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Thursday, 14 April 2016

e-NAM launch a turning point for agriculture sector: PM Modi

मैं देश के किसानों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं, बधाई देता हूं कि इस प्रयास से किसानों की अर्थव्यवस्था में कितना बड़ा परिवर्तन आने वाला है। आज डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर की 125वीं जयंती है और मैंने करीब 1 महीने पहले सार्वजनिक रूप से कहा था कि ई NAM का प्रारंभ हम डॉ. बाबा साहेब की जयंती पर करेंगे और मुझे खुशी है कि आज समय सीमा में काम प्रारंभ हो रहा है। राधामोहन सिंह जी कह रहे थे इसको हम औऱ जल्दी भी कर सकते हैं लेकिन ये काम राज्यों के सहयोग के साथ जुड़ा हुआ है। अभी भी देश के कुछ राज्य ऐसे हैं कि जहां मंडी का कोई क़ानून ही नहीं है।

अब किसानों के लिए सुनते तो बहुत हैं लेकिन ऐसे भी राज्य हैं आज भी इस देश में जहां किसानों के लिए मंडी के लिए कोई नीति निर्धारण कानून नहीं है। उन राज्यों में किसानों का exploitation कितना हो सकता है, इसका आप अंदाज कर सकते हैं। मैं नाम नहीं देना चाहता हूं राज्यों का क्योंकि आजकल ऐसे विषय 24 घंटे विवादों में फंस जाते हैं तो मैं उससे बचना चाहता हूं लेकिन ऐसे सभी राज्यों से मेरा आग्रह होगा कि वे अपने यहां किसान मंडी कानून बनाएं। उसी प्रकार से जिन राज्यों में कानून है। उसमें भी अब नई Technology आई है, काफी व्यवस्थाएं पलटी हैं तो उसके अनुरूप कानून में सुधार करना आवश्यक है। मैं आशा करता हूं कि वे राज्य भी अपने-अपने यहां जो existing कानून हैं उसमें भारत सरकार ने जो सुझाव दिए हैं उसके अनुसार अगर amendment कर देंगे तो उन राज्यों में भी ई NAM का लाभ किसान को प्राप्त होगा और इसलिए मैं इन सभी राज्यों से आग्रह करता हूं कि इसको प्राथमिकता दें।

वैसे मुझे लगता है कि शायद आग्रह मुझे अब नहीं करना पड़ेगा क्योंकि जैसे ही ये 21 मंडियों की खबर आना शुरू हो जाएगा तो नीचे से ही pressure इतना पैदा होगा कि हर राज्य को लगेगा कि भई मेरा किसान तो रह गया चलो मैं भी इसमें आ जाऊं ताकि मेरे राज्य के किसान को लाभ मिले। हमारे देश में वर्षों से किसी न किसी कारण से कुछ नियम न रहें। एक राज्य में जो कृषि उत्पादन होता था वो दूसरे राज्य में ले नहीं जा सकते थे, ये भी बंधन रहते थे। कभी कानूनी तौर पर रहते थे, कभी गैर कानूनी तौर पर रहते थे क्योंकि लगता था कि भई अगर ये चला गया तो राज्य की economy को क्या होगा, राज्य की आवश्यकताओं का क्या होगा तो ये चलता रहता था और उसके कारण मैं नहीं मानता हूं, मैं इसको कोई बहुत बड़ा गुनाह के रूप में नहीं देखता हूं।

वहां की सरकारों को practical problem रहता था कि भई ये चीज मेरे यहां उत्पादन होती है। मेरे यहां से बाहर चली गई तो मेरे यहां तो लोगों को कुछ मिलेगा ही नहीं तो ये उसकी चिंता बड़ी स्वाभाविक थी लेकिन उसका परिणाम ये होता था कि किसान को protection नहीं मिलता था। किसान के लिए मजबूरी हो जाती थी कि अपने 12-15-20-25 किलोमीटर के area में जो market है, वो जो दाम तय करता था। उसको उसी दाम पर बेचना पड़ता था और उसी से अपनी रोजी-रोटी कमानी पड़ती थी। किसान की समस्या ये भी रहती थी कि उसको कोई choice नहीं रहता था। एक बार घर से बैलगाड़ी में माल लेकर गया मंडी में और मंडी वालों को लगा कि आज दाम गिरा दो। अब वो बेचारा सोचता है कि भई अब मैं वापस इसको कहां ले जाऊंगा, 25 किलोमीटर कहां उठाकर ले जाऊंगा तो वो मजबूरन उनके हाथ-पैर जोड़कर कहता था चलिए जी ले लीजिए, 5 रुपए कम दे दीजिए, ले लीजिए मैं कहाँ ले जाऊँगा । ये हाल किसान का हमारे यहां market में रहा।

ये योजना ऐसी है कि जिस योजना से किसान का तो भरपूर फायदा है लेकिन ये ऐसी योजना नहीं है जो सिर्फ किसान का फायदा करती है। ऐसी व्यवस्था है, जिस व्यवस्था की तरफ जो थोक व्यापारी है, उनकी भी सुविधा बढ़ने वाली है। इतना ही नहीं ये ऐसी योजना है, जिससे उपभोक्ता को भी उतना ही फायदा होने वाला है। यानि ऐसी market व्यवस्था बहुत rare होती है कि जिसमें उपभोक्ता को भी फायदा हो, consumer को भी फायदा हो, बिचौलिए जो बाजार व्यापार लेकर के बैठे हैं, माल लेते हैं और बेचते हैं, उनको भी फायदा हो और किसान को भी फायदा हो। होता क्या है आज दुर्भाग्य से हमारे देश में कृषि उत्पादन का real time data अभी भी नहीं होता है। कभी हमें लगे कि फलां राज्य में गेंहू की जरूरत है तो सरकार सोचती है अच्छा भई क्या करेंगे, इनको गेंहू की जरूरत है लेकिन उसे पता नहीं होता कि दूसरे राज्य में गेहूं surplus पड़े हैं।

कभी गेंहू surplus हैं और वहां पहुंचाने हैं लेकिन उस समय ट्रेन की व्यवस्था नहीं मिलती माल ले जाने के लिए और वहां consumer परेशान रहता है, यहां किसान परेशान होता है, माल बेचना है। ये क्यों... वो जो structure ऐसा बना हुआ था कि जिस structure में वो बंध गया था, उसके बाहर नहीं जा पाता था। आज ई NAM के कारण। अभी तो प्रारंभ में 25 कृषि उत्पादन चीजें इस ई NAM पर बिकेंगी, सौदा होगा और 21 मंडी में होगी लेकिन बहुत ही निकट भविष्य में शायद 250 तक तो पहुंच जाएगी क्योंकि कुछ राज्यों ने कानून में जो सुधार करना चाहिए, वो कर दिया है। Technology के लिए ये कोई बड़ा मुश्किल काम नहीं है। वहां एक लैब बनेगी, उस लैब के कारण quality of agro product ये तय होगा। अब व्यापारी हाथ में पकड़कर के तय करेगा, नहीं यार तेरा माल तो ठीक नहीं है और किसान कहेगा नहीं-नहीं साहब बहुत ठीक है पहले जैसा ही है और आखिरकार उस बेचारे को लगता था कि चलो बेच दो। आज laboratory कहेगी कि तुम्हारा जो product है A grade का है, B grade का है, C grade का है औऱ वो नेशनली certified मान्यता होगी उसको।

अगर मान लीजिए बंगाल से चावल खरीदना है और केरल को चावल की जरूरत है तो बंगाल का किसान online जाएगा और देखेगा कि केरल की कौन सी मंडी है जहां पर चावल इस quality का चाहिए, इतना दाम मिलने की संभावना है तो वो online ही कहेगा कि भई मेरे पास इतना माल है और मेरे पास ये certificate और मेरे ये माल ऐसा है, बताइए आपको चाहिए और अगर केरल के व्यापारी को लगेगा कि भई 6 लोगों में ये ठीक है तो उससे सौदा करेगा और अपना माल मंगवा देगा। कुछ व्यापारी क्या करेंगे बंगाल से माल खरीदेंगे, खरीदने वाला केरल से होगा लेकिन उसको बंगाल में market मिल जाए तो वहीं पर उसको बेच देगा। मेरा कहना का तात्पर्य ये है कि इतनी transparency होगी इस व्यवस्था के कारण कि जिसके कारण हमारा किसान ये तय कर पाएगा और माल, अपना product बैलगाड़ी में चढ़ाने से पहले या ट्रैक्टर में चढ़ाने से पहले तय कर पाएगा कि मेरे product का क्या होगा।

