मैं सबसे पहले ISRO के सभी वैज्ञानिकों को और ISRO की पूरी टीम को ह्रदय से
बहुत बहुत धन्यवाद करता हूँ , उनका अभिनन्दन करता हूँ| मैं सवा सौ करोड़
देशवासियों को भी इस नए नजराने के लिए अनेक अनेक शुभकामनाएं देता हूँ|
स्पेस साइंस में भारत के वैज्ञानिकों ने अविरथ पुरुषार्थ करके अनेक
सिद्धियाँ प्राप्त की हैं और आज देश अनुभव कर रहा है | स्पेस साइंस के
माध्यम से सामान्य मानविकी के जीवन में भी कितना बदलाव लाया जा सकता है|
टेक्नोलोजी मनुष्य के जीवन में भी किस प्रकार से उपकारक हो सकती है और भारत
का स्पेस टेक्नोलोजी के क्षेत्र में पदार्पण भारत के सामन्य मानव की
जिन्दगी में बदलाव के लिए, व्यवस्था में सुधार के लिए, सुगमता के लिए एक
बहुत बड़ी भूमिका अदा कर रहा है|
आज नेविगेशन के क्षेत्र में भारत ने अपना
7वां सेटेलाईट लॉन्च किया है | सातों सेटेलाईट, एक के बाद एक सफलतापूर्वक
लॉन्च किये गए | और इस सिद्धि के कारण आज भारत दुनिया के उन पाँच देशों में
आज गर्व के साथ खड़ा हो गया कि जिसमें उसकी अपनी GPS सिस्टम , उसकी अपनी
नेविगेशन सेटेलाईट सिस्टम निर्मित हो गयी| आज तक हम GPS सिस्टम के लिए अन्य
देशों की व्यवस्थाओं पर निर्भर थे| आज हम आत्मनिर्भर बने हैं| हमारे
रास्ते हम तय करेंगे , कैसे जाना , कहाँ जाना , कैसे पहुँचना , यह हमारी
अपने टेक्नोलॉजी के माध्यम से होगा |
और इसलिए भारत के वैज्ञानिकों ने आज 125
करोड़ देशवासियों को एक अनमोल तोहफा दिया है |हम जानते हैं कि आज के इस युग
में जी पी एस सिस्टम का बहुत बड़ा रोल हो गया है| हमारा एक मछुआरा भी इस
व्यवस्था के तहत मछली का कैच कहाँ ज्यादा है, मछली कैच करने के लिए कहाँ
जाना चाहिए , shortest route कौनसा होगा यह अब भारतीय सेटेलाईट के
मार्गदर्शन में काम कर पायेगा| आसमान से उसको रास्ता दिखाया जाएगा| मंजिल
का पक्का address तय किया जाएगा| अब हमारे विमानों को अगर लैंड करना है तो
बहुत सरलता से, accuracy के साथ अपनी भारतीय व्यवस्था से वह कर पायेंगे|
कहीं कोई disaster हो गया , बहुत बड़ी प्राकृतिक आपदा हो गयी, उस स्थिति में
कैसे मदद पहुंचानी है , कहाँ पहुंचानी है , specific location क्या होगा ,
यह सारी व्यवस्थाएं इस भारतीय उपग्रह के द्वारा जो नयी व्यवस्था विकसित
हुयी है , उसके कारण लाभ मिलने वाला है| इसकी क्षमता इतनी है कि कश्मीर से
कन्याकुमारी , कच्छ से कामरूप तक वह भारत के हर कोने को तो सेवा देगा ही
देगा लेकिन इसके अतिरिक्त 1500 वर्ग किलोमीटर area में भी अगर कोई सेवाएं
लेना चाहता है तो भी उसको यह सेवाएं उपलब्ध होंगी| कहने का मतलब यह है कि
हमारे पड़ोस के जो SAARC देश हमसे जुड़े हुए हैं वह भी अगर भारत की इस सेवा
का उपयोग करना चाहते हैं क्योंकि आज वे भी दुनिया के किसी न किसी देश की
सेवाएं ले करके अपना गुजारा करते हैं | अब भारत भी , अगर वह चाहते हैं तो
यह सेवा उनको उपलब्ध करा सकता है |
एक प्रकार से सदियों पहले हमारे नाविक
समंदर में कूद जाते थे, सितारों के सहारे, चन्द्र और सूर्य की गति के सहारे
वह अपनी राह तय करते थे और मंजिल पर पहुँचने का प्रयास करते थे| सदियों से
हमारे नाविक अनजान जगह पर पहुँचते थे और उनका सहारा हुआ करता था आसमानी
सितारों, चन्द्र और सूर्य की गति के सहारे वह अपने रास्ते तय करते थे | अब
विज्ञान की मदद से हम इस सेटेलाईट और टेक्नोलोजी के माध्यम से इस काम को
करने जा रहे हैं | भारत के मछुआरे, भारत के नाविक समंदर में साहस के साथ
चलने वाली हमारी सदियों पुरानी हमारी परंपरा, इसने एक अनभिज्ञ जगह पर एक
अनजान जगह पर जाने के रास्ते साहस के सिखाये हैं और इसलिए हजारों साल से
मछुआरों ने जो साहस दिखाया है , नाविकों ने जो अदम्य साहस से दुनिया में
पहुँचने का प्रयास किया है और इसलिए इस पूरी नई टेक्नोलोजी के माध्यम से
मिलने वाली सेवाओं को आज हमने तय किया है कि यह सारी व्यवस्था, हमारी यह
जीपीएस सिस्टम “नाविक” नाम से जानी जायेगी|
इस व्यवस्था को मैं देश के करोड़ों करोड़ों
मछुआरों की सदियों पुरानी परम्पराओं को आदर्श मानते हुए देश के गराब गरीब
मछुआरों को यह पूरी व्यवस्था समर्पित करने के इरादे से आज इसे ‘नाविक’ नाम
से विश्व पहचानेगा और ‘नाविक’ नाम से अब यह सेवा उपलब्ध होगी| यह हमारा
अपना नाविक होगा| हमारे मोबाइल फोन में हमारा नाविक होगा| जो नाविक हमें,
हम कहाँ हैं उसका पता दे सकता है , कहाँ जाना है उसका रास्ता दे सकता है और
कहाँ पहुँचना है , उसका भी हमें वह नाविक रास्ता दिखाएगा| और जब मैं नाविक
की बात कर रहा हूँ तो, टेक्नोलोजी की भाषा में अगर मुझे कहना है तो मैं
कहूँगा कि navigation satellite system जोकि Navigation with Indian
Constellation, NAVIC , इस रूप में आज आपके सामने समर्पित करता हूँ|
सवा सौ करोड़ देशवासियों को आज एक नया
नाविक मिल गया, नाविक जो हमें अपने रास्ते तय करने के लिए, अपना
destination तय करने के लिए हमारी मौजूदगी महसूस कराने के लिए काम आएगा| यह
आसमानी व्यवस्थाओं के लिए काम आएगा, यह जमीनी व्यवस्थाओं के लिए काम आएगा,
यह जल की व्यवस्थाओं के लिए भी काम आएगा| हमारी shipping व्यवस्थाओं को
भारत की यह सेवा ज्यादा acccuracy के साथ उपलब्ध होगी|
हमारी
रेलवे ; आज हम हमारी रेल कब कहाँ है उसको जानने के लिए जीपीस का उपयोग
करना पड़ता है | अब हम किस क्रोसिंग से रेल कहाँ प्रसार हुयी, कितने सिग्नल
से कहाँ दूर है, कहीं रेलवे की चालू ट्रेन में कोई सिग्नल देना है , सूचना
देनी है तो यह नाविक के सहारे हम दे सकते हैं| हम कार से जा रहे हैं स्कूटर
से जा रहे हैं , हमारे हाथ में मोबाइल फोन है, हम नाविक के सहारे तय कर
सकते हैं, कितना पहुंचे, कहाँ पहुँचना है , कहाँ खड़े हैं| एक प्रकार से जन
सामान्य की आवश्यकताओं की पूर्ति का काम अब हमारे वैज्ञानिकों ने Make in
India, Made in India, Made for Indian यह सपना साकार किया है | मैं आज इस
शुभ अवसर पर सवा सौ करोड़ देशवासियों को अपना नाविक देते हुए अत्यंत हर्ष और
गर्व अनुभव कर रहा हूँ| और मैं देश के वैज्ञानिकों को फिर एक बार कोटि
कोटि बधाईयाँ देता हूँ| बहुत बहुत अभिनन्दन करता हूँ और मुझे विश्वास है कि
हमारे स्पेस के साइंटिस्ट और नए करतब दिखायेंगे, और नई खोज दिखायेंगे और
भारत का नाम आसमान के उन क्षितिजों को पार करते हुए विश्व में लहराएगा
हमारा झन्डा, इसी अपेक्षा के साथ बहुत बहुत शुभकामनाएँ बहुत बहुत बधाई |
मैं देश के किसानों को बहुत-बहुत
शुभकामनाएं देता हूं, बधाई देता हूं कि इस प्रयास से किसानों की
अर्थव्यवस्था में कितना बड़ा परिवर्तन आने वाला है। आज डॉ. बाबा साहेब
अंबेडकर की 125वीं जयंती है और मैंने करीब 1 महीने पहले सार्वजनिक रूप से
कहा था कि ई NAM का प्रारंभ हम डॉ. बाबा साहेब की जयंती पर करेंगे और मुझे
खुशी है कि आज समय सीमा में काम प्रारंभ हो रहा है। राधामोहन सिंह जी कह
रहे थे इसको हम औऱ जल्दी भी कर सकते हैं लेकिन ये काम राज्यों के सहयोग के
साथ जुड़ा हुआ है। अभी भी देश के कुछ राज्य ऐसे हैं कि जहां मंडी का कोई
क़ानून ही नहीं है।
अब किसानों के लिए सुनते तो बहुत हैं
लेकिन ऐसे भी राज्य हैं आज भी इस देश में जहां किसानों के लिए मंडी के लिए
कोई नीति निर्धारण कानून नहीं है। उन राज्यों में किसानों का exploitation
कितना हो सकता है, इसका आप अंदाज कर सकते हैं। मैं नाम नहीं देना चाहता हूं
राज्यों का क्योंकि आजकल ऐसे विषय 24 घंटे विवादों में फंस जाते हैं तो
मैं उससे बचना चाहता हूं लेकिन ऐसे सभी राज्यों से मेरा आग्रह होगा कि वे
अपने यहां किसान मंडी कानून बनाएं। उसी प्रकार से जिन राज्यों में कानून
है। उसमें भी अब नई Technology आई है, काफी व्यवस्थाएं पलटी हैं तो उसके
अनुरूप कानून में सुधार करना आवश्यक है। मैं आशा करता हूं कि वे राज्य भी
अपने-अपने यहां जो existing कानून हैं उसमें भारत सरकार ने जो सुझाव दिए
हैं उसके अनुसार अगर amendment कर देंगे तो उन राज्यों में भी ई NAM का लाभ
किसान को प्राप्त होगा और इसलिए मैं इन सभी राज्यों से आग्रह करता हूं कि
इसको प्राथमिकता दें।
वैसे मुझे लगता है कि शायद आग्रह मुझे अब
नहीं करना पड़ेगा क्योंकि जैसे ही ये 21 मंडियों की खबर आना शुरू हो जाएगा
तो नीचे से ही pressure इतना पैदा होगा कि हर राज्य को लगेगा कि भई मेरा
किसान तो रह गया चलो मैं भी इसमें आ जाऊं ताकि मेरे राज्य के किसान को लाभ
मिले। हमारे देश में वर्षों से किसी न किसी कारण से कुछ नियम न रहें। एक
राज्य में जो कृषि उत्पादन होता था वो दूसरे राज्य में ले नहीं जा सकते थे,
ये भी बंधन रहते थे। कभी कानूनी तौर पर रहते थे, कभी गैर कानूनी तौर पर
रहते थे क्योंकि लगता था कि भई अगर ये चला गया तो राज्य की economy को क्या
होगा, राज्य की आवश्यकताओं का क्या होगा तो ये चलता रहता था और उसके कारण
मैं नहीं मानता हूं, मैं इसको कोई बहुत बड़ा गुनाह के रूप में नहीं देखता
हूं।
वहां की सरकारों को practical problem
रहता था कि भई ये चीज मेरे यहां उत्पादन होती है। मेरे यहां से बाहर चली गई
तो मेरे यहां तो लोगों को कुछ मिलेगा ही नहीं तो ये उसकी चिंता बड़ी
स्वाभाविक थी लेकिन उसका परिणाम ये होता था कि किसान को protection नहीं
मिलता था। किसान के लिए मजबूरी हो जाती थी कि अपने 12-15-20-25 किलोमीटर के
area में जो market है, वो जो दाम तय करता था। उसको उसी दाम पर बेचना
पड़ता था और उसी से अपनी रोजी-रोटी कमानी पड़ती थी। किसान की समस्या ये भी
रहती थी कि उसको कोई choice नहीं रहता था। एक बार घर से बैलगाड़ी में माल
लेकर गया मंडी में और मंडी वालों को लगा कि आज दाम गिरा दो। अब वो बेचारा
सोचता है कि भई अब मैं वापस इसको कहां ले जाऊंगा, 25 किलोमीटर कहां उठाकर
ले जाऊंगा तो वो मजबूरन उनके हाथ-पैर जोड़कर कहता था चलिए जी ले लीजिए, 5
रुपए कम दे दीजिए, ले लीजिए मैं कहाँ ले जाऊँगा । ये हाल किसान का हमारे
यहां market में रहा।
ये योजना ऐसी है कि जिस योजना से किसान का
तो भरपूर फायदा है लेकिन ये ऐसी योजना नहीं है जो सिर्फ किसान का फायदा
करती है। ऐसी व्यवस्था है, जिस व्यवस्था की तरफ जो थोक व्यापारी है, उनकी
भी सुविधा बढ़ने वाली है। इतना ही नहीं ये ऐसी योजना है, जिससे उपभोक्ता को
भी उतना ही फायदा होने वाला है। यानि ऐसी market व्यवस्था बहुत rare होती
है कि जिसमें उपभोक्ता को भी फायदा हो, consumer को भी फायदा हो, बिचौलिए
जो बाजार व्यापार लेकर के बैठे हैं, माल लेते हैं और बेचते हैं, उनको भी
फायदा हो और किसान को भी फायदा हो। होता क्या है आज दुर्भाग्य से हमारे देश
में कृषि उत्पादन का real time data अभी भी नहीं होता है। कभी हमें लगे कि
फलां राज्य में गेंहू की जरूरत है तो सरकार सोचती है अच्छा भई क्या
करेंगे, इनको गेंहू की जरूरत है लेकिन उसे पता नहीं होता कि दूसरे राज्य
में गेहूं surplus पड़े हैं।
कभी गेंहू surplus हैं और वहां पहुंचाने
हैं लेकिन उस समय ट्रेन की व्यवस्था नहीं मिलती माल ले जाने के लिए और वहां
consumer परेशान रहता है, यहां किसान परेशान होता है, माल बेचना है। ये
क्यों... वो जो structure ऐसा बना हुआ था कि जिस structure में वो बंध गया
था, उसके बाहर नहीं जा पाता था। आज ई NAM के कारण। अभी तो प्रारंभ में 25
कृषि उत्पादन चीजें इस ई NAM पर बिकेंगी, सौदा होगा और 21 मंडी में होगी
लेकिन बहुत ही निकट भविष्य में शायद 250 तक तो पहुंच जाएगी क्योंकि कुछ
राज्यों ने कानून में जो सुधार करना चाहिए, वो कर दिया है। Technology के
लिए ये कोई बड़ा मुश्किल काम नहीं है। वहां एक लैब बनेगी, उस लैब के कारण
quality of agro product ये तय होगा। अब व्यापारी हाथ में पकड़कर के तय
करेगा, नहीं यार तेरा माल तो ठीक नहीं है और किसान कहेगा नहीं-नहीं साहब
बहुत ठीक है पहले जैसा ही है और आखिरकार उस बेचारे को लगता था कि चलो बेच
दो। आज laboratory कहेगी कि तुम्हारा जो product है A grade का है, B grade
का है, C grade का है औऱ वो नेशनली certified मान्यता होगी उसको।
अगर मान लीजिए बंगाल से चावल खरीदना है और
केरल को चावल की जरूरत है तो बंगाल का किसान online जाएगा और देखेगा कि
केरल की कौन सी मंडी है जहां पर चावल इस quality का चाहिए, इतना दाम मिलने
की संभावना है तो वो online ही कहेगा कि भई मेरे पास इतना माल है और मेरे
पास ये certificate और मेरे ये माल ऐसा है, बताइए आपको चाहिए और अगर केरल
के व्यापारी को लगेगा कि भई 6 लोगों में ये ठीक है तो उससे सौदा करेगा और
अपना माल मंगवा देगा। कुछ व्यापारी क्या करेंगे बंगाल से माल खरीदेंगे,
खरीदने वाला केरल से होगा लेकिन उसको बंगाल में market मिल जाए तो वहीं पर
उसको बेच देगा। मेरा कहना का तात्पर्य ये है कि इतनी transparency होगी इस
व्यवस्था के कारण कि जिसके कारण हमारा किसान ये तय कर पाएगा और माल, अपना
product बैलगाड़ी में चढ़ाने से पहले या ट्रैक्टर में चढ़ाने से पहले तय कर
पाएगा कि मेरे product का क्या होगा।
पहले तो क्या होता था सारी मेहनत करके 25
किलोमीटर दूर मंडी में गए उसके बाद तय होता था भविष्य क्या है। आज अपने घर
में, अपने मोबइल फोन पर वो तय कर सकता है कि मैं कहां जाऊं, थोड़ा मैं
मानता हूं हमारे देश का सामान्य से सामान्य व्यक्ति शायद वो साक्षर न हो
लेकिन बुद्धिमान होता है। जैसे ही उसको पता चलेगा, वो monitor करेगा कि
मंडी का trend क्या है, तीन दिन देखेगा बराबर और फिर trend के अनुसार तय
करेगा कि हां अब लगता है कि market पक गया है तो तुरंत अंदर enter कर जाएगा
और अपने माल बेचेगा। आज किसान निर्णायक होगा, किसान निर्णायक होगा। जो
मंडी में बैठे हुए व्यापारी हैं, उन व्यापारियों के लिए भी ये सुविधाजनक
होगा क्योंकि उसको लगता है कि भई जो जहां से पहले मैं खरीदता था तो वहां तो
इस बार ये चावल पैदा ही नहीं हुई है तो सालभर क्या करूंगा, मैं तो चावल की
व्यापारी हूं लेकिन अब उसको बैठे रहना नहीं पड़ेगा, वो हिंदुस्तान के किसी
भी कोने से अपनी आवश्यकता के अनुसार चावल का ऑर्डर देकर के दूसरे व्यापारी
से वो ले सकता है, दूसरे किसान से भी वो ले सकता है, अपनी आवश्यकताओं की
पूर्ति कर सकता है।
Consumer भी देख सकता है कि किस मंडी में
किस रूप से बाजार चल रहा है और इसलिए अपने यहां कोई locally ही exploit
करने जाता है तो कहता है, झूठ बोल रहे हो मैंने देखा है ई NAM पर तुमने तो
माल लिया है थोडा बहुत तो ले सकतो हो लेकिन इतना क्यों ले रहे हो। यानि
उत्पादन का balance use इसके लिए भी ई NAM portal एक बहुत बड़ी सुविधा बनने
वाला है और मैं मानता हूं किसान का जैसे स्वाभाव है। एक बार उसको विश्वास
पड़ गया तो वो उस भरोसे पर आगे बढ़ने चालू कर जाएगा। बहुत तेज गति से ई NAM
पर लोग आएंगे, transparency आएगी। इस market में आने के कारण भारत सरकार
बड़ी आसानी से, राज्य सरकारें भी monitor कर सकती हैं कि कहां पर क्या
उत्पादन है, कितना ज्यादा मात्रा में है। इससे ये भी पता चलेगा
transportation system कैसी होनी चाहिए, godown का उपयोग कैसे होना चाहिए,
इस godown में माल shift करना है या उस godown में, यानि हर चीज एक portal
के माध्यम से हम वैज्ञानिक तरीके से कर सकते हैं और इसलिए मैं मानता हूं कि
कृषि जगत का एक बहुत बड़ा आर्थिक दृष्टि से आज की घटना एक turning point
है।
एक मोड़ पर ले जा रही है हमें, जो पहले से
कभी हम इंतजार कर रहे थे या हमारे सामने संभावना नजर नहीं आ रही थी। एक
सप्ताह के भीतर-भीतर ये भी पता चलेगा कि जब इतनी बड़ी मात्रा में बाजार खुल
जाता है तो competition बहुत बड़ा जाती है। खरीदने वाला ज्यादा दाम देकर
के अच्छी quality खऱीदने की कोशिश करेगा। बेचने वाला कम पैसे में किस जगह
से माल मिलता है, वो खोजेगा तो दूर-सुदूर भी जिसको market नहीं मिलता था,
उसके लिए market सामने से invitation भेजेगा कि भई देखो तुम वहां बैठे हो
सिलीगुड़ी में लेकिन तुम्हारी चीज कोई लेता नहीं, मैं यहां बैठा हूं
अहमदाबाद में, मैं लेने के लिए तैयार हूं। ये इतनी बड़ी संभावना, हम कल्पना
कर सकते हैं कि हमारे किसान को पहली बार ये तय करने का अवसर मिला है कि
मेरे माल कैसे बिकेगा, कहां बिकेगा, कब बिकेगा, किस दाम से बिकेगा, ये
फैसला अब हिंदुस्तान में किसान खुद करेगा।
अब वो किसी से आश्रित नहीं रहेगा, वो
मोहताज नहीं रहेगा और जब ये पता औरों को चलेगा इतनी बड़ी competition शुरू
हो गई है तो स्वाभाविक है कि बाकी राज्य जो अभी पीछे हैं, मुझे विश्वास है
कि नीचे से ऐसा pressure पैदा होगा कि अब वो जल्दी कानून में भी सुधार
करेंगे और ई NAM portal पर सारी मंडियां आएंगी और ये मेरा पूरा विश्वास है।
मेरा आग्रह है और मैं मानता हूं कि कृषि को टुकड़ों में नहीं देखना चाहिए
और इसलिए हमने हमारे मंत्रालय का नाम भी, इसके साथ किसान कल्याण जोड़ा है।
हम उसको जब तक holistic approach नहीं होगा, हम किसानों की स्थिति में
सुधार नहीं ला सकते हैं और holistic approach लेना है तो मान लीजिए जैसे आज
solar revolution हो रहा है। किसान को तो लगता होगा कि ये तो कोई industry
का काम चल रहा है, कोई उद्योगकारों का काम चल रहा है। कोई तो उसको समझाए
ये solar revolution भी तेरे लिए है भाई।
अगर
उसको पानी के लिए solar pump मिल गया, वो अपने ही खेत में solar panel लगा
दिया तो उसको जो आज डीजल का खर्चा करना पड़ता है, नहीं करना पड़ेगा। आज
solar revolution हो रहा है। जो बड़ा किसान हैं वो उच्च technology का
उपयोग करता हैं। cutter लाते हैं, बाकी चीजें लाते हैं, वो बिजली से चलती
हैं। जिस दिन उसको पता चलेगा, अब ये सारे जो साधन हैं, वो भी solar से चलने
वाले आ गए हैं, उसका खर्चा कम हो जाएगा और साधन उसका सूर्य प्रकाश से चलने
लग जाएगा। यानि जो technology का development हो रहा है। उसके साथ हमारे
किसान की उपयोगी चीजों को कैसे जोड़ा जाए। अगर हमें ज्यादा उत्पादन करना है
तो flood irrigation का जमाना चला गया है और अब ये विज्ञान ने सिद्ध कर
दिया है कि flood irrigation से कोई अच्छी खेती होती नहीं लेकिन किसान का
स्वभाव है कि जब-जब खेत, जब तक खेत पानी से लबालब भरा न हो, सारे पौधे डूबे
हुए नजर न आए तो उसको लगता है, पौधा भूखा मर रहा है, वो खुद बेचारा परेशान
हो जाता है क्योंकि उसकी भावना जुड़ी हुई है, वो अपने आप को रात को सो
नहीं सकता है कि यार जितना पानी चाहिए था, उतना नहीं है, वो परेशान हो जाता
है लेकिन अगर उसको विज्ञान का पता हो per drop, more crop.
