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Saturday, 19 March 2016

Transformation in India will come through the villages & farmers: PM Modi at Krishi Unnati Mela


मेरे प्यारे किसना भाइयों और बहनों

यह किसान मेला भारत के भाग्‍य का मेला है, अगर भारत का भाग्‍य बदलना है, तो गांव से बदलने वाला है, किसान से बदलने वाला है और कृषि क्रांति से बदलने वाला है। हम लोग सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी से एक ही प्रकार से किसानी करते आए हैं। बहुत कम किसान हैं जो नया प्रयोग करते हैं या कुछ नया करने का साहस करते हैं। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती  यही है कि हम हमारी किसानी को आधुनिक कैसे बनाएं, टेक्‍नोलॉजी युक्‍त कैसे बनाएं, हमारी युवा पीढ़ी जो आधुनिक आविष्‍कार हो रहे हैं, उन आधुनिक आविष्कारों को खेत तक कैसे पहुंचाएं। किसान के घर तक कैसे पहुंचाएं। इस किसान मेले के माध्‍यम से एक प्रशिक्षण का प्रयास है। और मुझे खुशी है कि आज कृषि विभाग ने यह कार्यक्रम ऐसा बनाया है कि न सिर्फ यहां बैठे हुए लोग लेकिन पूरे हिंदुस्‍तान के हर गांव में किसान इस कार्यक्रम को देख रहे हैं।

और सिर्फ प्रधानमंत्री का भाषण सुनना है इसलिए देख रहे हैं ऐसा नहीं है। तीन दिन तक यहां जितनी चर्चाएं होने वाली हैं वो सारी चर्चाएं गांव में बैठा हुआ किसान भी उसको देख सकता है, सुन सकता है, समझ सकता है। क्‍योंकि जब तक हम इन बातों को किसान तक पहुंचाएंगे नहीं, किसान में विश्‍वास पैदा नहीं करेंगे तो वो अगल-बगल में जो देखता है वो ही करता रहता है। और किसान का स्‍वभाव है अगर पड़ोसी ने अपने खेत में लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाली तो यह भी जा करके लाल डिब्‍बे वाली दवाई लाकर डाल देगा। बगल वाले ने पीली दवाई डाल दी तो यह भी पीली दवाई डाल देगा। उसको ऐसा लगता है उसने किया तो मैं भी कर लूं। और जो बेचने वाले हैं उनको तो इसकी चिंता ही नहीं है कोई भी माल जाओ बेच दो, एक बार बिक्री हो जाए। बाद में कौन पूछने वाला है किसान का क्‍या हुआ।

और इसलिए कृषि क्षेत्र को एक अलग नजरिये से develop करने की दिशा में यह सरकार प्रयास कर रही है। हमारे देश में पहली कृषि क्रांति हुई वो पहली कृषि क्रांति अधिकतम जहां पानी था उस पानी के भरोसे हुई। लेकिन दूसरी कृषि क्रांति सिर्फ पानी के भरोसे करने से बात पूरी तरह संतोष नहीं देगी। और इसलिए दूसरी कृषि क्रांति विज्ञान के आधार पर, टेक्‍नोलॉजी के आधार पर, आधुनिक आविष्‍कारों के आधार पर करना आवश्‍यक हो गया है। पहली कृषि क्रांति हिंदुस्‍तान के पश्चिमी छोर पर, पश्चिमी उत्‍तर भाग में हुई। पंजाब, हरियाणा इसने नेतृत्‍व किया दूसरी कृषि क्रांति उन प्रदेशों में संभावनाएं पड़ी  है। जिस पर अगर हमने थोड़ा सा भी ध्‍यान दिया तो बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है और वो है पूर्वी उत्‍तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, नॉर्थ ईस्‍ट, ओडि़शा ये सारे हिंदुस्‍तान का पूर्वी इलाका, जहां पानी भरपूर है, जमीन की विपुलता है, जमीन ऊपजाऊ है, लेकिन वो पुराने ढर्रे से वो सब जुड़ा हुआ है और इसलिए इस सरकार का प्रयास है कि भारत के पूर्वी इलाके से एक दूसरी कृषि क्रांति कैसे हो, उस दिशा में हम कदम बढ़ा रहे हैं।

भारत की आर्थिक धारा भी गांव की धुरा से जुड़ी हुई है। अगर गांव में गांव के गरीब व्‍यक्ति के द्वारा अगर आज वो पांच हजार रुपया का माल बाजार से खरीदता है साल में और अगली बार दस हजार का खरीदता है, तो economy को वो ताकत  देता है। देश आगे बढ़ता है। और  यह अगर करना  है तो गांव के लोगों  की खरीद शक्ति बढ़ानी पड़ेगी, उनका purchasing power बढ़ाना पड़ेगा। और वो purchasing power तब तक नहीं बढता है जब तक कि गांव आर्थिक रूप से गतिशील न हो। गांव में आर्थिक गतिविधि का कारोबार न हो तो यह संभव नहीं है।

और इसलिए आपने इस बार देखा होगा चारों तरफ इस सरकार के बजट की तारीफ ही तारीफ हो रही है। कुछ लोग मौन हैं क्‍योंकि उनके लिए तारीफ करना मुश्किल है, लेकिन विरोध में बोलने के लिए कुछ है नहीं। पहली बार जिन जिन लोगों ने इस विषय के ज्ञाता है, उन्‍होंने लिखा है कि एक बड़े लम्‍बे अरसे के बाद एक ऐसा बजट आया है जो पूरी तरह गांव, गरीब और किसान को समर्पित किया गया है।और यह काम इसलिए किया है अगर भारत को आर्थिक संपन्न बनना है, आने वाले 25-30 साल तक लगातार आगे बढ़ना है, रूकना ही नहीं है, तो वो जगह सिर्फ गांव है, गरीब है, किसान है।

हमारा एक सपना है, लेकिन वो सपना मेरा होगा उससे बात बनेगी नहीं। वो सपना सिर्फ दिल्‍ली  सरकार का होगा तो बात बनेगी नहीं। चाहे केंद्र सरकार हो,  चाहे राज्‍य  सरकार हो,  चाहे हमारे किसान भाई-बहन हो, हम सबका मिला-जुला सपना होना चाहिए, हम सबकी जिम्‍मेदारी वाला सपना होना चाहिए। और  वो सपना है 2022 छह साल बाकी है, जब भारत की आजादी के 75 साल होंगे, क्‍या हम हमारे देश के किसानों की आय दोगुना कर सकते हैं क्‍या? किसानों की आय डबल कर सकते हैं क्‍या? अगर एक बार किसान, राज्‍य सरकार, केंद्र सरकार यह मिल करके तय कर लें तो काम मुश्किल नहीं है, मेरे भाईयों-बहनों। कुछ लोगों को लगता है कि यह मुश्किल काम है। मैं इस विभाग में जाना नहीं चाहता। लेकिन यह करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए इसमें कोई दुविधा नहीं हो सकती, कोशिश जरूर करनी चाहिए।

अब तक हमने देश को आगे बढाने में कृषि उत्‍पादन के growth को ही केंद्र में रखा है। हम कृषि उत्‍पादन के growth तक सीमित रह करके किसान का कल्‍याण नहीं कर सकते हैं। हमने किसान का कल्‍याण  करना है तो हमने और पचासों चीजें उसके साथ जोड़नी होगी, और तब जा करके 2022 का सपना हम पूरा कर सकते हैं। अब हम यह सोचे कि हमारी धरती माता बेचारी बोलती नहीं है, पीड़ा है तो रोती नहीं है, आप उस पर जितने जुल्‍म करो वो सहती रहती है। अगर हम धरती मां  की आवाज़ नहीं सुनेंगे, तो धरती मां भी हमारी आवाज़ नहीं सुनेगी। अगर हम धरती माता की पीड़ा महसूस नहीं करेंगे तो धरती मां भी हमारी पीड़ा कभी महसूस नहीं करेगी। और इसलिए हम सबका सबसे पहला दायित्‍व है कि हम हमारी धरती माता की पीड़ा को समझे। हमने कितने जुल्‍म किये हैं उस पर, न जाने कैसे कैसे कैमिकलों से उसको  नहला दिया। न जाने कैसी-कैसी दवाईंया पिलाई उसको, न जाने कितने-कितने जुल्‍म किये हैं उस पर अगर हम भी बीमार हो जाते हैं न तो अड़ोस-पड़ोस के लोग कहते हैं कि बेटा बहुत दवाइयां मत खाओं और ज्‍यादा बीमार हो जाओगे। डॉक्‍टर भी कहते है कि भई ठीक है बीमार हो दवा की जरूरत है लेकिन ऐसा नहीं कि एक गोली की बजाए 10 गोली खा जाओगे, ठीक  हो जाओगे। जो हमारे शरीर का हाल है, वो ही हाल यह हमारी धरती माता का भी है। और इसलिए हम कभी कम से कम देखे तो सही कि हमारी धरती माता की तबीयत कैसे है, कोई  बीमारी तो नहीं है? क्‍या कारण है कि हम फसल बोते हैं लेकिन जितनी मेहनत करते हैं उतना मिलता नहीं है, मां रूठी क्‍यों है।

और इसलिए आपकी मदद से एक बड़ा अभियान पूरा करना है वो Soil health card. हमारी जमीन की तबीयत कैसी है, उसकी परत  कैसी है, उसके अंदर ताकत कौन सी  है, उसके अंदर कमियां कौन सी है, उसके अंदर बीमारियां कौन सही है। यह हमने जांच करवानी चाहिए और यह regular करवानी चाहिए। यह कोई  महंगा काम नहीं है, सरकार आपकी मदद कर रही है। और जांच करवा ली, लेकिन हम उस रिपोर्ट को एक खाते में डालकर कागज पड़ा है, पड़ा रहे, फायदा नहीं होगा। अगर कोई  इंसान बीमार रहता है, laboratory में जाकर टेस्‍ट  करवाया और पता चला  कि diabetes है वो आ करके कागज घर  में रख दे और खाता है जैसे ही मिठाई मिले खाता रहे, जितना मिले उतना खाता रहे तो क्‍या diabetes उसको जाएगा क्‍या? बीमारी बढ़ेगी कि नहीं बढ़ेगी। मौत निश्चित हो जाएगी कि नहीं हो जाएगी।

और इसलिए soil health card के द्वारा हमें जमीन की जो कमियां नजर आई है। जमीन की जो ताकत ध्‍यान में आई है। जमीन की जो बीमारियां ध्‍यान  में आई  है, उसके अनुसार हमें खेती करनी चाहिए तो आपकी आधी समस्‍याएं तो वहीं सुलझ जाएगी। मैं दावे से कहता हूं मेरे किसान भाईयों-बहनों आपकी आधी समस्यायें, अगर जमीन की ठीक देखभाल कर दी, तो आपकी आधी समस्‍या वहीं सुलझ जाएगी। और एक बार धरती माता का ख्‍याल रखोगे न तो धरती माता तो आपका चार गुना ज्‍यादा ख्‍याल रखेगी। कभी आपको पीछे मुड़ करके देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 

दूसरी बात है पानी, किसान का स्‍वभाव है अगर उसको पानी मिल जाए तो वो मिट्टी में से सोना पैदा कर सकता है। उसे और कुछ नहीं चाहिए। और इसलिए हमने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना पर बल दिया है। किसानों को पानी कैसे पहुंचे? और कम से कम पानी बर्बाद हो, उस रूप में कैसे पड़े, इस पर काम चल रहा है। आपको हैरानी होगी मैं जरा हिसाब लगा रहा था कि हमारे किसान को पानी पहुंचाने की इतनी योजनाएं बनी  हाल क्‍या है। मेरे किसान भाईयों-बहनों आपको हैरानी होगी कि हम कुछ भी करते हैं तो हमारे विरोधी यह कहते हैं कि यह तो हमारे समय का है। यह तो हमारे जमाने का है। उनके जमाने का हाल क्‍या है मैं बताता हूं किसानों का मैंने करीब 90 प्रोजेक्‍ट ऐसे खोज कर निकालें कि जहां पानी तो भरा पड़ा लेकिन किसान को पानी पहुंचाने के लिए कोई व्‍यवस्‍था ही नहीं है। अब मुझे बताइये भइया अगर कहीं डैम भरा पड़ा है। हजारों, लाखों, करोड़ों रुपया खर्च कर दिया गया है, लेकिन अगर किसान के खेत तक पानी ले जाने का प्रबंध नहीं है वो सिर्फ दर्शन करने के सिवा किसी काम आएगा क्‍या? हमने 90 ऐसे प्रोजेक्‍ट हाथ में लिए है। और उस पर बड़ा जोर लगाया है कि वो पानी किसान तक पहुंचे। जितनी उसकी capacity है पानी कैसे पहुंचे, काम लगाया है। जब यह काम पूरा कर लेंगे करीब 80 लाख हेक्‍टेयर भूमि को पानी पहुंचना शुरू हो जाएगा भाईयों-बहनो। और पानी पहुंचेगा तो वो जमीन कितना कुछ देगी आप अंदाज कर सकते हैं।

20 हजार करोड़ रुपया, इस काम के लिए लगाने की दिशा में काम कर रहा हूं मैं। इतना ही नहीं मनरेगा, बड़ी चर्चा होती है,  लेकिन कहीं asset create नहीं होता है। इस सरकार ने बल दिया है। और मैं चाहूंगा इन गर्मी के दिनों में गांव-गांव मनरेगा से एक ही काम होना चाहिए, एक ही काम और सिर्फ तालाब है तो तालाब गहरे करना, मिट्टी निकालना, जहां पर  पानी रोक सकते हैं रोकना। इस बजट में पांच लाख तालाब बनाने का सपना है, पांच लाख  तालाब।

जहां हमारे छोटे-छोटे पर्वतीय इलाके होते हैं, पहाड़ी इलाके होते हैं, जहां तीन या चार पहाड़ इकट्ठे  होते हैं, वहां अगर थोड़ी सी खुदाई कर दें तो बहुत बड़े तालाब बनने की संभावना हो जाती है। मैंने forest department को भी कहा है जंगलों को बचाना है तो वहां छोटे-छोटे तालाब का काम किया जाए, ताकि पानी होगा तो हमारे जंगल भी बचेंगे। जंगल होंगे तो वर्षा बढ़ेगी, वर्षा बढेगी तो हमारी ज़मीन में पानी ऊपर आएगा। जो 12 महीने मेरे किसान को फायदा करेगा। हम गांव-गांव इस गर्मी के दिनों में पानी बचाने के साधन कैसे तैयार करें और जितना ज्‍यादा पानी बचाने का प्रयास करेंगे, पहली बारिश में यह सब भर जाएगा। और फिर कभी बारिश इधर-उधर हो गई तो भी वो पानी हमारी खेती को बचा लेगा। उसी प्रकार से जितना महात्‍मय जल संचय का है, उतना ही महात्‍मय जल सिंचन का है।