पहले तो क्या होता था सारी मेहनत करके 25 किलोमीटर दूर मंडी में गए उसके बाद तय होता था भविष्य क्या है। आज अपने घर में, अपने मोबइल फोन पर वो तय कर सकता है कि मैं कहां जाऊं, थोड़ा मैं मानता हूं हमारे देश का सामान्य से सामान्य व्यक्ति शायद वो साक्षर न हो लेकिन बुद्धिमान होता है। जैसे ही उसको पता चलेगा, वो monitor करेगा कि मंडी का trend क्या है, तीन दिन देखेगा बराबर और फिर trend के अनुसार तय करेगा कि हां अब लगता है कि market पक गया है तो तुरंत अंदर enter कर जाएगा और अपने माल बेचेगा। आज किसान निर्णायक होगा, किसान निर्णायक होगा। जो मंडी में बैठे हुए व्यापारी हैं, उन व्यापारियों के लिए भी ये सुविधाजनक होगा क्योंकि उसको लगता है कि भई जो जहां से पहले मैं खरीदता था तो वहां तो इस बार ये चावल पैदा ही नहीं हुई है तो सालभर क्या करूंगा, मैं तो चावल की व्यापारी हूं लेकिन अब उसको बैठे रहना नहीं पड़ेगा, वो हिंदुस्तान के किसी भी कोने से अपनी आवश्यकता के अनुसार चावल का ऑर्डर देकर के दूसरे व्यापारी से वो ले सकता है, दूसरे किसान से भी वो ले सकता है, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है।
Consumer भी देख सकता है कि किस मंडी में किस रूप से बाजार चल रहा है और इसलिए अपने यहां कोई locally ही exploit करने जाता है तो कहता है, झूठ बोल रहे हो मैंने देखा है ई NAM पर तुमने तो माल लिया है थोडा बहुत तो ले सकतो हो लेकिन इतना क्यों ले रहे हो। यानि उत्पादन का balance use इसके लिए भी ई NAM portal एक बहुत बड़ी सुविधा बनने वाला है और मैं मानता हूं किसान का जैसे स्वाभाव है। एक बार उसको विश्वास पड़ गया तो वो उस भरोसे पर आगे बढ़ने चालू कर जाएगा। बहुत तेज गति से ई NAM पर लोग आएंगे, transparency आएगी। इस market में आने के कारण भारत सरकार बड़ी आसानी से, राज्य सरकारें भी monitor कर सकती हैं कि कहां पर क्या उत्पादन है, कितना ज्यादा मात्रा में है। इससे ये भी पता चलेगा transportation system कैसी होनी चाहिए, godown का उपयोग कैसे होना चाहिए, इस godown में माल shift करना है या उस godown में, यानि हर चीज एक portal के माध्यम से हम वैज्ञानिक तरीके से कर सकते हैं और इसलिए मैं मानता हूं कि कृषि जगत का एक बहुत बड़ा आर्थिक दृष्टि से आज की घटना एक turning point है।

एक मोड़ पर ले जा रही है हमें, जो पहले से कभी हम इंतजार कर रहे थे या हमारे सामने संभावना नजर नहीं आ रही थी। एक सप्ताह के भीतर-भीतर ये भी पता चलेगा कि जब इतनी बड़ी मात्रा में बाजार खुल जाता है तो competition बहुत बड़ा जाती है। खरीदने वाला ज्यादा दाम देकर के अच्छी quality खऱीदने की कोशिश करेगा। बेचने वाला कम पैसे में किस जगह से माल मिलता है, वो खोजेगा तो दूर-सुदूर भी जिसको market नहीं मिलता था, उसके लिए market सामने से invitation भेजेगा कि भई देखो तुम वहां बैठे हो सिलीगुड़ी में लेकिन तुम्हारी चीज कोई लेता नहीं, मैं यहां बैठा हूं अहमदाबाद में, मैं लेने के लिए तैयार हूं। ये इतनी बड़ी संभावना, हम कल्पना कर सकते हैं कि हमारे किसान को पहली बार ये तय करने का अवसर मिला है कि मेरे माल कैसे बिकेगा, कहां बिकेगा, कब बिकेगा, किस दाम से बिकेगा, ये फैसला अब हिंदुस्तान में किसान खुद करेगा।

अब वो किसी से आश्रित नहीं रहेगा, वो मोहताज नहीं रहेगा और जब ये पता औरों को चलेगा इतनी बड़ी competition शुरू हो गई है तो स्वाभाविक है कि बाकी राज्य जो अभी पीछे हैं, मुझे विश्वास है कि नीचे से ऐसा pressure पैदा होगा कि अब वो जल्दी कानून में भी सुधार करेंगे और ई NAM portal पर सारी मंडियां आएंगी और ये मेरा पूरा विश्वास है। मेरा आग्रह है और मैं मानता हूं कि कृषि को टुकड़ों में नहीं देखना चाहिए और इसलिए हमने हमारे मंत्रालय का नाम भी, इसके साथ किसान कल्याण जोड़ा है। हम उसको जब तक holistic approach नहीं होगा, हम किसानों की स्थिति में सुधार नहीं ला सकते हैं और holistic approach लेना है तो मान लीजिए जैसे आज solar revolution हो रहा है। किसान को तो लगता होगा कि ये तो कोई industry का काम चल रहा है, कोई उद्योगकारों का काम चल रहा है। कोई तो उसको समझाए ये solar revolution भी तेरे लिए है भाई।


अगर उसको पानी के लिए solar pump मिल गया, वो अपने ही खेत में solar panel लगा दिया तो उसको जो आज डीजल का खर्चा करना पड़ता है, नहीं करना पड़ेगा। आज solar revolution हो रहा है। जो बड़ा किसान हैं वो उच्च technology का उपयोग करता हैं। cutter लाते हैं, बाकी चीजें लाते हैं, वो बिजली से चलती हैं। जिस दिन उसको पता चलेगा, अब ये सारे जो साधन हैं, वो भी solar से चलने वाले आ गए हैं, उसका खर्चा कम हो जाएगा और साधन उसका सूर्य प्रकाश से चलने लग जाएगा। यानि जो technology का development हो रहा है। उसके साथ हमारे किसान की उपयोगी चीजों को कैसे जोड़ा जाए। अगर हमें ज्यादा उत्पादन करना है तो flood irrigation का जमाना चला गया है और अब ये विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि flood irrigation से कोई अच्छी खेती होती नहीं लेकिन किसान का स्वभाव है कि जब-जब खेत, जब तक खेत पानी से लबालब भरा न हो, सारे पौधे डूबे हुए नजर न आए तो उसको लगता है, पौधा भूखा मर रहा है, वो खुद बेचारा परेशान हो जाता है क्योंकि उसकी भावना जुड़ी हुई है, वो अपने आप को रात को सो नहीं सकता है कि यार जितना पानी चाहिए था, उतना नहीं है, वो परेशान हो जाता है लेकिन अगर उसको विज्ञान का पता हो per drop, more crop.

हमारे उत्पादनों को पानी में डुबोए रखने की जरूरत नहीं है। हम सालों से मानकर के आए कि गन्ने की खेती करनी हो तो भरपूर पानी चाहिए। अब धीरे-धीरे अनुभव आ गया कि sprinkler से गन्ने की खेती बहुत अच्छी हो सकती है और sprinkler से गन्ने की खेती करें तो सामान्य गन्ने में जो sugar contain होता है, उससे sprinkler या drip से किए हुए गन्ने में sugar contain ज्यादा होता है, उसमें से ज्यादा चीनी निकलती है तो किसान को दाम भी ज्यादा मिलता है और आपने देखा होगा flood irrigation से गन्ने का जो डंडा होता है उसकी size और sprinkler से हुआ उसकी size देखते ही पता चलता है कि कितना बड़ा फर्क आया है। अब किसान को समझना होगा और मैं मानता हूं कि ये बात उन तक पहुंचाई जा सकती है और इसलिए मेरा मिशन है per drop, more crop एक-एक बूंद पानी से हम समृद्धि पैदा कर सकते हैं, हम भविष्य पैदा कर सकते हैं।

कभी-कभी मैं किसानों के साथ बैठना का स्वभाव रखता था तो काफी बातें करता था, जब गुजरात में था। मैं उनको कहता था और मैं आज उसको दुबारा कहना चाहूंगा, मैं उनको कहता था, मान लीजिए आपका बच्चा बीमार है और 3 साल की आय़ु हो गई, 5 साल की आयु हो गई, 7 साल की आय़ु हो गई लेकिन न वजन बढ़ रहा है, न चेहरे पर मुस्कान आ रही है, ऐसे ही दुबला-पतला, ऐसे ही पड़ा रहता है। अब आप सोचिए कि आपके बच्चे का ये हाल है और आप सोचें कि एक बाल्टी भर दूध लेंगे, उसमें केसर, बादाम, पिस्ता सब डालेंगे और रोज बच्चे को इस दूध से नहलाएंगे, उसकी तबीयत पर कोई फर्क पड़ेगा क्या, पड़ेगा क्या, मेरे किसान भाई पड़ेगा क्या लेकिन एक चम्मच में थोड़ा-थोड़ा दूध लेकर के 100 ग्राम, 100 ग्राम उसको शाम तक पिला दो, फर्क पड़ेगा कि नहीं पड़ेगा। जो बच्चा का है, वो ही पौधे का है। जो स्वभाव बच्चे का है, वो ही स्वभाव पौधे का है।