हमारे उत्पादनों को पानी में डुबोए रखने
की जरूरत नहीं है। हम सालों से मानकर के आए कि गन्ने की खेती करनी हो तो
भरपूर पानी चाहिए। अब धीरे-धीरे अनुभव आ गया कि sprinkler से गन्ने की खेती
बहुत अच्छी हो सकती है और sprinkler से गन्ने की खेती करें तो सामान्य
गन्ने में जो sugar contain होता है, उससे sprinkler या drip से किए हुए
गन्ने में sugar contain ज्यादा होता है, उसमें से ज्यादा चीनी निकलती है
तो किसान को दाम भी ज्यादा मिलता है और आपने देखा होगा flood irrigation से
गन्ने का जो डंडा होता है उसकी size और sprinkler से हुआ उसकी size देखते
ही पता चलता है कि कितना बड़ा फर्क आया है। अब किसान को समझना होगा और मैं
मानता हूं कि ये बात उन तक पहुंचाई जा सकती है और इसलिए मेरा मिशन है per
drop, more crop एक-एक बूंद पानी से हम समृद्धि पैदा कर सकते हैं, हम
भविष्य पैदा कर सकते हैं।
कभी-कभी मैं किसानों के साथ बैठना का
स्वभाव रखता था तो काफी बातें करता था, जब गुजरात में था। मैं उनको कहता था
और मैं आज उसको दुबारा कहना चाहूंगा, मैं उनको कहता था, मान लीजिए आपका
बच्चा बीमार है और 3 साल की आय़ु हो गई, 5 साल की आयु हो गई, 7 साल की आय़ु
हो गई लेकिन न वजन बढ़ रहा है, न चेहरे पर मुस्कान आ रही है, ऐसे ही
दुबला-पतला, ऐसे ही पड़ा रहता है। अब आप सोचिए कि आपके बच्चे का ये हाल है
और आप सोचें कि एक बाल्टी भर दूध लेंगे, उसमें केसर, बादाम, पिस्ता सब
डालेंगे और रोज बच्चे को इस दूध से नहलाएंगे, उसकी तबीयत पर कोई फर्क
पड़ेगा क्या, पड़ेगा क्या, मेरे किसान भाई पड़ेगा क्या लेकिन एक चम्मच में
थोड़ा-थोड़ा दूध लेकर के 100 ग्राम, 100 ग्राम उसको शाम तक पिला दो, फर्क
पड़ेगा कि नहीं पड़ेगा। जो बच्चा का है, वो ही पौधे का है। जो स्वभाव बच्चे
का है, वो ही स्वभाव पौधे का है।
पौधे को भी अगर पानी से नहला दोगे तो पौधा
मजबूत होगा, ऐसा नहीं है। एक-एक चम्मच से एक-एक बूंद पानी पिलाओगे तो आप
देखते ही देखते देखोगे कि पौधा कितना ताकतवर बन जाता है और इसलिए हमने...
बातें छोटी होती हैं लेकिन उनकी ताकत बड़ी होती है। हमने देखा है कि हमारे
किसान का सबसे बड़ा नुकसान किससे हो रहा है। वो जो देखता है उसमें विश्वास
करता है, जो सुनता है उस पर किसान कभी विश्वास नहीं करता। एक प्रकार से
अच्छी चीज भी है। वो जब तक खुद अपनी आंखों से नहीं देखता है, भरोसा नहीं
करता है लेकिन उसके कारण उसका misguide ऐसा हो जाता है कि अगर वाले खेत में
किसी किसान ने लाल डिब्बे वाली दवा डाली तो वो भी सोचता है कि लाल डिब्बे
वाली होती है तो वो भी जाकर के लाल डिब्बे वाली ले आता है। अगर उसने देखा
बगल वाला दो बोरी fertilizer डालता है तो वो भी दो बोरी डाल देता है और
उसको तो ज्यादा वो रंग से ही जानता है लाल डिब्बे वाली दवा, काले डिब्बे
वाली दवा, लंबे डिब्बे वाली दवा या छोटे डिब्बे वाली उसी से वो उसका
कारोबार चलता है जी, उसना अपना ये विज्ञान develop किया है।
ये गलती क्यों होती है। उसे पता नहीं है
कि वो जिस जमीन पर काम कर रहा है, उसकी प्रकृति कैसी है। ये धरा हमारी मां
है, ये भूमि हमारी मां है, कहीं बीमार तो नहीं हो गई है, हमने ज्यादा तो
इसका शोषण नहीं किया है, उसका भी कोई ख्याल रखा है कि नहीं रखा है, ज्यादा
अनुभव आता है कि हम धरा के साथ क्या करते हैं, फसल के संदर्भ में धरा के
साथ जो करना होता है, करते हैं। धरा की तबीयत, चिंतन करनी चाहिए, इस भूमि
की चिंता करनी चाहिए, इस पर हमारा ध्यान नहीं होता है और अगर बीमार धरा हो,
कितना ही अच्छा बीज बोएं, इच्छित परिणाम नहीं मिलता है और इसलिए हमारे
कृषि जगत को बदलना है तो हमारी धरा की तबीयत और उसके लिए अब सरल उपाय है
Soil health card, laboratory में धऱा की test करवानी चाहिए और उसमें जो
guidelines दें, उस प्रकार का पालन करना चाहिए। वरना कुछ लोग होते हैं कि
डॉक्टर के पास जाएं, तबीयत दिखाएं। डॉक्टर कहे डायबीटीज है लेकिन घर में
आकर के बताते ही नहीं हैं कि डायबीटीज है क्योंकि मिठाई खाने का शौक होता
है तो फिर वो laboratory काम नहीं आती है।
अगर laboratory ने कहा कि डायबीटीज है तो
फिर मिठाई छोड़नी पड़ती है। उसी प्रकार से धरा को check करने के बाद पता
चला कि ये बीमारियां हैं, उस फसल के लिए आपकी धरा ठीक नहीं है, वो
fertilizer आपकी धरा के लिए ठीक नहीं है, वो दवाई आपकी धरा को बर्बाद कर
देगी तो मेरा किसानों से प्रार्थना होगी कि उसमें जो सुझाव देते हैं, उन
सुझाव को religiously follow करना चाहिए। देखिए विज्ञान की बड़ी ताकत होती
है, विज्ञान की बड़ी ताकत होती है। इन चीजों को अगर हमने ढंग से कर लिया तो
आप देखना... कभी-कभार मैंने देखा है, हमारे पंजाब, हरियाणा में, इधर
पश्चिम उत्तर प्रदेश में वो पुरानी पद्धति फसल निकालने के बाद बाद में जो
रह जाता है उसको मुझे हिंदी शब्द तो मालूम नहीं है, उसको जला देते हैं। अब
हमें मालूम नहीं है ये मूल्यवान fertilizer है, उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके
उसी जमीन में दबा दीजिए, वो आपकी जमीन के लिए, वो खुराक बन जाएगा लेकिन
जल्दबाजी होती है, दुबारा फसल के लिए काम करना है, कौन करेगा इसलिए डालते
नहीं हैं।
मैं समझता हूं जिस चीज के लिए जो नियम
हैं, प्रकृति ने बनाए हैं, उसका अगर हम थोड़ा सा पालन करें तो पर्यावरण का
जो नुकसान हो रहा है और दिल्ली वाले चिल्लाते हैं कि धुँआ बहुत हो गया है,
वो बंद भी हो जाएगा और मेरे किसान को ये फायदा होगा। मुझे स्मरण है जो
केले की खेती करते हैं। केला पकने के बाद, वो केले का जो पेड़ रह जाता है,
उसको निकालने के लिए वो पैसे देते हैं लोगों को कि भाई उसको जरा आप साफ
करके दे दो और पहले ये एक-एक एकड़ पर 15-20 हजार रुपए खेत खाली करने पर ये
उनका खर्च होता था। बाद में उनके ध्यान में आय़ा कि ये तो most valuable है
और आपको हैरानी होगी केला पकने के बाद वो जो खड़ा रह गया, बाकी बचा हुआ
पुर्जा है, उसको आप कहीं गाड़ दें और वहां पर कोई पौधा लगा दें 90 दिन तक
पानी की जरूरत नहीं पड़ती, उसी से पानी मिल जाता है, इतनी ताकत होती है
उसमें। जब ये पता चला तो उन्होंने फिर से उसे फिर जमीन में गाड़ दिया और
उनकी जमीन इतनी गीली होने लगी कि बीच में वो एक extra फसल करने लगे जो
60-70 दिन में पैदा होने वाली होगी, उस फसल का उपयोग करने लगे, उनकी income
में पहले से डेढ़ गुना-ढ़ाई गुना तक फर्क होने लगा क्यों, उनको समझ आय़ा कि
भई इसका उपयोग है।
हम अगर उन छोटे-छोटे प्रयाग हैं। हमारे
किसान इसको समझ भी सकता है, उसको कैसे पहुंचाए, हम उसके उत्पादन की ओर
बढ़ें। हमारे देश का एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य है किसी न किसी कारण से टोडर
मल ने जमीनों को नापने का बहुत बड़ा काम किया था। उसके बाद उसके प्रति बड़ी
उदासीनता रखी गई। सरकारों में नियम था कि 30 साल में एक बार जमीन नापने का
काम regular होना चाहिए लेकिन शायद पिछले 100-150 साल में ये परंपरा
dilute हो गई और उसके कारण exact पता नहीं है जमीन की स्थिति का। किसान
conscious है कोई जमीन ले न जाए इसलिए वो क्या है बाड़ करता है। नाप का
ठिकाना नहीं, कागज पर exact नाप नहीं है तो बाड़ लगाता है, वो बाड़ लगाने
में एक मीटर जमीन इसकी खराब होती है, एक मीटर जमीन दूसरी वाली खराब होती
है। हर खेत के border पर दो मीटर जमीन खराब होना यानि पूरे देश में देखें
हम तो लाखों square meter जमीन इसी में बर्बाद होती होगी।
अगर हम उसका रास्ता निकालें। आज देश को
टिम्बर import करना पड़ता है। अगर हम हमारे border पर बाड़ करने के बजाए
टिम्बर के पेड़ लगा दें। बेटी पैदा हो, उस दिन अगर पेड़ लगाया तो शादी करने
का पूरा खर्चा एक पेड़ दे देगा। वो पेड़, बेटी बड़ी होगी उसके साथ-साथ
बड़ा होगा और जब वो टिम्बर बेचोगे। आज हिंदुस्तान फर्नीचर के लिए टिम्बर
दुनिया से import करता है, मेरा किसान अपने border पर, बाड़ पर ये काम कर
सकता है आराम से कमा सकता है। उसके कारण जो waste of land है, वो हमारा बचा
जाएगा। solar हम खेती के साथ solar बिजली पैदा कर-करके बेच सकते हैं।
मैंने ऐसे किसान देखें हैं जो अपनी cooperative society बना रहे हैं और
पड़ोस के किसान मिलकर के कोने पर बिजली पैदा कर रहे हैं और राज्य सराकारों
को बेच रहे हैं, ये सब संभव है। मैं हैरान हूं दुनिया भर में honey का बहुत
बड़ा market है, बहुत बड़ा market है और honey एक ऐसी चीज है शहद, जो
सालों तक घर में रहे, जितना पुराना हो तो ज्यादा पैसा मिलता है और किसान
अगर अपने खेत में साथ-साथ शहद का भी काम करें तो जो मधुमक्खी है वो भी फसल
को ताकत देती है, वो एक जगह से दूसरी जगह पर बैठती हैं तो फसल को नई ताकत
देती हैं। simple चीजें हैं, जब मैं कहता हूं double income संभव है, मेरे
दिमाग में बहुत साफ है क्या-क्या प्रयोग करने से income double हो सकती है।
चाहे Fisheries का काम हो, milk
production का काम हो, पशु का रखरखाव हो, इन सारी चीजों में से income बढ़
सकती है और हम आधुनिक वैज्ञानिक तरीक से खेती करना शुरू करें तो हम देश की
economy को भी बहुत बड़ा बल दे सकते हैं। मेरे देश के किसानों ने एक बार तय
किया कि अब देश का पेट भरने के लिए बाहर से अन्न नहीं आएगा, हिंदुस्तान के
किसानों ने कर दिया है। आज Pulses हमें बाहर से लाना पड़ता है दलहन, क्यों
न हमारे किसानों को संदेश जाए कि जहां पर पानी बहुत कम है, वहां और प्रयोग
मत करिए, आप दलहन पर चले जाइए ताकि आपकी भी गारंटी होगी और भारत सरकार
उसमें आपकी मदद करेगी और भारत को अब दलहन बाहर से नहीं लाना चाहिए दाल
क्यों बाहर से लानी पड़े, मूंग क्यों बाहर से लानी पड़े, चना क्यों बाहर से
लाना पड़े, उड़द क्यों बाहर से लाना पड़े। हम ये अपने संकल्प कर लें तो
मैं नहीं मानता हूं इस देश को... और अभी गया था सऊदी अरबिया, उसके पहले मैं
गया था यूएई, वहां के लोगों ने जो बात कही, मैं समझता हूं कि मेरे देश के
किसान इसको भलीभांति समझें, वो कह रहे हैं कि हमारे पास तो बारिश ही नहीं
है, हमारे पास खेती योग्य जमीन नहीं है, हमारी जनसंख्या बढ़ रही है, पूरे
गल्फ की countries में, हम भविष्य में हमारा पेट भरने के लिए अनाज पर भारत
पर ही depend करेंगे, हमें वहीं से import करना पड़ेगा।
आज भी हमारा सबसे ज्याजा अच्छा चावल
उन्हीं देशों में जाता है। इसका मतलब ये हुआ अगर हम quality product की तरफ
जाएंगे तो गल्फ का एक बहुत बड़ा market, agriculture product के लिए हमारा
इंतजार करके बैठा है। वे ware house के लिए cold storage के लिए तैयार है,
वो गारंटी के साथ माल खऱीदने के लिए तैयार है यानि भारत की कृषि भी एक
global requirement के संदर्भ में उसे हम एक नया मोड़ दे सकते हैं, हम
उसमें बदलाव ला सकते हैं और उस बदलाव लाने की दिशा में हमें प्रयास करना
चाहिए। अभी इस बजट में एक बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय किया, उस निर्णय की चर्चा
बहुत कम आई है क्योंकि कुछ चीजें ऐसी हैं, जिसे लोगों को समझते-समझते दो
साल चले जाते हैं इसलिए वो बात शायद पब्लिक में आई ही नहीं।
भारत सरकार ने एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय़
किया कि Agro processing में हम 100 percent foreign direct investment को
हम स्वागत करते हैं। अब कुछ लोगों का दिमाग शायद ऐसा है कि FDI का नाम आते
ही उनको लगता है ये कुछ उद्योग वाला हो गया।
ये food processing की सारी process किसान
को बहुत बड़ी ताकत देती है। अगर वो कोई ऐसी पैदावार करता है और उसका
technology solution से valuable addition होता है तो income बहुत बढ़ जाती
है और उसके लिए पूंजी निवेश के लिए दुनिया से पैसे आते हैं तो किसान की
ताकत बढ़ने वाली है। आप कच्चे आम बेचो तो कम पैसा आता है, पके हुए बेचो तो
थोड़ा ज्यादा आता है। कच्चे आम बेचो लेकिन आचार बनाकर बेचो और पैसा आता है।
आचार भी बढ़िया सी बोतल में pack करके बेचो तो और ज्यादा पैसा आता है और
बोतल की advertisement कोई नट या नटी करती हो तो औऱ ज्यादा पैसा मिल जाता
है। value addition कैसे होता है, food processing का value addition कैसे
होता है और इसलिए अभी हमने कोका कोला कंपनी के साथ महाराष्ट्र government
का एक agreement करवाया। मैंने इन सारी कंपनियों कहा है कि आप जो पेप्सी,
कोका कोला ये सब पानी बेचते हो colorful होता है, tasty होता है लोगों को
आदत हो गई है अरबों-खरबों का बाजार है। मैंने कहा मेरे देश के किसानों के
लिए आप एक नियम बनाइए कि कम से कम 5 percent, कम से कम 5 percent natural
fruit juice आप इस aerated water में mix करोगे।
आप देखिए एक तो जो पीता है उसको फायदा
होगा, कम से कम 5 percent तो माल अच्छा जाएगा शरीर में लेकिन उसके कारण
किसान जो फल पैदा करता है, उसको तुरंत market मिल जाएगा, वरना संतरा कोई
पैदा करेगा, एकाध दिन में तो संतरा खराब हो जाएगा लेकिन संतरे का जूस अगर
उसमें मिलना शुरू हुआ तो संतरे को market मिलना शुरू हो जाएगा, Apple को
market मिल जाएगा, केले को market मिल जाएगा और इसलिए वो चीजें जो हमारे
किसान को ताकत दें, ऐसे कई initiative लिए हैं और उस initiative के परिणाम
मैं कहता हूं कि आने वाले दिनों में किसानों का भविष्य उज्जवल बनाया जा
सकता है, सोची-समझी व्यवस्था के तहत बनाया जाता है और अब ये मंडी के माध्यम
से, ई NAM के माध्यम से जो प्रयास किया है इस ई NAM के माध्यम से, मैं
विश्वास से कहता हूं कि मेरा किसान अब तय करेगा कि उसका माल कहां बिकेगा,
कब बिकेगा, कितने दाम से बिकेगा इसका फैसला अब मेरा किसान करेगा और
consumer को कभी कोई बोझ नहीं होगा, ये मेरा भरोसा है। consumer को कभी कोई
मुसीबत नहीं होगी, ये मेरा पूरा भरोसा है। मैं देश के किसानों को आज 14
अप्रैल बाबा साहेब अंबेडकर की जन्म जयंती पर जिनका empowerment of poor
people वाला हमेशा रहा था, मेरा किसान empower हो इसलिए एक महत्वपूर्ण
project आज प्रारंभ हो रहा है, मैं कृषि मंत्रालय को मंत्री के विभाग के
सभी साथियों को हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं, मेरे देश के किसानों को
बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। असम का आज नया वर्ष है, असम का नववर्ष है,
उस बिहू के मौके पर भी मैं शुभकामनाएं देता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद।
विशाल संख्या में पधारे हुए मेरे प्यारे भाइयो और बहनों,
ये मेरा सौभाग्य है कि आज डॉ. बाबा साहेब
अम्बेडकर की 125वीं जन्म जयंती निमित्त, जिस भूमि पर इस महा पुरूष ने
जन्म लिया था, जिस धरती पर सबसे पहली बार जिसके चरण-कमल पड़े थे, उस धरती
को नमन करने का मुझे अवसर मिला है।
मैं इस स्थान पर पहले भी आया हूं। लेकिन
उस समय के हाल और आज के हाल में आसमान-जमीन का अंतर है और मैं मध्य प्रदेश
सरकार को, श्रीमान सुंदरलाल जी पटवा ने इसका आरंभ किया, बाद में श्रीमान
शिवराज की सरकार ने इसको आगे बढ़ाया, परिपूर्ण किया। इसके लिए हृदय से
बहुत-बहुत बधाई देता हूं उनका अभिनंदन करता हूं।
बाबा साहेब अम्बेडकर एक व्यक्ति नहीं
थे, वे एक संकल्प का दूसरा नाम थे। बाबा साहेब अम्बेडकर जीवन जीते नहीं
थे वो जीवन को संघर्ष में जोड़ देते थे, जोत देते थे। बाबा साहेब अम्बेडकर