पानी यह परमात्‍मा ने दिया हुआ प्रसाद है। इसको बर्बाद करने का हमें कोई  अधिकार नहीं है। एक-एक बूंद पानी का उपयोग होना चाहिए। और इसलिए per drop more crop एक-एक बूंद से फसल कैसे ज्‍यादा पैदा हो, उस पर काम करना है। हम micro irrigation में जाए, हम drip irrigation में जाए छोटे-छोटे पम्‍प लगा करके पानी पहुंचाने के लिए प्रबंध करे। liquid fertilizer दें। आप देखिए मेहनत कम हो जाएगी। खर्चा कम हो जाएगा और उत्‍पादन बढ़ जाएगा। कुछ लोगों की गलतफहमी है कि sugar में भी बहुत पानी चाहिए, जमाना चला गया। अब तो micro irrigation से sugar भी हो सकता है, paddy भी हो सकता है।

और इसलिए जो हमारी पुरानी मान्‍यता है कि अगर पूरा लबालब पानी से खेत भरा होगा तभी फसल होगी, ऐसी जरूरत नहीं है। अब विज्ञान बदल गया, टेक्‍नोलॉजी बदल गई। आप आराम  से बदलाव करके कर सकते हैं। और इसलिए मेरे किसान भाईयों-बहनों, यह हमारी रोजमर्रा के काम है, इस पर अगर हम ध्‍यान देंगे। हम हमारे खर्च को कम कर पाएंगे। और हमारी आय को बढ़ा पांएगे। और उसी से किसान का कल्‍याण होने वाला है।
हमारे यहां फसल के लिए मार्केट, यह 14 अप्रैल को बाबा साहेब अम्‍बेडकर की जन्‍म जयंती पर भारत सरकार एक ई प्‍लेटफॉर्म शुरू कर रही है, ताकि किसान को अपना माल कहां बेचना, सबसे ज्‍यादा दाम कहां मिलते हैं वो अपने मोबाइल फोन पर देख सकता है कि मुझे मेरा माल किस मंडी में कैसे बेचना और उसके कारण उसको दाम ज्‍यादा मिले। आज किसान बेचारा अगर गाँव से निकला, दो बजे अगर मंडी में पहुंचा, मंडी वाले अगर चले गए वो अपना माल बेच नहीं पाता है अगर वो सब्‍जी वगैरह लाया है तो वहीं छोड़कर चला जाता है, क्‍योंकि कोई खरीददार नहीं होता है। अगर हम इस प्रकार की व्‍यवस्‍था का उपयोग करेंगे, और आज मैंने अभी एक किसान सुविधा लॉन्च किया है। किसान अपने मोबाइल फोन पर आज के आधुनिक विज्ञान डिजिटल के माध्‍यम से अपनी आवश्‍यकताओं की जानकारी वो पा सकता है। weather का रिपोर्ट ले सकता है,  मार्केट का रिपोर्ट ले सकता है। बाजार में कहां पर अच्‍छा  बीच मिल  सकता है ले सकता है। कृषि के कौन वैज्ञानिक है किसका संपर्क करना चाहिए, यह सारी जानकारियां आपकी हथेली में देने का प्रयास किया है।

अगर हम उसका प्रयोग करेंगे तो मेरे किसान को आज जो अकेलापन महसूस होता है, उसको लगता है कि मेरा कोई नहीं है। यह सरकार कंधे से कंधा मिला करके किसान के सुख-दुख का साथी है और हम आपके साथ मिल करके काम करना चाहते हैं, क्‍योंकि हमें बदलाव लाना है उस दिशा में हम काम करना चाहते हैं। उसी प्रकार से अब समय की मांग है कि हम मूल्‍य वृद्धि करे। value addition करे, processing करे। जितना ज्‍यादा food processing होगा, उतना ही ज्‍यादा हमारे किसान की आय बढ़ने वाली है। जितना ज्‍यादा value addition करेंगे, उतनी कमाई बढ़ने वाली है। अगर आप दूध बेचते हैं, कम पैसा मिलता है, लेकिन अगर दूध का मावां बना करके बेचते हैं, तो ज्‍यादा पैसा मिलता होगा। दूध  में से घी बना करके बेचते हैं ज्‍यादा पैसा मिलता है। अगर आप कच्‍चा आम बेचते हैं कम पैसा मिलता है, लेकिन अगर कच्‍चे आम का अचार बना करके बेचे तो ज्‍यादा पैसा मिलता है। आप हरी मिर्ची बेचे, कम पैसा मिलता है। लेकिन लाल हो करके पाऊडर बना करके पैकिंग करके बेचे तो ज्‍यादा पैसा मिलता है। हमारे किसान की आय बढ़ाने का यह एक उत्‍तम से उत्‍तम से मार्ग है कि हम food processing को बल दें और food processing के लिए भारत जैसे देश में दुनिया की बहुत बड़ी टेक्‍नोलॉजी की जरूरत है, ऐसा नहीं है, हमारे यहां आमतौर पर इन चीजों को करने का स्‍वभाव बना हुआ है। उसको बल देने की जरूरत है। और गांव मिल करके करेगा। तो बहुत बड़ी ऊंचाईयों पर चला जा सकता है गांव। और आज हमने देखा है कि ऐसी चीजों ने अपने जगह बना ली है।

आज दुनिया के अंदर.. मुझे अभी गल्‍फ कंट्रीज के अमीरात के क्राउन प्रिंस यहां आए थे UAE के । उन्‍होंने एक बड़ी महत्‍वपूर्ण बात बताई। उन्‍होंने कहा हमारा जो गल्‍फ कंट्रीज है प्रट्रोलियम के पैसे तो बहुत है हमारे पास, लेकिन हमारे पास पेट भरने के लिए खेती के लिए कोई संभावना नहीं है हमारी जमीन रेगिस्‍तान है। हमारी जनसंख्‍या बढ़ रही है। हमें आने वाले दिनों में जैसे-जैसे जनसंख्‍या बढ़ेगी, हमारा पेट भरने के लिए भारत से ही अन्‍न मंगवाना पड़ेगा। इसका मतलब यह हुआ कि हिंदुस्‍तान का किसान जो पैदा करेगा दुनिया के बाजार में जाने की संभावनाएं बढ़ रही है। एक बहुत बड़ा ग्‍लोबल मार्केट हमारा इंतजार कर रहा है हम अगर अपनी व्‍यवस्‍थाओं को उस स्‍टेंडर्ड की बना दें तो दुनिया हमारी चीजों को स्‍वीकार करने के लिए तैयार हो जाएगी।

इन दिनों holistic health care. हर किसी को लगता है आप भले तो जग भला। और इसलिए लोग organic खाना खाना पसंद करते हैं। कैमिकल से आया हुआ उनको खाना नहीं है। आम भी बिकता है तो पूछते हैं organic है। चावल भी लाए तो पूछते हैं organic है, गेंहू लाए तो पूछते हैं organic है। वो कहता है साहब पैसा डबल होगा, वो बोले डबल ले लो भाई दवाई खाने से ज्‍यादा अच्‍छा है कि महंगा चावल खा लूं, लेकिन दवाई खाने के लिए मुझे केमिकल वाला नहीं खाना। लोग सोच रहे हैं कि दवाई में जो पैसे जाते हैं उसके बजाय अगर वो पैसे organic चीजों को खाने में जाते हैं तो स्‍वास्‍थ्‍य भी अच्‍छा रहेगा और खर्चा भी कम होने लगेगा। लेकिन यह तब संभव होगा, जब हम organic farming की तरफ प्रयास करें। हम कोशिश करें।

आज मैं सिक्‍कम प्रदेश को बधाई देता हूं| पहाड़ों में 2003 से उन्‍होंने मेहनत चालू की, 2003 से और दस साल के भीतर-भीतर सिक्किम के पूरे प्रदेश को उन्‍होंने organic state बना दिया। आज वहां chemical fertilizer का नामो-निशान नहीं है। और उनका उत्‍पादन बड़ा है, दवाईयां डालनी नही पड़ती है। जमीन में सुधार आया, पहले जो जमीन जितना देती थी। वो जमीन आज दोगुना, तीनगुना देने लग गई है। और उनका बहुत बड़ा ग्‍लोबल मार्केर्टिंग हो रहा है। क्‍या हमारे देश में हम organic farming को बल दे सकते हैं? ये तरीके हैं जो हमने आधुनिक कृषि की तरफ जाना है।

मैं किसानों से एक और आग्रह करना चाहता हूं। हमारी किसानी को तीन हिस्‍सों में बांटना यह अनिवार्य हो गया है। आज हम हमारी किसानी एक ही खम्‍बे पर चलाते हैं और उसका कारण जिस समय आंधी आ जाए वो खम्‍बा हिल जाए, ओले गिर जाए वो खम्‍बा गिर जाए, बहुत बड़ी बारिश आ जाए, वो खम्‍बा गया तो पूरी साल बर्बाद हो जाती है, पूरा परिवार बर्बाद हो जाता है। लेकिन अगर तीन खम्‍बों पर हमारी किसानी खड़ी होगी तो आफत आएगी तो एक-आध खम्‍बा गिरेगा। दो खम्‍बे पर तो हमारी जिंदगी टिक पाएगी भाई।

और इसलिए तीन खम्‍बे कौन से हैं जिस पर हमें किसानी करनी चाहिए एक तिहाई हम जो regular खेती करते हो वो, जो भी करते हो, मक्‍का हो, धान हो, फल हो, फूल हो, सब्‍जी हो जो करते है वो करें। एक तिहाई ताकत जहां आपके खेत की सीमा पूरी होती है। जहां boundary पर आप बाढ़ लगाते हैं बड़ी-बड़ी, एक-एक, दो-दो मीटर जमीन बर्बाद करते हैं। इधर  वाला भी जमीन बर्बाद करता हैं, उधर वाला भी जमीन बर्बाद करता है, दोनों पड़ोसी बीच में जमीन बर्बाद करते हैं। क्‍या हम वहाँ पर टिम्‍बर की खेती कर सकते हैं क्‍या? ऐसे पेड़ उगाए जिससे फर्नीचर बनता है, मकान बनाने में काम आता है। ऐसे वृक्षों की खेती करे। ऐसे पेड़ लगाए। 15-20 साल में घर में बेटी शादी हो करने योग्‍य जाएगी, यह एक पेड़ काट दोगे, बेटी की शादी हो जाएगी। आज हिंदुस्‍तान बहुत बड़ी मात्रा में टिम्‍बर import करता है। विदेशों में पैसा जाता है हमारा। अगर हमारा किसान तय कर ले कि खेत के किनारे पर जो जमीन आज बर्बाद हो करके पड़ी है, सिर्फ demarcation के लिए पड़ोसी ले न जाए इसलिए बाढ़ लगा करके बैठे हैं दो-दो, तीन-तीन मीटर खराब हो रही है, जमीन। आप देखिए कितनी बड़ी income हो सकती है।
और तीसरा, तीसरा महत्‍वपूर्ण पहलू है animal husbandry. दूध के लिए कुछ करे, अण्‍डों के लिए पॉल्‍ट्री फार्म करे। मधुमक्‍खी का पालन करे, मधु का निर्माण करे, शहद का निर्माण करे। इसके लिए अलग ताकत नहीं लगती है। सहज रूप से साथ-साथ चलता है। और यह भी बहुत बड़ा ताकत देने वाला काम है।

और मैं चाहूंगा कि भारत जो कि दुनिया में सबसे ज्‍यादा दूध उत्‍पादन करता है, लेकिन यह दुर्भाग्‍य है कि प्रति पशु जितना दूध उत्‍पादन होना चाहिए वो अभी हमें पार करना बाकी है। और इसलिए हमारे पशु की दूध की productivity कैसे बढ़े, उस पर हमने बल देना है। पशु  को आहार मिले, उस आहार के लिए अलग से प्रबंध करना है। पशु को आरोग्‍य की सुविधाएं मिलें उस पर ध्‍यान केंद्रित करना है। हमारे पशु की नस्‍ल बदलें इसके लिए सरकार बड़ा मिशन ले करके काम कर रही है। ऐसे अनेक प्रयास है जिन-जिन प्रयासों के परिणामस्‍वरूप हम हमारे पशुधन की ताकत को बढ़ा सकते हैं। उससे हम अपनी आय बढ़ा सकते हैं।

आज शहद दुनिया में शहद का बहुत बड़ा मार्केट है। भारत का किसान शहद के उत्‍पादन में बहुत कम संख्‍या में है। और शहद ऐसा है कभी खराब नहीं होता। सालों तक घर में रहे, घर में भी काम आता है बेचने के भी काम आता है। दवाईयों में भी बिकता है और एक खेत के कोने में हमारे घर के ही कोई व्‍यक्ति उसको संभाले तो काम चल जाता है।

इन तीनों खम्‍बों पर अगर हम हमारी किसानी को आगे बढ़ांएगे, तो किसान को प्राकृतिक आपदा के कारण संकट आने के बावजूद भी बचने का रास्‍ता निकल आ सकता है, बर्बाद होने से बच सकता है। और इसके लिए सरकार की योजनाएं हैं। इस बार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना मेरे किसान भाईयों-बहनों के चरणों में मैंने रखी है। यह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना यह सिर्फ कागज़ी योजना नहीं है, यह किसान की जिंदगी से जुड़ा हुआ काम है। और मैंने बड़ी भक्ति के साथ मेरे किसानों की भक्ति करने के लिए यह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ले करके मैं आपके पास आया हूं। बड़ा विचार-विमर्श किया है मैंने किसानों से सलाह-मश्‍विरा किया है, अर्थशास्त्रियों से किया है, सरकारों से किया है, बीमा कंपनियों से किया है और तब जा करके योजना बनी  है।
हमारे देश में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने फसल बीमा योजना चालू की। बाद में दूसरी सरकार आई उसने उसमें थोड़ा इधर-उधर कर दिया। मुसीबत यह आई कि किसान का फसल बीमा में से विश्‍वास ही उठ गया। उसको लगता है कि पैसे ले तो जाते हैं लेकिन मुसीबत के समय आते ही नहीं है। किसान की शिकायत सच्‍ची है। मैंने उन सारी शिकायतों को ध्‍यान  में रख करके योजना बनाई है। और यह पहली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ऐसी है कि जिसमें प्रीमियम कम से कम है। और सुरक्षा ज्‍यादा से ज्‍यादा है। यह पहली बार ऐसा हुआ है।