पौधे को भी अगर पानी से नहला दोगे तो पौधा मजबूत होगा, ऐसा नहीं है। एक-एक चम्मच से एक-एक बूंद पानी पिलाओगे तो आप देखते ही देखते देखोगे कि पौधा कितना ताकतवर बन जाता है और इसलिए हमने... बातें छोटी होती हैं लेकिन उनकी ताकत बड़ी होती है। हमने देखा है कि हमारे किसान का सबसे बड़ा नुकसान किससे हो रहा है। वो जो देखता है उसमें विश्वास करता है, जो सुनता है उस पर किसान कभी विश्वास नहीं करता। एक प्रकार से अच्छी चीज भी है। वो जब तक खुद अपनी आंखों से नहीं देखता है, भरोसा नहीं करता है लेकिन उसके कारण उसका misguide ऐसा हो जाता है कि अगर वाले खेत में किसी किसान ने लाल डिब्बे वाली दवा डाली तो वो भी सोचता है कि लाल डिब्बे वाली होती है तो वो भी जाकर के लाल डिब्बे वाली ले आता है। अगर उसने देखा बगल वाला दो बोरी fertilizer डालता है तो वो भी दो बोरी डाल देता है और उसको तो ज्यादा वो रंग से ही जानता है लाल डिब्बे वाली दवा, काले डिब्बे वाली दवा, लंबे डिब्बे वाली दवा या छोटे डिब्बे वाली उसी से वो उसका कारोबार चलता है जी, उसना अपना ये विज्ञान develop किया है।

ये गलती क्यों होती है। उसे पता नहीं है कि वो जिस जमीन पर काम कर रहा है, उसकी प्रकृति कैसी है। ये धरा हमारी मां है, ये भूमि हमारी मां है, कहीं बीमार तो नहीं हो गई है, हमने ज्यादा तो इसका शोषण नहीं किया है, उसका भी कोई ख्याल रखा है कि नहीं रखा है, ज्यादा अनुभव आता है कि हम धरा के साथ क्या करते हैं, फसल के संदर्भ में धरा के साथ जो करना होता है, करते हैं। धरा की तबीयत, चिंतन करनी चाहिए, इस भूमि की चिंता करनी चाहिए, इस पर हमारा ध्यान नहीं होता है और अगर बीमार धरा हो, कितना ही अच्छा बीज बोएं, इच्छित परिणाम नहीं मिलता है और इसलिए हमारे कृषि जगत को बदलना है तो हमारी धरा की तबीयत और उसके लिए अब सरल उपाय है Soil health card, laboratory में धऱा की test करवानी चाहिए और उसमें जो guidelines दें, उस प्रकार का पालन करना चाहिए। वरना कुछ लोग होते हैं कि डॉक्टर के पास जाएं, तबीयत दिखाएं। डॉक्टर कहे डायबीटीज है लेकिन घर में आकर के बताते ही नहीं हैं कि डायबीटीज है क्योंकि मिठाई खाने का शौक होता है तो फिर वो laboratory काम नहीं आती है।
अगर laboratory ने कहा कि डायबीटीज है तो फिर मिठाई छोड़नी पड़ती है। उसी प्रकार से धरा को check करने के बाद पता चला कि ये बीमारियां हैं, उस फसल के लिए आपकी धरा ठीक नहीं है, वो fertilizer आपकी धरा के लिए ठीक नहीं है, वो दवाई आपकी धरा को बर्बाद कर देगी तो मेरा किसानों से प्रार्थना होगी कि उसमें जो सुझाव देते हैं, उन सुझाव को religiously follow करना चाहिए। देखिए विज्ञान की बड़ी ताकत होती है, विज्ञान की बड़ी ताकत होती है। इन चीजों को अगर हमने ढंग से कर लिया तो आप देखना... कभी-कभार मैंने देखा है, हमारे पंजाब, हरियाणा में, इधर पश्चिम उत्तर प्रदेश में वो पुरानी पद्धति फसल निकालने के बाद बाद में जो रह जाता है उसको मुझे हिंदी शब्द तो मालूम नहीं है, उसको जला देते हैं। अब हमें मालूम नहीं है ये मूल्यवान fertilizer है, उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके उसी जमीन में दबा दीजिए, वो आपकी जमीन के लिए, वो खुराक बन जाएगा लेकिन जल्दबाजी होती है, दुबारा फसल के लिए काम करना है, कौन करेगा इसलिए डालते नहीं हैं।

मैं समझता हूं जिस चीज के लिए जो नियम हैं, प्रकृति ने बनाए हैं, उसका अगर हम थोड़ा सा पालन करें तो पर्यावरण का जो नुकसान हो रहा है और दिल्ली वाले चिल्लाते हैं कि धुँआ बहुत हो गया है, वो बंद भी हो जाएगा और मेरे किसान को ये फायदा  होगा। मुझे स्मरण है जो केले की खेती करते हैं। केला पकने के बाद, वो केले का जो पेड़ रह जाता है, उसको निकालने के लिए वो पैसे देते हैं लोगों को कि भाई उसको जरा आप साफ करके दे दो और पहले ये एक-एक एकड़ पर 15-20 हजार रुपए खेत खाली करने पर ये उनका खर्च होता था। बाद में उनके ध्यान में आय़ा कि ये तो most valuable है और आपको हैरानी होगी केला पकने के बाद वो जो खड़ा रह गया, बाकी बचा हुआ पुर्जा है, उसको आप कहीं गाड़ दें और वहां पर कोई पौधा लगा दें 90 दिन तक पानी की जरूरत नहीं पड़ती, उसी से पानी मिल जाता है, इतनी ताकत होती है उसमें। जब ये पता चला तो उन्होंने फिर से उसे फिर जमीन में गाड़ दिया और उनकी जमीन इतनी गीली होने लगी कि बीच में वो एक extra फसल करने लगे जो 60-70 दिन में पैदा होने वाली होगी, उस फसल का उपयोग करने लगे, उनकी income में पहले से डेढ़ गुना-ढ़ाई गुना तक फर्क होने लगा क्यों, उनको समझ आय़ा कि भई इसका उपयोग है।

हम अगर उन छोटे-छोटे प्रयाग हैं। हमारे किसान इसको समझ भी सकता है, उसको कैसे पहुंचाए, हम उसके उत्पादन की ओर बढ़ें। हमारे देश का एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य है किसी न किसी कारण से टोडर मल ने जमीनों को नापने का बहुत बड़ा काम किया था। उसके बाद उसके प्रति बड़ी उदासीनता रखी गई। सरकारों में नियम था कि 30 साल में एक बार जमीन नापने का काम regular होना चाहिए लेकिन शायद पिछले 100-150 साल में ये परंपरा dilute हो गई और उसके कारण exact पता नहीं है जमीन की स्थिति का। किसान conscious है कोई जमीन ले न जाए इसलिए वो क्या है बाड़ करता है। नाप का ठिकाना नहीं, कागज पर exact नाप नहीं है तो बाड़ लगाता है, वो बाड़ लगाने में एक मीटर जमीन इसकी खराब होती है, एक मीटर जमीन दूसरी वाली खराब होती है। हर खेत के border पर दो मीटर जमीन खराब होना यानि पूरे देश में देखें हम तो लाखों square meter जमीन इसी में बर्बाद होती होगी।
अगर हम उसका रास्ता निकालें। आज देश को टिम्बर import करना पड़ता है। अगर हम हमारे border पर बाड़ करने के बजाए टिम्बर के पेड़ लगा दें। बेटी पैदा हो, उस दिन अगर पेड़ लगाया तो शादी करने का पूरा खर्चा एक पेड़ दे देगा। वो पेड़, बेटी बड़ी होगी उसके साथ-साथ बड़ा होगा और जब वो टिम्बर बेचोगे। आज हिंदुस्तान फर्नीचर के लिए टिम्बर दुनिया से import करता है, मेरा किसान अपने border पर, बाड़ पर ये काम कर सकता है आराम से कमा सकता है। उसके कारण जो waste of land है, वो हमारा बचा जाएगा। solar हम खेती के साथ solar बिजली पैदा कर-करके बेच सकते हैं। मैंने ऐसे किसान देखें हैं जो अपनी cooperative society बना रहे हैं और पड़ोस के किसान मिलकर के कोने पर बिजली पैदा कर रहे हैं और राज्य सराकारों को बेच रहे हैं, ये सब संभव है। मैं हैरान हूं दुनिया भर में honey का बहुत बड़ा market है, बहुत बड़ा market है और honey एक ऐसी चीज है शहद, जो सालों तक घर में रहे, जितना पुराना हो तो ज्यादा पैसा मिलता है और किसान अगर अपने खेत में साथ-साथ शहद का भी काम करें तो जो मधुमक्खी है वो भी फसल को ताकत देती है, वो एक जगह से दूसरी जगह पर बैठती हैं तो फसल को नई ताकत देती हैं। simple चीजें हैं, जब मैं कहता हूं double income संभव है, मेरे दिमाग में बहुत साफ है क्या-क्या प्रयोग करने से income double हो सकती है।

