि वे अपने संशोधन को वापस करके राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण को सर्वसम्‍मति से धन्‍यवाद प्रस्‍ताव हम पारित करें जो कि अच्‍छी परंपरा जारी रहे। हम सबने देखा होगा कि कल रात के बारह बजे तक लोकसभा का सत्र चला।

दो दिन पूर्व यह सदन भी देर शाम तक बैठा था। आम तौर पर इतने घंटे काम करने के बाद थकान महसूस होती है, लेकिन मैं उल्‍टा अनुभव कर रहा था, जिन –जिन सदस्‍यों से मेरा मिलना हुआ बात करने का मौका मिला देर रात बैठने के बाद भी वे अत्‍यन्‍त प्रसन्‍न थे, अत्‍यंत संतुष्‍ट थे, अत्‍युन्‍त आनंदित थे क्‍योंकि एक लंबे अर्से के बाद अपने पास जो कुछ कहने की बातें थी, अपने क्षेत्र की बातें थी, समस्‍याएं थी उसको इस पवित्र Forum में वो जी भर के कह पाए।

ये अवसर उनको मिला है उनके चेहरे की जो प्रसन्‍नता है, ये सदन चलने के कारण संभव हुआ है| वरना पिछली बार सदन में जैसे Question hour मैं मानता हूं कि Question hour अपने आप में एक सदस्‍यों का अपनी संपत्ति है और राष्‍ट्र के महत्‍वपूर्ण Issues पर सरकार को कठघरे में खड़ा रखना, executives को अकाउंटेबल बनाना, उनके लिए सवालिया निशान खडा़ करना।

मंत्रियों को भी हर प्रकार से सजग रखने के लिए भी सबसे बड़ी ताकतवर जगह है तो वो Question hour है। लेकिन हमने देखा कि पिछली बार सदन न चलने के कारण स्‍टार Question 269 थे, लेकिन सात को अवसर मिला और करीब 42 घंटे हमारा इस हल्‍ला बोल के अन्‍दर आहुत हो गया। उसके पूर्व के सत्र में करीब 270 इन्‍हीं सदस्‍यों के द्वारा पूछे गये स्‍टार Question थे, सिर्फ छह चर्चा में आए। करीब-करीब हमारे 72 घंटे इस माहौल के अन्‍दर आहुत हो गये।

इस बार हमारे wisdom में हमारे अनुभव ने, हमारी जिम्‍मवारियों ने, हमें बचा लिया और मान्‍य सदस्‍यों के सवालों के जवाब देने के लिए मंत्रियों को देर रात तक तैयारियां करनी पड़ रही हैं। executives को हिसाब देने के लिए सजग रहना पड़ा रहा है और यही लोकतंत्र की ताकत है और इस ताकत को मैं समझता हूं कि हम जितना तवज्‍जो दें उतना कम है। एक बात जरूर है मृत्‍यु को एक वरदान है और मृत्‍यु को ऐसा वरदान है मृत्‍यु कभी बदनाम नहीं होता। कभी मृत्‍यु पर आरोप नहीं लगते। कोई मरे तो ये कैंसर से मरा है, आरोप कैंसर पर जाता है। कोई मरे तो ये अकस्‍मात मरा है तो अकस्‍मात पर आरोप जाता है मृत्‍यु पर नहीं जाता है। बड़ी आयु में मरे तो वे उम्र के कारण मरे हैं, मृत्‍यु को कभी दोष नहीं आता। मृत्‍यु कभी बदनाम नहीं होती।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि कांग्रेस को ऐसा वरदान है... वरदान इस अर्थ में है कि अगर हम कांग्रेस की आलोचना करें तो आपने मीडिया में देखा होगा कि विपक्ष पर हमला, विपक्ष पर आरोप, कभी ये नहीं आता है कि कांग्रेस पर हमला, कांग्रेस पर आरोप| हम अगर शरद जी के खिलाफ कुछ कहें, मायावती जी के खिलाफ कुछ कहें तो अखबार में आएगा, टीवी में आएगा कि बीएसपी पर हमला, जेडीयू पर हमला, शरद जी पर हमला, मायावती जी पर हमला लेकिन कांग्रेस एक ऐसी है जब भी हमला हो तो विपक्ष पर हमला। कभी कांग्रेस को बदनामी नहीं मिलती और ये अपने आप में बड़ा गजब का विज्ञान है। अब वो तो यही है हमारे सारे साथी सोचेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है।

यहां पर हमारे विपक्ष नेता ने चर्चा प्रारंभ की थी तब मैं यहां पर उपस्थित था। हमारे नड्डा जी ने Sea change कहा, तो हमारे गुलाम नबी जी ने थोड़ा माहौल हल्‍का करने का इरादा होगा उनका तो इरादा गलत नहीं होता। लेकिन चेन्‍नई का उदाहरण दे दिया। वो एक संकट था। मानवीय दृष्टि से वो दर्दनाक घटना थी उसको इस Sea change से जोड़ करके मजाक करने से उनकी पीड़ा में हम थोड़ा मैं समझता हूं कि अच्‍छा नहीं किया।

यहां एक विषय ये भी आया कि राजस्‍थान और हरियाणा में, जो उन्‍होंने चुनाव में कुछ नियम बनाएं हैं जिसको सुप्रीम कोर्ट ने मान्‍यता दी। लेकिन हमारी democracy में qualitative चेंज लाने का जो प्रयास है उसको कुछ राजनीतिक रंग लाने का प्रयास चल रहा है। मतभेद हो सकता है, लेकिन मैं चाहूंगा कि जो लोग इतने बड़ी प्रखरता के साथ कहते हैं जो अशिक्षित रहे उनका क्‍या।