अब तक हमारे देश में सौ किसान हो, तो 20 किसान से ज्‍यादा फसल बीमा कोई लेता ही नहीं है। और धीरे-धीरे वो भी कम हो रहे थे। कम से कम इतना तो तय करे कि एक-दो साल में गांव के आधे किसान फसल बीमा योजना ले लें। इतना हम कर सकते हैं क्‍या? अब टेक्‍नोलॉजी का उपयोग होने वाला कि प्राकृतिक आपदा आई तो क्‍या नुकसान हुआ, कहां नुकसान हुआ? तुरंत हिसाब लगाया जाएगा। और तुरंत पैसे मुहैया कराने की व्‍यवस्‍था यह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में है। अब दो-दो, तीन-तीन साल इंतजार करने की जरूरत नहीं।
और एक महत्‍वपूर्ण काम है, पहले ओले गिर गए, आंधी आ गई, नुकसान हो गया, उसका भी हिसाब रहता था। लेकिन फसल काटने के बाद खेत में अगर उसका ढेर पड़ा है, और अचानक आंधी आई, बारिश आई, ओले गिरे, बर्बाद हो गया तो सरकार कहती थी कि भई नहीं यह फसल बीमा में नहीं आता, क्‍यों? क्‍योंकि यह तो तुम्‍हारी कटाई हो गई है, तुम घर नहीं ले गए इसलिए खराब हुआ तुमको ले जाना था। इस सरकार ने एक ऐसी फसल बीमा योजना लाई है कि कटाई के बाद अगर 14 दिन तक खेत के अंदर अगर पड़ा है सामान और अगर बारिश आ गई तो उसका भी बीमा मिलेगा, यहां तक निर्णय किया गया है।

और एक निर्णय किया है कि मान लीजिए आपने सोचा कि जून महीने में बारिश आने वाली  है, सारा खेत तैयार करके रखा, बीज ला करके रखे, मेहनत करने के लिए जो भी करना पड़े सब करके रखा, लेकिन जून महीने में बारिश आई नहीं, जुलाई महीने में बारिश आई नहीं, अगस्‍त महीने में बारिश आई नहीं। अब आपका क्‍या होगा भई, जब बारिश ही नहीं आई, तो फसल खराब होने का सवाल ही नहीं होता है, क्‍यों, क्‍योंकि आपने बोया ही नहीं है। अब जब बोया ही नहीं है तो फसल हुई ही नहीं। फसल हुई नहीं तो फसल बर्बाद हुई नहीं और फिर बीमा वाले कह देते हैं अब तुम्‍हारी छुट्टी, कुछ नहीं मिलेगा। इस सरकार ने एक ऐसी योजना बनाई है कि अगर आपके इलाके में बारिश नहीं आई, आपका बोना संभव ही नहीं हुआ तो भी आपको 25 प्रतिशत पैसे मिल जाएंगे, ताकि आपका साल बर्बाद न हो जाए, यह काम हमने सोचा है।

भाईयों-बहनों किसान के लिए क्‍या किया जा सकता है इसकी एक-एक बारीक चीज पर हमने ध्‍यान दिया है। अगर हमारे यहां पहले कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए, तो 50 प्रतिशत अगर नुकसान होता था तब पैसे मिलते थे और वो भी एक पूरे इलाके में 50 प्रतिशत हिसाब बैठना चाहिए। हमने यह सब निकाल दिया और हमने कहा अगर 33 percent भी हुआ तो भी उसको मुआवजा दिया जाएगा। आजादी से अब तक सभी सरकारों में इस विषय की चर्चा हुई। हर किसानों ने इसकी मांग की, लेकिन किसी सरकार ने इसको किया नहीं था। हमने इसको कर दिया।

भाईयों-बहनों प्राकृतिक आपदा में किसान को मदद कैसे मिले? इसके सारे norms बदल दिये। सारी परंपराएं निकाल दी है। और किसान को विश्‍वास  दिलाया है और दूसरा यह भी किया है कि जनधन अकाउंट खोलो, मदद सीधी आपके खाते में जाएगी। कोई बिचौलिए के पैर आपको पकड़ने नहीं पड़ेंगे। हम सब जानते हैं यूरिया के लिए क्‍या-क्‍या होता था। रात-रात कतार में किसान खड़ा रहता था। कल यूरिया आने वाला है। और यूरिया की काला-बाजारी होती थी। कहीं-कहीं पर यूरिया लेने के लिए लोग किसान आते थे, लाठी चार्ज होता था। और मेरा तो अनुभव है मैं प्रधानमंत्री बन करके बैठा तो पहले तीन, चार, पांच महीने सारे मुख्‍यमंत्रियों की एक ही चिट्ठी आती थी कि हमारे प्रदेश में यूरिया कम है यूरिया भेजो, यूरिया भेजो, यूरिया भेजो। भारत सरकार यूरिया क्‍यों देती नहीं है। जो हमारे विरोधी लोग थे वो बयान देते थे अखबारों में भी छपता था कि मोदी सरकार यूरिया नहीं देती। पिछले दिनों यूरिया पर इतना काम किया, इतना काम किया कि गत वर्ष मुझे एक भी मुख्‍यमंत्री ने यूरिया की कमी है ऐसी  चिट्टी नहीं लिखी। पूरे देश में कहीं पर भी यूरिया को ले करके लाठी चार्ज नहीं हुआ है। कहीं पर किसान को मुसीबत झेलनी पड़ी।

और अब तो और कुछ किया है हमने यूरिया को नीम कोटिंग किया है। यह नीम कोटिंग क्‍या है? यह जो नीम के पेड़ होते हैं, उसकी जो फली होती है उसका तेल यूरिया पर लगाया गया है, उसके  कारण जमीन को ताकत मिलेगी। अगर आज आप दस किलो यूरिया उपयोग करते हैं, नीम कोटिंग है, तो छह किलो, सात किलो में चल जाएगा, तीन किलो, चार किलो का पैसा बच जाएगा। यह किसान की income में काम आएगा। किसान की income डबल कैसे होगी, ऐसे होगी। नीम कोटिंग का यूरिया। और इससे एक और फायदा है जहां-जहां नीम के पेड़ हैं वहां अगर लोग फली इकट्ठी करेंगे तो उस फली का बहुत बड़ा बाजार खड़ा हो जाएगा, क्‍योंकि यूरिया बनाने वालों को नीम कोटिंग के लिए चाहिए, क्‍योंकि भारत सरकार ने hundred percent यूरिया नीम कोटिंग का कर दिया है। इसका दूसरा परिणाम यह होगा पहले क्‍या होता था यूरिया सारा लिखा जाता था तो किसान के नाम पर। सरकार के दफ्तर में लिखा जाता था कि किसान को यूरिया की सब्सिडी में इतने हजार करोड़ गए। लेकिन क्‍या सचमुच में वो किसान के लिए जाते थे क्‍या? सब्सिडी जाती थी, यूरिया के लिए जाती थी, लेकिन यूरिया किसान तक नहीं पहुंचता था वो केमिकल के कारखाने में पहुंच जाता था। क्‍योंकि उसको सस्‍ता माल मिलता था, वो उस पर काम करता था और उसमें से वो चीजें बना करके बाजार में बेचता था और हजारों-लाखों रुपये की कमाई हो जाती थी। अब नीम कोटिंग के कारण एक ग्राम यूरिया भी किसी केमिकल फैक्‍ट्री को काम नहीं आएगा। चोरी गई, बेईमानी गई और किसान को जो चाहिए था वो किसान को पहुंच गया।

मेरे कहना का तात्‍पर्य यह है मेरे किसान भाईयों-बहनों कि अब हमें आधुनिक विज्ञान का उपयोग करते हुए कृषि के क्षेत्र में आगे बढ़ना है। हमने प्रयोग करने की हिम्‍मत दिखानी है। आज सब कुछ विज्ञान मौजूद है। आज जो सरकार ने initiative लिए हैं, वो आपके दरवाजें पर दस्‍तक दे रहे हैं। मैं खास करके युवा किसानों को निमंत्रण देता हूं आप आइये, मेरी बात पर गौर कीजिए, भारत सरकार की नई योजनाओं को ले करके आगे बढि़ए। और मैं विश्‍वास दिलाता हूं भारत का ग्रामीण जीवन, भारत के ग्रामीण गरीब का जीवन, भारत के किसान का जीवन हम बदल सकते हैं और उस काम के लिए मुझे आपका साथ और सहयोग चाहिए। मेरी आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं। राधामोहन जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं है। यह कृषि मेला के द्वारा आने वाले दिनों में सभी किसान उसका फायदा

उठाए। यही शुभकामनाओं के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Thursday, 3 March 2016

PM Modi's reply to Motion of thanks to President’s Address in Lok Sabha

अध्‍यक्ष महोदया जी, मैं सबसे पहले, राष्‍ट्रपति जी के प्रति आभार व्‍यक्‍त करना चाहता हूं। उन्‍होंने राष्‍ट्रपति अभिभाषण के माध्‍यम से न सिर्फ सदनों को लेकिन देश और दुनिया को भारत का गौरव, भारत की गरिमा, भारत की उत्‍तम विकास यात्रा और विश्‍व के पास भारत की जो अपेक्षा हैं, वो भारत के सामान्‍य मानव की जो अपेक्षाएं हैं, उसकी पूर्ति करने के प्रयास उसका एक विस्‍तार से बयान, आदरणीय राष्‍ट्रपति जी ने हमारे सामने प्रस्‍तुत किया है। मैं उनके प्रति आदरपूर्वक धन्‍यवाद व्‍यक्‍त करता हूं और धन्‍यवाद करने के लिए मैं खड़ा हूं।

सदन की इस महत्‍वपूर्ण चर्चा में कई आदरणीय सदस्‍यों ने अपने अनुभव का, अपने विचारों का लाभ सदन को और देश को पहुंचाया है। आदरणीय श्री मल्लिकार्जुन जी, श्री वैंकेया नायडू जी, मिनाक्षी लेखी जी, हरसिमरत कौर जी, श्री पी. नागराजन जी, श्रीमान सौगत राय, श्रीमान भर्तृहरि महताब जी, श्रीमान जितेंद्र रेड्डी जी, मोहम्‍मद सलीम जी, सुप्रिया सुले जी, मुलायम सिंह यादव जी, राहुल गांधी जी, अनुप्रिया पटेल जी, श्री रियो जी, श्री ओवैसी जी, कई वरिष्‍ठ आदरणीय महानुभावों ने अपने विचार रखे हैं। उन सभी को मैं धन्‍यवाद कहता हूं, क्‍योंकि इस विचार को उन्‍होंने जनता को सशक्‍त बनाने में, सुरेख बनाने में अपना योगदान दिया है।

मैं आज इस सदन में, हम सभी सांसदों की तरफ से स्‍पीकर महोदय का भी धन्‍यवाद करना चाहता हूं। क्‍योंकि, राष्‍ट्रपति जी के भाषण में संसद की कार्यवाही किस रूप में चलनी चाहिए, कैसी होना चाहिए उसकी अपेक्षाएं व्‍यक्‍त की गई है। और यह अच्‍छी बात है कि हमने अपने बड़ों की सलाह माननी चाहिए, उनसे सलाह लेनी चाहिए। और राष्‍ट्रपति जी हमारे संवैधानिक व्‍यवस्‍था के सबसे बड़े पद पर है। और उनकी सलाह हमने अवश्‍य माननी चाहिए। और मैं स्‍पीकर महोदय का विशेष रूप से इसलिए आभार व्‍यक्‍त करना चाहता हूं कि पिछले कुछ समय में उन्‍होंने कई नये initiative लिए हैं। उन्‍होंने जो SRI योजना प्रस्‍तुत की है Speaker’s Research Initiative. हम सभी सांसदों को अलग-अलग विषय पर research material मिले। हम लोगों का प्रबोधन हो। एक अच्‍छा प्रकल्‍प आपके द्वारा चल रहा है और वो संसद को qualitative change लाने में उपयोगी होगा। मैं इसके लिए आपका आभार व्‍यक्‍त करता हूं।

मैं अध्‍यक्ष महोदया का इस बात के लिए भी अभिनंदन करना चाहता हूं कि उन्‍होंने अगले पांच और छह मार्च को, पूरे देश की elected women members को Assembly and Loksabha उनके एक सर्वदलीय सम्‍मेलन की घोषणा की है। हमारे भूतपूर्व राष्‍ट्रपति जी समेत, सभी महिला leaders का उसमें प्रदर्शन मिलने वाला है। Women empowerment की दिशा में decision making process में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करने की दिशा में आपका एक अहम कदम है और मैं मानता हूं इस हिंदुस्‍तान के संसदीय गतिविधि के साथ एक अच्‍छा कदम आपने उठाया है और सभी दलों ने सहयोग किया है। सबसे बड़ी बात है कि सभी दल के women सांसद मिलकर इसको कार्ययोजना बना रहे हैं। एक बहुत ही अच्‍छा माहौल इसका दायर हुआ है। इसके लिए मैं आपका आभार व्‍यक्‍त करता हूं।

उसी प्रकार से BPST Training programme में जो नये हमारे सांसद चुन करके आए हैं, उनकी लगातार प्रशिक्षा, उसमें भी काफी अच्‍छा आपके द्वारा काम था, Orientation programme चल रहे हैं। मैं इसके लिए भी आपका बहुत-बहुत आभार व्‍यक्‍त करता हूं।