चाहे Fisheries का काम हो, milk production का काम हो, पशु का रखरखाव हो, इन सारी चीजों में से income बढ़ सकती है और हम आधुनिक वैज्ञानिक तरीक से खेती करना शुरू करें तो हम देश की economy को भी बहुत बड़ा बल दे सकते हैं। मेरे देश के किसानों ने एक बार तय किया कि अब देश का पेट भरने के लिए बाहर से अन्न नहीं आएगा, हिंदुस्तान के किसानों ने कर दिया है। आज Pulses हमें बाहर से लाना पड़ता है दलहन, क्यों न हमारे किसानों को संदेश जाए कि जहां पर पानी बहुत कम है, वहां और प्रयोग मत करिए, आप दलहन पर चले जाइए ताकि आपकी भी गारंटी होगी और भारत सरकार उसमें आपकी मदद करेगी और भारत को अब दलहन बाहर से नहीं लाना चाहिए दाल क्यों बाहर से लानी पड़े, मूंग क्यों बाहर से लानी पड़े, चना क्यों बाहर से लाना पड़े, उड़द क्यों बाहर से लाना पड़े। हम ये अपने संकल्प कर लें तो मैं नहीं मानता हूं इस देश को... और अभी गया था सऊदी अरबिया, उसके पहले मैं गया था यूएई, वहां के लोगों ने जो बात कही, मैं समझता हूं कि मेरे देश के किसान इसको भलीभांति समझें, वो कह रहे हैं कि हमारे पास तो बारिश ही नहीं है, हमारे पास खेती योग्य जमीन नहीं है, हमारी जनसंख्या बढ़ रही है, पूरे गल्फ की countries में, हम भविष्य में हमारा पेट भरने के लिए अनाज पर भारत पर ही depend करेंगे, हमें वहीं से import करना पड़ेगा।

आज भी हमारा सबसे ज्याजा अच्छा चावल उन्हीं देशों में जाता है। इसका मतलब ये हुआ अगर हम quality product की तरफ जाएंगे तो गल्फ का एक बहुत बड़ा market, agriculture product के लिए हमारा इंतजार करके बैठा है। वे ware house के लिए cold storage के लिए तैयार है, वो गारंटी के साथ माल खऱीदने के लिए तैयार है यानि भारत की कृषि भी एक global requirement के संदर्भ में उसे हम एक नया मोड़ दे सकते हैं, हम उसमें बदलाव ला सकते हैं और उस बदलाव लाने की दिशा में हमें प्रयास करना चाहिए। अभी इस बजट में एक बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय किया, उस निर्णय की चर्चा बहुत कम आई है क्योंकि कुछ चीजें ऐसी हैं, जिसे लोगों को समझते-समझते दो साल चले जाते हैं इसलिए वो बात शायद पब्लिक में आई ही नहीं।

भारत सरकार ने एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय़ किया कि Agro processing में हम 100 percent foreign direct investment को हम स्वागत करते हैं। अब कुछ लोगों का दिमाग शायद ऐसा है कि FDI का नाम आते ही उनको लगता है ये कुछ उद्योग वाला हो गया।

ये food processing की सारी process किसान को बहुत बड़ी ताकत देती है। अगर वो कोई ऐसी पैदावार करता है और उसका  technology solution से valuable addition होता है तो income बहुत बढ़ जाती है और उसके लिए पूंजी निवेश के लिए दुनिया से पैसे आते हैं तो किसान की ताकत बढ़ने वाली है। आप कच्चे आम बेचो तो कम पैसा आता है, पके हुए बेचो तो थोड़ा ज्यादा आता है। कच्चे आम बेचो लेकिन आचार बनाकर बेचो और पैसा आता है। आचार भी बढ़िया सी बोतल में pack करके बेचो तो और ज्यादा पैसा आता है और बोतल की advertisement कोई नट या नटी करती हो तो औऱ ज्यादा पैसा मिल जाता है। value addition कैसे होता है, food processing का value addition कैसे होता है और इसलिए अभी हमने कोका कोला कंपनी के साथ महाराष्ट्र government का एक agreement करवाया। मैंने इन सारी कंपनियों कहा है कि आप जो पेप्सी, कोका कोला ये सब पानी बेचते हो colorful होता है, tasty होता है लोगों को आदत हो गई है अरबों-खरबों का बाजार है। मैंने कहा मेरे देश के किसानों के लिए आप एक नियम बनाइए कि कम से कम 5 percent, कम से कम 5 percent natural fruit juice आप इस aerated water में mix करोगे।

आप देखिए एक तो जो पीता है उसको फायदा होगा, कम से कम 5 percent तो माल अच्छा जाएगा शरीर में लेकिन उसके कारण किसान जो फल पैदा करता है, उसको तुरंत market मिल जाएगा,  वरना संतरा कोई पैदा करेगा, एकाध दिन में तो संतरा खराब हो जाएगा लेकिन संतरे का जूस अगर उसमें मिलना शुरू हुआ तो संतरे को market मिलना शुरू हो जाएगा, Apple को market मिल जाएगा, केले को market मिल जाएगा और इसलिए वो चीजें जो हमारे किसान को ताकत दें, ऐसे कई initiative लिए हैं और उस initiative के परिणाम मैं कहता हूं कि आने वाले दिनों में किसानों का भविष्य उज्जवल बनाया जा सकता है, सोची-समझी व्यवस्था के तहत बनाया जाता है और अब ये मंडी के माध्यम से, ई NAM के माध्यम से जो प्रयास किया है इस ई NAM के माध्यम से, मैं विश्वास से कहता हूं कि मेरा किसान अब तय करेगा कि उसका माल कहां बिकेगा, कब बिकेगा, कितने दाम से बिकेगा इसका फैसला अब मेरा किसान करेगा और consumer को कभी कोई बोझ नहीं होगा, ये मेरा भरोसा है। consumer को कभी कोई मुसीबत नहीं होगी, ये मेरा पूरा भरोसा है। मैं देश के किसानों को आज 14 अप्रैल बाबा साहेब अंबेडकर की जन्म जयंती पर जिनका empowerment of poor people वाला हमेशा रहा था, मेरा किसान empower हो इसलिए एक महत्वपूर्ण project आज प्रारंभ हो रहा है, मैं कृषि मंत्रालय को मंत्री के विभाग के सभी साथियों को हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं, मेरे देश के किसानों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। असम का आज नया वर्ष है, असम का नववर्ष है, उस बिहू के मौके पर भी मैं शुभकामनाएं देता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

Saturday, 2 April 2016

Reason for India's growth is the political stability in the country: PM Modi

मेरे प्‍यारे देशवासियो मैं दो दिन के लिए Saudi Arabia की visit के लिए आया हूं। आज भारत जिस प्रकार से आर्थिक प्रगति कर रहा है, विश्‍व का ध्‍यान आज भारत की तरफ है। सवा सौ करोड़ लोगों का देश दुनिया को बहुत कुछ दे सकता है और दुनिया के लिए बहुत कुछ कर सकता है। और पूरे विश्‍व में एक आशा जगी है कि लोकतांत्रिक मूल्‍यों के साथ सबका साथ सबका विकास इस मंत्र को ले करके भारत जो प्रयत्‍न कर रहा है उसमें मानवीय मूल्‍यों में विश्‍वास करने वाली पूरी दुनिया के लिए एक नया विश्‍वास, नई आशा अन्‍तर्निहित है बहुत कम समय में भारत ने विश्‍व में फिर से एक बार एक नई आशा को जन्‍म दिया है।