मैं खास करके गुलाम नबी साहब से और उनके साथियों में आग्रह करूंगा कि जो पांच राज्‍यों में चुनाव होने वाले हैं कम से कम 30 % लोगों को अनपढ़ लेागों को टिकट दें, बिलकुल अनपढ़ तो वो जो कह रहे हैं तो उसमें उनका क्‍या commitment है पता तो चलेगा। अनपढ़ की इतनी चिंता है होनी भी चाहिए। लेकिन मैं एक अनुभव शेयर करता हूं। मैं गुजरात में जब था तो हर वर्ष, हर वर्ष जून महीने में 13, 14, 15 जून कन्‍या शिक्षा को ले करके बेटियों को पढ़ाने के लिए ग्रुजरात में एक कैम्‍पेन चलाता था, campaign चलाता था और गुजरात में मई जून में 40-45 तापमान रहता है। पूरी सरकार गांव जाती थी मैं खुद जाता था। तीन-तीन दिन में गांव में रहता था और बेटियों को पढ़ाओ इसके लिए campaign चलाता था। स्‍कूल 15 जून से शुरू होते थे तो उसके पहले एडमिशन्स के लिए लगते थे। वहां मैं मातृ सम्‍मेलन भी करता था। एक गांव में मैं गया । मैंने ऐसे ही पूछा कि आप बता ही दें कि आप में से अनपढ़ कितने हैं। तो कोई 40 साल 45 साल और 50 साल की महिलाओं ने हाथ ऊपर किया कि हम पढ़े लिखे नहीं हैं। लेकिन पांच छह महिलाएं ऐसी थी जिनकी उम्र 80-85 थी। मैंने पूछा आप पढ़े लिखे हैं, तो बोले ये हमारी बहु अनपढ़ है हम पढ़े लिखे हैं। कैसे तो बोले हम जो हैं गायकवाड स्‍टेट के नागरिक हैं, आजादी के पहले की बात है और गायकवाड स्‍टेट में ये नियम था कि अगर बेटी को नहीं पढ़ाते हैं तो एक रूपये दंड होता था और बोले इसके कारण हम पढ़े लिखे हैं। लेकिन बाद में स्‍वतंत्रता आई सरकारें बदल गईं तो बहू हमारी अनपढ़ है। तो ये जो अनपढ़ का कारण है वो आजादी के बाद जो हमारी कमियां रहीं है उससे और इसलिए हमने चिंता शिक्षा की करने की जरूरत है ताकि ये जो कठिनाई है उस कठिनाइयों से हम बाहर आ सकते हैं।

राष्‍ट्रपति जी ने कहा है कि पहले आकाशवाणी में आकाशवाणी रेडियो पर एक कार्यक्रम चलता था और गुजराती में जो शब्‍द था मुझे मालूम नहीं है कि हिन्‍दी में वो ही शब्‍द है क्‍या। बिसराते सुर यानी जो भूले बिरसे गीत हैं उनका कार्यक्रम आखिरी आखिरी तो अब कुछ लोगों का ये tenure पूरा हो रहा है तो स्‍वाभाविक है कि आखिर आखिर में कुछ कहें। तो ये भूले बिसरे सुर आखिर में सुनाई तो देने चाहिए।

सभापति जी, एक प्रकार से upper house है हमारे यहां कहा जाता है - महाजन ये न जतापन था। जहां महापुरूष चलते हैं लोग उसके पीछे चलते हैं। इस सदन में महाजन बैठे हैं। इस सदन से जो होगा जिस प्रकार से होगा उसका असर लोकसभा में होगा। उसका असर assembly होगा। कहीं कहीं कॉरपोरेशन सिटी में भी हो रहा है और इसलिए हम ऐसा कैसा करें ताकि नीचे तक वो माहौल बने जो लोकतंत्र को पुष्‍ट करे।

देश हमारे कई बिल पारित हो, इसका इंतजार कर रहा है। जीएसटी की चर्चा हो रही है बाकी बिल की चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं। बहुत बड़ी मात्रा में अब जो जनप्रतिनिधि चुन करके आए हैं उन्‍होंने तो इसको स्‍वीकार कर लिया है। लेकिन राज्‍यों के जो प्रतिनिधि हैं वहां। अब ये जगह ऐसी है जो अपर हाऊस हमारा, एक chamber of ideas है। यहां देश को मार्गदर्शन मिलेगा, दिशा मिलेगी और इसलिए दोनों सदनों के बीच तालमेल होना बहुत जरूरी है। दोनों सदन वस्‍तुत: उसी structure के भाग हैं और सहयोग एंव सामंजस्‍य की भावना की किसी भी कमी से कठिनाइयां बढ़ेगी और हमारे संविधान के उचित रूप से कार्य करने में बाधा खड़ी होगी। ये चिंता पं0 जवाहर लाल नेहरू जी ने जताई थी। मैं आशा करता हूं कि हम पंडित जी की इस चिंता को महत्‍व दें और हम कोशिश करें कि हमारे यहां यह जो सारे पेंडिंग बिल हैं, इस बार सदन चल रहा है। एक अच्‍छे माहौल में चल रहा है। तो हम चीजों को अगर पारित करें तो देश को गति देने में, ये महाजनों का ग्रो है, वरिष्‍ठ का गृह है। वो बहुत बढ़ा role play कर सकता है। इसलिए मैं आग्रहपूर्वक प्रार्थना करता हूं, सभी मान्‍य सदस्‍यों से जो लोकसभा में जो बिल पारित हुए हैं। उनको हो सके उतना जल्‍दी पारित करके हम देश को गति देने में भूमिका अदा करें।
इस सरकार में राष्‍ट्रपति के अभिभाषण में कुछ बातें आई हैं। ये तो सही है कि देश आजाद हुआ है, सरकारें बनी हैं। लंबे अरसे तक सत्‍ता भोगने का अवसर मिला है, सत्‍ता में रहने का अवसर मिला है। कुछ काम करने का अवसर मिला है और कुछ समय पहले से थोड़ा-थोड़ा बदलाव भी शुरू हुआ है, धीरे-धीरे। इस समय हम लोगों को मौका मिला है और ऐसा तो नहीं है कि कोई काम करना नहीं चाहता, हर कोई करना चाहता है। लेकिन कभी-कभार सवाल यह होता है कि हम इतना बड़ा देश है, इसकी आवश्‍यकताओं की पूर्ति हो, होती है, चलती है, इस प्रकार से करेंगे, तो हम बहुत पीछे चले जाएंगे। हमें incremental improvement से हटकर के एक quantum jump की ओर जाना बहुत जरूरी है और इसलिए शक्‍ति भी जरा ज्‍यादा लगानी पड़ती है और शक्‍ति जोड़नी भी पड़ती है। तो उसकी दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं।