राष्‍ट्रपति जी ने कहा है कि सदन बहस के लिए होता है। हम देख रहे हैं कि देश पिछले दिनों सदन में जो हुआ उससे बहुत पीडि़त भी है, चिंतित भी है। और जब सदन नहीं चलता है, तो सत्‍तापक्ष का नुकसान तो बहुत कम होता है, देश का नुकसान बहुत होता है। लेकिन सबसे ज्‍यादा नुकसान सांसदों का होता है, उसमें भी विपक्ष के सांसदों का होता है। क्‍योंकि उनका जनता की आवाज उठाने से रोका जाता है। और इसलिए, संसद में कितने विरोधी विचार क्‍यों न हो, कितनी ही नाराजगी क्‍यों न हो, लेकिन वो प्रकट होना यह आवश्‍यकता है। सदन एक ऐसा forum है, जहां तर्क रखे जाते हैं, जहां तीखे जवाब दिये जाते हैं। एक ऐसा forum है, जहां सरकार पर सवाल किये जाते हैं। एक ऐसा forum है जहां सरकार को अपना बचाव करना होता है। अपने पक्ष में सफाई देनी होती है। बहस के दौरान किसी को बख्‍शा नहीं जाता और उसकी उम्‍मीद भी नहीं की जानी चाहिए। लेकिन बहस के दौरान अगर सदन की गरिमा और मर्यादा बनी रही तो हम अपनी बात और मजबूती से रख पाएंगे और साथ ही साख भी बना पाएंगे। यह उपदेश नरेंद्र मोदी का नहीं है। यह भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमान राजीव गांधी का है।

राष्‍ट्रपति जी की बात इसलिए महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि उन्‍होंने लम्‍बे अरसे तक इस प्रक्रिया में भी अपने जीवन के महत्‍वपूर्ण वर्ष बिताएं हैं। और उन लोगों के साथ बिताएं हैं कि जिनसे ज्‍यादा अपेक्षा बहुत स्‍वाभाविक है। मैं एक और बात कहना चाहता हूं। मैं इस सदन में मौजूद सभी दलों को अहम बिल पास कराने में मदद का न्‍यौता देता हूं। और जब मैं इस सदन कहता हूं मतलब दोनों सदन। यह बिल लोगों के लिए है। यह बिल इसलिए जरूरी है ताकि system से दलालों को खत्‍म किया जा सके। यह बिल इसलिए है ताकि जमीनी स्‍तर पर जिम्‍मेदारियां बांटी जा सके। यह बिल इसलिए है ताकि प्रशासन को जवाबदेह बनाया जा सके। यह बिल इसलिए है ताकि योजनाओं में आम जनता की भूमिका बढ़ाई जा सके। सामाजिक न्‍याय में, विकास में, उनकी भागीदारी बढ़ाई जा सके। यह बिल इस लोकतंत्र की बुनियाद को मदद करने के लिए है। यह भी नरेंद्र मोदी नहीं कह रहा। यह भी हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमान राजीव गांधी ने कहा है। और हमने बड़ों की बात माननी चाहिए।

सदन को रोकने के संबंध में कुछ बातों की चर्चा जरूरी लगती है। हमारे भूतपूर्व स्‍पीकर और यहां कुछ महानुभाव है जिनके वो guide and philosopher रहे हैं, लम्‍बे अरसे तक- श्रीमान सोमनाथ चटर्जी। उन्‍होंने कहा कि ऐसे मुद्दों पर जिनके बारे में धारणा होती है कि वे महत्‍वपूर्ण है। सदन की बैठकों को रोकना पूरी तरह counter-productive है। दुर्भाग्‍य से राजनीतिक दलों में यह विचार पनपा है कि संसद की कार्रवाई में व्‍यवधान डालने और अंतत: सदन को समय से पहले स्‍थगित कराने से, उस विषय का या मुद्दे का महत्‍व साबित हो जाएगा, जिस पर विभिन्‍न पार्टियां विरोध कर रही है। संसद के कार्यों को बाधित करने को अगर देश के लोगों के खिलाफ युद्ध जैसा नहीं भी माने, तो कम से कम संसदीय प्रणाली में आस्‍था की कमी तो मानना ही चाहिए। दुर्भाग्‍य से लगभग सभी राजनीतिक दल और यहां तक की जो छोटे दल है उनका भी ऐसा ही विश्‍वास और नजरिया दिखाई दे रहा है। यह चिंता श्रीमान सोमनाथ जी ने भी सभी सदस्‍यों के सामने प्रकट की है।

मैं एक और बात को आज कहना चाहता हूं, सदन चलने के संबंध में। यहां हम संसद में जो भारत की Soveign Authority है। भारत के शासन की जिम्‍मेदारी लेकर आए हैं। निश्चित रूप से इस Soveign Body का सदस्‍य होने से, बड़ी जिम्‍मेदारी और बड़ा सौभाग्य कुछ भी नहीं हो सकता। क्‍योंकि यह इस देश की विशाल जनसंख्‍या की नियति के लिए जिम्‍मेदारी है यह सदन। हम में से सभी को, अगर हमेशा नहीं तो जीवन में कभी न कभी, जिम्‍मेदारी का यह बड़ा एहसास जरूर हुआ होगा और जिस destiny के लिए हमें बुलाया गया है, उसे हमने महसूस जरूर किया होगा। हम इस योग्‍य है या नहीं वह अलग मामला है। अत: इन पांच वर्षों के दौरान हम अपने इन कार्यों में न केवल इतिहास के किनारे खड़े रहे, बल्कि कभी-कभी हम इतिहास बनाने की प्रक्रिया में भी शामिल हुए हैं। यह बात सांसदों के संबंध में इतनी ऊंची कल्‍पना हमारे प्रथम प्रधानमंत्री आदरणीय पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने 1957 में व्‍यक्‍त की थी, तब हम में से कोई नहीं थे। हम में से कोई नहीं था, उस समय भी यह चिंता, हम में से और हमारे दल में से तो कोई नहीं था, उस समय आपने यह बात कही थी। मैं इसलिए कह रहा हूं क्‍योंकि यह देश को जानना जरूरी है कि इसी लोकसभा में हो-हल्‍ले के बीच आपकी दृढ़ता के कारण आपके उच्‍च मनोबल के कारण कुछ बिल पास हुए, लेकिन वे आगे नहीं पहुंच पाए।

National Water-way bill, हमारे यहां जल शक्ति का कितना सामर्थ्‍य है, कितना उपयोग है, पानी बह रहा है। उसके लिए यह सरकार एक योजना लेकर काम करना चाहती है। इस तरह उसको रोक करके देश का क्‍या भला कर रहे हैं। मैं चाहूंगा कि जब राष्‍ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में इस बात को कहा है। उसी प्रकार से Whistel-blower Protection Amendment Bill, यह वो विषय है जो हम citizen-centric कह सके। हम जागरूक नागरिकों के अधिकारों की बात कह सकें। और इसलिए उसको रोकने के पीछे मुझे कोई तर्क नजर नहीं आता है। GST बिल हम कल से सुन रहे हैं यह तो हमारा है, यह तो हमारा है, यह तो हमारा है। यह भी आप ही का है। GST Bill आप ही का है। और उसको रोका जा रहा है। Consumer Protection bill, यह consumer कौन है? उसे रोका गया है। Insolvency and Bankruptcy Code. हम सोचे राष्‍ट्रपति जी जो संविधान के सबसे बड़े व्‍यक्ति हैं उनकी सलाह हम जरूर मानेंगे।

और जब मैं संसद की बात कर रहा हूं तो मैं सभी आदरणीय सदस्‍यों से भी, मेरे कुछ विचार रखना चाहता हूं। एक पहली बार सदन में आए हुए एक सांसद के विचार हैं, एक प्रधानमंत्री के विचार के रूप में न लिया जाए लेकिन हो सकता है शायद यह चीजें काम आज जाए।

मेरा एक सुझाव है, आपने पांच और छह की तो एक अच्‍छा कार्यक्रम की रचना की है। इस बार आठ मार्च को हमारा सदन चलता होगा। अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस है, उस समय का आठ मार्च का जो एजेंडा है वो ही रहे, लेकिन हम तय कर सकते हैं कि आठ मार्च को सिर्फ हमारी women member ही बोलेंगे। हम हमारी संसदीय गतिविधि (व्यवधान).

उसी प्रकार से, हम बहुत समय, हमारे समय ऐसा था, आपके समय ऐसा है, आप ऐसे हैं, हम वैसे थे। यह हम करते हैं। और देश को यह अब हमारे विषय में पूरा पता है। इसलिए देश को कोई तकलीफ न हो। हम सब कौन, कहां खड़े हुए हैं, क्‍या सोचते हैं यह देश पूरी तरह जानता है। लेकिन क्‍या, मैं सभी वरिष्‍ठ महानुभव से मार्गदर्शन चाहूंगा कि क्‍या हम वर्ष में दो सत्र के समय या एक सत्र तय करेंगे। उस पूरे सत्र के दौरान एक week ऐसा हो कि जिस week में सिर्फ जो first timer MP है, उन्‍हीं को बोलने के लिए निमंत्रित किया जाए। इसलिए नहीं कि मैं first timer हूं, लेकिन हमें एक ताजगी भरी हवा, इस सदन में विचारों की आवश्‍यकता मुझे महसूस हुई होती है। और मुझे भरोसा है, मैं जानता हूं जिस प्रकारसे आपके कार्यक्रम में यह जो नये MP रूचि ले रहे हैं। इससे मुझे लगता है कि उनको अवसर देना चाहिए। वे देश के लिए बहुत सी चीजें नई हमारे सामने रख सकते हैं। उस पर हम कुछ कर सकते हें।

एक तीसरा मेरा सुझाव है कि हमारे यहां United Nation ने अभी Sustainable Development Goals. सारे विश्‍व ने मिल करके तय किया हमारी सुषमा जी ने उसके लिए बहुत अच्‍छा शब्‍द दिया ‘टिकाऊ विकास लक्ष्‍य’। हिन्‍दी में उन्‍होंने उसका अच्‍छा translation किया, sustainable. यह तय होता है सरकारे जाती हैं। क्‍या कभी सदन के सभी लोग Saturday को एक दिन ज्‍यादा बैठे कभी और एक सत्र के दरमियां एक या दो दिवस हम सब मिल करके अंतर्राष्‍ट्रीय जगत में जो Sustainable Development Goals तय हुए उसमें भारत की जो भूमिका है। उसको चरितार्थ करने के लिए क्‍या कर सकते हैं? हम कोई बहस कर सकते हैं? हमारे अपने एजेंडा के काम बहुत है, लेकिन कोई पल हो जिसमें कोई राजनीति हो सिर्फ राष्‍ट्रनीति, सिर्फ मानवतावाद इसको ले करके कुछ कर सकते हैं क्‍या? मैं आशा करूंगा कि इस पर सोचा जाए।

उसी प्रकार से मैं तीन विषयों को, मैं तीन और बातों को आज आपके सामने प्रस्‍तुत करना चाहता हूं। सरकार यह हो या सरकार वो हो लेकिन यह बात माननी पड़ेगी भले शिक्षा यह राज्‍यों का विषय हो लेकिन हमारी प्राथमिक शिक्षा का स्‍तर, यह बहुत ही चिंता का विषय है, पीड़ा का विषय है। अगर हमारे देश की इन बालकों की जिंदगी पर हम ध्‍यान नहीं देंगे तो क्‍या होगा। उसी प्रकार से हम Environment, Global Warming, CoP-21 यह सब करें, जरूर करें, लेकिन पानी। यह हमारे सामने एक बहुत बड़ा सामाजिक जिम्‍मेदारी का का है। उसी प्रकार से एक विषय जिससे हम सब लोग बहुत डरते हैं, डरने के कारण भी हैं। मैं उसकी गहराई में जाना नहीं चाहता। लेकिन न्‍याय में विलंब, न्‍याय न देने के बराबर भी हम बोलते हैं। आज भी हमारे lower courts में इतनी pendency है, क्‍या कभी सदन में बैठ करके हम उसके रास्‍ते क्‍या हो, कैसे उपाय निकाले, इस प्रकार के एक-दो विषय हम तय कर रहे हैं। और छह महीने के पहले तय करें।

हम expert लोगों के पेपर्स मंगवाएं, पेपर circulate करें और बहुत ही qualitative बहस करके उसमें से कोई actionable point कोई हम निकाल सकते हैं क्‍या ? और वो इस सदन की मालिकी होगी, किसी सरकार की नहीं होगी। सरकार को गौरवगान करने के लिए नहीं होना चाहिए। इस सदन में यहां भी बहुत अनुभवी लोग बैठे हैं, बहुत अनुभवी लोग बैठे हैं। और इसलिए ऐसा एक सामूहिक चिंतन हो। और मुझे मालूम है सतपति जी ने पहले एक बहुत अच्‍छा विषय रखा था कि क्यों न एक दिन सदस्‍यों का... मैं उसी बात को आज थोड़ा structured way में प्रस्‍तुत कर रहा हूं। मूल यह विचार मेरे मन में सतपति जी का भाषण सुना तब आया था। और इसलिए मैं चाहूंगा कि हम अगर इन चीजों को कर सके तो शायद होगा। कभी-कभी सदन को रोकने के संबंध में या हो-हल्‍ला करके काम में रूकावटें करने से, एक सार्वजनिक चर्चा होती है, यह होती है कि हम लोग कहेंगे कि देखो सरकार काम नहीं करने देते, वो लोग कहेंगे कि देखो सरकार हमको सुनती नहीं है। किसी को लगता है कि देखो हमने दिखा दी अपनी ताकत। भले हम कम है, लेकिन हम... यह सब चल रहा है।

लेकिन एक और बात है जिस पर ध्‍यान जाने की आवश्‍यकता है। यह सदन क्‍यों नहीं चलने दिया जाता है। इसलिए नहीं कि सरकार के प्रति रोष है। एक inferiority-complex के कारण नहीं चलने दिया जाता है। क्‍योंकि विपक्ष में भी ऐसे होनहार सांसद हैं, ऐसे तेजस्‍वी सांसद है और मैं मानता हूं उनका सुनना, उनके विचार अपने आप में एक बहुत बड़ी asset है। लेकिन अगर सदन चलेगा तो उनको बोलने का अवसर मिलेगा। अगर वो बनेगे, बोलेंगे तो बहुत उनकी जय जयकार होगी, तब हमारा क्‍या होगा। यह चिंता सता रही है। यह inferiority है कि विपक्ष के सामर्थ्‍यवान सांसद न बोल पाए। विपक्ष के सामर्थ्‍यवान सांसदों की प्रतिभा का परिचय देश को न हो। इसलिए यह सरकार को रोकने वाली बात तो अपनी जगह है। लेकिन विपक्ष में कोई ताकतवर बनना नहीं चाहिए। कोई होनहार दिखना नहीं चाहिए। इस inferiority-complex का परिणाम है। इसलिए, अब इस बार सदन चला तो मैंने देखा कितने तेजस्‍वी लोग हैं हमारे पास, कितने शानदार विचार रखते हैं ये। पिछले दो सदन में उनका कोई लाभ ही नहीं मिला। और इसलिए मैं समझता हूं कि बहुत आवश्‍यक है और मैं देख रहा हूं बहुत study करके आते हैं। हमारे विपक्ष के भी छोटे-छोटे दल के सदस्‍य चार मेम्‍बर होंगे, तीन मेम्‍बर होंगे और कुछ लोग मनोरंजन भी करवाते हैं।