वरना इस समय तो हम भी अनेक देशों में से एक देश थे, आज भारत एक महत्‍वपूर्ण देश है, उस रूप में दुनिया भारत को स्‍वीकार करती है। और उसका कारण एक तो हिन्‍दुस्‍तान में political stability, करीब 30 साल के बाद एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी है। पूरा विश्‍व आज आर्थिक संकट से गुजर रहा है और दुनिया के IMF, World Bank और Credit rating agencies हर कोई ये कह रहा है कि भारत आर्थिक जगत का एक आशा भरी किरण के रूप में लोग देख रहे हैं। कुछ लोग उसे चमकता सितारे के रूप में भी देख रहे हैं। और ये सही स्थिति है कि भारत ने इन विपरीत परिस्थ्‍िातियों में भी विकास की स्थितियों को और मजबूत किया है।
भारत की तीसरी सबसे बड़ी ताकत है eight hundred million, 35 से कम आयु का youth, पूरे विश्‍व को एक ऐसे workforce की जरूरत होगी जो talented हो, आधुनिक technology से सज्ज हो, और भारत उस दिशा में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत का कृषि क्षेत्र हो, भारत का औद्योगिक क्षेत्र हो, भारत का सेवा क्षेत्र हो, तीनों में भारत इन दिनों बहुत मजबूती के साथ अपने कदम रख रहा है, आगे बढ़ रहा है।
 आप सबसे मुझे मिलने का अवसर मिला, मेरी आप सबको बहुत-बहुत शुभ कामनाएं हैं। धन्‍यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Saturday, 19 March 2016

Transformation in India will come through the villages & farmers: PM Modi at Krishi Unnati Mela


मेरे प्यारे किसना भाइयों और बहनों

यह किसान मेला भारत के भाग्‍य का मेला है, अगर भारत का भाग्‍य बदलना है, तो गांव से बदलने वाला है, किसान से बदलने वाला है और कृषि क्रांति से बदलने वाला है। हम लोग सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी से एक ही प्रकार से किसानी करते आए हैं। बहुत कम किसान हैं जो नया प्रयोग करते हैं या कुछ नया करने का साहस करते हैं। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती  यही है कि हम हमारी किसानी को आधुनिक कैसे बनाएं, टेक्‍नोलॉजी युक्‍त कैसे बनाएं, हमारी युवा पीढ़ी जो आधुनिक आविष्‍कार हो रहे हैं, उन आधुनिक आविष्कारों को खेत तक कैसे पहुंचाएं। किसान के घर तक कैसे पहुंचाएं। इस किसान मेले के माध्‍यम से एक प्रशिक्षण का प्रयास है। और मुझे खुशी है कि आज कृषि विभाग ने यह कार्यक्रम ऐसा बनाया है कि न सिर्फ यहां बैठे हुए लोग लेकिन पूरे हिंदुस्‍तान के हर गांव में किसान इस कार्यक्रम को देख रहे हैं।

और सिर्फ प्रधानमंत्री का भाषण सुनना है इसलिए देख रहे हैं ऐसा नहीं है। तीन दिन तक यहां जितनी चर्चाएं होने वाली हैं वो सारी चर्चाएं गांव में बैठा हुआ किसान भी उसको देख सकता है, सुन सकता है, समझ सकता है। क्‍योंकि जब तक हम इन बातों को किसान तक पहुंचाएंगे नहीं, किसान में विश्‍वास पैदा नहीं करेंगे तो वो अगल-बगल में जो देखता है वो ही करता रहता है। और किसान का स्‍वभाव है अगर पड़ोसी ने अपने खेत में लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाली तो यह भी जा करके लाल डिब्‍बे वाली दवाई लाकर डाल देगा। बगल वाले ने पीली दवाई डाल दी तो यह भी पीली दवाई डाल देगा। उसको ऐसा लगता है उसने किया तो मैं भी कर लूं। और जो बेचने वाले हैं उनको तो इसकी चिंता ही नहीं है कोई भी माल जाओ बेच दो, एक बार बिक्री हो जाए। बाद में कौन पूछने वाला है किसान का क्‍या हुआ।

और इसलिए कृषि क्षेत्र को एक अलग नजरिये से develop करने की दिशा में यह सरकार प्रयास कर रही है। हमारे देश में पहली कृषि क्रांति हुई वो पहली कृषि क्रांति अधिकतम जहां पानी था उस पानी के भरोसे हुई। लेकिन दूसरी कृषि क्रांति सिर्फ पानी के भरोसे करने से बात पूरी तरह संतोष नहीं देगी। और इसलिए दूसरी कृषि क्रांति विज्ञान के आधार पर, टेक्‍नोलॉजी के आधार पर, आधुनिक आविष्‍कारों के आधार पर करना आवश्‍यक हो गया है। पहली कृषि क्रांति हिंदुस्‍तान के पश्चिमी छोर पर, पश्चिमी उत्‍तर भाग में हुई। पंजाब, हरियाणा इसने नेतृत्‍व किया दूसरी कृषि क्रांति उन प्रदेशों में संभावनाएं पड़ी  है। जिस पर अगर हमने थोड़ा सा भी ध्‍यान दिया तो बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है और वो है पूर्वी उत्‍तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, नॉर्थ ईस्‍ट, ओडि़शा ये सारे हिंदुस्‍तान का पूर्वी इलाका, जहां पानी भरपूर है, जमीन की विपुलता है, जमीन ऊपजाऊ है, लेकिन वो पुराने ढर्रे से वो सब जुड़ा हुआ है और इसलिए इस सरकार का प्रयास है कि भारत के पूर्वी इलाके से एक दूसरी कृषि क्रांति कैसे हो, उस दिशा में हम कदम बढ़ा रहे हैं।

भारत की आर्थिक धारा भी गांव की धुरा से जुड़ी हुई है। अगर गांव में गांव के गरीब व्‍यक्ति के द्वारा अगर आज वो पांच हजार रुपया का माल बाजार से खरीदता है साल में और अगली बार दस हजार का खरीदता है, तो economy को वो ताकत  देता है। देश आगे बढ़ता है। और  यह अगर करना  है तो गांव के लोगों  की खरीद शक्ति बढ़ानी पड़ेगी, उनका purchasing power बढ़ाना पड़ेगा। और वो purchasing power तब तक नहीं बढता है जब तक कि गांव आर्थिक रूप से गतिशील न हो। गांव में आर्थिक गतिविधि का कारोबार न हो तो यह संभव नहीं है।

और इसलिए आपने इस बार देखा होगा चारों तरफ इस सरकार के बजट की तारीफ ही तारीफ हो रही है। कुछ लोग मौन हैं क्‍योंकि उनके लिए तारीफ करना मुश्किल है, लेकिन विरोध में बोलने के लिए कुछ है नहीं। पहली बार जिन जिन लोगों ने इस विषय के ज्ञाता है, उन्‍होंने लिखा है कि एक बड़े लम्‍बे अरसे के बाद एक ऐसा बजट आया है जो पूरी तरह गांव, गरीब और किसान को समर्पित किया गया है।और यह काम इसलिए किया है अगर भारत को आर्थिक संपन्न बनना है, आने वाले 25-30 साल तक लगातार आगे बढ़ना है, रूकना ही नहीं है, तो वो जगह सिर्फ गांव है, गरीब है, किसान है।

हमारा एक सपना है, लेकिन वो सपना मेरा होगा उससे बात बनेगी नहीं। वो सपना सिर्फ दिल्‍ली  सरकार का होगा तो बात बनेगी नहीं। चाहे केंद्र सरकार हो,  चाहे राज्‍य  सरकार हो,  चाहे हमारे किसान भाई-बहन हो, हम सबका मिला-जुला सपना होना चाहिए, हम सबकी जिम्‍मेदारी वाला सपना होना चाहिए। और  वो सपना है 2022 छह साल बाकी है, जब भारत की आजादी के 75 साल होंगे, क्‍या हम हमारे देश के किसानों की आय दोगुना कर सकते हैं क्‍या? किसानों की आय डबल कर सकते हैं क्‍या? अगर एक बार किसान, राज्‍य सरकार, केंद्र सरकार यह मिल करके तय कर लें तो काम मुश्किल नहीं है, मेरे भाईयों-बहनों। कुछ लोगों को लगता है कि यह मुश्किल काम है। मैं इस विभाग में जाना नहीं चाहता। लेकिन यह करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए इसमें कोई दुविधा नहीं हो सकती, कोशिश जरूर करनी चाहिए।