हमने एक बल दिया है good governance पर, और जब मैं good governance की बात करता हूं, सुशासन की बात करता हूं तो उसकी पहली शर्त होती है transparency. हम यह भली-भांति जानते हैं कि इसके पूर्व, हमारे आने से पहले देश और दुनिया में, सही और गलत, इसका अपवाद हो सकता है। लेकिन यह माहौल बना हुआ था, विश्‍वास टूट चुका था। आशंका के दायरे में हम दबे हुए थे और सब ओर भ्रष्‍टाचार, भाई-भतीजावाद, इन चीजों ने हिन्‍दुस्‍तान के मन को झटक दिया था। दुनिया में भी इसके कारण भारत की छवि को गहरा नुकसान हुआ था। देश में विश्‍वास पैदा करने के लिए आवश्‍यक है और लोगों की जिम्‍मेवारी भी है कि transparency, policy driven government , individual के beam पर सरकारें नहीं चल सकती। सरकार नीतियों के आधार पर चलनी चाहिए, इस पर हमारा बल रहा है।

पिछले दिनों चाहे कोयले की चर्चा हो, स्‍पेक्‍ट्रम की चर्चा हो, न-जाने क्‍या-क्‍या बातें उठी, अब तो मामले सारे कोर्ट में भी पड़े हुए हैं। लेकिन हमने transparency पर बल दिया है। उसका परिणाम यह है – कोयला auction में हम गए 3.33 लाख करोड़, स्‍पेक्‍ट्रम में गए 1 लाख करोड़, हम एफएम रेडियो में गए। अभी-अभी चल रहा है। शायद आप लोगों को ज्ञान होगा 6 अन्‍य minerals का और अभी-अभी auction में जो 18 हजार करोड़ रुपया cross कर गया। ये एक कोशिश हमारी कि transparency और मैंने उसके लिए उदाहरण नहीं लिए।
अभी-अभी Forbes magazine, उसने एक बात कही है। हमने जो auction की परंपरा शुरू की है, उसके विषय में Forbes magazine कहता है – “India has just conducted its first auction of a Gold mine. This is exactly the right way to allocate the exploration and exploitation rise of such a natural resources. This is another one of those steps along the road to India coming the much wealthier country it should be”.
अब वो जो Gold mine कहते हैं, उनकी पश्‍चिम की दुनिया में इनके लिए, कोयला वगैरह सबको वो Gold mine के रूप में माना जाता है। उस अर्थ में वो Gold mine लिखा है। हमारे यहां कोई सोना की खदान ही नहीं दी गई है। Forbes magazine ने आगे एक जगह पर अच्‍छी बात कही है, हमने जो प्रयास किया है उस पर उन्‍होंने कहा है। एक ही वाक्‍य मैं अलग से पढ़ना चाहूंगा, This is the way this matter should be handled . मैं समझता हूं इसमें काफी कुछ आ जाता है।

दूसरा पहलू है good governance का accountability. हमें यह मानकर चले कि कुल मिलाकर के जो deterioration आया है उसमें हम खबरों की speed से चलते चले जा रहे हैं, पीछे की चीजें छूटती चली जा रही हैं। खबरें आती हैं जाती हैं, घटनाएं आती हैं जाती हैं, accountability का विषय छूट जाता है। हमने कोशिश की है कि accountability पर बल दिया जाए। मैं लगातार इन दिनों Infrastructure के review कर रहा हूं। इस सदन के सभी माननीय सदस्‍यों को आश्‍चर्य होगा 10-10, 20-20 साल से हमारे बड़े-बड़े प्रोजेक्‍ट लटके पड़े हुए हैं। या तो environment वालों ने रोक दिया होगा, कोर्ट-कचहरी ने रोक दिया होगा, या स्‍थानीय कोई body होगी छोटी, नगरपालिका वो रोककर के बैठ गई होगी। रुका हुआ है, क्‍यों रुका हुआ है, कोई देखता नहीं, पूछता नहीं, इसी कारण, कभी financial कारण भी रहे होंगे लेकिन 10-10, 20-20 साल से रुके हुए प्रोजेक्‍ट। मैंने पिछले दिनों करीब 300 प्रोजेक्‍ट का खुद review किया और उसकी worth है करीब 15 लाख करोड़ रुपया। मैं इस सदन को नम्रतापूर्वक कहता हूं कि वो सारे छोटे-छोटे संकटों में फंसे हुए, ये 15-15, 20 साल पुराने stalled projects आज चालू हो गए है, गति बढ़ रही है।

Good governance का तीसरा पहलू होता है – decentralization. इतना बड़ा देश हम centralized mechanism से नहीं चला सकते। जितनी बड़ी मात्रा में decentralize करेंगे और इसलिए सरकार ने नीतिगत रूप से decentralize करने की दिशा में नीतिगत कदम उठाए हैं जैसे environment. हम environment की हर permission को दिल्‍ली ले आए। एक दफ्तर में ले गए, एक व्‍यक्‍ति के पास ले गए और क्‍या परिणाम आया हम जानते हैं, क्‍या-क्‍या बातें सुनी गई, क्‍या-क्‍या बातें कही गई, किस पर क्‍या-क्‍या लगा सब मालूम हैं। हमने 10 regional offices को strengthen किया ताकि उनको वहां की समस्‍या की समझ है, वो जानते हैं इस चीजों को, उसको हमने किया। कुछ चीजें सरकार की, मैं तो हैरान हूं, एक गांव के बीच में से रेल जा रही है। इधर से पानी उस तरफ ले जाना है तो पाइपलाइन डालने में, पचासों permissions में वो अटकें पड़े हुए थे और बिना पानी को एक इलाका तरसता था। bridge बन गया है, दोनों तरफ road बनाना है, अटका पड़ा है। कभी दोनों तरफ road बन गए है, रेल वाले ऊपर bridge डालने के लिए permission नहीं दे रहे हैं, ऐसी छोटी-छोटी चीजें। हमने रेल, road, पाइपलाइन, बिजली transmission, इसके लिए केन्‍द्र के पास आना ही जरूरी नहीं है, सरकार ने व्‍यवस्‍था कर दी, वहीं पर हो जाएगा। इतना ही नहीं, हमने राज्‍यों के environment clearance के rights बढ़ा दिए, राज्‍यों को अधिकार ज्‍यादा दे दिए ताकि वो भी, हम जितने जिम्‍मेवार है, उतने भी राज्‍य के लोग जिम्‍मेवार है और वो कोई देश को बर्बाद करना नहीं चाहते।