मेरे मन में, जब मैं कुछ पढ़ता रहता हूं तो कुछ बातें अच्‍छी लगती है। हम लोगों को किसी का मजाक नहीं उड़ानी चाहिए। ‘Make in India’ की मजाक उड़ा रहे हैं हम। न न ‘Make in India’ की मजाक उड़ा रहे हैं। यह ‘Make in India’ देश के लिए है। हां, सफल नहीं हुआ तो सफल होने के लिए क्‍या करना चाहिए, सफल होने में क्‍या कमियां है उसकी चर्चा होनी चाहिए। लेकिन मैं एक बात कहना चाहता हूं और मुझे लगता है जाने ऐसा क्‍यों है कि हम लोग अपे देश के image ऐसे बनाते हैं जैसे हम भीख का कटोरा ले करके निकले हो। और जब हम खुद ऐसा कहते हैं, तो दूसरे लोग यही बात और ज्‍यादा चीख करके कहते हैं और ज्‍यादा मजबूती से कहते है। यह मैं नहीं कह रहा हूं श्रीमती इंदिरा गांधी कह रहीं हैं। यह 1974 में इंद्रपस्‍थ कॉलेज में, आप ने, इंदिरा जी ने यह भाषण किया था। और इसलिए यह भी बात है कि हम कोई भी नई योजना लाए, नये तरीके से लाए तो कुछ लोगों को, उम्र तो बढ़ती है लेकिन समझ नहीं बढ़ती है तो समझने में बड़ी देर लगती है। कुछ लोगों का ऐसा रहता है। और इसलिए चीजें समझने में बड़ा समय जाता है। कुछ लोग तो समय बीतने के बाद भी चीजें समझ नहीं पाते हैं। और इसलिए अच्‍छा लगता है कि विरोध करें, तो वो अपना विरोध करने का तरीका ढूंढते रहते हैं। और इसलिए मैं एक पीड़ा कहना चाहता हूं। हमारे देश में बहुत सी दिक्‍कते हैं, ज्‍यादातर ऐसी हैं जो बहुत पुरानी है। गरीबी, पिछड़ापन, अंधविश्‍वास, कुछ गलत परंपराएं। कुछ समस्‍याएं विकास और तरक्‍की के साथ भी आई है, लेकिन इस देश की सबसे बड़ी चुनौती है तेजी से हो रहे बदलाव का विरोध। यह विरोध पढ़े-लिखे तबका भी बहुत मुखर तरीके से करता है। जैसे ही कोई खास काम आगे बढ़ता है सौ कारण बताए जाने लगते हैं कि यह काम क्‍यों नहीं करना चाहिए। मुझे लगता है कि एक मजबूत और ऊंची दीवार ने हम सबको चारों तरफ से घेर के रखा है। कितनी सटीक बात है, यह 1968 में इंदिरा गांधी ने कही थी।

यहां पर कोई भी बात आई तो यह कहा जाता है कि यह तो हमारे समय का है। यह तो हमारी देन है। कुछ बातें ऐसी हैं, जो आप ही की तो देन है। अब हमने एक अभियान चलाया। स्‍कूलों में टॉयलेट बनाने का। अब आपकी बात सही है कि मोदी जी अगर हमने हमारे कार्यकाल में सभी स्‍कूलों में टॉयलेट बना दिये होते तो तुम क्‍या करते? यह तो हमने नहीं बनाए, इसलिए तुमने चार लाख बनाए। यह आप ही की तो देन है।

बांग्‍लादेश की सीमा का विवाद, इतने दशकों के बाद बांग्‍लादेश सीमा का विवाद सुलझा। आप कह सकते है कि देखो हमने अगर हमारे कार्यकाल में कर दिया होता तो मोदी तुम्‍हारा achievement कहां होता। यह तो तुम्‍हारे लिए हम छोड़ करके गए थे, यह तो आप ही तो देन है। 18 हजार गांव, आजादी के इतने सालों बाद अंधेरे में डूबे हुए हो और अगर हम उन गांवों में बिजली पहुंचाएं, तो आप गर्व से कह सकते हो कि मोदी जी यह 18 हजार हमारी ही तो देन है, तभी तो आप कर रहे हो। और इसलिए यह आप ही की देन है। इसका मैं कोई इनकार नहीं कर सकता। 60 साल के यह आपके ही कारोबार का परिणाम है। इसका कोई इनकार नहीं कर सकता। और इसलिए कभी-कभी बड़े गर्व के साथ मनरेगा की चर्चा होती है। मैं जरा कहना चाहता हूं कि इसका इतिहास 50 साल पुराना है। लेकिन उसके पहले भी राजे-रजवाड़ों के जमाने में भी ऐसी कुछ बातें चलती थी। आप देखिए 1972 महाराष्‍ट्र की रोजगार गारंटी योजना, 1972 में आई। 1980 में National Rural Employment Programme (NREP) यह 1980 में उसका recarnation हुआ। 1983 में Rural Landless Employment Guarantee Programme (RLEGP) ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम आया। यह सब recarnation होते गए। योजनाओं का पुनर्जन्‍म होता गया।

उसके बाद 1989 में जवाहर रोजगार योजना (JRY) यह मनरेगा का पिछले जन्‍म का नाम है। लेकिन मैं हैरान हूं बाद में जवाहर लाल जी का नाम निकाल दिया गया। और किसी और ने नहीं निकाला, उसी दल ने निकाला जो हमें कोसते रहते हैं। उसके बाद 1993 में, Employment Insurance Scheme (EIS) सुनिश्चित रोजगार योजना यह आया। उसके बाद भाजपा जी की सरकार आई। तो उस समय इन सभी योजनाओं में से जो भी अच्‍छा था ले ले करके संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (SGRY) यह शुरू हुआ। 2004 में फिर उसमें reincarnation हुआ। National Food for Work programme, ‘काम के बदले अनाज’ का राष्‍ट्रीय कार्यक्रम आया। उसके बाद इसने नया रूप 2006 में लिया मनरेगा। पहले नरेगा और फिर एक नया ज्ञान हुआ तो वो मनरेगा हुआ। तो यह गरीबों की भलाई केलिए कुछ न कुछ लगातार योजनाएं चलती गई। यह बात सही है कि आप बड़े सीना तान करके कह सकते हैं कि मोदी जी चुनाव में भाषण करना अलग चीज है। तुम कहते हो गरीबी हटाओगे लेकिन तुम्‍हें मालूम नहीं हम कौन है। अरे हमने गरीबी की जड़े इतनी जमा दी है, इतनी जमा दी है, मोदी तुम उखड़ जाओगे, लेकिन इसे उखाड़ नहीं पाओगे।

यह बात सही है कि मुझे यहां आने के बाद पता चला कि इतनी जड़े जमाई है आपने। और इसलिए मैंने पछिली बार भी कहा था, इस बात का कोई इनकार नहीं करेगा कि इस देश के 60 साल के कार्यकाल में अगर हम गरीबों का भला कर पाएं होते, तो आज मेरे देश के गरीबों को मिट्टी उठाने के लिए, गड्ढ़ा खोदने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। यह हमारा सफलता का स्‍मारक नहीं है। यह हम सबको स्‍वीकार करना होगा। और इसलिए यह हमारा दायित्‍व भी बनता है कि यह जो क्रमिक विकास चला है इस योजना का उसको और अच्‍छी बनाए और उस जिम्‍मेदारी को निभाने का हम प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यह बात स्‍वीकार करनी होगी कि हम उस हालत पर देश को लाएं हैं कि skilled labour को भी unskilled होने में मजा आने लगा है। और इसलिए मैं जब कहता हूं कि हमारी विफलताओं का स्‍मारक है, इसका मतलब यही है कि गरीबी न होती तो इस नरेगा या मनरेगा की जरूरत नहीं होती। लेकिन यह सच्‍चाई है और मैंने आ करके देखा कि ऐसी गरीबी की जड़ों को जमा दिया गया है कि उसको उखाड़ फेंकने के लिए मुझे भारी मेहनत करनी पड़ रही है और उसके लिए हम अभी जो फिलहाल योजना चली है, उसमें जो कमियां है, उन कमियों को कैसे दूर करना उसकी दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं।

मैं आज आदरणीय खड़गे जी ने कहा था कि मनरेगा में भ्रष्‍टाचार बहुत है। मैं आपके साथ Thousand Percent सहमत हूं। मुझे इसका कोई विरोध नहीं हूं। आप 2012 की CAG की रिपोर्ट को देख लीजिए। क्‍या observation किए हैं कैसे भ्रष्‍टाचार ने इसके साथ जड़ें जमा दी है। कैसे गरीबों के नाम पर रुपये लुटे जो रहे हैं। इसकी उसमें चर्चा है, 2012 की CAG रिपोर्ट में चर्चा है। और इसलिए हमने उसमें से कुछ सीखने का प्रयास ‍किया है। और हम बहुत कुछ सीखना चाहते हैं और सीखने का प्रयास करके उसमें जो चीजें थी उसमें से बाहर निकाल करके full prove कैसे बने, जरूरतमंदों को कैसे मिले, उस पर काम करेंगे। CAG ने एक बहुत बड़ा observation किया है और वो चौंकाने वाला है।

हमारे देश में जिन राज्यों को हम गरीबों की श्रेणी में गिनते हैं। जहां गरीबों की संख्या ज्यादा है। CAG ने लिखा है कि जहां गरीबों की संख्या कम है और कुल मिलाकर के शासन-व्यवस्था सुचारु रूप से चली है, ऐसे राज्यों में नरेगा का, मनरेगा का maximum उपयोग हुआ है। लेकिन जहां सचमुच में गरीबी है, जहां सबसे ज्यादा जरुरत है, वहां इसके कम से उपयोग हुआ है। मतलब ये गरीबों को target करके पहुंचाने में हम उतने सफल नहीं हुए हैं और इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि हम इसको और अधिक perfect कैसे बनाएं ताकि जिन राज्यों में गरीबों की संख्या की मात्रा ज्यादा है, जिन राज्यों की गरीबी ज्यादा है, ये उस तरफ कैसे जाए। समृद्ध राज्यों की क्षमता है इन सारी चीजों को व्यवस्था में करें, हमने उस दिशा में कोशिश करी कि ऐसे राज्यों को ये कैसे पहुंचे। हमने JAM योजना के साथ जनधान, आधार और मोबाइल, ये पैसे direct beneficiary को पाएं, उस दिशा में बड़ा अभियान चलाया है तो उसके कारण बिचौलियों की संख्या नष्ट करने में शायद हमें सफलता मिलेगी।

और इसलिए मैं समझता हूं कि ये जिस मनरेगा की हम इतनी बड़ी तारीफ करते हैं। CAG ने कहा है कि 7 साल के बाद भी 5 राज्य ऐसे थे जिन्होने rules भी नहीं बनाए और दुख इस बात का है, उन 5 राज्यों में 4 वो थे, जो इस मनरेगा के गीत गाते हैं कि जिन्होंने 7 साल के बाद भी rules नहीं बनाए थे और इसलिए even Union Territories उसमें भी ये कठिनाई ध्यान में आई है। उसी प्रकार से 8 ऱाज्यों में, 100 दिन का हमारा लक्ष्य, हम कभी भी पूरा नहीं कर पाए हैं। Average 30 दिन, 40 दिन से गाड़ी अटक जाती है। हमने जिस प्रकार से उसका नया structure बनाने का प्रयास किया है उसमें targeted हो, अधिकतम रोजगार मिले, अधिकतम दिवस तक रोजगार मिले, बिचोलिए समाप्त हो, पाई-पाई का सही उपयोग हो और उसकी audit की व्यवस्था हो इस दिशा में हमने भरपूर प्रयास किया है। और इसलिए मुझे विश्वास है औज श्रमिकों के बैंक/डाकघर खातों में सीधे अंतरण के electronic तरीके से, ये पैसे जाते हैं। 94 percent श्रमिकों को इसी माध्यम से भुगतान करने की दिशा में हम आगे बढ़े हैं।

दूसरी तरफ कभी न कभी ये सदन सिर्फ इस ईर्ष्या भाव से काम करने के लिए नहीं है कि मेरे से तेरी shirt ज्यादा सफेद क्यों है, ये ईर्ष्या भाव के लिए नहीं है। मैं मानता हूं जो आलोचना हो रही है हमारी। माननीय अध्यक्षा जी, आलोचना इस बात के लिए नहीं हो रही है कि हमने कुछ गलत किया है, चिंता इस बात की है तुम हमसे अच्छा क्यों कर रहे हो, कैसे कर रहे हो, ये चिंता का विषय सता रहा है और इसलिए परेशानी हो रही है। जो 60 साल में नहीं कर पाए वो आप कैसे कर लेते हो, ये चिंता का विषय है और योजनाएं कैसी होती हैं, लंबे अर्से तक कैसा लाभ करती हैं।

इस देश के intellectual class को भी मैं निमंत्रित करता हूं कि दो योजनाओं का एक comparative study करने की जरूरत है, एक अटल जी के समय शुरू हुई प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना औऱ दूसरी हमारी मनरेगा। आप analysis देखोगे, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का उन राज्यों को सबसे ज्यादा लाभ मिला है, जो कुल मिलाकर के गरीबी की श्रेणी में आते हैं। road बनता है तो रोजगार भी आता है, road बनता है तो सुविधा भी आती है और उसके कारण education में, health में , wealth में भी एक बदलाव आया है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में भी सरकार के पैसे गए, मनरेगा में भी गए लेकिन asset creation हुआ और इसलिए उसमें से सीखकर के हम मनरेगा को भी asset creation पर बल दे रहे हैं। उसमें भी पानी पर हम सबसे ज्यादा बल दे रहे हैं और उसका परिणाम मिलेगा। ऐसा मैं मानता हूं और हम कोशिश कर रहे हैं।