अपने मान-सम्मान, मर्यादाओं के लिए नहीं लेकिन समाज की बुराईयों के खिलाफ
जंग खेल करके आखिरी झोर पर बैठा हुआ दलित हो, पीढि़त हो, शोषित हो, वंचित
हो। उनको बराबरी मिले, उनको सम्मान मिले, इसके लिए अपमानित हो करके भी
अपने मार्ग से कभी विचलित नहीं हुए। जिस महापुरूष के पास इतनी बड़ी ज्ञान
संपदा हो, जिस महापुरूष के युग में विश्व की गणमान्य यूनिवर्सिटिस की
डिग्री हो, वो महापुरूष उस कालखंड में अपने व्यक्तिगत जीवन में लेने,
पाने, बनने के लिए सारी दुनिया में अवसर उनके लिए खुले पड़े थे। लेकिन इस
देश के दलित, पीढि़त, शोषित, वंचितों के लिए उनके दिल में जो आग थी, जो
उनके दिल में कुछ कर गुजरने का इरादा था, संकल्प था। उन्होंने इन सारे
अवसरों को छोड़ दिया और वह अवसरों को छोड़ करके, फिर एक बार भारत की मिट्टी
से अपना नाता जोड़ करके अपने आप को खपा दिया।
आज 14 अप्रैल बाबा साहेब अम्बेडकर की
जन्म जयंती हो और मुझे हमारे अखिल भारतीय भिक्षुक संघ के संघ नायक डॉ.
धम्मवीरयो जी का सम्मान करने का अवसर मिला। वो भी इस पवित्र धरती पर अवसर
मिला। बहुत कम लोगों को पता होगा कि कैसी बड़ी विभूति आज हमारे बीच में है।
कहते है 100 भाषाओं के वो जानकार है, 100
भाषाएं, Hundred Languages. और बर्मा में जन्मे बाबा साहेब अम्बेडकर
उन्हें बर्मा में मिले थे और बाबा साहेब के कहने पर उन्होंने भारत को
अपनी कर्म भूमि बनाया और उन्होंने भारत में बुद्ध सत्व से दुनिया को
जोड़ने को प्रयास अविरत किया।
मेरा तो व्यक्तिगत नाता उनके इतना निकट
रहा है, उनके इतने आर्शीवाद मुझे मिलते रहे है। मेरे लिए वो एक प्रेरणा को
स्थान रहे है। लेकिन आज मुझे खुशी है कि मुझे उनका सम्मान करने का
सौभाग्य मिला। बाबा साहेब अम्बेडकर के साथ उनका वो नाता और बाबा साहेब
अम्बेडकर ने कहा तो पूरा जीवन भारत के लिए खपा दिया। और ज्ञान की उनकी कोई
तुलना नहीं कर सकता, इतने विद्यमान है। वे आज हमारे मंच पर आए इस काम की
शोभा बढ़ाई इसलिए मैं डॉ. धम्मवीरयो जी का, संघ नायक जी का हृदय से आभार
करता हूं। मैं फिर से एक बार प्रणाम करता हूं।
आज 14 अप्रैल से आने वाली 24 अप्रैल तक
भारत सरकार के द्वारा सभी राज्यों सरकारों के सहयोग के साथ “ग्राम उदय से
भारत उदय”, एक व्यापक अभियान प्रारंभ हो रहा है और मुझे खुशी है कि बाबा
साहेब अम्बेडकर ने हमें जो संविधान दिया। महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज
की जो भावना हमें दी, ये सब अभी भी पूरा होना बाकी है। आजादी के इतने
सालों के बाद जिस प्रकार से हमारे गांव के जीवन में परिवर्तन आना चाहिए था,
जो बदलाव आना चाहिए था। बदले हुए युग के साथ ग्रामीण जीवन को भी आगे ले
जाने का आवश्यक था। लेकिन ये दुख की बात है अभी भी बहुत कुछ करना बाकि है।
भारत का आर्थिक विकास 5-50 बढ़े शहरों से होने वाला नहीं है। भारत का
विकास 5-50 बढ़े उद्योगकारों से नहीं होने वाला। भारत का विकास अगर हमें
सच्चे अर्थ में करना है और लंबे समय तक Sustainable Development करना है
तो गांव की नींव को मजबूत करना होगा। तब जा करके उस पर विकास की इमारत हम
Permanent बना सकते है।
और इसलिए इस बार आपने बजट में भी देखा
होगा कि बजट पूरी तरह गांव को समर्पित है, किसान को समर्पित है। और एक
लंबे समय तक देश के ग्रामीण अर्थकारण को नई ऊर्जा मिले, नई गति मिले, नई
ताकत मिले उस पर बल दिया गया है। और मैं साफ देख रहा हूं, जो भावना
महात्मा गांधी की अभिव्यक्ति में आती थी, जो अपेक्षा बाबा साहेब
अम्बेडकर संविधान में प्रकट हुई है, उसको चरितार्थ करने के लिए, टुकड़ो
में काम करने से चलने वाला नहीं है। हमें एक जितने भी विकास के स्रोत हैं,
सारे विकास के स्रोत को गांव की ओर मोड़ना है।
मैं सरकार में आने के बाद अगल-अलग कामों
का Review करता रहता हूं, बहुत बारिकी से पूछता रहता हूं। अभी कुछ महिने
पहले मैं भारत में ऊर्जा की स्थिति का Review कर रहा था। मैंने अफसरों को
पूछा कि आजादी के अब 70 साल होने वाले है कुछ ही समय के बाद। कितने गांव
ऐसे है जहां आजादी के 70 साल होने आए, अभी भी बिजली का खंभा नहीं पहुंचा
है, बिजली का तार नहीं पहुंचा है। आज भी वो गांव के लोग 18वीं शताब्दी की
जिंदगी में जी रहे है, ऐसे कितने गांव है। मैं सोच रहा था 200-500 शायद,
दूर-सुदूर कहीं ऐसी जगह पर होंगे जहां संभव नहीं होगा। लेकिन जब मुझे बताया
गया कि आजादी के 70 साल होने को आए है लेकिन 18,000 गांव ऐसे जहां बिजली
का खंभा भी नहीं पहुंचा है। अभी तक उन 18,000 हजार गांव के लोगों ने
उजियारा देखा नहीं है।
20वीं सदी चली गई, 19वीं शताब्दी चली गई,
21वीं शताब्दी के 15-16 साल बीत गए, लेकिन उनके नसीब में एक लट्टू भी
नहीं था। मेरा बैचेन होना स्वाभाविक था। जिस बाबा साहेब अम्बेडकर ने
वंचितों के लिए जिंदगी गुजारने का संदेश दिया हो, उस शासन में 18,000 गांव
अंधेरे में गुजारा करते हों, ये कैसे मंजूर हो सकता है।
मैंने अफसरों को कहा कितने दिन में पूरा
करोंगे, उन्होंने न जवाब मुझे दिन में दिया, न जवाब महिनों में दिया,
उन्होंने जवाब मुझे सालों में दिया। बोले साहब सात साल तो कम से कम लग
जाएंगे। मैंने सुन लिया मैंने कहा भई देखिए सात साल तक तो देश इंतजार नहीं
कर सकता, वक्त बदल चुका है। हमने हमारी गति तेज करनी होगी। खैर उनकी
कठिनाईयां थी वो उलझन में थे कि प्रधानमंत्री कह रहे है कि सात साल तो बहुत
हो गया कम करो। तो बराबर मार-पीट करके वो कहने लगे साहब बहुत जोर लगाये तो
6 साल में हो सकता है।
खैर मैंने सारी जानकारियां ली अभ्यास
करना शुरू किया और लाल किले पर से 15 अगस्त को जब भाषण करना था, बिना पूछे
मैंने बोल दिया कि हम 1000 दिन में 18,000 गांव में बिजली पहुंचा देंगे।
मैंने देश के सामने तिरंगे झंडे की साक्षी में लाल किले पर से देश को वादा
कर दिया। अब सरकार दोड़ने लगी और आज मुझे खुशी के साथ कहना है कि शायद ये
सपना मैं 1000 दिन से भी कम समय में पूरा कर दूंगा। जिस काम के लिए 70 साल
लगे, 7 साल और इंतजार मुझे मंजूर नहीं है। मैंने हजार दिन में काम पूरा
करने का बेड़ा उठाया पूरी सरकार को लगाया है। राज्य सरकारों को साथ देने
के लिए आग्रह किया है और तेज गति से काम चल रहा है।
और व्यवस्था भी इतनी Transparent है। कि
आपने अपने मोबाइल पर ‘गर्व’ - ‘GARV’ ये अगर App लांच करेंगे तो आपको
Daily किस गांव में खंभा पहुंचा, किस गांव में तार पहुंचा, कहां बिजली
पहुंची, इसका Report आपकी हथेली में मोबाइल फोन पर यहां पर कोई भी देख सकता
है। ये देश की जनता को हिसाब देने वाली सरकार है, पल-पल का हिसाब देने
वाली सरकार है, पाई-पाई का हिसाब देने वाली सरकार है और हिन्दुस्तान के
सामान्य मानवी के सपनों को पूरा करने के लिए तेज गति से कदम आगे बढ़ाने
वाली सरकार है। और उसी का परिणाम है कि आज जिस गांव में इतने सालों के बाद
बिजली पहुंची है उन गांवों में ऊर्जा उत्सव मनाए जा रहे है, हफ्ते भर
नाच-गान चल रहे है। लोग खुशियां मना रहे है कि चलो गांव में बिजली आई, अब
घर में भी आ जाएंगी ये mood बना है।
हमारी दुनिया बिजली की बात तो दुनिया के
लिए 18वीं, 19वीं शताब्दी की बात है। आज विश्व को optical fiber चाहिए,
आज विश्व को digital network से जुड़ना है। जो दुनिया में है वो सारा उसकी
हथेली पर होना चाहिए। ये आज सामान्य-सामान्य नागरिक भी चाहता है। अगर
दुनिया के हर नागरिक के हाथ में उसके मोबाइल फोन में पूरा विश्व उपलब्ध
है तो मेरे हिन्दुस्तान के गांव के लोगों के हाथ में क्यों नहीं होना
चाहिए। ढाई लाख गांव जिसको digital connectivity देनी है, optical fiber
network लगाना है। कई वर्षों से सपने देखें गए, काम सोचा गया लेकिन कहीं
कोई काम नजर नहीं आया। मैं जानता हूं ढाई लाख गांवों में optical fiber
network करना कितना कठिन है, लेकिन कठिन है तो हाथ पर हाथ रख करके बैठे
थोड़े रहना चाहिए। कहीं से तो शुरू करना चाहिए और एक बार शुरू करेंगे तो
गति भी आएंगी और सपने पूरे भी होंगे। आखिरकर बाबा साहेब अम्बेडकर जैसे
संकल्प के लिए जीने वाले महापुरूष हमारी प्ररेणा हो तो गांव का भला क्यों
नहीं हो सकता है।
हमारा देश का किसान, किसान कुछ नहीं मांग
रहा है। किसान को अगर पानी मिल जाए तो मिट्टी में से सोना पैदा कर सकता है।
बाकि सब चीजें वो कर सकता है। उसके पास वो हुनर है, उसके पास वो सामर्थ्य
है, वो मेहनतकश है वो कभी पीछे मुड़ करके देखता नहीं है। और किसान, किसान
अपनी जेब भरे तब संतुष्ट होता है वो स्वभाव का नहीं है, सामने वाले का
पेट भर जाए तो किसान संतुष्ट हो जाता है ये उसका चरित्र होता है। और जिसे
दूसरे का पेट भरने से संतोष मिलता है वो परिश्रम में कभी कमी नहीं करता है,
कभी कटौती नहीं करता है।
और इसलिए हमने देश के किसानों के सामने एक
संकल्प रखा है। गांव के अर्थ कारण को बदलना है। 2022 में किसान की income
double करना बड़े-बड़े बुद्धिमान लोगों, बड़े-बड़े अनुभवी लोगों ने,
बड़े-बड़े अर्थशस्त्रियों ने कहा है कि मोदी जी ये बहुत मुश्किल काम है।
मुश्किल है तो मैं भी जानता हूं। अगर सरल होता तो ये देश की जनता मुझे काम न
देती, देश की जनता ने काम मुझे इसलिए दिया है कि कठिन का ही तो मेरे नसीब
में आए। काम कठिन होगा लेकिन इरादा उतना ही संकल्पबद्ध हो तो फिर रास्ते
भी निकलते है और रास्ते मिल रहे है।
मैं शिवराज जी को बधाई देता हूं उन्होंने
पूरी डिजाइन बनाई है, मध्य प्रदेश में 2022 तक किसानों की आया double
करने का रास्ता क्या-क्या हो सकता है, initiative क्या हो सकते है,
तरीके क्या हो सकते है, पूरा detail में उन्होंने बनाया। मैंने सभी
राज्य सरकारों से आग्रह किया कि आप भी अपने तरीके से सोचिए। आपके पार जो
उपलब्ध resource है, उसके आधार पर देखिए।
लेकिन ग्रामीण अर्थकारण भारत की अर्थनीति
को ताकत देने वाला है। जब तक गांव के व्यक्ति का Purchasing Power बढ़ेगा
नहीं और हम सोचें कि नगर के अंदर कोई माल खरीदने आएंगा और नगर की economy
चलेंगी, तो चलने वाली नहीं है। इंदौर का बाजार भी तेज तब होगा, जब मऊ के
गांव में लोगों की खरीद शक्ति बढ़ी होगी, तब जा करके इंदौर जा करके खरीदी
करेगा और इसलिए ग्रामीण अर्थकारण की मजबूती ये भारत में आर्थिक चक्र को तेज
गति देने का सबसे बड़ा Powerful engine है। और हमारी सारी विकास की जो
दिशा है वो दिशा यही है।
बाबा साहेब अम्बेडकर जैसे एक प्रकार कहते
थे कि शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो। साथ-साथ उनका सपना ये भी था
कि भारत आर्थिक रूप से समृद्ध हो, सामाजिक रूप से empowered हो और
Technologically के लिए upgraded हो। वे सामाजिक समता, सामाजिक न्याय के
पक्षकार थे, वे आर्थिक समृद्धि के पक्षकार थे और वे आधुनिक विज्ञान के
पक्षकार थे आधुनिक Technology के पक्षकार थे। और इसलिए सरकार ने भी ये 14
अप्रैल से 24 अप्रैल, 14 अप्रैल बाबा अम्बेडकर साहेब की 125वीं जन्म
जन्म जयंती और 24 अप्रैल पंचायती राज दिवस इन दोनों का मेल करके बाबा
साहेब अम्बेडकर से सामाजिक-आर्थिक कल्याण का संदेश लेता हुए गांव-गांव जा
करके गांव के एक ताकत का निर्णय लिया है।
आज सरकारी खजाने से, भारत सरकार के खजाने
से एक गांव को करीब-करीब 75 लाख रुपए से ज्यादा रकम उसके गांव में हाथ में
आती है। अगर योजनाबद्ध दीर्घ दृष्टि के साथ हमारा गांव का व्यक्ति करें
काम, तो कितना बड़ा परिणाम ला सकता है ये हम जानते है।
हमारी ग्राम पंचायत की संस्था है। देश
संविधान की मर्यादाओं से चलता है, कानून व्यवस्था, नियमों से चलता है।
ग्राम पंचायत के अंदर उस भावना को प्रज्जवलित रखना आवश्यक है, वो निरंतर
चेतना जगाए रखना आवश्यक है और इसलिए गांव के अंदर पंचायत व्यवस्था अधिक
सक्रिय कैसे हो, अधिक मजबूत कैसे हो, दीर्घ दृष्टि वाली कैसे बने, उस दिशा
में प्रयत्न करने की आवश्यकता, गांव-गांव में एक चेतना जगाकर के हो सकती
है। बाबा साहेब अम्बेडकर का व्यक्तित्व ऐसा है कि गांव के अंदर वो
चेतना जगा सकता है। गांव को संविधान की मर्यादा में आगे ले जाने के रास्ते
उपलब्ध है। उसका पूरा इस्तेमाल करने का रास्ता उसको दिखा सकता है। अगर
एक बार हम निर्णय करें।
मैं आज इंदौर जिले को भी हृदय से बधाई
देना चाहता हूं और मैं मानता हूं कि इंदौर जिले ने जो काम किया है। पूरे
जिले को खुले में शौच जाने से मुक्त करा दिया। यह बहुत उत्तम काम.. अगर
21वीं सदीं में भी मेरी मॉं-बहनों को खुले में शौच के लिए जाना पड़े, तो
इससे बड़ी हम लोगों के लिए शर्मिन्दगी नहीं हो सकती। लेकिन इंदौर जिले ने,
यहां की सरकार की टीम ने, यहां के राजनीतिक नेताओं ने, यहां के सामाजिक
आगेवानों ने, यहां के नागरिकों ने, यह जो एक सपना पूरा किया, मैं समझता हूं
बाबा साहेब अम्बेडकर को एक उत्तम श्रद्धांजलि इंदौर जिले ने दी है। मैं
इंदौर जिले को बधाई देता हूं। और पूरे देश में एक माहौल बना है। हर जिले को
लग रहा है Open defecation-free होने के लिए हर जिले में यह स्पर्धा शुरू
हुई है। भारत को स्वच्छ बनाना है तो हमें सबसे पहले हमारी मॉं-बहनों को
शौचालय के लिए खुले में जाना न पड़ रहा है, इससे मुक्ति दिलानी होगी। उसके
लिए बहुत बड़ी मात्रा में हर किसी को मिलकर के काम करना पड़ेगा। ये करे, वो
न करे; ये credit ले, वो न ले; इसके लिए काम नहीं है, यह तो एक सेवा भाव
से करने वाला काम है, जिम्मेवारी से करने वाला काम है। इस “ग्रामोदय से
भारत उदय” का जो पूरा मंत्र है, उसमें इस बात पर भी बल दिया गया है।
मेरे प्यारे भाइयो-बहनों, हमारे देश में
हम कभी-कभी सुनते तो बहुत है। कई लोग छह-छह दशक से अपने आप को गरीबों के
मसीहा के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। जिनकी जुबां पर दिन-रात
गरीब-गरीब-गरीब हुआ करता है। वे गरीबों के लिए क्या कर पाए, इसका
हिसाब-किताब चौंकाने वाला है। मैं अपना समय बर्बाद नहीं करता। लेकिन क्या
कर रहा हूं जो गरीबों की जिन्दगी में बदलाव ला सकता है। अभी आपने देखा
मध्य प्रदेश के गरीबों के लिए, दलितों के लिए, पिछड़ों के लिए जो योजनाएं
थी, उसके लोकार्पण का कार्यक्रम हुआ। कई लाभार्थियों को उनकी चीजें दी गई।
इन सब में उस बात का संदेश है कि Empowerment of People. उनको आगे बढ़ने का
सामर्थ्य दिया जा रहा है। जो मेरे दिव्यांग भाई-बहन है, किसी न किसी
कारण शरीर का एक अंग उनको साथ नहीं दे रहा है। उनको आज Jaipur Foot का
फायदा मिला और यह आंदोलन चलता रहने वाला है। यहां तो एक टोकन कार्यक्रम हुआ
है और बाबा साहेब अम्बेडकर की जन्मभूमि पर यह कार्यक्रम अपने आप को एक
समाधान देता है।
भाइयो-बहनों, आपको जानकर के हैरानी होगी।
आज भी हमारे करोड़ों-करोड़ों गरीब भाई-बहन, जो झुग्गी-झोपड़ी में, छोटे घर
में, कच्चे घर में गुजारा करते हैं, वे लकड़ी का चूल्हा जलाकर के खाना
पकाते हैं। विज्ञान कहता है कि जब मॉ लकड़ी का चूल्हा जलाकर खाना पकाती
है। एक दिन में 400 सिगरेट जितना धुँआ उस मॉं के शरीर में जाता है। आप
कल्पना कर सकते हो, जिस मॉं के शरीर में 400 सिगरेट जितना धुँआ जाएगा, वो
मॉं बीमार होगी कि नहीं होगी? उसके बच्चे बीमार होंगे कि नहीं होंगे और
समाज के ऐसे कोटि-कोटि परिवार बीमारी से ग्रस्त हो जाए, तो भारत स्वस्थ
बनाने क सपने कैसे पूरे होंगे?