अब जैसे sand. आज हमारे यहां नदी में बालू, housing constructions में से कितनी। हर नदी दिल्‍ली तक इंतजार करती है कि permission मिले। हमने इसको राज्‍य नहीं district level पर दे दिया, district authority उस पर निर्णय करेगा और वो तय करेगी। Online प्रक्रियाओं को लोग देख सकते हैं। पहले रेलवे के टेंडर की सारी प्रक्रिया यहां होती थी। आज हमने उसको zonal general manager के under में डाल दिया, टेंडर प्रक्रिया वही से चल रही है, गति से चल रही है। पहले एक 300 करोड़-500 करोड़ के प्रोजेक्‍ट भी cabinet approval के लिए आते थे, इंतजार करना पड़ता था। हमने तय कर दिया कि वो ministry करेगी। एक हजार करोड़ से ऊपर होगा तभी cabinet में लाना है। decentralization के द्वारा इसको आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

Good governance की एक महत्‍वपूर्ण बात होती है effective delivery. अब जन-धन account की यहां चर्चा हो रही है। हमारे माननीय विपक्ष नेता जी ने भोपाल के अच्‍छे उदाहरण दिए। बहुत आभारी हूं मैं कि एक जो विपक्ष ने करना चाहिए वैसा सटीक काम उन्‍होंने किया है। भोपाल जिले में किस गांव में कौन ‘जन-धन’ account से रह गया है और उसका recording तक करके ले आए। होना यही चाहिए तभी executive accountable बनेगी और ये सदन के सदस्‍यों का यही काम होता है। यह मुद्दा मेरी सरकार, तेरी सरकार नहीं होता है और मैं मानता हूं कि एक सही दिशा का यह प्रयास है। उसमें तथ्‍य क्‍या है, वो तो कल अरुण जी ने कह दिया। मैं तथ्‍य पर चर्चा नहीं करूंगा, मैं इस प्रयास को अच्‍छा मानता हूं। क्‍योंकि कभी-कभार नीचे से, व्‍यवस्‍था से खबर आएगी और मान लेते हैं, लेकिन विपक्ष सजग रहा, देखा और कितनी मेहनत की है। सत्‍ता में इतनी मेहनत की होती तो ‘जन-धन’ account का काम मुझे करना ही नहीं पड़ता। बाल की खाल उधेड़ी। लेकिन फिर भी अच्‍छा किया। साहब आपने microscope लेकर के देखा। मोदी कह रहा है जन-धन होगा, देखो यार कहीं तो होगा कोई कोने में। बहुत microscope लेकर के निकले लेकिन साहब आप इतने साल microscope लेकर के नहीं, अगर binocular से भी देखकर के काम किया होता तो आज यह मेहनत करने का मेरे जिम्‍मे नहीं आता। आज microscope लेकर के घूम रहे हो, अच्‍छा होता जब सत्‍ता में थे binocular से भी देखकर के काम को निपटाने का प्रयास किया होता। मेरे कहने का तात्‍पर्य यही है कि हम effective delivery पर बल दें वरना कभी जो last mile delivery, हमारे यहां जो लोग सरकार में रहे उनको मालूम है। हमें उसमें जितना ही हम पुरुषार्थ करे, हमें करना चाहिए।

हमारे सीताराम जी ने एक विषय छोड़ा था। उन्‍होंने कहा था कि ये targeted subsidy के नाम पर आप subsidy कम कर रहे हैं। वैसे वो उनके nature का विषय नहीं है लेकिन क्‍यों बोल दिए मुझे समझ में नहीं आता है। लेकिन हो सकता है politics में कुछ चीजें करनी भी पड़ती हैं। मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं चंडीगढ़ शहर का। चंडीगढ़ शहर में ज्‍यादातर घरों में बिजली है, ज्‍यादातर घरों में गैस कनेक्‍शन है। उसके बावजूद भी चंडीगढ़ में 30 लाख लीटर केरोसिन जाता था। जबकि उनका कोई उपयोग उनको नहीं था। कुछ परिवार थे जिनके पास गैस नहीं था, शायद उनको उपयोग होगा। 30 लाख लीटर केरोसिन। हमने सोचा कि भई जरा हम JAM योजना को लागू करे। सर्वे किया, आधार का उपयोग किया, गैस कनेक्‍शन का डाटा इकट्ठा किया। कुछ परिवार रह गए हैं जिनके पास गैस कनेक्‍शन नहीं है। हमने एक अभियान चलाया है। आने वाले कुछ दिनों में शायद पूरा हो जाएगा। लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि 30 लाख लीटर केरोसिन जो कि जाता था और धन्‍ना सेठों के द्वारा बाजार में चला जाता था, पूंजीपतियों के पास चला जाता था। ये पूंजीपति लोग उसका black marketing करते थे, डीजल में mix करते थे, environment को बर्बाद करते थे, ये targeted subsidy का परिणाम यह है कि यह जो धन्‍ना सेठ या पूंजीपति लोगों के हाथ में 30 लाख लीटर केरोसिन जाता था बहुत तो बंद हो गया, बाकी भी अब बंद हो जाएगा और इसके कारण देश की करोड़ों रुपयों की subsidy बचेगी।

तीसरा, देश को import करने में भी राहत मिल जाएगी। कहने का हमारा तात्‍पर्य यह है कि हम जब technology के माध्‍यम से इस काम को जो हम कर रहे हैं, इस काम के संबंध में subsidy सही व्‍यक्‍ति को मिले, नियम में जितनी मिलनी चाहिए उतनी मिले, समय पर मिले, उस दिशा में हमारा एक प्रयास है। यह रुपए बचाने का खेल नहीं है। एक व्‍यवस्‍था में transparency लाना नहीं, leakages बंद करने की, दलालों को निकालने का एक उत्‍तम प्रकार का प्रयास है। उसमें भी कुछ कमियां है तो ठीक करनी है और आप लोगों का उसमें सहयोग मिलेगा, कहीं से कोई जानकार मिलेगी तो ठीक करने में सुविधा बढ़ेगी। तो मैं आश्वस्त कर देता हूं सबको कि ऐसी कोई बात ध्‍यान में आए तो जरूर सरकार के ध्‍यान में लाइए ताकि हम इसको कर पाए।