हमारे मल्लिकार्जुन जी ने Food security bill को लेकर के, act को लेकर के और मैंने देखा है गुजरात की बात आ जाए तो बड़ा ही मजा आ जाता है, बड़ा आनंद आ जाता है और फिर कहने को कुछ होता नही है तो घूम-फिरकर के, तो ये आपकी bankruptcy है, मैं जानता हूं कि आपके पास और कुछ नहीं है लेकिन मैं बताना चाहता हूं जी, जिस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के आप इतने गीत गाते हैं और हमें बार-बार सुनाते हैं कि हम लाए, हम लाए, हम लाए। हम 2014, मई में आए। अध्यक्ष महोदया जी, मई, 2014 तक सिर्फ 11 राज्यों ने हड़बड़ी में, उसमें जो अपेक्षाएं थी, ऐसी किसी व्यवस्था को पूर्ण किए बिना कागज पर लिख दिया था कि स्वीकार कर रहे हैं। जिस बात को लेकर के हम इतनी बातें करते हैं, उसकी ये दुर्दशा थी। इतना ही नहीं, आज जो मैं अभी खड़ा हुआ हूं न तब कि मैं बात बताना चाहता हूं। आज भी चार राज्य ऐसे हैं, कुल आठ। चार राज्य ऐसे हैं जिसमें आज भी ये Food security act का नामोनिशान नहीं है और उसमें आपके द्वारा शासित राज्य हैं केरल, मिजोरम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और इसलिए गुजरात ने अब कर लिया औऱ उन्होंने, उन्होने जिन बारीकियों को पूरा किया है। जरा study करने जाना चाहिए, आपकी एक पूरी टीम भेजिए।

आप केरल में चुनाव में जा रहे हो। आप जिस ताम-झाम से बातें कर रहे हो, केरल की जनता आपसे जवाब मांगेगी कि आपने जिस act को लेकर के इतनी बड़ी बातें की, केरल उस act से वंचित क्यों रखा है, अरुणाचल प्रदेश क्यों रखा था, मिजोरम क्यों रखा था, मणिपुर क्यों रखा था। आठ राज्य बाकी उसमें से चार राज्य आपके हैं और इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि हम कहते बहुत हैं लेकिन कभी-कभार। कभी-कभी आप सभी महानुभाव, जब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की बात आई थी तो वेंकैया जी जब बोल रहे थे तो हमारे सौगत राय जी खड़े हो गए थे। वैसे वो फटाफट खड़े हो जाते हैं और जब वो खड़े हो जाते हैं तो उनके दल वाले भी देखते हैं कि पता नहीं क्या करेंगे।

सौगत राय जी ने कहा कि भई ये किसान फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ये तो सिर्फ 45 district के लिए है तो एक जानकारी के लिए कहना चाहता हूं सौगत राय ये 1 अप्रैल से देश के सभी गांव, सभी किसानों के लिए लागू होगा। इस योजना की एक और beauty है। जिसकी तरफ मैं आपका औऱ जो 45 जिलों में pilot project के रूप में हमने ली है। अब ये pilot project के रूप में इसलिए हैं क्योंकि इसमें सफलता मिले या न मिले, लोगों को पसंद आए या न आए, पचासों विषय होते हैं। हमने ये कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के साथ कोई दो और चीजें insurance में आप जोड़ सकते हैं क्या? और उसके लिए हमने किसानों को 7 alternate इन 45 जिलों में एक प्रायोगिक रूप में देने का तय किया है।

एक प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना, जीवन ज्योति बीमा योजना, दूसरी प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, तीसरी छात्र सुरक्षा योजना, चौथी घर अग्नि दुर्घटना बीमा योजना, पांचवी कृषि संयंत्र पंप सेट बीमा योजना, छठवीं ट्रैक्टर बीमा योजना और सातवीं मोटर बाईक बीमा योजना। ये किसान के साथ जुड़ी हुई 7 चीजें हैं। अगर वो फसल बीमा के साथ क्या उसको suit करता है इसमें से कोई दो चीज लेना तो कम premium में उसको एक अतिरिक्त benefit मिल जाए तो उसके पंप खराब हो जाते हैं इसलिए प्रायोगिक रूप से Insurance company को थोड़ी दिक्कत हो रही है लेकिन मैंने बड़ा आग्रह किया है। एक प्रयोग है, मैं सांसदों से भी आग्रह करुंगा कि इस पर वो तराशे, ठीक लगे तो आगे बढ़ाएंगे नहीं लगेगा तो छोड़ देंगे। लेकिन ये उस दर्श में था 45 district वाला trial वो प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से वो नहीं था।

कभी-कभी कहा जाता है कि ये तो भई हमारा था। मैं कैसे कह सकता हूं, रेल मैंने शुरु की, आप कह सकते हैं, आप तो कुछ भी कह सकते हैं, हम में वो हिम्मत नहीं है और इसलिए यूपीए के 10 साल। रेलवे, सुरेश जी यूं, औसत सालाना खर्च रेलवे के development के लिए 9291 करोड़ रुपए। हमारे इस दो साल में 32587 crore rupees. प्रतिवर्ष औसत लाइनों का commissioning है। हमने लाइनें कितनी बिछाई हैं, यूपीए-1 average है 1477 kilometre, यूपीए-2, थोड़ा सुधार हुआ 1520 kilometre। NDA, 2292... round aboout 2300, काम कैसे होता है, गति कैसे लाई जा सकती है, एक perform करने वाली सरकार कैसी होती है। संसाधन यही थे, रेलवे की पटरियां वही थीं, department वही थे, मुलाजिम वही थे, कानून-व्यवस्थाएं वही थी, ये जीता-जागता उदाहरण है और मैं हर क्षेत्र में ये दिखा सकता हूं लेकिन राष्ट्रपति जी के भाषण के संदर्भ में और अधिक न कहते हुए मैंने ये कहा है।

आदरणीय अध्यक्षा महोदया, एक बात हमेशा ही चर्चा में रहती है Finance के संबंध में, वो ये रहती है कि राज्यों को पैसा कम कर दिया, डिगना किया, फलां किया। एक ऐसी पवित्र जगह कि मुझे देश के सामने ये चीजें रखना जरुरी लगता है। 14वें वित्त आयोग की अनुशंसा के बाद 2015-16 से राज्यों को 2014-15 की तुलना में केंद्र से अधिक वित्तीय संसाधन दिए जा रहे हैं। राज्यों को वित्तीय संसाधन 3 मुख्य heading के अंतर्गत दिए जाते हैं। केंद्रीय करों में राज्य सरकार का हिस्सा, Non plan grants एवं राज्यों के plan के लिए केंद्र की सहायता। केंद्र से राज्य सरकारों को वर्ष 2014-15 में कुल 6,78,819 crore रुपए की राशि दी गई थी। Revised Estimates 2015-16 के अनुसार राज्यों को 8,20,133 crore रुपए की राशि दी गई। 2015-16 की राशि, 2014-15 की राशि से 1 लाख 41 हजार 314 करोड़ रुपए, 1,41,314 crore रुपए ज्यादा है। इन तीनों heading के अंतर्गत मिल रही राशि पिछले वर्ष की तुलना में 20.8 percent ज्यादा है। और इसलिए ये जो बिना कारण हकीकतों को न कहते हुए, मिथ्याकारक चीजें चलने की जो कोशिशें हो रही हैं, मैं समझता हूं कि उसको जरा समझने की आवश्यकता है।

उसी प्रकार से, हमारा देश लोकतंत्र से विश्वास करने वाला देश रहा है, लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध देश रहा है लेकिन हम जानते हैं इस देश में, सार्वजनिक जीवन में हम सब लोग answerable हैं। कोई भी व्यक्ति हमें सवाल पूछ सकता है, पूछने का उसका हक है लेकिन कुछ है जो जवाबदेह नहीं है, न ही कोई उनको पूछने की हिम्मत करता है, न ही उनको कहने की किसी को ताकत है। और जो करने जाते हैं उनका क्या हाल होता है, वो मैं देख चुका हूं। लेकिन मैं घटना का सिर्फ जिक्र करना चाहता हूं, अर्थ आप लोग लगाइए। Russia के राष्ट्र प्रमुख श्रीमान Khrushchev, जब स्टालिन की मृत्यु हो गई, वो उनके साथी थे तो स्टालिन की मृत्यु के बाद ये जहां जाते थे Khrushchev, स्टालिन की बड़ी आलोचना करते थे, बहुत ही कठोर शब्दों में निंदा करते थे, कुछ भी कहते थे और ये वो हर जगह पर करते थे तो एक बार एक सभागृह में Khrushchev अपनी बात बता रहे थे और स्टालिन को उन्होंने जमकर, अपने पूर्व के नेता को, उनकी मृत्यु के बाद बहुत कोसा।

एक नौजवान खड़ो हो गया, पीछे से, उसने कहा Mr. Khrushchev मैं आपसे सवाल करना चाहता हूं, बोले आप स्टालिन को इतनी गालियां दे रहे हो, इतना बदनाम कर रहे हो। जब वो जिंदा थे, आप उनके साथ काम करते थे तब आपने क्या किया, ये जो हालात पैदा हुई आपने क्या किया। सारे सभागृह में सन्नाटा छा गया। जब सभागृह में सन्नाटा छा गया और कुछ पल के बाद Khrushchev ने कहा जिसने सवाल किया वो जरा खड़ा हो जाए, वो खड़े हो गए, उन्होंने कहा तुम्हें जवाब मिल गया। तुम जो आज कर पा रहे हो, स्टालिन की जमाने में मैं चाहता था लेकिन नहीं कर पाता था और इसलिए इसको समझने में देर लगेगी लेकिन इसमें कोई बादाम काम नहीं आएगी, आपको तो शायद थोड़ा समझ आ जाएगा औरों के लिए मैं नहीं कह सकता।

हमारे यहां कभी-कभी शास्त्रों में, लोकोक्तियों में कई बातें बड़ी अच्छी कही जाती हैं और उसमें ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे’। दूसरों को उपदेश देने की कुशलता देने वाले तो बहुत सारे लोग हैं परंतु जो खुद वैसा आचरण करे वैसे लोगों की संख्या बहुत कम है। मैं लगातार आप सब की तरह उपदेश सुनता रहा हूं, सलाह सुनता रहा हूं, आलोचना झेलता रहा हूं, आलोचना से ज्यादा आरोप सह रहा हूं, ये सब चल रहा है और मुझे क्या हुआ है कि 14 साल के काम, काफी कुछ मैं इससे जीना सीख चुका हूं, इससे जीना सीख चुका हूं लेकिन ये देश उस बात को कभी नहीं भुला सकता है। अध्यक्ष महोदया, 27 सितंबर, 2013 हमारे देश के सम्मानीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अमेरीका में थे, अमेरिका के राष्ट्रपति के साथ उनका bilateral talk होना था, देश के सम्मानीय नेता थे। हिंदुस्तान की कैबिनेट, जिसमें फारुख अबदुल्ला साहब बैठते थे, एंटनी साहब बैठते थे, शरद पवार साहब बैठते थे, इस देश के गणमान्य अनुभवी नेता बैठते थे।

उस कैबिनेट में ने जो निर्णय किया। उस निर्णय को 27 सितंबर, 2013 पत्रकार परिषद में फाड़ दिया गया था, ordinance को फाड़ दिया गया था। अपनों से बड़ों का मान-सम्मान, आदर मैं बहुत... आदरणीय अध्यक्ष महोदया मुलायम सिंह जी और हम दो छोर पर खड़े नेता हैं, मेरी एक बात को वो नहीं स्वीकार सकते हैं, मैं उनकी एक बात को नहीं स्वीकार सकता except लोहिया जी के विचार को। क्योंकि मैं ऐसी जगह पर पैदा हुआ हूं, मुझे लोहिया जी पसंद आना बहुत स्वाभाविक थे लेकिन मुलायम सिंह जी ने जनता को वादे करते हुए अपना एक पर्चा निकाला हुआ था कि हम उत्तर प्रदेश के लिए ये करेंगे, ये करेंगे। मुलायम सिंह जी हमें पसंद हो या न हो लेकिन बहुत बड़े वरिष्ठ नेता हैं, सार्वजनिक सभा में मुलायम सिंह जी के वादों को फाड़ दिया गया है और फिर मुझे बार-बार यादा आता है ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे।

आदरणीय अध्यक्षा महोदया जी, देश, लोकतंत्र में आगे बढ़ने के लिए जितना हमारे सामने एक आवश्यकता मुझे लगती है। मैं अभी जो बात करने जा रहा हूं वो शायद, हम सबको पसंद आएगी। मैं छोटा था, तो मैं जिस गांव में बढ़ा हुआ। हमारे यहां एक MLA थे, वो कभी हारते ही नहीं थे, हमेशा जीतते थे लेकिन वो जाते थे ट्रेन में, हम भी कोशिश करते थे उनके चाय पिलाएं वरना कोई मुसीबात आ जाए रेलवे में तो हम उनको संभालते थे। तो हम देख रहे थे कि हमारे देश में उनसे कभी मैंने एक बार शब्द सुना elective. अब हमें elective क्या है, समझ नहीं था लेकिन जब आगे दिन बीतते गुए तो पता चला elective वो था। मैं देख रहा था कोई elective आ गया है तो पूरी government machinery कांप जाती थी, नीचे से ऊपर तक अफसर परेशान रहते थे क्योंकि assembly या संसद में सवाल आ गया, एक घबराहट का माहौल था। सदन में भी कभी किसी subject की debate होती थी तो अफसरों को चिंता रहती थी, पता नहीं क्या होगा। हमारे लोकतंत्र में संसदीय कार्यवाही को हम कहां ले गए। ये आज न हमारे सांसदों के सवालों से, प्रशासन के किसी भी अफसर को पसीना आता हो, चिंता नही होती हो। हमने हमारी इस कार्यवाही को कहां ले गए कि हमारे अफसरों को कोई डर नहीं रहा है। ये सवाल इस सरकार का, उस सरकार का नहीं है। कालक्रम से ये deterioration हुआ है।