पिछले एक वर्ष में, हमने trial basis पर
काम चालू किया। मैंने समाज को कहा कि भाई, आप अपने गैस सिलेंडर की सब्सिडी
छोड़ दीजिए और मुझे आज संतोष के साथ कहना है कि मैंने तो ऐसे ही चलते-चलते
कह दिया था, लेकिन करीब-करीब 90 लाख परिवार और जो ज्यादातर मध्यम वर्गीय
है, कोई स्कूल में टीचर है, कोई टीचर रिटायर्ड हुई मॉं है, पेंशन पर
गुजारा करती है लेकिन मोदी जी ने कहा तो छोड़ दो। करीब 90 लाख लोगों ने अपने
गैस सिलेंडर की सब्सिडी छोड़ दी और पिछले एक वर्ष में आजादी के बाद, एक
वर्ष में इतने गैस सिलेंडर का कनेक्शन कभी नहीं दिया गया। पिछले वर्ष एक
करोड़ गरीब परिवारों को गैस सिलेंडर का कनेक्शन दे दिया गया और उनको
चूल्हे के धुँअे से मुक्ति दिलाने का काम हो गया। जब ये मेरा ‘पायलट
प्रोजेक्ट’ सफलतापूर्वक हुआ और मैंने कोई घोषणा नहीं की थी, कर रहा था,
चुपचाप उसको कर रहा था। जब सफलता मिली तो इस बजट में हमने घोषित किया है कि
आने वाले तीन वर्ष में हम भारत के पॉंच करोड़ परिवार, आज देश में कुल
परिवार है 25 करोड़ और थोड़े ज्यादा; कुल परिवार है 25 करोड़। संख्या है
सवा सौ करोड़, परिवार है 25 करोड़ से ज्यादा। पॉंच करोड़ परिवार, जिनको
गैस सिलेंडर का कनेक्शन देना है, गैस सिलेंडर देना है और उन पॉंच करोड़
परिवार में लकड़ी के चूल्हे से, धुँए में गुजारा कर रही मेरी गरीब
माताओं-बहनों को मुक्ति दिलाने का अभियान चलाया है।
गरीब का भला कैसे होता है? प्रधानमंत्री
जन-धन योजना! हम जानते है, अखबारों में पढ़ते हैं। कभी कोई शारदा चिट फंड
की बात आती है, कभी और चिट फंड की बात आती है। लोगों की आंख में धूल झोंककर
के बड़ी-बड़ी कंपनियॉं बनाकर के, लोगों से पैसा लेने वाले लोग बाद में
छूमंतर हो जाते हैं। गरीब ने बेचारे ने बेटी की शादी के लिए पैसे रखे हैं,
ज्यादा ब्याज मिलने वाला है इस सपने से; लेकिन बेटी कुंवारी रह जाती है
क्योंकि पैसे जहां रखे, वो भाग जाता है। ये क्यों हुआ? गरीब को ये चिट
फंड वालों के पास क्यों जाना पड़ा? क्योंकि बैंक के दरवाजे गरीबों के लिए
खुलते नहीं थे। हमने प्रधानमंत्री जन-धन योजना के द्वारा हिन्दुस्तान के
हर गरीब के लिए बैंक में खाते खोल दिए और आज गरीब आदमी को साहूकारों के
पास जाकर के ब्याज के चक्कर में पड़ना नहीं पड़ रहा है। गरीब को अपने
पैसे रखने के लिए किसी चिट फंड के पास जाना नहीं पड़ रहा है और गरीब को एक
आर्थिक सुरक्षा देने का काम हुआ और उसके साथ उसको रूपे कार्ड दिया गया।
उसके परिवार में कोई आपत्ति आ जाए तो दो लाख रुपए का बीमा दे दिया और मेरे
पास जानकारी है, कई परिवार मुझे मिले कि अभी तो जन-धन एकाउंट खोला था और
15 दिन के भीतर-भीतर उनके घर में कोई नुकसान हो गया तो उनके पास दो लाख
रुपए आ गए। परिवार ने कभी सोचा भी नहीं था कि दो लाख रुपए सीधे-सीधे उनके
घर में पहुंच जाएंगे।
गरीब के लिए काम कैसे होता है?
प्रधानमंत्री जन-धन योजना के द्वारा सिर्फ बैंक में खाता खुला, ऐसा नहीं
है। वो भारत की आर्थिक व्यवस्था की मुख्यधारा में हिन्दुस्तान के गरीब
को जगह मिली है, जो पिछले 70 साल में हम नहीं कर पाए थे। उसको पूरा करने
से भारत की आर्थिक ताकत को बढ़ावा मिलेगा। आज दुनिया के अंदर हिन्दुस्तान
के आर्थिक विकास का जय-जयकार हो रहा है। विश्व की सभी संस्थाएं कह रही
हैं कि भारत बहुत तेज गति से आगे बढ़ रहा है। उसका मूल कारण देश के गरीब से
गरीब व्यक्ति को साथ लेकर के चलने का हमने एक संकल्प किया, योजना बनाई
और चल रहे हैं। जिसका परिणाम है कि आज आर्थिक संकटों के बावजूद भी भारत
आर्थिक ऊंचाइयों पर जा रहा है। दुनिया आर्थिक संकटों को झेल रही है, हम
नए-नए अवसर खोज रहे हैं।
अभी मैं मुम्बई से आ रहा था। आज मुम्बई
में एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्यक्रम था। बहुत कम लोगों को अम्बेडकर साहेब को
पूरी तरह समझने का अवसर मिला है। ज्यादातर लोगों को तो यही लगता है कि
बाबा साहेब अम्बेडकर यानी दलितों के देवता। लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम
है कि बाबा साहेब अम्बेडकर दीर्घदृष्टा थे। उनके पास भारत कैसा बने, उसका
vision था। आज मैंने मुम्बई में एक maritime को लेकर के, सामुद्रिक
शक्ति को लेकर के एक अंतर्राष्ट्रीय बड़े कार्यक्रम का उद्घाटन किया। वो
14 अप्रैल को इसलिए रखा था कि भारत में बाबा साहेब अम्बेडकर पहले
व्यक्ति थे जिन्होंने maritime, navigation, use of water पर
दीर्घदृष्टि से उन्होंने vision रखा था। उन्होंने ऐसी संस्थाओं का
निर्माण किया था उस समय, जब वे सरकार में थे, जिसके आधार पर आज भी
हिन्दुस्तान में पानी वाली, maritime वाली, navigation वाली संस्थाएं
काम कर रही हैं। लेकिन बाबा साहेब अम्बेडकर को भुला दिया। हमने आज जानबूझ
करके 14 अप्रैल को बाबा साहेब अम्बेडकर ने जो vision दिया था, उनके
जन्मदिन 14 अप्रैल को, उसको साकार करने की दिशा में आज मुम्बई में एक
समारोह करके मैं आ रहा हूं, आज उसका मैंने प्रारम्भ किया। लाखों-करोड़ों
समुद्री तट पर रहने वाले लोग, हमारे मछुआरे भाई, हमारे नौजवान, उनको रोजगार
के अवसर उपलब्ध होने वाले हैं, जो बाबा साहेब अम्बेडकर का vision था।
इतने सालों तक उसको आंखों से ओझल कर दिया गया था। उसको आज चरितार्थ करने की
दिशा में, एक तेज गति से आगे बढ़ने का प्रयास अभी-अभी मुम्बई जाकर के मैं
करके आया हूं।
अभी
हमारे दोनों पूर्व वक्ताओं ने पंचतीर्थ की बात कही है। कुछ लोग इसलिए
परेशान है कि मोदी ये सब क्यों कर रहे हैं? ये हमारे श्रद्धा का विषय है,
ये हमारे conviction का विषय है। हम श्रद्धा और conviction से मानते हैं कि
बाबा साहेब अम्बेडकर ने सामाजिक एकता के लिए बहुत उच्च मूल्यों का
प्रस्थापन किया है। सामाजिक एकता, सामाजिक न्याय, सामाजिक समरसता, बाबा
साहेब अम्बेडकर ने जो रास्ता दिखाया है उसी से प्राप्त हो सकती है इसलिए
हम बाबा साहेब अम्बेडकर के चरणों में बैठकर के काम करने में गर्व अनुभव
करते हैं।
सरकारें बहुत आईं.. ये 26-अलीपुर, बाबा
साहेब अम्बेडकर की मृत्यु के 60 साल के बाद उसका स्मारक बनाने का
सौभाग्य हमें मिला। क्या 60 साल तक हमने रोका था किसी को क्या? और आज हम
कर रहे हैं तो आपको परेशानी हो रही है। पश्चाताप होना चाहिए कि आपने किया
क्यों नहीं? परेशान होने की जरूरत नहीं है, आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा
देने के लिए यही तो सामाजिक आंदोलन काम आने वाला है। और इसलिए मेरे
भाइयो-बहनों एक श्रद्धा के साथ.. और मैं बड़े गर्व के साथ कहता हूं कि ऐसा
व्यक्ति जिसकी मॉं बचपन में अड़ोस-पड़ोस के घरों में बर्तन साफ करती हो,
पानी भरती हो, उसका बेटा आज प्रधानमंत्री बन पाया, उसका credit अगर किसी को
जाता है तो बाबा साहेब अम्बेडकर को जाता है, इस संविधान को जाता है। और
इसलिए श्रद्धा के साथ, एक अपार, अटूट श्रद्धा के साथ इस काम को हम करने लगे
हैं। और आज से कर रहे हैं, ऐसा नहीं। हमने तो जीवन इन चीजों के लिए खपाया
हुआ है। लेकिन वोट बैंक की राजनीति करने वालों ने समाज को टुकड़ों में
बांटने के सिवाए कुछ सोचा नहीं है।
बाबा साहेब आम्बेडर, उन पर जो बीतती थी,
शिक्षा में उनके साथ अपमान, जीवन के हर कदम पर अपमान, कितना जहर पीया होगा
इस महापुरुष ने, कितना जहर पीया होगा जीवन भर और जब संविधान लिखने की नौबत
आई, अगर वो सामान्य मानव होते, हम जैसे सामान्य मानव होते तो उनकी कलम से
संविधान के अंदर कहीं तो कहीं उस जहर की एक-आध बिन्दु तो निकल पाती।
लेकिन ऐसे महापुरुष थे जिसने जहर पचा दिया। अपमानों को झेलने के बाद भी जब
संविधान बनाया तो किसी के प्रति कटुता का नामो-निशान नहीं था, बदले का भाव
नहीं था। वैर भाव नहीं था, इससे बड़ी महानता क्या हो सकती है? लेकिन
दुर्भाग्य से देश के सामने इस महापुरुष की महानताओं को ओझल कर दिया गया
है। तब ऐसे महापुरुष के चरणों में बैठकर के कुछ अच्छा करने का इरादा जो
रखते हैं, उनके लिए यही रास्ता है। उस रास्ते पर जाने के लिए हम आए हैं।
मुझे गर्व है कि आज 14 अप्रैल को पूरे देश में “ग्राम उदय से भारत उदय” के
आंदोलन का प्रारंभ इस धरती से हो रहा है। सामाजिक न्याय के लिए हो रहा है,
सामाजिक समरसता के लिए हो रहा है।
मैं हर गांव से कहूंगा कि आप भी इस
पवित्रता के साथ अपने गांव का भविष्य बदलने का संकल्प कीजिए। बाबा साहेब
की 125वीं जयंती की अच्छी श्रद्धांजलि वही होगी कि हम हमारे गांव में कोई
बदलाव लाए। वहां के जीवन में बदलाव लाए। सरकारी योजनाओं का व्यय न करते
हुए, पाई-पाई का सदुपयोग करते हुए चीजों को करने लगे तो अपने आप बदलाव आना
शुरू हो जाएगा।
मैं फिर एक बार मध्यप्रदेश सरकार का,
इतनी विशाल संख्या में आकर के आपने हमें आशीर्वाद दिया। इसलिए
जनता-जनार्दन का हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं।
जय भीम, जय भीम। दोनों मुट्ठी पूरी ऊपर करके बोलिए जय भीम, जय भीम, जय भीम, जय भीम।
मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे लोकदूतों के
आशीर्वाद पाने का अवसर मिला है। हम विदेश में जाते हैं तो राजदूतों को तो
मिलते हैं लेकिन लोकदूतों को मिलना एक सौभाग्य होता है और सरकार में अगर
राजदूत है तो आप भारत के लोकदूत हैं, जो भारत की सांस्कृतिक परम्परा को,
भारत को दुनिया के सामने अपने व्यवहार से, अपनी वाणी से, अपने विचारों से,
परिचित करवाते हैं, प्रभावित करते हैं। ऐसे सभी ये हजारों लोकदूतों को
मेरा नमस्कार।
गत सप्ताह ब्रसेल्स में एक भयंकर
आतंकवादी घटना घटी। जिन लोगों को अपने प्राणप्रिय स्वजन गंवाने पड़े हैं
उन परिवारों के प्रति मैं आदरपूर्वक अपनी श्रद्धा समर्पित करता हूं। यहां
के जीवन में इस प्रकार की घटनाएं अपने-आप में एक लम्बे अरसे के बाद इतना
बड़ा कांड इस धरती को सहना पड़ा है। आतंकवाद कितना भयंकर है, कितना निर्दयी
है ये अब दुनिया भली-भांति जान गई है। गत वर्ष दुनिया के 90 देश किसी न
किसी आतंकवादी घटना के शिकार हुए हैं, हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई और
दूसरी तरफ सैंकड़ों मां-बाप हैं, जो आंसू बहा रहे हैं क्योंकि उनकी संतान
आतंकवाद के रास्ते पर चल पड़ी है। आतंकवाद किसी देश के सामने चुनौती नहीं
है, आतंकवाद किसी भू-भाग पर चुनौती नहीं है, आतंकवाद मानवता को चुनौती दे
रहा है। और इसलिए समय की मांग है कि जो भी मानवता में विश्वास करते हैं,
दुनिया की उन सारी शक्तियों ने एकत्र आ करके आतंकवाद से मुकाबला करना होगा।
आतंकवाद जितना भयंकर है उससे ज्यादा चिंता इस बात की हो रही है कि इतने
बड़े संकट के बावजूद भी हजारों लोगों, निर्दोष लोगों की मौत के बावजूद भी
दुनिया इस विकराल रूप को पहचानने में कम पड़ रही है। और उसके कारण
मानवतावादी शक्तियों में बिखराव नजर आता है। कभी good terrorism, bad
terrorism वो जाने-अनजाने में आतंकवाद को एक अलग प्रकार की ताकत पहुंचाता
है। और इसलिए समय की मांग है कि दुनिया इस आतंकवाद की भयानकता को समझे।
भारत 40 साल से आतंकवाद के कारण परेशान है। युद्ध में भारत ने जितने जवानों
को नहीं गवांया, उससे ज्यादा जवान आतंकवादियों की गोलियों से मरे हैं,
शहीद हुए हैं और भारत जब चीख-चीख के दुनिया को कहता था कि आतंकवाद
निर्दोषों के जीवन का दुश्मन बन चुका है। मेरा स्वयं का अनुभव है दुनिया
की बड़ी-बड़ी ताकतें हमें समझाती थीं कि आतंकवाद नहीं है ये तो आपका law
and order problem है। लेकिन जब धरती पैरों के नीचे से हिलने लगी, तब
दुनिया को पता चला कि आतंकवाद क्या होता है।
Nine/Eleven (9/11) ने दुनिया को झकझोर
दिया, तब तक दुनिया ये मानने को तैयार नहीं थी कि भारत कितने बड़े संकट को
झेल रहा है। लेकिन भारत आतंकवाद के सामने झुका नहीं और झुकने का तो सवाल ही
नहीं उठता। लेकिन आतंकवाद के खिलाफ मुकाबला ये एक बहुत बड़ी चुनौती है।
मैंने दुनिया के कई वरिष्ठ नेताओं से बात की। अलग-अलग सांप्रदायों से
जुड़े हुए नेताओं से बात की। और उनको मैंने समझाया कि आतंकवाद को religion
से delink कर देना चाहिए पहले। कोई धर्म आतंकवाद नहीं सिखाता है। पिछले
दिनों भारत में Liberal Islamic Scholar का एक बहुत बड़ा समारोह हुआ।
दुनिया के कई देश के Islamic Scholar आए। सूफी परम्परा से जुड़े हुए थे।
उन्होंने एक स्वर से कहा कि आतंकवादी जो इस्लाम की बात करते हैं वो
इस्लाम नहीं है, ये तो un-Islamic बात करते हैं। जितनी बड़ी मात्रा में इस
प्रकार का स्वर उठेगा, उतनी तेजी से जो नौजवानों का radicalization हो
रहा है उनको बचाया जा सकता है। सिर्फ बम, बंदूक और पिस्तौल से आतंकवाद को
समाप्त नहीं कर सकते हैं।
हमें समाज में एक माहौल पैदा करना पड़ेगा।
ये देश का दुर्भाग्य देखिए, दुनिया का दुर्भाग्य देखिए, मानवता का
दुर्भाग्य देखिए, United Nation युद्ध क्या होता है, युद्ध में किसने
क्या करना चाहिए, युद्ध से क्या संकट होते हैं, युद्ध को रोकने के क्या
तरीके होते हैं, UN के पास जाइए सब चीज लिखी पड़ी मिलेगी। लेकिन आतंकवाद के
लिए पूछो तो अभी UN को भी पता नहीं है कि क्या आतंकवाद होता है और कैसे
वहां पहुंचा जाए और कैसे निकला जाए। क्योंकि उनका जन्म युद्ध की भयानकता
में से पैदा हुआ और इसलिए युद्ध के दायरे के बाहर सोच नहीं पा रहे हैं। ये
नए युग की नई चुनौती है, मानवता को चुनौती है उसको आंकने में भी विश्व में
विश्व का इतना बड़ा संगठन अपना दायित्व निभा नहीं पा रहा है।
भारत ने सालों से United Nation से आग्रह
किया है कि आप एक resolution पारित कीजिए जिसमे define कीजिए कौन आतंकवादी
है, कौन आतंकवादी देश है, कौन आतंकवादियों को मदद करते हैं, कौन आतंवादियों
का समर्थन करते हैं, कौन सी बातें हैं जो आतंकवाद को बढ़ावा देती हैं। एक
बार Black and White में आज जाएगा तो लोग उससे जुड़ने से डरना शुरू कर
जाएंगे, हटने का प्रयास करेंगे। मैं नहीं जानता हूं United Nation कब
करेगा, कैसे करेगा लेकिन जिस प्रकार के हालत बन रहे हैं, अगर इन समस्याओं
का समाधान कोई नहीं करेगा तो उस संस्था में भी irrelevant होते हुए देर