एक विषय है, माननीय हमारे गुलाब नबी साहब ने विषय निकाला – skill development का। आपने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने इसको शुरू किया था, वगैरह-वगैरह। वैसे हमारे देश में skill परंपरागत है लेकिन हर सरकार ने किसी न किसी रूप में प्रयास किया है। अब बात कहा जाकर के अटकती है। अब जैसे मान लीजिए आज हम गंगा सफाई करते हैं तो स्‍वाभाविक से आपसे आवाज उठेगी, ये तो हमने शुरू किया था। सही बात है। श्रीमान राजीव गांधी जी ने उस पर बल दिया, शुरू किया।

अब सवाल यह उठता है कि शुरू किया, उसका credit लेने के उत्‍साह में यह भी तो जवाब देना पड़ेगा कि 30 साल के बाद भी गंदी क्‍यों हैं, अगर शुरू किया था तो 30 साल के बाद गंगा गंदी क्‍यों हैं, क्‍या कमी रह गई? और इसलिए हर बार, ये तो हमारे समय हुआ था, ये उत्‍साह का अपना एक महत्‍व है। श्रेय लेने का प्रयास करने में कुछ बुरा है, ऐसा नहीं है, ये तो आपको मन करेगा। देखिए दुनिया में दो तरह के व्‍यक्‍ति होते हैं - एक वो जो कार्य करते है और दूसरे वे जो उसका श्रेय लेते है। आप इनमें से पहली तरह का व्‍यक्‍ति बनने का प्रयास करें क्‍योंकि इसमें competition बहुत कम है। यह बात श्रीमती इंदिरा जी ने कही थी। अब skill development. देखिए साहब 2008 में, मैं मानता हूं skill development पिछली सरकार में जो चला। उसमें एक skill की mastery आ गई और mastery थी कमेटियां बनाने और कमेटियां बिखरने की। उसमें mastery आ गई, skill development वो हुआ।

2008 में PM’s national council, National skill Development Coordination Board, National Skill Development Corporation फिर 2009 में National Policy on Skill Development, कमेटियां पर कमेटियां, कमेटियां पर कमेटियां और मीटिंगे नहीं होती थी। एक कमेटी की तो मीटिंग शायद ढाई-तीन साल के बाद अचानक एक कर ली गई थी लेकिन वो भी इसलिए कर ली गई थी कि अगली मीटिंग कब करेंगे। आखिरकार, इतनी सारी कमेटियों के बाद 2013 में यह तय कर दिया कि National Skill Development Agency बनाई जाए और बाकी सब दुकानें बंद कर दी जाए। साहब ये skill development का हाल था। Skill Development के विषय में आप अज्ञान नहीं थे, आपको ज्ञान था कि एक जरूरी है, देश में इतनी बड़ी संख्‍या में नौजवान है करना चाहिए। लेकिन कभी-कभार तो महाभारत याद आता है ज्ञानम न धर्मम नचे बिन प्रभुति। ज्ञान तो बहुत था लेकिन करना प्रवृत्‍ति नहीं थी। अब कौन-क्‍या ये मैं ज्‍यादा चर्चा नहीं करता।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल में 2014 में हमने skill development एक अलग ministry बनाई। skill development scheme के लिए common norms तय किए। skill initiatives, consistent quality हासिल करने पर बल दिया गया। NSDC के तहत हमने डेढ़ साल में ढाई गुना उसमें बढ़ोतरी की। Industrial training institutions (ITI) हमने डेढ़ साल के भीतर-भीतर 20% उसमें इजाफा किया। पिछले दो वर्ष में क्षमता 15 लाख 23 हजार सीटों से बढ़कर के 18 lakh 65 thousand कर दी गई, 20% हमने बढ़ोतरी की। 1 लाख 70 हजार प्रतिवर्ष जो तय होते थे उसमें हमने 53 thousand और जोड़ दिए। 10th और 12th उसमें vocational education करीब बारह सौ तेरह सौ स्‍कूल में चलता था। आज हमने उसको एकदम से quantum jump लगाकर के तीन हजार पहुंचा दिया। डेढ़ लाख अतिरिक्‍त छात्रों का लाभ उसके लिए हुआ। International mobility , एक बात मानकर के चलें कि 2030 वो समय आएगा, जब दुनिया की नज़र हिन्‍दुस्‍तान के workforce पर रहने वाली है।
हमने अभी से global standard का workforce तैयार करने की दिशा में हमें काम करना चाहिए। International mobility पर हमें बल देना चाहिए और उसके लिए ऑस्‍ट्रेलिया और UK के जो standards है उसको match होते हुए, कामों को हमने शुरू किया है और भी requirements के अनुसार उस standard को लेने की दिशा में हम काम करना चाहते हैं।

Apprenticeship, किसी न किसी कारण से हमने apprenticeship को एक ऐसी अवस्‍था बना दी कि सब उद्योगकार, व्‍यापारी दरवाजे बंद करके बैठ गए, किसी को घुसने ही नहीं देते और किसी को भी नौकरी चाहिए तो लोग पूछते है experience है क्‍या? Experience लेने जाता है तो दरवाजा बंद है। जब तक हम apprenticeship को बल नहीं देते, हमारे नौजवानों को experience नहीं मिलेगा। experience नहीं मिलेगा तो उनके लिए job opportunity नहीं होगी और उसको ध्‍यान में रखते हुए हमने apprenticeship के trainee जो पहले 3 लाख 12 हजार थे। सवा साल के भीतर-भीतर 2 लाख 70 हजार और उसमें जोड़ दिए, हमने वो व्‍यवस्‍था की है।