जब संसद के अंदर भले ही प्रतिपक्ष का एक ही अकेला सांसद क्यों न हो, उसके दल का औऱ कोई भी सदस्य न हो लेकिन सरकारी मुलाजिमों के लिए government machinery के लिए वो प्रधानमंत्री से कम नहीं हो सकता है। लेकिन आज मैं चाहता हूं हम लोग तय करें। तु-तु, मैं-मैं हम करेंगे, आप मुझे कोसोगे, मैं आपको कोसूंगा और अफसर ताली बजाते हैं, मजा लेते हैं। ये लंबे अर्से की बीमारी आई है। इस सदन में विपक्ष का शब्द की उनके लिए महत्वपूर्ण है, ये जनप्रतिनिधि है, ये देश के लोग हैं। ये स्थिति लानी है तो, ये तु-तु, मैं-मैं करके जो हम Scoring करते हैं, मीडिया में छा जाते हैं। हमको लगता है इन्होंने बहुत कुछ कर लिया लेकिन अफसरशाही की accountability खत्म होती जा रही है। लोकतंत्र में हम लोग तो हर पांच साल में जनता को हिसाब देंगे। आएंगे, नहीं आएंगे चलता रहेगा लेकिन उनका हिसाब लेने के लिए यही एक जगह है। और इसलिए हमारी संसदीय कार्यप्रणाली में, हम सभी को, सभी सदस्यों को एक क्यों न हो, वो प्रधानमं से कम नहीं है और इसलिए ये आवश्यक है कि हमारी executive की accountability कैसे बढ़ाएं। ये जब तक हम मिलकर के नहीं करेंगे, ये accountability संभव नहीं होगी और तब एक सरकार को गालियां पड़ेंगी, दुसरी सरकार आएगी, उनकी मजा लेना बंद नहीं होगा।

हमारे सामने ये चुनौती है, मैं मानता हूं और इस चुनौती को हमने पूरा करने की दिशा में एक सामूहिक प्रयास करने पड़ेगा। इसमें आपको भी ये भुगतना पड़ा है, मैं तो लंबे समय तक इस काम को करके आया हूं क्योंकि मुझे मालूम है। मैं किसी को दोष नहीं देता हूं लेकिन ये हम अखबार में क्या छिपेगा उसकी चिंता मे तु-तु, मैं-मैं में लगे रहते हैं। उसके कारण लाखों मुलाजिम हैं, लाखों मुलाजिम। अरबों-खरबों रुपया का तनख्वाह जा रहा है, योजनाओं की कमी नहीं है। न आपके समय कमी थी, न मेरे समय कमी है। सवाल ये है कि हम वो accountability को कैसे लाए।

इस सदन ने, एक और बात है भारत जैसे लोकतंत्र में हम देश के नागरिकों को अफसरशाही के भरोसे नहीं छोड़ सकते। हमें हमारे सवा सौ करोड़ देशवासियों पर भरोसा करना होगा, उस पर हमने विश्वास करना होगा और एक बार हम सवा सौ करोड़ देशवासियों पर विश्वास करके चलेंगे, मुझे विश्वास है ये देश का नागरिक, हमसे कोई बहुत नहीं मांग रहा है, वो हमारे लिए साथ चलने के लिए तैयार है। हमने उस दिशा में कुछ प्रयास किए, वो बहुत बड़े हैं ऐसा मेरा दावा नहीं है लेकिन उस दिशा में जाना है।

हमने छोटे मुलाजिमों के लिए interview क्यों बंद किया है इसलिए की हमें उस नागरिक पर भरोसा करना सीखना है, हमने नागरिकों को बेचारों को Xerox के जमाने में भी gazetted officer के पास signature के लिए जाना। कभी MP, MLA के घर के पास कतार लगाकर के खड़ा रहना पड़ता था और MP, MLA उसका चेहरा भी नहीं देखता था, एक छोटा सा लड़का होता था ठप्पे मार-मारकर के दे दे रहा था। हमारे उस 10वीं, 12वीं पास बच्चे पर तो भरोसा था लेकिन उस नागरिक पर हमारा भरोसा नहीं था, हमने उसको नष्ट कर दिया क्योंकि नागरिक पर भरोसा होना चाहिए, जब final job लेगा आएगा, अपने दिखाएगा। अभी हमने बजट में बहुत बड़ी अहम बात रखी है कि दो करोड़ रुपए तक हम कुछ नहीं पूछेंगे आप जो चाहो दे दो हम ले लेंगें। विश्वास बढ़ाने का माहौला बढ़ाना है, ऐसे कोई नए सुझाव हैं तो आप जरूर दीजिए।

मैं चाहूंगा कि सरकार आदत डाले, ये सरकार को भी सुधरना चाहिए, इस सरकार में भी सुधार आने चाहिए और आपकी मदद के बिना नहीं आएंगे जी, आपकी मदद चाहिए मुझे, आप लोगों का साथ चाहिए, आपके अनुभव का मुझे लाभ चाहिए। मैं नया हूं, आप अनुभवी लोग हैं, आइए कंधे से कंधा मिलाकर के हम चलें और कुछ अच्छा काम कर करके देश के लिए देकर के जाएं। सरकार आएंगी-जाएंगी, लोग आएंगे-जाएंगे, बिगड़ती-बनती बात चलेगी, ये देश अजर-अमर है, ये देश रहने वाला है और इस देश की पूर्ति के लिए हम काम करें। इसी एक अपेक्षा के साथ फिर एक बार राष्ट्रपति जी को आदरपूर्वक मैं अभिनंदन करता हूं, उनका धन्यवाद करता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Sunday, 21 February 2016

Through National Rurban Mission, we want to combine the spirit of a village & facilities associated with cities: PM Modi

मेरे प्‍यारे भाइयो बहनों, आज मैं सुबह नया रायपुर में था। नया रायपुर में जब भी आता हूं कई नई चीजें देखने को मिलती हैं। लगता है दिन में जितना नया रायपुर बढ़ता है उससे ज्‍यादा रात में बढ़ता है। आज मैंने नया रायपुर में शहरों में जो गरीब होते हैं, उन गरीबों के आवास की योजना का शिलान्‍यास किया। और अभी मैं आपके बीच आया हूं। कार्यक्रम तो इन मेरे आदिवासी भाई-बहनों के बीच में है, जो दिल्‍ली से बहुत दूर है। राजनंद गांव के एक इलाके की छोटी सी जगह पर है। लेकिन कार्यक्रम बहुत बड़ा है और पूरे हिंदुस्‍तान के लिए है।

 पहले सरकार को आदत थी, कि जो कुछ भी करना है वो दिल्‍ली में से ही करना है। विज्ञान भवन में दो सौ-चार सौ लोग आ जाएं, दीप जलाएं, मीडिया वालों की मित्रता काम आ जाए, टीवी पर 24 घंटे पता चल जाए कि इतना बड़ा काम हो गया है। मैंने सरकार को दिल्‍ली से बाहर निकाल करके जन-जन के बीच में लाकर खड़ा कर दिया है। आदिवासियों के बीच में लाया हूं, किसानों के बीच में लाया हूं, गांव के बीच में लाया हूं। सरकार के अधिकारियों की फौज गांव के बीच में जाने लग गई है और विकास की एक नई दिशा चल पड़ी है। और इसलिए आज इस छोटे से स्‍थान पर इतने लाखों लोगों का जनसागर, मैं हैरान हूं इतनी बड़ी संख्या में लोग, जहां भी मेरी नजर पहुंची है, लोग ही लोग नजर आते हैं। मैं उधर पहाड़ी पर नजर कर रहा हूं पहाड़ी में भी जैसे जान आ गई है, पत्‍थर नहीं लोग नजर आ रहे हैं। क्‍या अद्भुत दृश्‍य देख रहा हूं मैं। मेरे प्‍यारे भाइयो-बहनों ये जनता-जनार्दन के आर्शीवाद इस देश को नई ऊंचाई पर पहुंचाएंगे। ये मेरा विश्‍वास हर दिन पक्‍का होता जाता है। हर दिन नया विश्‍वास पैदा होता है। ऐसा प्‍यार जो आप लोग दे रहे हैं, उससे मुझे आपके लिए ज्‍यादा दौड़ने की ताकत मिलती है, ज्‍यादा मेहनत करने की ताकत मिलती है, पसीना बहाने की प्रेरणा मिलती है।

आज मुझे यहां 104 साल की उम्र की मां कुंवरबाई का आर्शीवाद प्राप्‍त करने का सौभाग्‍य मिला। जो लोग अपने-आप को नौजवान मानते हैं, वो जरा तय करें क्‍या उनकी सोच भी जवान है क्‍या? मैं ये इसलिए कह रहा हूं कि 104 साल की मां कुंवरबाई न टीवी देखती है न अखबार पढ़ती है न वो पढ़ी-लिखी मां है, दूर-सुदूर गांव में रहती है, और उसको पता चला कि देश के प्रधानमंत्री कहते हैं कि शौचालय बनाओ। बस इस मां के कान में पड़ गया, उसने अपनी बकरियां बेच दीं और शौचालय बना दिया। 104 साल की मां के मन में विचार, ये ही हिंदुस्‍तान के बदलाव का संकेत दे रहा है। देश बदल रहा है, इसका सबूत दूर-सुदूर गांव में बैठी हुई मेरी एक आदिवासी 104 साल की मां जब शौचालय बनाने का संकल्‍प करे, और संकल्‍प करे इतना ही नहीं, पूरे गांव वालों को शौचालय बनाने के लिए मजबूर करे, इतना ही नहीं, गांव में अब कोई भी व्‍यक्ति खुले में शौचालय नहीं जाएगा ये पक्‍का करवा ले, इससे बड़ी प्ररेणा क्‍या हो सकती है। मैं आज देशवासियों को कहता हूं, मैं मीडिया वालों से भी प्रार्थना करता हूं, कि मेरा ये भाषण नहीं दिखाओगे तो चलेगा, लेकिन मेरी ये मां कुवरबाई की बात जरूर देश को बताना। ये ही तो बातें हैं जो समाज की ताकत बनती हैं। और आज मुझे मां कुंवरबाई का स्‍वागत करने का सम्‍मान करने का अवसर मिला।

मुझे आज यहां के आदिवासी क्षेत्र के दो विकास खंडों के सेवाभावी नौजवान माताएं, बहनों और भाइयों का सम्‍मान करने का अवसर मिला। अम्‍बागढ़ चौकी और छुरिया इस दो ब्लॉक, सामाजिक जागरुकता से, ये जागरुक नागरिकों के अथक प्रयास से ये दो ब्लॉक open Defection free हो गए हैं। ये दो ब्लॉक खुले में शौचलाय जाना वहां बंद हो गया और हर किसी ने शौचालय बना लिया। स्वचछ्ता, ये छोटी बात नहीं है। हिंदुस्तान के कोने-कोने में जन-जन के मन-मन में शौचालय स्वभाव बनाना है, शौचालय, स्वच्छता, बीमारी से मुक्ति, स्वस्थ भारत, सशक्त भारत इस सपनों को पूरा करने के लिए अगर कोई पहली कोई महत्वपूर्ण पंक्ति, कदम है तो वो स्वच्छता है। आज मुझे उनका सम्मान करने का अवसर मिला है। अम्बागढ़ चौकी ब्लॉक के ग्रामीण लोगों को मैं विशेषकर बधाई देता हूं। कभी-कभी देश का प्रधानमंत्री भी टैक्स लगाने से डरता है, उसको चिंता रहती है कि अरे ये करुंगा तो क्या होगा। लेकिन अम्बागढ़ चौकी के नागरिकों को मैं सलाम करता हूं कि उन्होंने खुले में कोई शौच जाए दंड करने का प्रावधान किया है और दंड करते हैं। ये बहुत बड़ी हिम्मत की बात है। समाज के लिए निर्णय़ कडवा हो तो भी करने की ताकत इन अम्बागढ़ चौकी के मेरे आदिवासी भाइयों ने आज हमें सिखाया है। उन्होंने open Defection free, खुले में शौच जाने की सदियों पुरानी आदत से लोगों को मुक्ति दिलाई है और ये जब आप खुले में शौच जाने वाला बंद कराते हैं तो वो सबसे पहले माताओं-बहनों के सम्मान का काम होता है। आज मजबूरन उनको खुले में, जंगलों में शौच के लिए जाना पड़ता है। अगर हम हमारी माताओं-बहनों को इस मुसीबत से मुक्त करा दें तो देश की कोटि-कोटि माताओं-बहनों का आशीर्वाद ये भारत को एक महान शक्तिशाली देश बना देगा और उस काम को यहां के हमारे आदिवासी भाईयों-बहनों ने करके दिखाया है, 104 वर्ष की मां ने करके दिखाया है। इससे बड़ा सफलता का मार्ग क्या हो सकता है। मैं इन सभी को सार्वजनिक रूप से सर झुका करके नमन करता हूं, मैं उनका बहुत-बहुत वंदन करता हूं, उनका हृदय से अभिंनंदन करता हूं।