नहीं लगेगी। अगर समय के साथ चलना है, चुनौतियों को समझना है और 21वीं सदी
को सुख, शांति और चैन की जिंदगी जीने के लिए तैयार करना है तो विश्व के
नेतृत्व को भी जिम्मेवारियां उठानी पड़ेंगी और जितनी देर करेंगे उतना
नुकसान ज्यादा होने वाला है।
आज में दिनभर यहां के नेताओं से मिला, EU
के नेताओं से मिला। विस्तार से कई विषयों पर चर्चा हुई। लेकिन हर बात का
centre point आतंकवाद रहा। आतंकवाद ने कितना झकझोर दिया है, ये में सब
नेताओं से आज मिल रहा था तो मैं अनुभव कर रहा था। और वो फिर मुझे धीरे से
कहते थे आप लोग तो 40 साल से झेल रहे हैं, काफी अनुभव है आपका।
आज पूरा विश्व आर्थिक संकटों से भी गुजर
रहा है। दुनिया के अच्छे से अच्छे देशों की Economy आज हिल चुकी है। ऐसे
समय सारी दुनिया एक स्वर से कहती है, चाहे World Bank हों, IMF हो,
Credit rating agencies हों, हर कोई एक स्वर से कह रहे हैं कि दुनिया में
अगर आज कोई आशा की किरण है, कोई light of hope है तो वो, वो, वो, सारी
दुनिया एक स्वर से कह रही है उस देश का नाम हिन्दुस्तान है। भारत आज
विश्व में जो बड़ी Economies हैं, उसमें सबसे तेज गति से बढ़ने वाली एक
Economy के रूप में आज उसने दुनिया में अपनी जगह बना ली है। और ये नसीब के
कारण नहीं हुआ है, मोदी के कारण भी नहीं हुआ है, ये सवा सौ करोड़
हिन्दुस्तानियों के कारण हुआ है। दुनिया भर में फैले हुए
हिन्दुस्तानियों के कारण हुआ है। वरना जो देश दो मौसम, दो वर्ष लगातार
बारिश कम हुई, सूखा पड़ा और उतना कम था तो बीच-बीच में ओले पड़े, ईश्वर ने
भरपूर कसौटी की है। लेकिन उसके बावजूद भी भारत तेज गति से आर्थिक विकास कर
रहा है। अगर दिशा सही हो, नीतियां स्पष्ट हों और इससे भी बढ़ करके नीयत
साफ हो तो भारत जैसे देश को कोई रोक नहीं सकता है, भारत आगे बढ़ सेता है।
कभी-कभार बहुत सी चीजें हैं जो शायद आपको
टीवी पर देखने को न मिलती हों, अखबार में पढ़ने के लिए न मिलती हों।
कभी-कभार Narendra Modi App पर दिखाई देती हों या social media में दिखाई
देती हों, लेकिन अभी मैं आपको बताना चाहता हूं, आपको पता चलेगा कि कैसे
बदलाव आ रहा है। चीजें इतनी हैं कि मुझे कागज की मदद लेनी पड़ेगी। वैसे मैं
थोड़ा कम, मैं सिर्फ 2015 का हिसाब दे रहा हूं आप लोगों को। और मैं मानता
हूं लोकतंत्र में जनता-जनार्दन को हिसाब देना ही मेरा दायित्व है और मैं
आने-आपको प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक मानता हूं। तो आपके सेवक के नाते
मेरा दायित्व बनता है कि मैं आपको हिसाब दूं। हमारे देश में sugarcane
(गन्ना), गन्ना किसानों का 25 हजार करोड़, 30 हजार करोड़ रुपया बकाया
रहना ये आम बात है, मिल वाले कहते हैं कि चीनी बिकीं नहीं, वो उसको पैसे
देते नहीं। अब बताइए 25-30 हजार करोड़ रुपया किसान कर बाकी रहेगा तो जाएगा
कहां? इस बार दुनिया में चीनी के दाम गिर गए, चीनी का उत्पादन बहुत हो
गया। भारत से चीनी बाहर जा नहीं रही थी, भारत में दाम बढ़ नहीं रहे थे,
गन्ना किसानों का क्या होगा? हमने एक निर्णय किया कि हम Ethanol बनाएंगे।
और हमने नियम compulsory किया कि हमारे Petroleum के अंदर 5 percent
Ethanol compulsory mix करना होगा। 2015 में सबसे ज्यादा हिन्दुस्तान
में Ethanol की पैदावार हुई।
हमारे देश में, मैं जब प्रधानमंत्री बना
तो मुझे मुख्यमंत्रियों की चिट्ठियां आती थीं, तो मुख्यमंत्री की चिट्टी
स्वाभाविक है मुझे खुद को पढ़ना होता है। और चिट्ठी में एक ही विषय होता
था कि मोदी जी यूरिया की बड़ी कमी है, यूरिया fertilizer यूरिया भी। हर
मुख्यमंत्री ये ही चिट्ठी लिखता था। कभी खबर आती थी कि यूरिया खरीदने के
लिए रात-रात किसान बेचारे दुकान के बाहर queue लगा के खड़े हैं। कभी खबर
आती थी कि किसानों पर लाठी चार्ज हुआ, यूरिया लेने के लिए गए थे लाठी चार्ज
हो गया। अभी मुझे हमारे कुछ MP मिले, बोले साहब पहली बार ऐसा हुआ है कि
यूरिया के लिए कोई लाठी चार्ज नहीं हुआ। इस वर्ष मुझे 2015 में एक भी
मुख्यमंत्री ने चिट्ठी नहीं लिखी कि यूरिया नहीं मिला है। देश आजाद होने
के बाद सबसे ज्यादा यूरिया का उत्पादन 2015 में हुआ और संकटों से हमने
बाहर निकाला।
हमारे देश में अमीरों की सरकारें जब होती
हैं तो अमीरों को गैस सिलिंडर मिलना और पहले तो एक जमाना ऐसा था कि गैस
सिलिंडर लेना है तो MP के यहां लोग जाते थे कि साहब जरा सिफारिश करो न एक
गैस सिलिंडर मिल जाए। 2015 में, एक वर्ष में गरीबों को सबसे ज्यादा Gas
Cylinder का Connection देने का काम इस सरकार ने किया। हमारे देश के एक
प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एक बार देश के नागरिकों से अपील की
थी कि अनाज की कमी है, हम लोग एक टाईम खाना छोड़ देंगे, और यहां कई पुराने
लोग बैठे होंगे, पूरा हिन्दुस्तान सप्ताह में एक दिन खाना नहीं खाता था
अनाज बचाने के लिए। लाल बहादुर शास्त्री के शब्द की वो ताकत थी। मैं तो
छोटा व्यक्त्िा हूं, कहां लाल बहादुर शास्त्री और कहां एक चाय बेचने
वाला। लेकिन मैंने देश के सामने एक request की, जो सम्पन्न लोग हैं उन
लोगों ने Gas Cylinder की Subsidy नहीं लेनी चाहिए। उन्होंने surrender
करना चाहिए। एक सिलिंडर पर ढाई सौ रुपये, असल में क्या रखा है छोड़ दो।
आपको जान करके खुशी होगी मेरा इतनी से बात, और वो भी मैंने कोई बहुत बड़ा
campaign नहीं किया था, ऐसे ही बातों-बातों में बता दिया था। हिन्दुस्तान
में नब्बे लाख लोग ऐसे निकले जिन्होंने अपनी Gas Subsidy छोड़ दी। जब
मैं कहता हूं ना देश प्रगति कर रहा है, उसका कारण सवा सौ करोड़ देशवासी हैं
ये उसका उदाहरण है। नब्बे लाख लोगों ने अपनी Gas Subsidy Surrender कर
दी। और नब्बे लाख लोगों ने, उसमें कोई बहुत बड़े अमीर लोगों की बात नहीं
कर रहा हूं मैं, सामान्य, retired teacher उसको लगा मोदी जी ने कहा है
मुझे छोड़ देना चाहिए। और हमने कहा अगर आप छोड़ते हो मैं उस गरीब मां को एक
Gas Cylinder दूंगा जो मां लकड़ी के चूल्हे जला करके धुंए में रोटी पकाती
है, बच्चों को खिलाती है।
वैज्ञानिकों को कहना है कि एक मां चूल्हे
में लकड़ी जला करके अगर खाना पकाती है तो एक दिन में 400 सिगरेट जितना
धुंआ उसके शरीर में जाता है, Four Hundred Cigarettes, आप कल्पना कर सकते
हैं कि उस मां की तबियत का क्या हाल होता होगा और उस घर में छोटे-छोटे
बच्चे उस धुंए के अंदर कैसे गुजारा करतें होंगे। इसी एक बात ने मुझे बड़ा
पीड़ा दी और मैंने तय किया कि गरीबों के घर में गैस का सिलिुंडर क्यों न
हो। और उसका परिणाम है कि गत एक वर्ष में आजादी के बाद सबसे ज्यादा गरीबों
को गैस सिलिंडर दिए। इस बार बजट में हमने एक संकल्प घोषित किया है कि आने
वाले तीन वर्ष में पांच करोड़ गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले परिवार
जिनके घर में लकड़ी का चूल्हा है, उनको गैस सिलिंडर का connection दिया
जाएगा और पहला connection का खर्चा सरकार भुगतेगी और धुंए में से उन माताओं
को बाहर निकाला जाएगा।
2015 में सबसे ज्यादा कोयले का उत्पादन
हुआ। मैं जो सबसे ज्यादा बोल रहा हूं ना, इसलिए लिख करके रखो कि आजादी के
बाद सबसे ज्यादा बोल रहा हूं। पहले खबर आती थी कोयले में इतने हाथ काले
हुए। पता है ना क्या आता था? पता है ना? कोयले के कारोबार का मालूम है ना
क्या आता था? इस बार सबसे ज्यादा कोयले का उत्पादन 2015 में हुआ। 2015
में सबसे ज्यादा बिजली का उत्पादन हुआ। 2015 में हिन्दुस्तान के बंदरों
पर जो Goods आया, सामान आया, वो सबसे ज्यादा सामान बदंरगाहों पर उस माल
की ढुलाई हुई, सबसे ज्यादा। मतलब व्यापार बढ़ा होगा, तब माल आया हुआ गया
होगा। 2015 में, पहले हमारे यहां बंदरगाह पर Steamer आता था तो तीन दिन,
चार दिन तक उसको इंतजार करना पड़ता था क्योंकि किनारे पर बैठे हुए लोगों
को जब तक खुश नहीं करता था, आपको तो मालूम है ना कि जब हिन्दुस्तान जाते
हो तो खुश कैसे करते हो? तीन दिन, चार दिन, पांच दिन, सप्ताह, Steamer
अंदर खड़ा है, किनारे पर आता नहीं, माल उतरता नहीं, कितना खर्चा होता था।
गत वर्ष कम से कम समय में बंदरगाह पर Steamer आने और जाने में समय कम से कम
लगा। सारी बिचौलिए पद्धतियां बंद हो गईं, Steamer आता था, माल उतरता था,
दूसरा माल भरता था Steamer चल पड़ता था, किस प्रकार से बदलाव आ रहा है देश
में।
2015 में देश में सबसे ज्यादा दूध का
उत्पादन हुआ, मतलब पशु भी सुखी हुए होंगे, गाय, भैंस, बकरियां भी तो खुश
हुई होंगी। हम Vote Bank की राजनीति नहीं करते हैं, जो Vote नहीं देते हैं
उनका भी भला करते हैं।
आजादी के बाद एक वर्ष में Railway
Infrastructure में सबसे ज्यादा Investment हुआ। क्योंकि मेरा मत है कि
हिन्दुस्तान में रेलवे, ये सिर्फ यातायात का साधन नहीं है। हिन्दुस्तान
में रेलवे हमारी आर्थिक गतिविधि की रीढ़ है, Spine है। अगर उसको बल दिया
जाए, उसका expansion किया जाए, उसको Modernise किया जाए तो देश में बहुत
बड़ा बदलाव लाया जा सकता है और उसको ले करके हम काम कर रहे हैं।
2015 में Highways राजमार्ग सबसे ज्यादा एक साल में ज्यादा से ज्यादा किलोमीटर के Contract अगर दिए गए, 2015 में दिए गए।
2015 में गाय-भैंस से दूध तो ज्यादा दिया
ही दिया, लेकिन 2015 में सबसे ज्यादा कार का भी उत्पादन हुआ। गाडि़यां,
Motor Vehicles, सबसे ज्यादा हिन्दुस्तान में 2015 में उसका
manufacturing हुआ।
Software IT, यहां होंगे काफी। 2015 में
सबसे ज्यादा Software Export हुआ भारत से। Ease of doing business भारत
में कुछ नियम, कुछ आदतें, कुछ तरीके, उसके कारण दुनिया में ये जो Ease of
doing business के ranking आते हैं, उसमें हम बहुत पीछे रह गए हैं। एक साल
के भीतर-भीतर उसमें सुधार लाए और 12 अंक हमारी परिस्थति में सुधार हो गया।
ये पहली बार हुआ है और आने वाले दिनों में और ज्यादा आपको नजर आएगा।
देश आजाद होने के बाद 2015 में विदेशी
मुद्रा सबसे ज्यादा Foreign Reserve 2015 में हुआ। देश में बैंकों का
राष्ट्रीय करण हुआ था 1980 के कालखंड में और ये कह करके हुआ था, श्रीमती
इन्दिरा गांधी जी थीं, ये कह करके हुआ था कि ये बैंकों पर गरीबों का अधिकार
होना चाहिए और इसलिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। आजादी के 60 साल
बाद भी हिन्दुस्तान के 40 प्रतिशत लोग ऐसे थे जिन्होंने बैंक के दरवाजे
देखे तक नहीं थे। वो कल्पना नहीं कर सकता था कि बैंक के दरवाजे उसके लिए
भी खुल सकते हैं। हमने आते ही एक अभियान चलाया कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी
अर्थव्यवस्था की जो मुख्य धारा है बैंकिंग, उससे जुड़ना चाहिए, और आज
मुझे खुशी है करीब-करीब सभी नागरिक आज बैंक व्यवस्था से, प्रधानमंत्री
जन-धन account से जुड़ गए। 21 करोड़ नए Bank account खुले, 21 करोड़। आप
कल्पना कर सकते हैं कि कितना बड़ा काम हुआ होगा। और हमने ये करना था तो
हमने एक नियम बनाया था कि Zero Balance से भी Bank account खुलेगा, नहीं तो
शायद आम बैंक का नियम होता है 50 रुपये, 100 रुपये रखोगे तभी Bank account
खुलता है,क्योंकि स्टेशनरी का भी तो खर्चा होता है। हमने कहा नहीं गरीब
हैं Zero amount से खोला जाएगा। आप लोगों ने कल्पना नहीं की होगी मैंने इस
योजना के तहत एक बहुत बड़ी चीज देखी और वो है गरीबों की अमीरी। अमीरों की
गरीबी तो बहुत बार नजर आती है लेकिन गरीबों की अमीरी की तरफ नजर बहुत कम
जाती है। सरकार ने कहा था Zero amount से Bank Balance Zero होगा तो भी
Account खुलेगा लेकिन मेरे देश के गरीबों की ताकत देखिए कि उन्होंने यह
सोचा, नहीं-नहीं भाई मुफ्त में कैसे ले सकते हैं, हमारे देश का गरीब ये
सोचता है। और उसका परिणाम ये आया Thirty four thousand crore rupees
चौंतीस हजार करोड़ रुपया इन गरीबों ने बैंक में जमा करवाया। बैंक से ले
करके भाग लेने वाले एक है और बैंक में रखने वाले दूसरे हैं। अमीरों की
गरीबी क्या होती है और गरीबों की अमीरी क्या होती है ये साफ नजर आता है
दोस्तो।
हमने, हमारे देश में एक बात तो,
भ्रष्टाचार को ले करके तो सभी लोग पीडि़त हैं। व्यापारी लोग कहते हैं जरा
practical होना चाहिए और practical का मतलब क्या होता हे, ये ही होता है।
क्या corruption खत्म नहीं हो सकता है। मैं आज विश्वास से कहता हूं कि
हो सकता है। थोड़ा सा, थोड़ा सा बदलाव लाना पड़ता है। भारत में ये जो गैस
सिलिंडर जाते हैं घरों में, एक-एक सिलिंडर पर 250-300 रुपया Subsidy दी
जाती है और करीब 18-19 करोड़ गैस सिलिंडर जाते थे हर वर्ष और उतनी Subsidy
जाती थी। हमने JAM योजना बनाई है, जे ए एन, जन धन आधार मोबाइल। बैंक में
जन-धन एकाउंट, आधार Unique Identity Card और एम मोबाइल। हमने जो Gas
Subsidy जाती थी उसको आधार कार्ड से जोड़ दिया और दूसरा किया कि हम एक गैस
सिलिंडर बेचने वालों को Subsidy नहीं देंगे। जो गैस लेता है उसके खाते में
सीधी Subsidy जमा करेंगे। बाजार में जा करके उसको जो दाम देना है देगा
लेकिन उसकी Subsidy उसके खाते में जाएगी। इसका परिणाम ये आया कि पहले जो
सरकारी खजाने से Subsidy जाती थी उसमें से करीब तीन-चार करोड़ लोग पता ही
नहीं चला कि वो पैदा हुए थे कि नहीं पैदा हुए थे, लेकिन Subsidy जाती थी।
आपको जान करके हैरानी होगी करीब-करीब 14-15 हजार करोड़ रुपये की चोरी बड़े
आराम से हो रही थी, बंद हो गई, और एक बार की नहीं, हर वर्ष होता था इतना।
इतने सालों में कितना गया होगा, आप मुझे बताइए मोदी ऐसा करेगा तो मोदी को
परेशानी होगी कि नहीं होगी? इसके कारण कुछ लोग होंगे न जिनका नुकसान हुआ
होगा? वो चुप बैठेंगे क्या? और इतना खाया होगा तो उनकी चिल्लाने की ताकत
भी तो ज्यादा होगी। इसलिए वो चारों तरफ बोल रहे हैं, मोदी बेकार है, मोदी
बेकार है, कुछ नहीं करता, मोदी कुछ नहीं करता ये सुनने को मिलेगा। बहुत
स्वाभाविक है कि सालों से इस प्रकार की मलाई खाने वाले लोग हैं उनकी जरा
हालत बहुत खस्ता है।
मैंने यूरिया का बताया कि यूरिया उत्पादन