पहले हमारे यहां target होता था - कितने बच्‍चों को तैयार किया। उसी को पूरा करने की दिशा में प्रयास था। हमने market में requirement क्‍या है, किस प्रकार के syllabus की जरूरत है, किस प्रकार की training की जरूरत है, उसका सर्वे किया और according to that हमने skill develop किया ताकि job के साथ उसको connect किया जाए और उसको उसका काम मिल जाए और उस दिशा में हमने प्रयास किया है। अब मैं देख रहा हूं कि पिछले दिनों हमारे देश में manufacturing को बल तो देना ही होगा। हम सब जानते हैं कि कोई भी सरकार हो, भाषण के लिए हम कुछ भी कहे लेकिन देना पड़ेगा। इसके कारण हमने FDI पर बल दिया, FDI में बढ़ोतरी हुई, 48% करीब। हमने 2015 में electronic manufacturing में छह गुना बढ़ोतरी हुई है। 2015 में software export सबसे ज्‍यादा हुआ है। हमारे major Ports 2015 में सबसे ज्‍यादा handling हुआ है। 2015 में सबसे ज्‍यादा कार उत्‍पादन हुआ है। 50 नई मोबाइल कंपनियां manufacturing के लिए आई है। यह सारी बातें skill और रोजगार के साथ जुड़ने वाली है और skill और रोजगार की दिशा में ये काम करने वाले हमारे प्रयास है और उसका परिणाम यह होगा कि हमारे देश में रोजगार की संभावनाएं बढेंगी।

Ease of doing business में 12 rank हम quantum jump लगाया है। हम ऊपर गए है। World Economic Forum में Global competitive index में हम 16 स्‍थान ऊपर गए है। Moodys ने जो up gradation दिया हमारे लिए, positive दिया है, जो global environment में भारत की साख को बढ़ाता है, भारत की ताकत की पहचान कराता है। Employment की चर्चा skill development में हो, manufacturing sector में बढ़ावा हो, एक रोजगार के लिए मानदंड के रूप में एक institute को हमने मान्‍यता मिली हुई। Monster Employment Index, ये online recruitment के आधार पर analysis करता है। January 2016 में index 229 था। यह index 2014 में सिर्फ 150 था और आज आप देख सकते हैं 150 से बढ़कर के 229 index को हम प्राप्‍त कर गए है। हमने रोजगारी को बढ़ावा देने के लिए जो micro and small industry है उसको हमने Tax के अंदर सुविधाएं दी हैं। Start Up को बल दिया है। तीन साल के लिए टैक्‍स में हमने रियायत दी है ताकि नौजवानों को Start Up के लिए मौका मिले। मुद्रा बैंक के द्वारा करोड़ों-करोड़ों लोगों को हमने धन दिया है, जो पुराने थे उन्होंने expansion किया है। expansion के कारण उसको एक-दो लोगों को और रोजगार देने का उसको अवसर मिला है और इसमें भी ज्‍यादा SC, ST और women हैं | मुद्रा के लाभार्थी सबसे ज्‍यादा SC, ST, OBC and women है। नए उद्योग जो लगेंगे ही, उसके लिए हमने टैक्‍स को 25% पर रख दिया है और कोई benefit अगर लेना चाहता नहीं है तो ये benefit मिलेगा।

एक महत्‍वपूर्ण निर्णय इस बजट में आपने सुना होगा। हम जो पूंजीपतियों की चर्चा करते हैं। जो लोग first UPA में सरकार का समर्थन करते थे और वो जो पूंजीपतियों का विरोध कर करके गाड़ी चलाते रहते हैं। आप देखिए हमारे देश में बड़े-बड़े मॉल हो, वो तो सात दिन चल सकते हैं, लेकिन गांव के अंदर एक छोटा दुकानदार हो, वो सात दिन खुली नहीं रख सकता है। हमने बजट में इस बार घोषित किया है कि छोटे दुकानदार भी सात दिन चला सते हैं, देर रात चला सकते हैं। इसका परिणाम यह आने वाला है कि हर छोटा दुकानदार भी एक न एक काम करने वाले को रखेगा, एक-एक दुकान पर एक नए व्‍यक्‍ति के रोजगार की संभावना होने वाली है। उस दिशा में महत्‍वपूर्ण काम मैं समझता हूं आने वाले दिनों में रोजगार की दिशा में होने वाला है।
चेयरमैन श्री, मैं अब थोड़ी किसानों के संबंध में बात करना चाहता हूं। जब हमने कहा कि क्‍यों न देश जिसमें किसान हो, progressive किसान हो, राज्‍य सरकारें हो, केन्‍द्र सरकारें हो, हम सब मिलकर के, हमने बहुत जिम्‍मेदारी के साथ इन शब्‍दों का प्रयोग किया हुआ है। सब मिलकर के ये लक्ष्‍य क्‍यों न तय करे कि 2022 में किसान की income double हो और मैं हमारे मनमोहन सिंह जैसा तो अर्थशास्‍त्री नहीं हूं लेकिन जिस अवस्‍था में से पला-बढ़ा हूं तो गरीब किसानों को नजदीक से देखा है और इसलिए मुझे वो बढ़ा ज्ञान तो नहीं है लेकिन छोटी-सी चीजों का पता है। अगर हम सही दिशा में प्रयास करे तो परिणाम आएगा। मैं एक हमारे देश में इस विषय के जानकार है, श्रीमान एम. एस. स्वामीनाथन, उनका एक latest article का quote मैं कहना चाहता हूं “seeds have been sown for agricultural transformation and for attracting and retaining youth in farming. The dawn of a new era in farming is in sight.”

अब किसान की आय दोगुना हो सकती है कि नहीं हो सकती है। किसान मतलब, अगर जो हम soil health card के काम को लेकर के चले है, उसको हम सफलता से लागू करे और किसान soil health card के advices के अुनसार अपनी जमीन का उपयोग करना शुरू करे। productivity बढ़ सकती है, input cost कम हो सकती है। आज किसान की मुसीबत यह है कि पड़ोसी ने अगर लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाल दी तो उसको भी लगता है कि मैं लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाल दूं । पड़ोसी ने अगर पीले डिब्‍बे वाली डाल दवाई दी तो वो भी पीले डब्‍बे वाली दवाई डाल देता है। पड़ोसी ने इतने kg यूरिया डाल दिया तो वो भी। उसकी जमीन उसके लिए योग्‍य है कि नहीं है।