आज यहां एक योजना का और भी आरंभ हुआ, जन औषधि भंडार। गरीब व्यक्ति को, परिवार मेहनत करके गुजारा करता हो, सोचता हो 5 साल के बाद ये करेंगे, 10 साल के बाद ये करेंगे। कभी सोचता हो साईकिल लाएंगे, कभी सोचता हो बच्चों के लिए कोई अच्छे से कपड़े ले आएंगे लेकिन परिवार में अगर एक व्यक्ति को बीमारी आ जाए तो गरीब के लिए तो 10 साल का पूरा planning गड्ढे में चला जाता है, आर्थिक बोझ बन जाता है, कर्जदार बन जाता है। गरीब को सस्ती दवाई मिले, गरीब को दवाई के बिना मरने की नौबत न आए इसलिए पूरे देश में जन औषधि भंडारों को अभियान चलाया है। आज मैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और उनकी पूरी टीम को बधाई देता हूं कि आज जन औषधि भंडार खोलने का आज मेरे हाथों से, मुझे करने का उन्होंने अवसर दिया, मैं इसके लिए उनका बहुत आभारी हूं।
आज Rurban Mission इसको हम प्रारंभ कर रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं Smart City तो Smart Village क्यों नहीं, ये जो Rurban Mission है ना, वही Smart Village है। हमारे चौधरी साहब, हमारे मंत्री हैं उस विभाग के, वे अभी विस्तार से बता रहे थे। ये बात सही है कि हमारे शहरों की ओर जाना बहुत तेजी से बढ़ रहा है। लोग अपने बेटों को शहरों में भेज रहे हैं, बूढ़े मां-बाप गांव में रहते हैं, नौजवान शहरों में चले जा रहे हैं, उनको एक अच्छी जिंदगी जीनी है, एक quality of life, जहां अच्छी शिक्षा हो, अच्छी अस्पताल हो, बिजली आती हो, Internet चलता हो, कहीं शाम को परिवार से साथ पलभर घूमने-फिरने जाना हो तो अच्छी जगह हो, ये उसके मन में रहता है और इसलिए वो शहर की ओर चल पड़ता है लेकिन शहरों के हाल हम देख रहे हैं कि वहां पर झुग्गी-झोंपड़ियां बढ़ती चली जाती हैं। शहरों का विकास, पिछले कई वर्षों से लोग आते गए और शहर को बढ़ाते गए। शहर में बैठे हुए लोगों ने या राज्य सरकार चलाने वाले लोगों ने, ये लोग आएंगे तो कहां रहेंगे, उनको पानी कहां से पहुंचेगा, बिजली कहां से मिलेगी, उनका drainage का क्या होगा, उनको दैनिक जीवन क्रियाएं करनी हैं तो कहां करेंगे, कोई सोचता नहीं, लोग आते हैं। कभी एक लाख जनसंख्या होगी, थोड़े समय में डेढ़ लाख हो जाएगी, फिर दो लाख हो जाएगी, फिर तीन लाख हो जाएगी और व्यवस्था वैसी की वैसी रहेगी। पानी का टंका वही रहेगा जो पहले एक लाख लोगों के लिए था। अब पांच लाख लोगों को पानी कहां से पहुंचेगा और इसलिए पिछले कई वर्षों से पूर्वानुमान लगाकर के, विकास का नक्शा तैयार करके कि अगर शहर बढ़ेगा तो इस तरफ बढ़ाएंगे, मकान नए बनाने हैं तो इस तरफ बनाएंगे, Planning ऐसा करेंगे, ये सोचा नहीं गया। और सोचा गया है तो बहुत कम जगह पर सोचा गया और उसके कारण शहरों में जाना भी लोगों के लिए दुष्कर हो गया है। इसका उपाय क्या है, क्या लोगों को उनके नसीब पर छोड़ दिया जाए, झुग्गी-झोंपड़ी में जीने के लिए मजबूर किया जाए जी नहीं, इसका उपाय सोचना चाहिए और इस सरकार ने सोचा है और उसी में से ये Rurban Mission बना है। Rurban का सीधा-सीधा अर्थ है Rural-Urban दोनों को मिला दिया Rurban, ग्रामीण और शहरी दोनों को एक साथ मिला दिया वो है Rurban, जिसका मतलब है कि विकास ऐसा हो, जिसकी आत्मा गांव की हो और सुविधा शहर की हो, ऐसा गांव। अगर हम देखते हैं कुछ 5-7 गांवों के बीच में एकाध गांव होता है। जहां पर लोग कुछ खरीदी करने आते हैं, कुछ छोटी-मोटी चीज खरीदने आते हैं लेकिन वो गांव ही होता है। इस सरकार ने सोचा क्या देश में ऐसे जो गांव हैं, जिसके अगल-बगल में 5-7 गांव होते हैं और ये गांव धीरे-धीरे बढ़ रहा है क्या वो शहर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, अपने आप बढ़ रहा है, लोग धीरे-धीरे वहां आने लगे। पढ़ने के लिए आ गए, व्यापार करने के लिए आए, नौकरी करने के लिए आए हैं। पहले 10 हजार संख्या थी, देखते ही देखते 20 हजार संख्या हो गई, देखते ही देखते 25 हजार हो गई। क्या अभी से ऐसे जो अभी से तेज गति से बढ़ रहे हैं, ऐसे गांवों को केंद्रित करके, अगल-बगले के 5-7 गावों को जोड़कर के, 25,30,40 हजार की जनसंख्या की सुविधा के लिए एक Cluster Approach से ये Rurban Mission को लागू किया जा सकता है। पूरे देश में ऐसे 300 Rurban Center ख़ड़े करने की कामना से अभी काम प्रारंभ किया है। इस वर्ष 100 ऐसे Rurban Cluster खड़े करने की कल्पना है। जिसका विकास शहर बनने वाला है, वो ध्यान में रखा जाएगा लेकिन उसके अंदर का जो गांव है, दिल में जो गांव का भाव है, उसको जिंदा रखने के लिए पूरा प्रयास होगा। एक ऐसी रचना जो भारत के स्वभाव के साथ जुड़ती है, भारत की प्रकृति के साथ जुड़ती है।

दूसरी बात भारत के आर्थिक विकास को भी 5-50 बड़े शहरों के आधार पर नहीं चलाया जा सकता है। सवा सौ करोड़ का देश, कश्मीर से कन्याकुमारी, कच्छ से कामरोप, इतना विशाल देश, अगर लोगों को रोजगार देना है, आर्थिक प्रगति करनी है तो हमें विस्तार नीचे तक ले जाना पड़ेगा। ये Rurban जो कल्पना है, उसमें उसको Growth Center बनाने की कल्पना है। आर्थिक विकास की गतिविधि का केंद्र बिंदु बनाने की कल्पना है। छोटे-छोटे बाजार होंगे, कारोबार अगल-बगल के 5-10 गावों के लिए चलता होगा तो धीरे-धीरे वो Rurban बन जाएंगे। हमारे यहां जो Tribal belt है, उन Tribal belt में आदिवासी विस्तारों में अगर हम सोचकर के Growth Centre develop किए होते, एक-एक ब्लॉक में अगर Growth Centre develop किया होता तो हमारे आदिवासी क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए इतने साल जो बीत गए, नहीं बीतते और इसलिए सुविधाएं मिलें, शिक्षा मिले, आधुनिकता मिले, साथ-साथ आर्थिक गतिविधि भी मिले। इन सारी बातों को जोड़कर के ये Rurban की योजना बनाई है। आज छोटे गांव में डॉक्टर जाते नहीं हैं, छोटे गांव में शिक्षक नहीं जाता लेकिन अगर Rurban बना दिया तो लोग वहां जाएंगे और नजदीक में 5,10,15 किलोमीटर दूरी पर दवाई सेवाओं के लिए जाना है या शिक्षा के लिए जाना है तो आराम से जाएगा, आएगा और इसलिए अगल-बगल के भी अनेक गांवों की quality of life में बहुत बड़ा बदलाव आएगा।

इस vision के साथ आज छत्‍तीसगढ़ में चार ऐसे संकूल के लिए प्रारंभ हो रहा है। मैं छत्‍तीगढ़ सरकार को बधाई देता हूं कि एक महत्‍वपूर्ण काम की योजना वो भी आदिवासि‍यों के बीच बैठ करके देश के लिए प्रारंभ हो रही है, इसका लाभ हिंदुस्‍तान के हर कोने को मिलने वाला है। और देखते ही देखते शहरों पर दबाव कम होगा। गांवों से बाहर जाने वालों के लिए एक अच्‍छी जगह उपलब्‍ध हो जाएगी, नए शहरों का निर्माण हो जाएगा। ये नए शहर व्‍यवस्थित होगे, आयोजित होंगे, आर्थिक गतिविधि के साथ जुड़े हुए होंगे। इस कल्‍पना को ले करके ये Rurban का कार्यक्रम आज प्रारंभ कर रहे हैं। मुझे विश्‍वास है कि एक साथ देश में जब योजना चलेगी, करोड़ों-करोड़ों लोगों को इसका लाभ होने वाला है।

भाइयों, बहनों यहां बहुत बड़ी मात्रा में मेरे किसान भाई-बहन हैं। मैं दो दिन पहले एक किसी पत्रकार ने लिखा था, फीचर को मैं पढ़ रहा था, उसने लिखा कि कई वर्षों के बाद किसानों के लिए भरोसे पात्र विश्‍वास पैदा करने वाली योजना पहली बार आई हैं, जो किसानों में एक नया विश्‍वास पैदा करेंगी। ये योजना है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। हमारे देश में ज्‍यादातर खेती ईश्‍वर पर आधीन है। अगर वर्षा हो गई तो ठीक, वर्षा नहीं हुई तो सूखा, ज्‍यादा हो गई तो पानी में डूब गया। प्रकृति अगर रूठ जाए तो सबसे पहला नुकसान किसान को होता है। ऐसी स्थिति में किसान को सुरक्षा मिलना जरूरी है। एक नया विश्‍वास मिलना जरूरी है। और इस बात को ध्‍यान में रखते हुए पहली बार देश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ला रहे हैं, जो पहले की योजनाओं से बिल्‍कुल अलग है। पहले तो किसान premium लेने के लिए तैयार ही नहीं होता था। उसको लगता था इतने रुपये अगर में premium दूंगा तो फिर बीज कहां से लाऊंगा, खाद कहां से लाऊंगा, पानी खेती में कहां से पिलाऊंगा, पशु को चारा कहां से खिलाऊंगा, वो देता ही नहीं था और एक बार अगर दे दिया तो पता चलता था दो-दो साल तक बीमा का पैसा ही नहीं आता है, कभी पता चलता था आया तो बीमा तो 30 हजार का लिया था लेकिन 6 हजार रुपया ही मिला। और बीमा तो उसको मिला जिसको बैंक का लोन मिला था, तो सीधे बैंक वाले को चला गया, किसान के पास तो कुछ आता ही नहीं था। ये जितनी बीमारियां थीं, सारी बीमारियों को हमने खत्‍म कर दिया। एक नई ताकत वाली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लाए जिसमें अब उसको प्रीमियम भी ज्‍यादा नहीं देना पड़ेगा। डेढ़ पर्सेंट, दो पर्सेंट पड़ा वो। वरना पहले तो कुछ इलाकों में 52-52 प्रतिशत प्रीमियम गया है। 8, 10, 14, 15 प्रतिशत तो Routine चलता था। हमने पक्‍का कर दिया कि दो पर्सेंट से ज्‍यादा नहीं, डेढ़ पर्सेंट से ज्‍यादा नहीं। ये पक्‍का कर दिया और इसलिए अब किसान को ज्‍यादा देना नहीं पड़ेगा।

दूसरा फसल खेत में से तैयार हो गई। अच्‍छी बारिश हुई, अच्‍छी फसल हो गई, और फसल काट करके खेत में ढेर पड़ा हुआ है। ट्रैक्‍टर मिल जाए ले जाने के लिए इंतजार हो रहा है। इतने में अचानक बारिश आ गई, तो उस बेचारे को एक पैसा नहीं मिलता था। बारिश आने तो उसका तो बरबाद हो गया, ढेर किसी काम का नहीं ऐसा ही ढेर देखने का। इस सरकार ने निर्णय किया कि फसल काटने के बाद खेत में अगर ढेर करके पड़ा है, और 14 दिन के भीतर-भीतर अगर कोई आपत्ति आ गई और नुकसान हो गया, तो उसको भी फसल बीमा मिलेगा।
ये बहुत बड़ा निर्णय किया है। पहले बहुत बड़े इलाके में तय होता था कि यहां वर्षा हुई तो इसका हिसाब लगाया जाता था। इसके कारण क्‍या होता था, पांच गांव में अच्‍छी बारिश हुई हो, दस गांव बेचारे सूखे में पड़े हों, उनको मिलता नहीं था। हमने कह दिया, कि छोटी इकाई को भी अगर उसका नुकसान हुआ है, तो उसको भी भरपाई हो जाएगा, उसको फसल का बीमा मिल जाएगा। इतना ही नहीं, दो-दो साल तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। उसको technology के माध्‍यम से तत्‍काल पैसे मिल जाएं इसका प्रबंध किया जा रहा है। कभी-कभार किसान तय करता है कि जून महीने में बारिश आने वाली है, सब ready रखता है, लेकिन जब तक बारिश नहीं आती, वो बोवनी नहीं कर पाता है, जून महीना चला जाए वो बेचारा बारिश की इंतजार कर रहा है, जुलाई महीना चला जाए वो इंतजार कर रहा है, अगस्‍त महीना चला जाए वो इंतजार कर रहा है, बारिश आई नहीं। तो ऐसा किसान क्‍या करेगा? जिसको बेचारे को बारिश आई ही नहीं, बोवनी का ही मौका नहीं मिला। तो सरकार ने कहा है, इस फसल बीमा योजना के तहत अगर वो फसल बो भी नहीं पाया और उसका नुकसान हो गया, तो भी उसको 25 प्रतिशत उसका साल भर पेट भरने के लिए तुरंत पैसा दे दिया जाएगा।

भाइयो, बहनों हिंदुस्‍तान के इतिहास में किसानों के लिए इतना बड़ा सुरक्षा कवच अगर किसी ने दिया है तो पहली बार दिल्‍ली में आपने हमें बिठाया और हमने आपकी सेवा में रखा है। भाइयो, बहनों ये सरकार गरीबों के लिए है। ये सरकार दलितों के लिए है। ये सरकार आदिवासियों के लिए है। ये सरकार पीडि़तों के लिए है। ये सरकार वंचितों के लिए है। समाज में आखिरी छोर पर जो बैठे हैं, उनके कल्‍याण के लिए एक संकल्‍प करके ये सरकार आई है, और इसलिए चाहे घर बनाने की योजना हो, चाहे जन औषधि भंडार करना हो, चाहे Rurban mission हो, चाहे फसल बीमा योजना हो, चाहे स्‍वच्‍छता का अभियान हो, चाहे खुले में शौच बंद कराने का प्रयास हो, ये सारी बातें सिर्फ और सिर्फ गरीब के लिए हैं। गरीब की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए हैं।

भाइयों, बहनों ये ही बातें हैं जो आने वाले दिनों में परिणाम लाने वाली हैं। और मेरा तो विश्‍वास जब 104 साल की मां कुंवरबाई आर्शीवाद दें तो मेरा विश्‍वास लाखों गुना बढ़ जाता है, लाखों गुना बढ़ जाता है। ये ही रास्‍ता है, इसी रास्‍ते से देश का कल्‍याण होने वाला है, और उस रास्‍ते पर हम चल पड़े हैं। फिर एक बार मैं आपका बहुत-बहुत आभार व्‍यक्‍त करता हूं, आप सबको नमन करता हूं, आप सबको धन्‍यवाद करता हूं। भारत माता की जय।
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