तो ज्यादा हुआ ही हुआ, लेकिन हमारे देश में किसानों को यूरिया में बहुत
Subsidy दी जाती है। साल की करीब 80 हजार करोड़ रुपया किसानों को यूरिया
Subsidy में जाता है। लेकिन ये यूरिया खेत में पहुंचता है क्या? यूरिया
chemical factory के लिए raw material होता है। अब उनको Subsidy वाला
सस्ते में यूरिया मिले तो उसकी जो chemical product है वो सस्ते में
तैयार होगी तो उसको मुनाफा ज्यादा होगा और इसलिए उनकी सांठगांठ रहती थी।
कारखाने से यूरिया निकलता था खेत में जाने के लिए लेकिन जाता था chemical
के कारखाने में और सरकार की Subsidy जाती थी। हमने एक काम किया, हमने
यूरिया का नीम coating किया। हमारे यहां जो नीम के पेड़ होते हैं, उसकी जो
फली होती है, उसका oil निकाल करके यूरिया पर उसका coating किया। इसके कारण
यूरिया में extra nutritional value हो गई और वो जमीन के लिए बड़ा फायदा
देने वाली हो गई। अगर routine में 10 Kg यूरिया इस्तेमाल करते हैं लेकिन
नीम coating वाला है तो 7 Kg से चल जाता है जमीन का भी भला होता है।
लेकिन उसका दूसरा सबसे बड़ा फायदा ये है कि नीम coating वाला यूरिया इसके
सिवाय किसी काम नहीं आ सकता है। और परिणाम ये हुआ ये जो यूरिया chemical
फैक्टरियों में जाता था वो बंद हो गया, वो किसान के खेत में जाने लग गया
और परिणाम ये आएगा, अभी उसका हिसाब निकल रहा है, हजारों करोड़ रुपये की
चोरी बंद हो जाएगी। और आप सुन लीजिए अगर मोदी के खिलाफ जोर से कोई आवाज आई
है तो समझ लेना कि मोदी कहीं चाबी टाईट की है। ये मान के चलना। आवाज जितनी
जोर से आ जाए मेरे खिलाफ तो समझ लेना कि दाल में कुछ ...., कभी-कभी तो पूरी
दाल काली नजर आती है। कहने का तात्पर्य ये है कि इन चीजों को बदला भी जा
सकता है और परिणाम लाया भी जा सकता है।
हमारे देश में एक आदत ऐसी है कि बड़ा
योजना घोषित करो, एयरकंडीशनर हॉल में दीया जलाओ, टीवी-अखबार में आ जाए तो
आपका जय-जयकार चलता है, बहुत अच्छा काम आएगा, कोई नीचे देखता ही नहीं
क्या हुआ। मैंने हिसाब लगाया एक बार, मैंने कहा कि भई देश आजादी को 60 साल
से भी ज्यादा समय हो गया, 70 साल हो जाएंगे अगली साल। कितने गांव ऐसे हैं
जो अभी भी 18वीं शताब्दी में जी रहे हैं। Eighteen Century में जीने वाले
गांव कितने हैं, जहां पर अभी तक बिजली का एक खंभा भी नहीं पहुंचा है।
मैंने हिसाब लगाया तो करीब 18,000 गांव ऐसे मिले कि जहां अभी बिजली का खंभा
21वीं सदी में पहुंचा नहीं है। मुझे बताइए सुन करके आपको दुख होता है नहीं
होता है? 60 साल देश की आजादी, 70 साल होने जा रहे हैं क्या इतना काम
नहीं करना चाहिए था क्या? होता है, देखेंगे। अब वहां से कहां आवाज आएगी?
हमने तय किया ये काम करना है। मैंने अफसरों की मीटिंग बुलाई, मैंने पूछा
बताओ भई कैसे करोगे? तो बोले साहब कर तो देंगे। मैंने बोला भई कितना समय
लगेगा? बोले सात साल लगेंगे। तो कठिन है ये बात ठीक है बड़ी मुश्किल में
है। मैंने कहा भई ये सात, कुछ कम हो सकता है क्या? तो उनको लगा जरा
प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए कुछ तो कहना पड़ेगा। उन्होंने कहा साहब 6
साल में कर देंगे। खैर सुन लिया मैंने, मैं भी क्या करता, काम तो उन्हीं
से लेना है। लेकिन 15 अगस्त को लाल किले से मैंने बोल दिया कि 1000 दिन
में 18,000 गांव में हम बिजली पहुंचा देंगे। वो काम शुरू हुआ, अब तक करीब
सात महीने हुए हैं, 250 दिन भी नहीं हुए हैं। आज मैं बड़े संतोष के साथ कह
सकता हूं कि 18,000 गांव में से 7,000 से ज्यादा गांवों में बिजली का खंभा
पहुंच गया, बिजली का तार पहुंच गया, बिजली का signal है। आप में से भी
किसी का interest हो तो G A R V गर्व, इस पर आप अगर वेबसाईट पर जाओगे तो
पूरी detail App पर है। G A R V App है उस App पर पूरी detail है, कितने
गांव है जहां बिजली नहीं है, किसको जिम्मेवारी दी है, आज किस गांव में
खंभा पहुंचा, आज किस गांव में गड्ढा खोदा, आज किस गांव में खंभा खड़ा हुआ,
किस गांव में तार पहुंचा, कहां बिजली चालू हुई, Minute to Minute हिसाब
आपके मोबाइल फोन पर available है। आप इस App को, App को देख सकते हो। इतनी
transparency के साथ और इसके कारण अफसरों को भी लगा कि भई अब तो काम करना
पड़ेगा, और कहीं कोई गलती करता है तो हम सामने से कहते हैं कोई गलत जानकारी
है तो हमें बताओ। मैं समझता हूं कि ऐसी accountability ऐसी transparency
लाई जा सकती है और लाने में हम सफल हो रहे हैं।
कहने का तात्पर्य ये है, आप विचार करिए
हमारे देश में बालिकाएं स्कूल क्यों छोड़ देती हैं? तो हमने जरा सर्वे
किया कि बच्चियां पढ़ती क्यों नहीं हैं गांव में। तीसरी-चौथी कक्षा में आई
छोड़ देती हैं। उसका एक कारण ये ध्यान में आया कि स्कूल में बच्चियों के
लिए अलग नहीं toilet है। इस एक कारण वो बच्ची तीन-चार कक्षा में आती है,
संकोच होने लगता है, स्कूल छोड़ देती है। हमने अभियान चलाया toilet बनाना।
सवा चार लाख स्कूलों में toilet बनाने का काम पूरा कर दिया बच्चियों के
लिए। आज कोई स्कूल ऐसी सरकारी नहीं बची जहां toilet न हो।
मेरा कहने का तात्पर्य ये है कि एक-एक
विषय को ले करके पूरी ताकत से उनको जोड़ करके परिणाम प्राप्त करने की दिशा
में हम प्रयास करते रहते हैं और उसका नतीजा ये है कि आज विकास तेज गति से
हो रहा है। Per day पहले अगर रोड एक दिन में दो किलोमीटर बनते थे average
तो आज हम उसको 20-22 किलोमीटर पर ले गए हैं Per day। कहां दो-तीन किलोमीटर
और कहां 20-22 किलोमीटर। रेल की पटरियां, रेल का meter gauge से broad
gauge बनाना, रेल का electrification, डीजल इंजन से electricity पर ले
जाना, बहुत तेजी से काम चल रहा है।
आज पूरी दुनिया Global warming को ले करके
परेशान है। हमने तय किया भारत renewable energy की दिशा में जाएगा Solar
Energy की दिशा में जाएगा। Hundred Seventy Five Gigawatt Renewable Energy
का हमने लक्ष्य रखा है। भारत में ज्यादा से ज्यादा Megawatt क्या है
वो हम लोग समझते थे। हम Megawatt तक चलते थे बस। पहली बार देश ने Hundred
Seventy Five Gigawatt का लक्ष्य तय किया, पूरी दुनिया को आश्चर्य हुआ
क्या भारत ये कर सकता है? और आज मैं बड़े संतोष के साथ कहता हूं कि ठीक
Time table से काम चल रहा है और भारत इसको achieve करके रहेगा। Solar
Energy में, Solar Energy में बहुत बड़ा काम आज सरकार के द्वारा हो रहा
है।हमारे देश के सेना के जवान पिछले 40 साल से one rank one pension की
मांग कर रहे थे, OROP. निवृत्त सेना के जवान उसके लिए मांग कर रहे थे,
यहां भी शायद कोई निवृत्त फौजी बैठे होंगे, लेकिन सरकार वादे करती रहती थी
और कभी 200 करोड़ रुपया बजट में डालना और कहना कि हम OROP लाएंगे। OROP
लाना है तो कम से कम हर साल 10 हजार करोड़ रुपया लगता है। पहले की सरकारों
ने वादे करते रहे। देश के लिए जीने-मरने वाले सेना के जवानों के लिए ये ही
चलता रहा। हम आए और आज मुझे बड़े संतोष के साथ कहता हूं कि मां भारती के
लिए जीने-मरने के लिए निकले हुए जवानों का OROP का सवाल हमने पूर्ण कर दिया
और OROP देना शुरू कर दिया। इस बार अभी दो महीने पहले जब उनके Bank
Account में पैसे गए तो उनके लिए कोई खुशी का यानि कल्पना नहीं कर सकते,
धमाधम चैक आना शुरू हो जाए तो उसके जीवन में कितना बड़ा आनंद हुआ होगा। देश
के फौज के लिए जीने-मरने, देश के लिए जीने-मरने वाले लोग, उनको जीवन में
कितना संतोष हुआ होगा, हां देश मेरी चिंता कर रहा है, मेरे परिवार की चिंता
कर रहा है, इस काम हो हमने पूरा कर दिया।
बंगलादेश, कभी-कभी लगता है कि पड़ौसी
देशों के साथ समस्याओं का समाधान हो सकता है क्या? भारत-पाकिस्तान का
विभाजन हुआ, आज जहां बंगलादेश है वहां पूर्वी पाकिस्तान था। एक जमीन का
विवाद तब से चल रहा था। 71 में बंगलादेश अलग बन गया तब भी ये सवाल चलता
रहा। एक विवाद था पानी के बंटवारे का, समुद्र का पानी, कहां उनकी सरहद होती
है कहां हमारी होती है और तीसरा था सीमा का। आपको जान करके खुशी होगी
हमारी सरकार आने के बाद किसी भी प्रकार की गोली चले बिना, किसी भी प्रकार
का संघर्ष हुए बिना बंगलादेश के साथ बैठ करके सीमा का विवाद समाप्त हो
गया। भारत में जिनको आना था वो भारत में आ गए, जिनको बंगलादेश जाना था वो
बंगलादेश हो गए, सीमा तय हो गई, अब वहां fencing लग जाएगी, घुसपैठ की जो
बीमारी है वो भी बंद हो जाएगी और दोनों देश सुख-चैन से जिंदगी गुजारेंगे।
पानी का विवाद था वो भी निपट गया। दुनिया
के सामने हमने एक मिसाल रखी है कि पड़ौसी देशों के साथ बातचीत से मसले
solve किए जा सकते हैं। कुछ पड़ौसी है जिनको बातगले नहीं उतरती। अब पड़ोसी
कैसे बदलेंगे, लेकिन उनको भी समझ आएगा, कभी न कभी समझ आएगा। कहने का मेरा
तात्पर्य ये है भाईयो कि अनेक ऐसे काम जो इस सरकार ने विकास की दिशा में
एक के बाद एक कदम उठाए उसका परिणाम ये आया है कि देश बहुत तेज गति से आगे
बढ़ रहा है।
मैं जब यहां आ रहा था तो मैंने मेरी एक
Narendra Modi App है, आप मोबाइल फोन पर download कर सकते हैं और मैं हमेशा
आपकी सेवा में मौजूद रहता हूं। तो लोग मुझे कुछ न कुछ लिखा करते हैं, अपने
सुझाव भेजते हैं। मुझे यहां आने से पहले आपके ब्रसेल्स से, Antwerp से
कुछ लोगों ने मुझे सुझाव भेजे हैं। कोई रोहित अरोड़ा है, कोई चंदा
कोरगांवकर है, कोई कांता ओडिडो है, कोई प्रकाश अडवाणी है, कोई सुशांत
गुप्ता है, और सब लोगों ने मुझे भारत और बेलिज्यम और यूरोप के संबंधों को
कैसे मजबूत बनाया जाए इसके विषय में मुझे सुझाव लिख करके भेजे हैं। कुछ
लिखने वाले छोटे बच्चे भी होंगे, उस प्रकार का भी लिखा है कुछ बच्चों ने।
लेकिन मैं इसे पढ़ता हूं, ये मुझे बड़ी ऊर्जा देता है, ये जो मेरे साथ जो
संपर्क बनाए रखते हैं। कोई डॉक्टर सचिन और डॉक्टर रुता, उन्होंने Indian
Community और खासतौर से बच्चों में भारतीय संस्कृति की समझ कैसे पड़े और
भारतीय परिवारों के रोजमर्रा के जीवन में भारतीय जीवनशैली कैसे आए इस बारे
में अपने प्रयासों के बारे में लिखा है। अब बताइए परिवार उनका, बच्चे
उनके और संस्कार का contract मुझे दे रहे हैं। लेकिन मैं खुश हूं, मैं
उनका आभारी हूं कि दोनों डॉक्टर होने के बाद भी उनका इरादा है कि बच्चे
भारतीय परम्परा में पलें-बढ़ें यहां की परम्परा में न पलें-बढ़े, ये खुशी
की बात है। कोई सुभाष नांबयार है, उनकी सात साल की बेटी मीनाक्षी नांबयार,
उसने बड़ी मजेदार बात लिखी है, उसने लिखा है कि मेरे पास जो पैसे जमा होते
हैं वो सारे पैसे मैं हिन्दुस्तान में किसी गरीब बच्चों की पढ़ाई के
लिए दे देना चाहती हूं। मैं मीनाक्षी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। उसने
मुझे मेरे App पर ये लिखा है कि मेरे पास जो कुछ भी पैसे कोई मिलते है
कभी-कभी त्योहार पर वो मैं गरीब बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करना चाहती हूं।
खैर, Narendra Modi App के माध्यम से मुझे देश और दुनिया के हर छोटे-मोटे
से संपर्क रहता है, आप भी मुझसे संपर्क बनाए रखिए, उसमें सरकार के कामों
की भी बहुत सारी जानकारियां रहती हैं, वो जानकारियां शायद आपको काम आ जाएं।
जो
non residential के पास अगर पेन कार्ड नंबर नहीं है तो उनको higher rate
TDS लिया जाता है। अभी हम लोगों ने इस बजट में NRI के लिए कोई भी
alternative document होगा तो भी उसको higher rate TDS की झंझट से
मुक्तिमिल जाएगी। अब पोर्ट और एयरपोर्ट पर single window system शुरू हो
जाएगा। International passengers के लिए custom baggage’s rules और अधिक
सरल बना दिए जाएंगे। अभी जो free baggage’s की जो limit है उसको थोड़ा
बढाएंगे। कुछ ले आइए न देश में।
हम लोगों ने FDI में कुछ reforms किए
हैं। कोई NRI की कंपनी या उसका ट्रस्ट अगर भारत में FDI निवेश करता है,
investment करता है तो उसको जैसे कोई हिन्दुस्तान के अंदर हिन्दुस्तान
का नागरिक जिस नीतिनियमों से investment करता है, वैसे ही सारे लाभ
NRI को भी दिए जाएंगे। अब तक उसमें अंतर था। उसमें और कठिनाइयां रहती थी
अब हमने उनको निकाल दिया है।
सरकार ने food processing में भी 100% FDI
को open up कर दिया है। E-commerce, चाय-कॉफी के plantation हो,
construction sector हो, उसमें भी Foreign direct investment के लिए हमने
काफी सुधार किए है। बाकी तो कई बातें हैं जो हम ‘मदद’ नाम का एक पोर्टल
चलता है। किसी भी NRI को कोई तकलीफ हो तो आप ‘मदद’ पोर्टल पर जाकर के
तुरंत अपनी बात बता सकते हो।
आज विश्व भर में पहली बार विश्व
विभाग के साथ, भारत की foreign embassies के साथ भारतीयों का नाता एक अलग
बनता जा रहा है। एक-दूसरे को मदद का माहौल बनता जा रहा है। यह अपने आप में
एक सुखद परिणाम है। छोटे-मोटे बहुत परिवर्तन लाने का प्रयास किया है। आप
लोग इतनी बड़ी संख्या में आए। आपने जो प्यार दिया मैं उसके लिए बहुत
आभारी हूं लेकिन हम जहां भी हो हम यह कोशिश करे किहम भारत के एक सच्चे
लोकदूत है।
दुनिया की किसी भी भाषा का कोई भी
व्यक्तिक्यों न हो, उसके दिल-दिमाग में भारत की गौरव-गाथा, भारत का
इतिहास, संस्कृति, परंपरा, टूरिज्म, उसमें हम जितना कर सकते हैं,
करने की कोशिश करें। भारत में टूरिज्म के लिए बहुत संभावनाएं हैं। यह
हमारी कोशिश रहनी चाहिए किविश्व के लोग भारत को देखने के लिए आतुर
हो। भारत में रोजगार की संभावनाओं के अनेक क्षेत्र हैं, उसमें एक क्षेत्र
टूरिज्म हैं। भारत दुनिया का सबसे नौजवान देश है। 65 प्रतिशत लोग 35 से
नीचे की उम्र के है। जिस देश के पास ऐसी जवानी हो, वो देश हर सपनों को
पूरा करने का सामर्थ्य रखता है। उसी एक विश्वास के साथ मैं आपको एक
विश्वास दिलाना चाहता हूं, देश नई ऊंचाइयों को पार करता रहेगा, देश पूरी
ताकत से आगे बढ़ता चला जाएगा और भारत जिन सपनों को लेकर के निकला है उन
सपनों को पूरा करेगा, यह मेरा पक्का विश्वास है।
मैं फिर एक बार आप सबका बहुत-बहुत आभारी हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद। Thank you.