अगर हम कोशिश करें। हमारी agriculture universities, agriculture graduates ये सारे लोग इसमें लगे और soil testing का जो काम चला है, उसको अगर खेती के साथ सीधा-सीधा जोड़कर के हम आगे बढ़े परिणाम ला सकते हैं। दूसरी बात, हमारे यहां हम timber import करते हैं। अगर हम हमारे किसानों को जहां उसकी जमीन की सीमा समाप्‍त होती है वहां वो एक-दो मीटर जमीन बर्बाद करता है। बाड़ लगा देता है, एक मीटर इधर वाले की जाती है, एक मीटर उधर वाले की जाती है। अगर वो दोनों मिलकर के timber की खेती करें । पेड लगा दे तो 15-20 साल में permanent income का source बन सकता है और जमीन को कोई नुकसान नहीं होने वाला है। जमीन को अतिरिक्‍त फायदा होने वाला है। उस दिशा में काम कर रहे हैं। हम कृषि के साथ fisheries, poultry , animal husbandry, milk production, दूसरा value addition. Income बढ़ाने के लिए जरूरी नहीं है कि agro product ही बने. Value addition से, अभी हमने एक निर्णय कोका कोला कंपनी पर हमने दबाव डाला, उनसे बातचीत की, laboratory में testing करवाया। हमने आग्रह किया कि आप कोका कोला के अंदर 5% natural orange juice mix करिये और मुझे खुशी है कि अभी महाराष्‍ट्र government के साथ उनका agreement हुआ और विदर्भ के अंदर जो संतरा पैदा होता है वो संतरा अब कोका कोला के अंदर 5% मिक्स होगा तो वि‍दर्भ के कि‍सान का संतरा बि‍कने में कोई दि‍क्‍कत नहीं आएगी।

हमें value addition की दि‍शा में प्रयास करना होगा और इसलि‍ए अगर आलू कि‍सान बेचता है तो कम कमाई होती है लेकि‍न wafer बनाकर के बेचता है तो ज्‍यादा कमाई होती है। हरी मि‍र्च बेचता है तो कम कमाई होती है लेकि‍न लाल मि‍र्च का पाउडर बनाकर के बेचता है तो ज्‍यादा कीमत मि‍लती है। हम लोगों ने value addition पर बल देना शुरू कि‍या है जि‍सके कारण हमारे कि‍सान की income में बढ़ोतरी होना पूरी तरह लाजि‍मी है। उसी प्रकार से blue economy, हमारे जो सागर, जो हमारे fisheries में हमारे fisherman लगे हैं। हमारे समुद्री तट पर seaweed की खेती, पूरी संभावना है आज दुनि‍या में pharmaceuticals के manufacturing में base material के लि‍ए seaweed बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरा है। हमारे fisherman के परि‍वार समुद्री तट पर आराम से seaweed की खेती कर सकते है और वो seaweed की marketing और हमारे pharmaceuticals से हम tie up करे, हमारे fisherman की income भी हम बढ़ा सकते हैं। कहने का तात्‍पर्य यह है कि‍हम जो सोचते हैं कि‍agriculture sector में हम कि‍सानों की आय बढ़ा नहीं सकते, ये नि‍राशा का कोई कारण नहीं है। अगर हम वैज्ञानि‍क तरीके से, उसी प्रकार से National Agriculture Market, आज National Agriculture Market के द्वारा, e-platform के द्वारा, कि‍सान अपने गांव में बैठकर के यह तय कर सकता है कि‍अगर महाराष्‍ट्र के अंदर उसकी पैदावार की कीमत ज्‍यादा है, वहां बेच सकता है। 14 अप्रैल बाबा साहेब आम्‍बेडकर की जन्‍मजयंती पर यह सरकार इसको launch करने जा रही है। कि‍सान अपनी जहां ज्‍यादा कीमत मि‍लेगी, वहां market में जाने के लि‍ए उसको सुवि‍धा मि‍लने वाली है।

दुनि‍या में honey का बहुत बड़ा market है। लेकि‍न भारत में हमारे कृषि‍क्षेत्र में honey bee का वैज्ञानि‍क तरीके से कोई प्रयास नहीं हुआ, registration तक available नहीं है। हमने इस पर बल दि‍या है।
अगर उस पर हमारा किसान काम करता है और हनी बी को बिगड़ने का सवाल ही नहीं होता है लंबे समय अर्से तक रहता है। हमारे किसान की इनकम में अतिरिक्‍त बढ़ोतरी कर सकता है। हमने किसान की income बढ़ाने के लिए और पहलुओं पर बल देने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं।

चैयरमैन श्री, यहां पर स्‍वच्‍छता की चर्चा हुई और ये कहा गया कि ये काम तो हमारे समय में भी चलता था। हमने किसी भी बात नहीं कही है। ये सब आप ही की देन है। हम कभी claim नहीं करते ये आप ही की देन है कि आज हमको दिन रात मेहनत करके स्‍कूलों में चार लाख टॉयलेट बनाने पड़े। आपने अगर बना करके दिया होता तो काम हमारा कम हो जाता और इसिलए कोई ये नहीं कहता कहने का तात्‍पर्य समस्‍याएं पुरानी हैं, समस्‍याएं नई नहीं हैं। समस्‍याओं के समाधान करने के प्रयास अभिरथ चले हैं। हर किसी ने अपने-अपने समय कुछ न कुछ जोड़ने का प्रयास किया है। उस समय की स्‍थिति के अनुसार available resources के अनुसार हमने भी एक प्रयास किया है और यह खुशी की बात है। देखिए 1986 में central rural sanitation programme आया था, तब से लेकर के। रिकॉर्ड पर यह चीजें available है। उसके बावजूद भी हम अभी तक परिणाम प्राप्‍त नहीं कर सके। परिणाम प्राप्‍त करना है तो जन आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा ।

और मैं आज इस बात को संतोष के साथ कह सकता हूं कि‍ आज स्‍वच्‍छता, ये जन आंदोलन बनने की दि‍शा में जा रहा है। हमारी संसद ने देश आजाद होने के बाद कभी भी स्‍वच्‍छता पर debate नहीं की थी। पहली बार इस देश में पार्लि‍यामेंट ने दो-दो, तीन-तीन घंटे तक स्‍वच्‍छता पर चर्चा की। हो सकता है सरकार की आलोचना हुई होगी लेकि‍न कम से कम इस सदन के लोग, उस सदन के लोग इस बात पर sensitize हुए है कि‍अब इसको ऐसे नहीं रहने देना चाहि‍ए, बदलना चाहि‍ए। एक अच्‍छा माहौल बन रहा है। हम सब उसको बल कैसे दे, उस दि‍शा में सोचना है। कोई दावा नहीं करता है कि‍हम ही लाए।