अब तक हमने देश को आगे बढाने में कृषि उत्‍पादन के growth को ही केंद्र में रखा है। हम कृषि उत्‍पादन के growth तक सीमित रह करके किसान का कल्‍याण नहीं कर सकते हैं। हमने किसान का कल्‍याण  करना है तो हमने और पचासों चीजें उसके साथ जोड़नी होगी, और तब जा करके 2022 का सपना हम पूरा कर सकते हैं। अब हम यह सोचे कि हमारी धरती माता बेचारी बोलती नहीं है, पीड़ा है तो रोती नहीं है, आप उस पर जितने जुल्‍म करो वो सहती रहती है। अगर हम धरती मां  की आवाज़ नहीं सुनेंगे, तो धरती मां भी हमारी आवाज़ नहीं सुनेगी। अगर हम धरती माता की पीड़ा महसूस नहीं करेंगे तो धरती मां भी हमारी पीड़ा कभी महसूस नहीं करेगी। और इसलिए हम सबका सबसे पहला दायित्‍व है कि हम हमारी धरती माता की पीड़ा को समझे। हमने कितने जुल्‍म किये हैं उस पर, न जाने कैसे कैसे कैमिकलों से उसको  नहला दिया। न जाने कैसी-कैसी दवाईंया पिलाई उसको, न जाने कितने-कितने जुल्‍म किये हैं उस पर अगर हम भी बीमार हो जाते हैं न तो अड़ोस-पड़ोस के लोग कहते हैं कि बेटा बहुत दवाइयां मत खाओं और ज्‍यादा बीमार हो जाओगे। डॉक्‍टर भी कहते है कि भई ठीक है बीमार हो दवा की जरूरत है लेकिन ऐसा नहीं कि एक गोली की बजाए 10 गोली खा जाओगे, ठीक  हो जाओगे। जो हमारे शरीर का हाल है, वो ही हाल यह हमारी धरती माता का भी है। और इसलिए हम कभी कम से कम देखे तो सही कि हमारी धरती माता की तबीयत कैसे है, कोई  बीमारी तो नहीं है? क्‍या कारण है कि हम फसल बोते हैं लेकिन जितनी मेहनत करते हैं उतना मिलता नहीं है, मां रूठी क्‍यों है।

और इसलिए आपकी मदद से एक बड़ा अभियान पूरा करना है वो Soil health card. हमारी जमीन की तबीयत कैसी है, उसकी परत  कैसी है, उसके अंदर ताकत कौन सी  है, उसके अंदर कमियां कौन सी है, उसके अंदर बीमारियां कौन सही है। यह हमने जांच करवानी चाहिए और यह regular करवानी चाहिए। यह कोई  महंगा काम नहीं है, सरकार आपकी मदद कर रही है। और जांच करवा ली, लेकिन हम उस रिपोर्ट को एक खाते में डालकर कागज पड़ा है, पड़ा रहे, फायदा नहीं होगा। अगर कोई  इंसान बीमार रहता है, laboratory में जाकर टेस्‍ट  करवाया और पता चला  कि diabetes है वो आ करके कागज घर  में रख दे और खाता है जैसे ही मिठाई मिले खाता रहे, जितना मिले उतना खाता रहे तो क्‍या diabetes उसको जाएगा क्‍या? बीमारी बढ़ेगी कि नहीं बढ़ेगी। मौत निश्चित हो जाएगी कि नहीं हो जाएगी।

और इसलिए soil health card के द्वारा हमें जमीन की जो कमियां नजर आई है। जमीन की जो ताकत ध्‍यान में आई है। जमीन की जो बीमारियां ध्‍यान  में आई  है, उसके अनुसार हमें खेती करनी चाहिए तो आपकी आधी समस्‍याएं तो वहीं सुलझ जाएगी। मैं दावे से कहता हूं मेरे किसान भाईयों-बहनों आपकी आधी समस्यायें, अगर जमीन की ठीक देखभाल कर दी, तो आपकी आधी समस्‍या वहीं सुलझ जाएगी। और एक बार धरती माता का ख्‍याल रखोगे न तो धरती माता तो आपका चार गुना ज्‍यादा ख्‍याल रखेगी। कभी आपको पीछे मुड़ करके देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 

दूसरी बात है पानी, किसान का स्‍वभाव है अगर उसको पानी मिल जाए तो वो मिट्टी में से सोना पैदा कर सकता है। उसे और कुछ नहीं चाहिए। और इसलिए हमने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना पर बल दिया है। किसानों को पानी कैसे पहुंचे? और कम से कम पानी बर्बाद हो, उस रूप में कैसे पड़े, इस पर काम चल रहा है। आपको हैरानी होगी मैं जरा हिसाब लगा रहा था कि हमारे किसान को पानी पहुंचाने की इतनी योजनाएं बनी  हाल क्‍या है। मेरे किसान भाईयों-बहनों आपको हैरानी होगी कि हम कुछ भी करते हैं तो हमारे विरोधी यह कहते हैं कि यह तो हमारे समय का है। यह तो हमारे जमाने का है। उनके जमाने का हाल क्‍या है मैं बताता हूं किसानों का मैंने करीब 90 प्रोजेक्‍ट ऐसे खोज कर निकालें कि जहां पानी तो भरा पड़ा लेकिन किसान को पानी पहुंचाने के लिए कोई व्‍यवस्‍था ही नहीं है। अब मुझे बताइये भइया अगर कहीं डैम भरा पड़ा है। हजारों, लाखों, करोड़ों रुपया खर्च कर दिया गया है, लेकिन अगर किसान के खेत तक पानी ले जाने का प्रबंध नहीं है वो सिर्फ दर्शन करने के सिवा किसी काम आएगा क्‍या? हमने 90 ऐसे प्रोजेक्‍ट हाथ में लिए है। और उस पर बड़ा जोर लगाया है कि वो पानी किसान तक पहुंचे। जितनी उसकी capacity है पानी कैसे पहुंचे, काम लगाया है। जब यह काम पूरा कर लेंगे करीब 80 लाख हेक्‍टेयर भूमि को पानी पहुंचना शुरू हो जाएगा भाईयों-बहनो। और पानी पहुंचेगा तो वो जमीन कितना कुछ देगी आप अंदाज कर सकते हैं।

20 हजार करोड़ रुपया, इस काम के लिए लगाने की दिशा में काम कर रहा हूं मैं। इतना ही नहीं मनरेगा, बड़ी चर्चा होती है,  लेकिन कहीं asset create नहीं होता है। इस सरकार ने बल दिया है। और मैं चाहूंगा इन गर्मी के दिनों में गांव-गांव मनरेगा से एक ही काम होना चाहिए, एक ही काम और सिर्फ तालाब है तो तालाब गहरे करना, मिट्टी निकालना, जहां पर  पानी रोक सकते हैं रोकना। इस बजट में पांच लाख तालाब बनाने का सपना है, पांच लाख  तालाब।

जहां हमारे छोटे-छोटे पर्वतीय इलाके होते हैं, पहाड़ी इलाके होते हैं, जहां तीन या चार पहाड़ इकट्ठे  होते हैं, वहां अगर थोड़ी सी खुदाई कर दें तो बहुत बड़े तालाब बनने की संभावना हो जाती है। मैंने forest department को भी कहा है जंगलों को बचाना है तो वहां छोटे-छोटे तालाब का काम किया जाए, ताकि पानी होगा तो हमारे जंगल भी बचेंगे। जंगल होंगे तो वर्षा बढ़ेगी, वर्षा बढेगी तो हमारी ज़मीन में पानी ऊपर आएगा। जो 12 महीने मेरे किसान को फायदा करेगा। हम गांव-गांव इस गर्मी के दिनों में पानी बचाने के साधन कैसे तैयार करें और जितना ज्‍यादा पानी बचाने का प्रयास करेंगे, पहली बारिश में यह सब भर जाएगा। और फिर कभी बारिश इधर-उधर हो गई तो भी वो पानी हमारी खेती को बचा लेगा। उसी प्रकार से जितना महात्‍मय जल संचय का है, उतना ही महात्‍मय जल सिंचन का है।

पानी यह परमात्‍मा ने दिया हुआ प्रसाद है। इसको बर्बाद करने का हमें कोई  अधिकार नहीं है। एक-एक बूंद पानी का उपयोग होना चाहिए। और इसलिए per drop more crop एक-एक बूंद से फसल कैसे ज्‍यादा पैदा हो, उस पर काम करना है। हम micro irrigation में जाए, हम drip irrigation में जाए छोटे-छोटे पम्‍प लगा करके पानी पहुंचाने के लिए प्रबंध करे। liquid fertilizer दें। आप देखिए मेहनत कम हो जाएगी। खर्चा कम हो जाएगा और उत्‍पादन बढ़ जाएगा। कुछ लोगों की गलतफहमी है कि sugar में भी बहुत पानी चाहिए, जमाना चला गया। अब तो micro irrigation से sugar भी हो सकता है, paddy भी हो सकता है।