यह किसान मेला भारत के भाग्य का मेला है,
अगर भारत का भाग्य बदलना है, तो गांव से बदलने वाला है, किसान से बदलने
वाला है और कृषि क्रांति से बदलने वाला है। हम लोग सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी
से एक ही प्रकार से किसानी करते आए हैं। बहुत कम किसान हैं जो नया प्रयोग
करते हैं या कुछ नया करने का साहस करते हैं। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती
यही है कि हम हमारी किसानी को आधुनिक कैसे बनाएं, टेक्नोलॉजी युक्त कैसे
बनाएं, हमारी युवा पीढ़ी जो आधुनिक आविष्कार हो रहे हैं, उन आधुनिक
आविष्कारों को खेत तक कैसे पहुंचाएं। किसान के घर तक कैसे पहुंचाएं। इस
किसान मेले के माध्यम से एक प्रशिक्षण का प्रयास है। और मुझे खुशी है कि
आज कृषि विभाग ने यह कार्यक्रम ऐसा बनाया है कि न सिर्फ यहां बैठे हुए लोग
लेकिन पूरे हिंदुस्तान के हर गांव में किसान इस कार्यक्रम को देख रहे हैं।
और सिर्फ प्रधानमंत्री का भाषण सुनना है
इसलिए देख रहे हैं ऐसा नहीं है। तीन दिन तक यहां जितनी चर्चाएं होने वाली
हैं वो सारी चर्चाएं गांव में बैठा हुआ किसान भी उसको देख सकता है, सुन
सकता है, समझ सकता है। क्योंकि जब तक हम इन बातों को किसान तक पहुंचाएंगे
नहीं, किसान में विश्वास पैदा नहीं करेंगे तो वो अगल-बगल में जो देखता है
वो ही करता रहता है। और किसान का स्वभाव है अगर पड़ोसी ने अपने खेत में
लाल डिब्बे वाली दवाई डाली तो यह भी जा करके लाल डिब्बे वाली दवाई लाकर
डाल देगा। बगल वाले ने पीली दवाई डाल दी तो यह भी पीली दवाई डाल देगा। उसको
ऐसा लगता है उसने किया तो मैं भी कर लूं। और जो बेचने वाले हैं उनको तो
इसकी चिंता ही नहीं है कोई भी माल जाओ बेच दो, एक बार बिक्री हो जाए। बाद
में कौन पूछने वाला है किसान का क्या हुआ।
और इसलिए कृषि क्षेत्र को एक अलग नजरिये
से develop करने की दिशा में यह सरकार प्रयास कर रही है। हमारे देश में
पहली कृषि क्रांति हुई वो पहली कृषि क्रांति अधिकतम जहां पानी था उस पानी
के भरोसे हुई। लेकिन दूसरी कृषि क्रांति सिर्फ पानी के भरोसे करने से बात
पूरी तरह संतोष नहीं देगी। और इसलिए दूसरी कृषि क्रांति विज्ञान के आधार
पर, टेक्नोलॉजी के आधार पर, आधुनिक आविष्कारों के आधार पर करना आवश्यक
हो गया है। पहली कृषि क्रांति हिंदुस्तान के पश्चिमी छोर पर, पश्चिमी
उत्तर भाग में हुई। पंजाब, हरियाणा इसने नेतृत्व किया दूसरी कृषि क्रांति
उन प्रदेशों में संभावनाएं पड़ी है। जिस पर अगर हमने थोड़ा सा भी ध्यान
दिया तो बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है और वो है पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार,
पश्चिम बंगाल, असम, नॉर्थ ईस्ट, ओडि़शा ये सारे हिंदुस्तान का पूर्वी
इलाका, जहां पानी भरपूर है, जमीन की विपुलता है, जमीन ऊपजाऊ है, लेकिन वो
पुराने ढर्रे से वो सब जुड़ा हुआ है और इसलिए इस सरकार का प्रयास है कि
भारत के पूर्वी इलाके से एक दूसरी कृषि क्रांति कैसे हो, उस दिशा में हम
कदम बढ़ा रहे हैं।
भारत की आर्थिक धारा भी गांव की धुरा से
जुड़ी हुई है। अगर गांव में गांव के गरीब व्यक्ति के द्वारा अगर आज वो
पांच हजार रुपया का माल बाजार से खरीदता है साल में और अगली बार दस हजार का
खरीदता है, तो economy को वो ताकत देता है। देश आगे बढ़ता है। और यह अगर
करना है तो गांव के लोगों की खरीद शक्ति बढ़ानी पड़ेगी, उनका purchasing
power बढ़ाना पड़ेगा। और वो purchasing power तब तक नहीं बढता है जब तक कि
गांव आर्थिक रूप से गतिशील न हो। गांव में आर्थिक गतिविधि का कारोबार न हो
तो यह संभव नहीं है।
और इसलिए आपने इस बार देखा होगा चारों तरफ
इस सरकार के बजट की तारीफ ही तारीफ हो रही है। कुछ लोग मौन हैं क्योंकि
उनके लिए तारीफ करना मुश्किल है, लेकिन विरोध में बोलने के लिए कुछ है
नहीं। पहली बार जिन जिन लोगों ने इस विषय के ज्ञाता है, उन्होंने लिखा है
कि एक बड़े लम्बे अरसे के बाद एक ऐसा बजट आया है जो पूरी तरह गांव, गरीब
और किसान को समर्पित किया गया है।और यह काम इसलिए किया है अगर भारत को
आर्थिक संपन्न बनना है, आने वाले 25-30 साल तक लगातार आगे बढ़ना है, रूकना
ही नहीं है, तो वो जगह सिर्फ गांव है, गरीब है, किसान है।
हमारा एक सपना है, लेकिन वो सपना मेरा
होगा उससे बात बनेगी नहीं। वो सपना सिर्फ दिल्ली सरकार का होगा तो बात
बनेगी नहीं। चाहे केंद्र सरकार हो, चाहे राज्य सरकार हो, चाहे हमारे
किसान भाई-बहन हो, हम सबका मिला-जुला सपना होना चाहिए, हम सबकी जिम्मेदारी
वाला सपना होना चाहिए। और वो सपना है 2022 छह साल बाकी है, जब भारत की
आजादी के 75 साल होंगे, क्या हम हमारे देश के किसानों की आय दोगुना कर
सकते हैं क्या? किसानों की आय डबल कर सकते हैं क्या? अगर एक बार किसान,
राज्य सरकार, केंद्र सरकार यह मिल करके तय कर लें तो काम मुश्किल नहीं है,
मेरे भाईयों-बहनों। कुछ लोगों को लगता है कि यह मुश्किल काम है। मैं इस
विभाग में जाना नहीं चाहता। लेकिन यह करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए इसमें
कोई दुविधा नहीं हो सकती, कोशिश जरूर करनी चाहिए।
अब तक हमने देश को आगे बढाने में कृषि
उत्पादन के growth को ही केंद्र में रखा है। हम कृषि उत्पादन के growth
तक सीमित रह करके किसान का कल्याण नहीं कर सकते हैं। हमने किसान का
कल्याण करना है तो हमने और पचासों चीजें उसके साथ जोड़नी होगी, और तब जा
करके 2022 का सपना हम पूरा कर सकते हैं। अब हम यह सोचे कि हमारी धरती माता
बेचारी बोलती नहीं है, पीड़ा है तो रोती नहीं है, आप उस पर जितने जुल्म
करो वो सहती रहती है। अगर हम धरती मां की आवाज़ नहीं सुनेंगे, तो धरती मां
भी हमारी आवाज़ नहीं सुनेगी। अगर हम धरती माता की पीड़ा महसूस नहीं करेंगे
तो धरती मां भी हमारी पीड़ा कभी महसूस नहीं करेगी। और इसलिए हम सबका सबसे
पहला दायित्व है कि हम हमारी धरती माता की पीड़ा को समझे। हमने कितने
जुल्म किये हैं उस पर, न जाने कैसे कैसे कैमिकलों से उसको नहला दिया। न
जाने कैसी-कैसी दवाईंया पिलाई उसको, न जाने कितने-कितने जुल्म किये हैं उस
पर अगर हम भी बीमार हो जाते हैं न तो अड़ोस-पड़ोस के लोग कहते हैं कि बेटा
बहुत दवाइयां मत खाओं और ज्यादा बीमार हो जाओगे। डॉक्टर भी कहते है कि
भई ठीक है बीमार हो दवा की जरूरत है लेकिन ऐसा नहीं कि एक गोली की बजाए 10
गोली खा जाओगे, ठीक हो जाओगे। जो हमारे शरीर का हाल है, वो ही हाल यह
हमारी धरती माता का भी है। और इसलिए हम कभी कम से कम देखे तो सही कि हमारी
धरती माता की तबीयत कैसे है, कोई बीमारी तो नहीं है? क्या कारण है कि हम
फसल बोते हैं लेकिन जितनी मेहनत करते हैं उतना मिलता नहीं है, मां रूठी
क्यों है।
और इसलिए आपकी मदद से एक बड़ा अभियान पूरा
करना है वो Soil health card. हमारी जमीन की तबीयत कैसी है, उसकी परत
कैसी है, उसके अंदर ताकत कौन सी है, उसके अंदर कमियां कौन सी है, उसके
अंदर बीमारियां कौन सही है। यह हमने जांच करवानी चाहिए और यह regular
करवानी चाहिए। यह कोई महंगा काम नहीं है, सरकार आपकी मदद कर रही है। और
जांच करवा ली, लेकिन हम उस रिपोर्ट को एक खाते में डालकर कागज पड़ा है,
पड़ा रहे, फायदा नहीं होगा। अगर कोई इंसान बीमार रहता है, laboratory में
जाकर टेस्ट करवाया और पता चला कि diabetes है वो आ करके कागज घर में रख
दे और खाता है जैसे ही मिठाई मिले खाता रहे, जितना मिले उतना खाता रहे तो
क्या diabetes उसको जाएगा क्या? बीमारी बढ़ेगी कि नहीं बढ़ेगी। मौत
निश्चित हो जाएगी कि नहीं हो जाएगी।
और इसलिए soil health card के द्वारा हमें
जमीन की जो कमियां नजर आई है। जमीन की जो ताकत ध्यान में आई है। जमीन की
जो बीमारियां ध्यान में आई है, उसके अनुसार हमें खेती करनी चाहिए तो
आपकी आधी समस्याएं तो वहीं सुलझ जाएगी। मैं दावे से कहता हूं मेरे किसान
भाईयों-बहनों आपकी आधी समस्यायें, अगर जमीन की ठीक देखभाल कर दी, तो आपकी
आधी समस्या वहीं सुलझ जाएगी। और एक बार धरती माता का ख्याल रखोगे न तो
धरती माता तो आपका चार गुना ज्यादा ख्याल रखेगी। कभी आपको पीछे मुड़ करके
देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दूसरी बात है पानी, किसान का स्वभाव है
अगर उसको पानी मिल जाए तो वो मिट्टी में से सोना पैदा कर सकता है। उसे और
कुछ नहीं चाहिए। और इसलिए हमने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना पर बल दिया
है। किसानों को पानी कैसे पहुंचे? और कम से कम पानी बर्बाद हो, उस रूप में
कैसे पड़े, इस पर काम चल रहा है। आपको हैरानी होगी मैं जरा हिसाब लगा रहा
था कि हमारे किसान को पानी पहुंचाने की इतनी योजनाएं बनी हाल क्या है।
मेरे किसान भाईयों-बहनों आपको हैरानी होगी कि हम कुछ भी करते हैं तो हमारे
विरोधी यह कहते हैं कि यह तो हमारे समय का है। यह तो हमारे जमाने का है।
उनके जमाने का हाल क्या है मैं बताता हूं किसानों का मैंने करीब 90
प्रोजेक्ट ऐसे खोज कर निकालें कि जहां पानी तो भरा पड़ा लेकिन किसान को
पानी पहुंचाने के लिए कोई व्यवस्था ही नहीं है। अब मुझे बताइये भइया अगर
कहीं डैम भरा पड़ा है। हजारों, लाखों, करोड़ों रुपया खर्च कर दिया गया है,
लेकिन अगर किसान के खेत तक पानी ले जाने का प्रबंध नहीं है वो सिर्फ दर्शन
करने के सिवा किसी काम आएगा क्या? हमने 90 ऐसे प्रोजेक्ट हाथ में लिए है।
और उस पर बड़ा जोर लगाया है कि वो पानी किसान तक पहुंचे। जितनी उसकी
capacity है पानी कैसे पहुंचे, काम लगाया है। जब यह काम पूरा कर लेंगे करीब
80 लाख हेक्टेयर भूमि को पानी पहुंचना शुरू हो जाएगा भाईयों-बहनो। और
पानी पहुंचेगा तो वो जमीन कितना कुछ देगी आप अंदाज कर सकते हैं।
20 हजार करोड़ रुपया, इस काम के लिए लगाने
की दिशा में काम कर रहा हूं मैं। इतना ही नहीं मनरेगा, बड़ी चर्चा होती
है, लेकिन कहीं asset create नहीं होता है। इस सरकार ने बल दिया है। और
मैं चाहूंगा इन गर्मी के दिनों में गांव-गांव मनरेगा से एक ही काम होना
चाहिए, एक ही काम और सिर्फ तालाब है तो तालाब गहरे करना, मिट्टी निकालना,
जहां पर पानी रोक सकते हैं रोकना। इस बजट में पांच लाख तालाब बनाने का
सपना है, पांच लाख तालाब।
जहां हमारे छोटे-छोटे पर्वतीय इलाके होते
हैं, पहाड़ी इलाके होते हैं, जहां तीन या चार पहाड़ इकट्ठे होते हैं, वहां
अगर थोड़ी सी खुदाई कर दें तो बहुत बड़े तालाब बनने की संभावना हो जाती
है। मैंने forest department को भी कहा है जंगलों को बचाना है तो वहां
छोटे-छोटे तालाब का काम किया जाए, ताकि पानी होगा तो हमारे जंगल भी बचेंगे।
जंगल होंगे तो वर्षा बढ़ेगी, वर्षा बढेगी तो हमारी ज़मीन में पानी ऊपर
आएगा। जो 12 महीने मेरे किसान को फायदा करेगा। हम गांव-गांव इस गर्मी के
दिनों में पानी बचाने के साधन कैसे तैयार करें और जितना ज्यादा पानी बचाने
का प्रयास करेंगे, पहली बारिश में यह सब भर जाएगा। और फिर कभी बारिश
इधर-उधर हो गई तो भी वो पानी हमारी खेती को बचा लेगा। उसी प्रकार से जितना
महात्मय जल संचय का है, उतना ही महात्मय जल सिंचन का है।
पानी यह परमात्मा ने दिया हुआ प्रसाद है।
इसको बर्बाद करने का हमें कोई अधिकार नहीं है। एक-एक बूंद पानी का उपयोग
होना चाहिए। और इसलिए per drop more crop एक-एक बूंद से फसल कैसे ज्यादा
पैदा हो, उस पर काम करना है। हम micro irrigation में जाए, हम drip
irrigation में जाए छोटे-छोटे पम्प लगा करके पानी पहुंचाने के लिए प्रबंध
करे। liquid fertilizer दें। आप देखिए मेहनत कम हो जाएगी। खर्चा कम हो
जाएगा और उत्पादन बढ़ जाएगा। कुछ लोगों की गलतफहमी है कि sugar में भी
बहुत पानी चाहिए, जमाना चला गया। अब तो micro irrigation से sugar भी हो
सकता है, paddy भी हो सकता है।
और इसलिए जो हमारी पुरानी मान्यता है कि
अगर पूरा लबालब पानी से खेत भरा होगा तभी फसल होगी, ऐसी जरूरत नहीं है। अब
विज्ञान बदल गया, टेक्नोलॉजी बदल गई। आप आराम से बदलाव करके कर सकते हैं।
और इसलिए मेरे किसान भाईयों-बहनों, यह हमारी रोजमर्रा के काम है, इस पर
अगर हम ध्यान देंगे। हम हमारे खर्च को कम कर पाएंगे। और हमारी आय को बढ़ा
पांएगे। और उसी से किसान का कल्याण होने वाला है।
हमारे यहां फसल के लिए मार्केट, यह 14
अप्रैल को बाबा साहेब अम्बेडकर की जन्म जयंती पर भारत सरकार एक ई
प्लेटफॉर्म शुरू कर रही है, ताकि किसान को अपना माल कहां बेचना, सबसे
ज्यादा दाम कहां मिलते हैं वो अपने मोबाइल फोन पर देख सकता है कि मुझे
मेरा माल किस मंडी में कैसे बेचना और उसके कारण उसको दाम ज्यादा मिले। आज
किसान बेचारा अगर गाँव से निकला, दो बजे अगर मंडी में पहुंचा, मंडी वाले
अगर चले गए वो अपना माल बेच नहीं पाता है अगर वो सब्जी वगैरह लाया है तो
वहीं छोड़कर चला जाता है, क्योंकि कोई खरीददार नहीं होता है। अगर हम इस
प्रकार की व्यवस्था का उपयोग करेंगे, और आज मैंने अभी एक किसान सुविधा
लॉन्च किया है। किसान अपने मोबाइल फोन पर आज के आधुनिक विज्ञान डिजिटल के
माध्यम से अपनी आवश्यकताओं की जानकारी वो पा सकता है। weather का रिपोर्ट
ले सकता है, मार्केट का रिपोर्ट ले सकता है। बाजार में कहां पर अच्छा
बीच मिल सकता है ले सकता है। कृषि के कौन वैज्ञानिक है किसका संपर्क करना
चाहिए, यह सारी जानकारियां आपकी हथेली में देने का प्रयास किया है।
अगर हम उसका प्रयोग करेंगे तो मेरे किसान
को आज जो अकेलापन महसूस होता है, उसको लगता है कि मेरा कोई नहीं है। यह
सरकार कंधे से कंधा मिला करके किसान के सुख-दुख का साथी है और हम आपके साथ
मिल करके काम करना चाहते हैं, क्योंकि हमें बदलाव लाना है उस दिशा में हम
काम करना चाहते हैं। उसी प्रकार से अब समय की मांग है कि हम मूल्य वृद्धि
करे। value addition करे, processing करे। जितना ज्यादा food processing
होगा, उतना ही ज्यादा हमारे किसान की आय बढ़ने वाली है। जितना ज्यादा
value addition करेंगे, उतनी कमाई बढ़ने वाली है। अगर आप दूध बेचते हैं, कम
पैसा मिलता है, लेकिन अगर दूध का मावां बना करके बेचते हैं, तो ज्यादा
पैसा मिलता होगा। दूध में से घी बना करके बेचते हैं ज्यादा पैसा मिलता