हमारे बाद कोई आएंगे तो वो उसको improve करेंगे। उनके बाद कोई आएगा और improve करेंगे और हो सकता है स्‍थि‍ति‍ऐसी आए करना न पड़े और वो जन सामान्‍य का वि‍षय बन जाए। लेकि‍न हमें करना होगा और जब तक हम इसको नहीं करेंगे। हमने अभी शहरों की एक challenging mode में competition शुरू की है। उसका परि‍णाम यह आया है Urban Development Ministry कर रही है। आज शहरों में उस शहर की elected body पर दबाव पड़ रहा है कि‍भई उन तीन में तुम्‍हारा नाम क्‍यों नहीं है हमारे शहर का नाम क्‍यों नहीं है? मैं बनारस का MP हूं, बनारस के नागरि‍क municipality पर दबाव डाल रहे हैं कि‍क्‍या बात है यह स्‍वच्‍छता के अंदर बनारस नज़र क्‍यों नहीं आ रहा? जनता का pressure बढ़ रहा है। ये बढ़ना चाहि‍ए और मैं तो चाहता हूं आप भी जहां-जहां हो ये pressure बढ़ाइए। सरकार को मजबूर कीजि‍ए। सभी elected bodies को मजबूर कीजि‍ए। हम स्‍वच्‍छता को हमारे देश हि‍त का एक महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम माने। महात्‍मा गांधी का जो सपना था, 2019 में पूरा करना, हम सबका दायि‍त्‍व क्‍यों नहीं हो सकता।

इस सरकार उस सरकार का नहीं हो सकता है मेरे माननीय सभी सदस्‍यगण ये हम सबका होना है। मैं देख रहा हूं मीडिया हाऊस दुनियाभर के विषय में दुनियाभर के विषय में हमारी आलोचना करते हैं। सरकारों की आलोचना करते हैं। ये एक विषय ऐसा है कि देश का मीडिया पार्टनर बना है। कहीं न कहीं मीडिया के लोग इस काम को कर रहे हैं खुद कार्यक्रम कर रहे हैं। खुद उसको promote कर रहे हैं। इसको एक हम सबका कार्यक्रम बनाएंगे तो देश के और देश के Tourism बढ़ाने के लिए काम आएगा और स्‍वच्‍छता जो पूंजीपतियों का विरोध करते हैं, उनके लिए तो सबसे पहले करने जैसा काम है, क्‍योंकि WHO का रिपोर्ट कहता है, इंटर नेशनल एजेंसी का रिपोर्ट कहता है कि गंदगी के कारण गरीबी में जीने वाले परिवारों को सालाना average सात हजार रूपया दवाई में खर्च होता है। अगर ये उसकी बीमारी चली जाए इसके कारण कितनी बड़ी सेवा होगी।

मैं मानता हूं, ये काम ऐसा है जिन्‍होंने किया है उसे हम आगे बढ़ाए। जितना किया है उसको और अधिक करें। अभी मैं छत्‍तीसगढ़ गया था। मैंने एक मां के पैर छुए, आदिवासी मां, पढ़ी-लिखी नहीं 90 प्‍लस उम्र है। उस मां ने अपनी तीन बकरियां बेच करके टॉयलेट बनाया। उस गांव में वो पहली महिला थी जिसे टॉयलेट बनाया। हम लोगों के लिए इससे बडा़ inspiration क्‍या हो सकता है और इसलिए और इसलिए मैं चाहूंगा कि इसको सरकार कार्यक्रम, पक्ष का कार्यक्रम, ये सरकार वो सरकार की सीमाओं में न बांधें। उसको देशहित के लिए सोचें और उसको हम बनाएंगे तो मैं समझता हूं कि बहुत अच्‍छा होगा।

कल हमारे सीताराम जी, जो उनका बेसिक फिलॉस्‍पी है उसको कल प्रकट कर रहे थे कि इतने exemption हैं, इतना फलां, आंकड़ा कहां से लाए। वो तो भगवान जाने। हां, वो आंकड़ा ढूंढा मुझे मिला नहीं। मुझे बाद में दिखा देना जी, लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि मैं वो आंकड़े की बताना चाहता हूं। टेक्‍स exemption है। जरा हम देखें 10 हजार 350 करोड़ रूपये exemption उसमें दाल और सब्‍जी में, क्‍या हम उसका विरोध करेंगे। 5800 करोड़ रूपये exemption किसके लिए चीनी के लिए।

शरद जी जो आपके बगल में बैठे है बाद में समझा देंगे आपको। 19 हजार 120 करो़ड़ रूपये exemption किसके लिए। जम्‍मू कश्‍मीर, हिमाचल, उत्‍तराखंड उनके उद्योगों के लिए। नार्थ ईस्‍ट के लिए, हम उसका भी विरोध करेंगे क्या ।
 
मैं समझता हूं कि कभी-कभार बारीकियों में जाएंगे तो हमें पता चलेगा कि हमारे जो इन बातों को ले करके आपको चिंता हो रही है। यही सरकार है, कल अरूण जी ने आपको विस्‍तार से बताया है finance की चर्चा होगी तो बताएंगे कि हमने टैक्‍स किस पर लगा रहे हैं और टैक्‍स से मु‍क्ति किसको दे रहे हैं। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा और इसके लिए। और जो चीजें हमें विरासत में दी हैं कभी आपने बाहर से समर्थन करके सरकारें चलाई उसने जो हमें विरासत में दी हैं। आज उसी को सफाई करने में हमारा दम उखड़ रहा है और इसलिए समाप्‍त करने से पहले एक मशहूर शायर निदा फाजली की जो आवाज है। अभी अभी उनका स्‍वर्गवास हुआ। उनकी बात कह करके मेरी बात मैं समाप्‍त करूंगा।

सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
किसी के वास्‍ते, राहें कहां बदलती हैं,
किसी के वास्‍ते, राहें कहां बदलती हैं
तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो, चलो
यहां किसी को कोई रास्‍ता नहीं देता
यहां किसी को कोई रास्‍ता नहीं देता
मुझे गिरा के मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो
यही है जिन्दगी , कुछ ख्वाब चंद उम्मीदें
इन्हीं खिलोने से जो तुम भी बहल सको तो चलो |
सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
बहुत बहुत धन्यवाद