और इसलिए जो हमारी पुरानी मान्‍यता है कि अगर पूरा लबालब पानी से खेत भरा होगा तभी फसल होगी, ऐसी जरूरत नहीं है। अब विज्ञान बदल गया, टेक्‍नोलॉजी बदल गई। आप आराम  से बदलाव करके कर सकते हैं। और इसलिए मेरे किसान भाईयों-बहनों, यह हमारी रोजमर्रा के काम है, इस पर अगर हम ध्‍यान देंगे। हम हमारे खर्च को कम कर पाएंगे। और हमारी आय को बढ़ा पांएगे। और उसी से किसान का कल्‍याण होने वाला है।
हमारे यहां फसल के लिए मार्केट, यह 14 अप्रैल को बाबा साहेब अम्‍बेडकर की जन्‍म जयंती पर भारत सरकार एक ई प्‍लेटफॉर्म शुरू कर रही है, ताकि किसान को अपना माल कहां बेचना, सबसे ज्‍यादा दाम कहां मिलते हैं वो अपने मोबाइल फोन पर देख सकता है कि मुझे मेरा माल किस मंडी में कैसे बेचना और उसके कारण उसको दाम ज्‍यादा मिले। आज किसान बेचारा अगर गाँव से निकला, दो बजे अगर मंडी में पहुंचा, मंडी वाले अगर चले गए वो अपना माल बेच नहीं पाता है अगर वो सब्‍जी वगैरह लाया है तो वहीं छोड़कर चला जाता है, क्‍योंकि कोई खरीददार नहीं होता है। अगर हम इस प्रकार की व्‍यवस्‍था का उपयोग करेंगे, और आज मैंने अभी एक किसान सुविधा लॉन्च किया है। किसान अपने मोबाइल फोन पर आज के आधुनिक विज्ञान डिजिटल के माध्‍यम से अपनी आवश्‍यकताओं की जानकारी वो पा सकता है। weather का रिपोर्ट ले सकता है,  मार्केट का रिपोर्ट ले सकता है। बाजार में कहां पर अच्‍छा  बीच मिल  सकता है ले सकता है। कृषि के कौन वैज्ञानिक है किसका संपर्क करना चाहिए, यह सारी जानकारियां आपकी हथेली में देने का प्रयास किया है।

अगर हम उसका प्रयोग करेंगे तो मेरे किसान को आज जो अकेलापन महसूस होता है, उसको लगता है कि मेरा कोई नहीं है। यह सरकार कंधे से कंधा मिला करके किसान के सुख-दुख का साथी है और हम आपके साथ मिल करके काम करना चाहते हैं, क्‍योंकि हमें बदलाव लाना है उस दिशा में हम काम करना चाहते हैं। उसी प्रकार से अब समय की मांग है कि हम मूल्‍य वृद्धि करे। value addition करे, processing करे। जितना ज्‍यादा food processing होगा, उतना ही ज्‍यादा हमारे किसान की आय बढ़ने वाली है। जितना ज्‍यादा value addition करेंगे, उतनी कमाई बढ़ने वाली है। अगर आप दूध बेचते हैं, कम पैसा मिलता है, लेकिन अगर दूध का मावां बना करके बेचते हैं, तो ज्‍यादा पैसा मिलता होगा। दूध  में से घी बना करके बेचते हैं ज्‍यादा पैसा मिलता है। अगर आप कच्‍चा आम बेचते हैं कम पैसा मिलता है, लेकिन अगर कच्‍चे आम का अचार बना करके बेचे तो ज्‍यादा पैसा मिलता है। आप हरी मिर्ची बेचे, कम पैसा मिलता है। लेकिन लाल हो करके पाऊडर बना करके पैकिंग करके बेचे तो ज्‍यादा पैसा मिलता है। हमारे किसान की आय बढ़ाने का यह एक उत्‍तम से उत्‍तम से मार्ग है कि हम food processing को बल दें और food processing के लिए भारत जैसे देश में दुनिया की बहुत बड़ी टेक्‍नोलॉजी की जरूरत है, ऐसा नहीं है, हमारे यहां आमतौर पर इन चीजों को करने का स्‍वभाव बना हुआ है। उसको बल देने की जरूरत है। और गांव मिल करके करेगा। तो बहुत बड़ी ऊंचाईयों पर चला जा सकता है गांव। और आज हमने देखा है कि ऐसी चीजों ने अपने जगह बना ली है।

आज दुनिया के अंदर.. मुझे अभी गल्‍फ कंट्रीज के अमीरात के क्राउन प्रिंस यहां आए थे UAE के । उन्‍होंने एक बड़ी महत्‍वपूर्ण बात बताई। उन्‍होंने कहा हमारा जो गल्‍फ कंट्रीज है प्रट्रोलियम के पैसे तो बहुत है हमारे पास, लेकिन हमारे पास पेट भरने के लिए खेती के लिए कोई संभावना नहीं है हमारी जमीन रेगिस्‍तान है। हमारी जनसंख्‍या बढ़ रही है। हमें आने वाले दिनों में जैसे-जैसे जनसंख्‍या बढ़ेगी, हमारा पेट भरने के लिए भारत से ही अन्‍न मंगवाना पड़ेगा। इसका मतलब यह हुआ कि हिंदुस्‍तान का किसान जो पैदा करेगा दुनिया के बाजार में जाने की संभावनाएं बढ़ रही है। एक बहुत बड़ा ग्‍लोबल मार्केट हमारा इंतजार कर रहा है हम अगर अपनी व्‍यवस्‍थाओं को उस स्‍टेंडर्ड की बना दें तो दुनिया हमारी चीजों को स्‍वीकार करने के लिए तैयार हो जाएगी।

इन दिनों holistic health care. हर किसी को लगता है आप भले तो जग भला। और इसलिए लोग organic खाना खाना पसंद करते हैं। कैमिकल से आया हुआ उनको खाना नहीं है। आम भी बिकता है तो पूछते हैं organic है। चावल भी लाए तो पूछते हैं organic है, गेंहू लाए तो पूछते हैं organic है। वो कहता है साहब पैसा डबल होगा, वो बोले डबल ले लो भाई दवाई खाने से ज्‍यादा अच्‍छा है कि महंगा चावल खा लूं, लेकिन दवाई खाने के लिए मुझे केमिकल वाला नहीं खाना। लोग सोच रहे हैं कि दवाई में जो पैसे जाते हैं उसके बजाय अगर वो पैसे organic चीजों को खाने में जाते हैं तो स्‍वास्‍थ्‍य भी अच्‍छा रहेगा और खर्चा भी कम होने लगेगा। लेकिन यह तब संभव होगा, जब हम organic farming की तरफ प्रयास करें। हम कोशिश करें।

आज मैं सिक्‍कम प्रदेश को बधाई देता हूं| पहाड़ों में 2003 से उन्‍होंने मेहनत चालू की, 2003 से और दस साल के भीतर-भीतर सिक्किम के पूरे प्रदेश को उन्‍होंने organic state बना दिया। आज वहां chemical fertilizer का नामो-निशान नहीं है। और उनका उत्‍पादन बड़ा है, दवाईयां डालनी नही पड़ती है। जमीन में सुधार आया, पहले जो जमीन जितना देती थी। वो जमीन आज दोगुना, तीनगुना देने लग गई है। और उनका बहुत बड़ा ग्‍लोबल मार्केर्टिंग हो रहा है। क्‍या हमारे देश में हम organic farming को बल दे सकते हैं? ये तरीके हैं जो हमने आधुनिक कृषि की तरफ जाना है।

मैं किसानों से एक और आग्रह करना चाहता हूं। हमारी किसानी को तीन हिस्‍सों में बांटना यह अनिवार्य हो गया है। आज हम हमारी किसानी एक ही खम्‍बे पर चलाते हैं और उसका कारण जिस समय आंधी आ जाए वो खम्‍बा हिल जाए, ओले गिर जाए वो खम्‍बा गिर जाए, बहुत बड़ी बारिश आ जाए, वो खम्‍बा गया तो पूरी साल बर्बाद हो जाती है, पूरा परिवार बर्बाद हो जाता है। लेकिन अगर तीन खम्‍बों पर हमारी किसानी खड़ी होगी तो आफत आएगी तो एक-आध खम्‍बा गिरेगा। दो खम्‍बे पर तो हमारी जिंदगी टिक पाएगी भाई।