है। अगर आप कच्चा आम बेचते हैं कम पैसा मिलता है, लेकिन अगर कच्चे आम का
अचार बना करके बेचे तो ज्यादा पैसा मिलता है। आप हरी मिर्ची बेचे, कम पैसा
मिलता है। लेकिन लाल हो करके पाऊडर बना करके पैकिंग करके बेचे तो ज्यादा
पैसा मिलता है। हमारे किसान की आय बढ़ाने का यह एक उत्तम से उत्तम से
मार्ग है कि हम food processing को बल दें और food processing के लिए भारत
जैसे देश में दुनिया की बहुत बड़ी टेक्नोलॉजी की जरूरत है, ऐसा नहीं है,
हमारे यहां आमतौर पर इन चीजों को करने का स्वभाव बना हुआ है। उसको बल देने
की जरूरत है। और गांव मिल करके करेगा। तो बहुत बड़ी ऊंचाईयों पर चला जा
सकता है गांव। और आज हमने देखा है कि ऐसी चीजों ने अपने जगह बना ली है।
आज दुनिया के अंदर.. मुझे अभी गल्फ
कंट्रीज के अमीरात के क्राउन प्रिंस यहां आए थे UAE के । उन्होंने एक बड़ी
महत्वपूर्ण बात बताई। उन्होंने कहा हमारा जो गल्फ कंट्रीज है
प्रट्रोलियम के पैसे तो बहुत है हमारे पास, लेकिन हमारे पास पेट भरने के
लिए खेती के लिए कोई संभावना नहीं है हमारी जमीन रेगिस्तान है। हमारी
जनसंख्या बढ़ रही है। हमें आने वाले दिनों में जैसे-जैसे जनसंख्या
बढ़ेगी, हमारा पेट भरने के लिए भारत से ही अन्न मंगवाना पड़ेगा। इसका मतलब
यह हुआ कि हिंदुस्तान का किसान जो पैदा करेगा दुनिया के बाजार में जाने
की संभावनाएं बढ़ रही है। एक बहुत बड़ा ग्लोबल मार्केट हमारा इंतजार कर
रहा है हम अगर अपनी व्यवस्थाओं को उस स्टेंडर्ड की बना दें तो दुनिया
हमारी चीजों को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाएगी।
इन दिनों holistic health care. हर किसी
को लगता है आप भले तो जग भला। और इसलिए लोग organic खाना खाना पसंद करते
हैं। कैमिकल से आया हुआ उनको खाना नहीं है। आम भी बिकता है तो पूछते हैं
organic है। चावल भी लाए तो पूछते हैं organic है, गेंहू लाए तो पूछते हैं
organic है। वो कहता है साहब पैसा डबल होगा, वो बोले डबल ले लो भाई दवाई
खाने से ज्यादा अच्छा है कि महंगा चावल खा लूं, लेकिन दवाई खाने के लिए
मुझे केमिकल वाला नहीं खाना। लोग सोच रहे हैं कि दवाई में जो पैसे जाते हैं
उसके बजाय अगर वो पैसे organic चीजों को खाने में जाते हैं तो
स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा और खर्चा भी कम होने लगेगा। लेकिन यह तब संभव
होगा, जब हम organic farming की तरफ प्रयास करें। हम कोशिश करें।
आज मैं सिक्कम प्रदेश को बधाई देता हूं|
पहाड़ों में 2003 से उन्होंने मेहनत चालू की, 2003 से और दस साल के
भीतर-भीतर सिक्किम के पूरे प्रदेश को उन्होंने organic state बना दिया। आज
वहां chemical fertilizer का नामो-निशान नहीं है। और उनका उत्पादन बड़ा
है, दवाईयां डालनी नही पड़ती है। जमीन में सुधार आया, पहले जो जमीन जितना
देती थी। वो जमीन आज दोगुना, तीनगुना देने लग गई है। और उनका बहुत बड़ा
ग्लोबल मार्केर्टिंग हो रहा है। क्या हमारे देश में हम organic farming
को बल दे सकते हैं? ये तरीके हैं जो हमने आधुनिक कृषि की तरफ जाना है।
मैं किसानों से एक और आग्रह करना चाहता
हूं। हमारी किसानी को तीन हिस्सों में बांटना यह अनिवार्य हो गया है। आज
हम हमारी किसानी एक ही खम्बे पर चलाते हैं और उसका कारण जिस समय आंधी आ
जाए वो खम्बा हिल जाए, ओले गिर जाए वो खम्बा गिर जाए, बहुत बड़ी बारिश आ
जाए, वो खम्बा गया तो पूरी साल बर्बाद हो जाती है, पूरा परिवार बर्बाद हो
जाता है। लेकिन अगर तीन खम्बों पर हमारी किसानी खड़ी होगी तो आफत आएगी तो
एक-आध खम्बा गिरेगा। दो खम्बे पर तो हमारी जिंदगी टिक पाएगी भाई।
और इसलिए तीन खम्बे कौन से हैं जिस पर
हमें किसानी करनी चाहिए एक तिहाई हम जो regular खेती करते हो वो, जो भी
करते हो, मक्का हो, धान हो, फल हो, फूल हो, सब्जी हो जो करते है वो करें।
एक तिहाई ताकत जहां आपके खेत की सीमा पूरी होती है। जहां boundary पर आप
बाढ़ लगाते हैं बड़ी-बड़ी, एक-एक, दो-दो मीटर जमीन बर्बाद करते हैं। इधर
वाला भी जमीन बर्बाद करता हैं, उधर वाला भी जमीन बर्बाद करता है, दोनों
पड़ोसी बीच में जमीन बर्बाद करते हैं। क्या हम वहाँ पर टिम्बर की खेती कर
सकते हैं क्या? ऐसे पेड़ उगाए जिससे फर्नीचर बनता है, मकान बनाने में काम
आता है। ऐसे वृक्षों की खेती करे। ऐसे पेड़ लगाए। 15-20 साल में घर में
बेटी शादी हो करने योग्य जाएगी, यह एक पेड़ काट दोगे, बेटी की शादी हो
जाएगी। आज हिंदुस्तान बहुत बड़ी मात्रा में टिम्बर import करता है।
विदेशों में पैसा जाता है हमारा। अगर हमारा किसान तय कर ले कि खेत के
किनारे पर जो जमीन आज बर्बाद हो करके पड़ी है, सिर्फ demarcation के लिए
पड़ोसी ले न जाए इसलिए बाढ़ लगा करके बैठे हैं दो-दो, तीन-तीन मीटर खराब हो
रही है, जमीन। आप देखिए कितनी बड़ी income हो सकती है।
और तीसरा, तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है
animal husbandry. दूध के लिए कुछ करे, अण्डों के लिए पॉल्ट्री फार्म
करे। मधुमक्खी का पालन करे, मधु का निर्माण करे, शहद का निर्माण करे। इसके
लिए अलग ताकत नहीं लगती है। सहज रूप से साथ-साथ चलता है। और यह भी बहुत
बड़ा ताकत देने वाला काम है।
और मैं चाहूंगा कि भारत जो कि दुनिया में
सबसे ज्यादा दूध उत्पादन करता है, लेकिन यह दुर्भाग्य है कि प्रति पशु
जितना दूध उत्पादन होना चाहिए वो अभी हमें पार करना बाकी है। और इसलिए
हमारे पशु की दूध की productivity कैसे बढ़े, उस पर हमने बल देना है। पशु
को आहार मिले, उस आहार के लिए अलग से प्रबंध करना है। पशु को आरोग्य की
सुविधाएं मिलें उस पर ध्यान केंद्रित करना है। हमारे पशु की नस्ल बदलें
इसके लिए सरकार बड़ा मिशन ले करके काम कर रही है। ऐसे अनेक प्रयास है
जिन-जिन प्रयासों के परिणामस्वरूप हम हमारे पशुधन की ताकत को बढ़ा सकते
हैं। उससे हम अपनी आय बढ़ा सकते हैं।
आज शहद दुनिया में शहद का बहुत बड़ा
मार्केट है। भारत का किसान शहद के उत्पादन में बहुत कम संख्या में है। और
शहद ऐसा है कभी खराब नहीं होता। सालों तक घर में रहे, घर में भी काम आता
है बेचने के भी काम आता है। दवाईयों में भी बिकता है और एक खेत के कोने में
हमारे घर के ही कोई व्यक्ति उसको संभाले तो काम चल जाता है।
इन तीनों खम्बों पर अगर हम हमारी किसानी
को आगे बढ़ांएगे, तो किसान को प्राकृतिक आपदा के कारण संकट आने के बावजूद
भी बचने का रास्ता निकल आ सकता है, बर्बाद होने से बच सकता है। और इसके
लिए सरकार की योजनाएं हैं। इस बार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना मेरे किसान
भाईयों-बहनों के चरणों में मैंने रखी है। यह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना
यह सिर्फ कागज़ी योजना नहीं है, यह किसान की जिंदगी से जुड़ा हुआ काम है।
और मैंने बड़ी भक्ति के साथ मेरे किसानों की भक्ति करने के लिए यह
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ले करके मैं आपके पास आया हूं। बड़ा
विचार-विमर्श किया है मैंने किसानों से सलाह-मश्विरा किया है,
अर्थशास्त्रियों से किया है, सरकारों से किया है, बीमा कंपनियों से किया है
और तब जा करके योजना बनी है।
हमारे देश में अटल बिहारी वाजपेयी जी की
सरकार ने फसल बीमा योजना चालू की। बाद में दूसरी सरकार आई उसने उसमें थोड़ा
इधर-उधर कर दिया। मुसीबत यह आई कि किसान का फसल बीमा में से विश्वास ही
उठ गया। उसको लगता है कि पैसे ले तो जाते हैं लेकिन मुसीबत के समय आते ही
नहीं है। किसान की शिकायत सच्ची है। मैंने उन सारी शिकायतों को ध्यान
में रख करके योजना बनाई है। और यह पहली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ऐसी है
कि जिसमें प्रीमियम कम से कम है। और सुरक्षा ज्यादा से ज्यादा है। यह
पहली बार ऐसा हुआ है।
अब तक हमारे देश में सौ किसान हो, तो 20
किसान से ज्यादा फसल बीमा कोई लेता ही नहीं है। और धीरे-धीरे वो भी कम हो
रहे थे। कम से कम इतना तो तय करे कि एक-दो साल में गांव के आधे किसान फसल
बीमा योजना ले लें। इतना हम कर सकते हैं क्या? अब टेक्नोलॉजी का उपयोग
होने वाला कि प्राकृतिक आपदा आई तो क्या नुकसान हुआ, कहां नुकसान हुआ?
तुरंत हिसाब लगाया जाएगा। और तुरंत पैसे मुहैया कराने की व्यवस्था यह
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में है। अब दो-दो, तीन-तीन साल इंतजार करने की
जरूरत नहीं।
और एक महत्वपूर्ण काम है, पहले ओले गिर
गए, आंधी आ गई, नुकसान हो गया, उसका भी हिसाब रहता था। लेकिन फसल काटने के
बाद खेत में अगर उसका ढेर पड़ा है, और अचानक आंधी आई, बारिश आई, ओले गिरे,
बर्बाद हो गया तो सरकार कहती थी कि भई नहीं यह फसल बीमा में नहीं आता,
क्यों? क्योंकि यह तो तुम्हारी कटाई हो गई है, तुम घर नहीं ले गए इसलिए
खराब हुआ तुमको ले जाना था। इस सरकार ने एक ऐसी फसल बीमा योजना लाई है कि
कटाई के बाद अगर 14 दिन तक खेत के अंदर अगर पड़ा है सामान और अगर बारिश आ
गई तो उसका भी बीमा मिलेगा, यहां तक निर्णय किया गया है।
और एक निर्णय किया है कि मान लीजिए आपने
सोचा कि जून महीने में बारिश आने वाली है, सारा खेत तैयार करके रखा, बीज
ला करके रखे, मेहनत करने के लिए जो भी करना पड़े सब करके रखा, लेकिन जून
महीने में बारिश आई नहीं, जुलाई महीने में बारिश आई नहीं, अगस्त महीने में
बारिश आई नहीं। अब आपका क्या होगा भई, जब बारिश ही नहीं आई, तो फसल खराब
होने का सवाल ही नहीं होता है, क्यों, क्योंकि आपने बोया ही नहीं है। अब
जब बोया ही नहीं है तो फसल हुई ही नहीं। फसल हुई नहीं तो फसल बर्बाद हुई
नहीं और फिर बीमा वाले कह देते हैं अब तुम्हारी छुट्टी, कुछ नहीं मिलेगा।
इस सरकार ने एक ऐसी योजना बनाई है कि अगर आपके इलाके में बारिश नहीं आई,
आपका बोना संभव ही नहीं हुआ तो भी आपको 25 प्रतिशत पैसे मिल जाएंगे, ताकि
आपका साल बर्बाद न हो जाए, यह काम हमने सोचा है।
भाईयों-बहनों किसान के लिए क्या किया जा
सकता है इसकी एक-एक बारीक चीज पर हमने ध्यान दिया है। अगर हमारे यहां पहले
कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए, तो 50 प्रतिशत अगर नुकसान होता था तब पैसे
मिलते थे और वो भी एक पूरे इलाके में 50 प्रतिशत हिसाब बैठना चाहिए। हमने
यह सब निकाल दिया और हमने कहा अगर 33 percent भी हुआ तो भी उसको मुआवजा
दिया जाएगा। आजादी से अब तक सभी सरकारों में इस विषय की चर्चा हुई। हर
किसानों ने इसकी मांग की, लेकिन किसी सरकार ने इसको किया नहीं था। हमने
इसको कर दिया।
भाईयों-बहनों प्राकृतिक आपदा में किसान को
मदद कैसे मिले? इसके सारे norms बदल दिये। सारी परंपराएं निकाल दी है। और
किसान को विश्वास दिलाया है और दूसरा यह भी किया है कि जनधन अकाउंट खोलो,
मदद सीधी आपके खाते में जाएगी। कोई बिचौलिए के पैर आपको पकड़ने नहीं
पड़ेंगे। हम सब जानते हैं यूरिया के लिए क्या-क्या होता था। रात-रात कतार
में किसान खड़ा रहता था। कल यूरिया आने वाला है। और यूरिया की काला-बाजारी
होती थी। कहीं-कहीं पर यूरिया लेने के लिए लोग किसान आते थे, लाठी चार्ज
होता था। और मेरा तो अनुभव है मैं प्रधानमंत्री बन करके बैठा तो पहले तीन,
चार, पांच महीने सारे मुख्यमंत्रियों की एक ही चिट्ठी आती थी कि हमारे
प्रदेश में यूरिया कम है यूरिया भेजो, यूरिया भेजो, यूरिया भेजो। भारत
सरकार यूरिया क्यों देती नहीं है। जो हमारे विरोधी लोग थे वो बयान देते थे
अखबारों में भी छपता था कि मोदी सरकार यूरिया नहीं देती। पिछले दिनों
यूरिया पर इतना काम किया, इतना काम किया कि गत वर्ष मुझे एक भी
मुख्यमंत्री ने यूरिया की कमी है ऐसी चिट्टी नहीं लिखी। पूरे देश में
कहीं पर भी यूरिया को ले करके लाठी चार्ज नहीं हुआ है। कहीं पर किसान को
मुसीबत झेलनी पड़ी।
और अब तो और कुछ किया है हमने यूरिया को
नीम कोटिंग किया है। यह नीम कोटिंग क्या है? यह जो नीम के पेड़ होते हैं,
उसकी जो फली होती है उसका तेल यूरिया पर लगाया गया है, उसके कारण जमीन को
ताकत मिलेगी। अगर आज आप दस किलो यूरिया उपयोग करते हैं, नीम कोटिंग है, तो
छह किलो, सात किलो में चल जाएगा, तीन किलो, चार किलो का पैसा बच जाएगा। यह
किसान की income में काम आएगा। किसान की income डबल कैसे होगी, ऐसे होगी।
नीम कोटिंग का यूरिया। और इससे एक और फायदा है जहां-जहां नीम के पेड़ हैं
वहां अगर लोग फली इकट्ठी करेंगे तो उस फली का बहुत बड़ा बाजार खड़ा हो
जाएगा, क्योंकि यूरिया बनाने वालों को नीम कोटिंग के लिए चाहिए, क्योंकि
भारत सरकार ने hundred percent यूरिया नीम कोटिंग का कर दिया है। इसका
दूसरा परिणाम यह होगा पहले क्या होता था यूरिया सारा लिखा जाता था तो
किसान के नाम पर। सरकार के दफ्तर में लिखा जाता था कि किसान को यूरिया की
सब्सिडी में इतने हजार करोड़ गए। लेकिन क्या सचमुच में वो किसान के लिए
जाते थे क्या? सब्सिडी जाती थी, यूरिया के लिए जाती थी, लेकिन यूरिया
किसान तक नहीं पहुंचता था वो केमिकल के कारखाने में पहुंच जाता था।
क्योंकि उसको सस्ता माल मिलता था, वो उस पर काम करता था और उसमें से वो
चीजें बना करके बाजार में बेचता था और हजारों-लाखों रुपये की कमाई हो जाती
थी। अब नीम कोटिंग के कारण एक ग्राम यूरिया भी किसी केमिकल फैक्ट्री को
काम नहीं आएगा। चोरी गई, बेईमानी गई और किसान को जो चाहिए था वो किसान को
पहुंच गया।
मेरे कहना का तात्पर्य यह है मेरे किसान
भाईयों-बहनों कि अब हमें आधुनिक विज्ञान का उपयोग करते हुए कृषि के क्षेत्र
में आगे बढ़ना है। हमने प्रयोग करने की हिम्मत दिखानी है। आज सब कुछ
विज्ञान मौजूद है। आज जो सरकार ने initiative लिए हैं, वो आपके दरवाजें पर
दस्तक दे रहे हैं। मैं खास करके युवा किसानों को निमंत्रण देता हूं आप
आइये, मेरी बात पर गौर कीजिए, भारत सरकार की नई योजनाओं को ले करके आगे
बढि़ए। और मैं विश्वास दिलाता हूं भारत का ग्रामीण जीवन, भारत के ग्रामीण
गरीब का जीवन, भारत के किसान का जीवन हम बदल सकते हैं और उस काम के लिए
मुझे आपका साथ और सहयोग चाहिए। मेरी आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
राधामोहन जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं है। यह कृषि मेला के द्वारा आने वाले
दिनों में सभी किसान उसका फायदा