और इसलिए तीन खम्‍बे कौन से हैं जिस पर हमें किसानी करनी चाहिए एक तिहाई हम जो regular खेती करते हो वो, जो भी करते हो, मक्‍का हो, धान हो, फल हो, फूल हो, सब्‍जी हो जो करते है वो करें। एक तिहाई ताकत जहां आपके खेत की सीमा पूरी होती है। जहां boundary पर आप बाढ़ लगाते हैं बड़ी-बड़ी, एक-एक, दो-दो मीटर जमीन बर्बाद करते हैं। इधर  वाला भी जमीन बर्बाद करता हैं, उधर वाला भी जमीन बर्बाद करता है, दोनों पड़ोसी बीच में जमीन बर्बाद करते हैं। क्‍या हम वहाँ पर टिम्‍बर की खेती कर सकते हैं क्‍या? ऐसे पेड़ उगाए जिससे फर्नीचर बनता है, मकान बनाने में काम आता है। ऐसे वृक्षों की खेती करे। ऐसे पेड़ लगाए। 15-20 साल में घर में बेटी शादी हो करने योग्‍य जाएगी, यह एक पेड़ काट दोगे, बेटी की शादी हो जाएगी। आज हिंदुस्‍तान बहुत बड़ी मात्रा में टिम्‍बर import करता है। विदेशों में पैसा जाता है हमारा। अगर हमारा किसान तय कर ले कि खेत के किनारे पर जो जमीन आज बर्बाद हो करके पड़ी है, सिर्फ demarcation के लिए पड़ोसी ले न जाए इसलिए बाढ़ लगा करके बैठे हैं दो-दो, तीन-तीन मीटर खराब हो रही है, जमीन। आप देखिए कितनी बड़ी income हो सकती है।
और तीसरा, तीसरा महत्‍वपूर्ण पहलू है animal husbandry. दूध के लिए कुछ करे, अण्‍डों के लिए पॉल्‍ट्री फार्म करे। मधुमक्‍खी का पालन करे, मधु का निर्माण करे, शहद का निर्माण करे। इसके लिए अलग ताकत नहीं लगती है। सहज रूप से साथ-साथ चलता है। और यह भी बहुत बड़ा ताकत देने वाला काम है।

और मैं चाहूंगा कि भारत जो कि दुनिया में सबसे ज्‍यादा दूध उत्‍पादन करता है, लेकिन यह दुर्भाग्‍य है कि प्रति पशु जितना दूध उत्‍पादन होना चाहिए वो अभी हमें पार करना बाकी है। और इसलिए हमारे पशु की दूध की productivity कैसे बढ़े, उस पर हमने बल देना है। पशु  को आहार मिले, उस आहार के लिए अलग से प्रबंध करना है। पशु को आरोग्‍य की सुविधाएं मिलें उस पर ध्‍यान केंद्रित करना है। हमारे पशु की नस्‍ल बदलें इसके लिए सरकार बड़ा मिशन ले करके काम कर रही है। ऐसे अनेक प्रयास है जिन-जिन प्रयासों के परिणामस्‍वरूप हम हमारे पशुधन की ताकत को बढ़ा सकते हैं। उससे हम अपनी आय बढ़ा सकते हैं।

आज शहद दुनिया में शहद का बहुत बड़ा मार्केट है। भारत का किसान शहद के उत्‍पादन में बहुत कम संख्‍या में है। और शहद ऐसा है कभी खराब नहीं होता। सालों तक घर में रहे, घर में भी काम आता है बेचने के भी काम आता है। दवाईयों में भी बिकता है और एक खेत के कोने में हमारे घर के ही कोई व्‍यक्ति उसको संभाले तो काम चल जाता है।

इन तीनों खम्‍बों पर अगर हम हमारी किसानी को आगे बढ़ांएगे, तो किसान को प्राकृतिक आपदा के कारण संकट आने के बावजूद भी बचने का रास्‍ता निकल आ सकता है, बर्बाद होने से बच सकता है। और इसके लिए सरकार की योजनाएं हैं। इस बार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना मेरे किसान भाईयों-बहनों के चरणों में मैंने रखी है। यह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना यह सिर्फ कागज़ी योजना नहीं है, यह किसान की जिंदगी से जुड़ा हुआ काम है। और मैंने बड़ी भक्ति के साथ मेरे किसानों की भक्ति करने के लिए यह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ले करके मैं आपके पास आया हूं। बड़ा विचार-विमर्श किया है मैंने किसानों से सलाह-मश्‍विरा किया है, अर्थशास्त्रियों से किया है, सरकारों से किया है, बीमा कंपनियों से किया है और तब जा करके योजना बनी  है।
हमारे देश में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने फसल बीमा योजना चालू की। बाद में दूसरी सरकार आई उसने उसमें थोड़ा इधर-उधर कर दिया। मुसीबत यह आई कि किसान का फसल बीमा में से विश्‍वास ही उठ गया। उसको लगता है कि पैसे ले तो जाते हैं लेकिन मुसीबत के समय आते ही नहीं है। किसान की शिकायत सच्‍ची है। मैंने उन सारी शिकायतों को ध्‍यान  में रख करके योजना बनाई है। और यह पहली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ऐसी है कि जिसमें प्रीमियम कम से कम है। और सुरक्षा ज्‍यादा से ज्‍यादा है। यह पहली बार ऐसा हुआ है।

अब तक हमारे देश में सौ किसान हो, तो 20 किसान से ज्‍यादा फसल बीमा कोई लेता ही नहीं है। और धीरे-धीरे वो भी कम हो रहे थे। कम से कम इतना तो तय करे कि एक-दो साल में गांव के आधे किसान फसल बीमा योजना ले लें। इतना हम कर सकते हैं क्‍या? अब टेक्‍नोलॉजी का उपयोग होने वाला कि प्राकृतिक आपदा आई तो क्‍या नुकसान हुआ, कहां नुकसान हुआ? तुरंत हिसाब लगाया जाएगा। और तुरंत पैसे मुहैया कराने की व्‍यवस्‍था यह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में है। अब दो-दो, तीन-तीन साल इंतजार करने की जरूरत नहीं।
और एक महत्‍वपूर्ण काम है, पहले ओले गिर गए, आंधी आ गई, नुकसान हो गया, उसका भी हिसाब रहता था। लेकिन फसल काटने के बाद खेत में अगर उसका ढेर पड़ा है, और अचानक आंधी आई, बारिश आई, ओले गिरे, बर्बाद हो गया तो सरकार कहती थी कि भई नहीं यह फसल बीमा में नहीं आता, क्‍यों? क्‍योंकि यह तो तुम्‍हारी कटाई हो गई है, तुम घर नहीं ले गए इसलिए खराब हुआ तुमको ले जाना था। इस सरकार ने एक ऐसी फसल बीमा योजना लाई है कि कटाई के बाद अगर 14 दिन तक खेत के अंदर अगर पड़ा है सामान और अगर बारिश आ गई तो उसका भी बीमा मिलेगा, यहां तक निर्णय किया गया है।

और एक निर्णय किया है कि मान लीजिए आपने सोचा कि जून महीने में बारिश आने वाली  है, सारा खेत तैयार करके रखा, बीज ला करके रखे, मेहनत करने के लिए जो भी करना पड़े सब करके रखा, लेकिन जून महीने में बारिश आई नहीं, जुलाई महीने में बारिश आई नहीं, अगस्‍त महीने में बारिश आई नहीं। अब आपका क्‍या होगा भई, जब बारिश ही नहीं आई, तो फसल खराब होने का सवाल ही नहीं होता है, क्‍यों, क्‍योंकि आपने बोया ही नहीं है। अब जब बोया ही नहीं है तो फसल हुई ही नहीं। फसल हुई नहीं तो फसल बर्बाद हुई नहीं और फिर बीमा वाले कह देते हैं अब तुम्‍हारी छुट्टी, कुछ नहीं मिलेगा। इस सरकार ने एक ऐसी योजना बनाई है कि अगर आपके इलाके में बारिश नहीं आई, आपका बोना संभव ही नहीं हुआ तो भी आपको 25 प्रतिशत पैसे मिल जाएंगे, ताकि आपका साल बर्बाद न हो जाए, यह काम हमने सोचा है।

भाईयों-बहनों किसान के लिए क्‍या किया जा सकता है इसकी एक-एक बारीक चीज पर हमने ध्‍यान दिया है। अगर हमारे यहां पहले कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए, तो 50 प्रतिशत अगर नुकसान होता था तब पैसे मिलते थे और वो भी एक पूरे इलाके में 50 प्रतिशत हिसाब बैठना चाहिए। हमने यह सब निकाल दिया और हमने कहा अगर 33 percent भी हुआ तो भी उसको मुआवजा दिया जाएगा। आजादी से अब तक सभी सरकारों में इस विषय की चर्चा हुई। हर किसानों ने इसकी मांग की, लेकिन किसी सरकार ने इसको किया नहीं था। हमने इसको कर दिया।

भाईयों-बहनों प्राकृतिक आपदा में किसान को मदद कैसे मिले? इसके सारे norms बदल दिये। सारी परंपराएं निकाल दी है। और किसान को विश्‍वास  दिलाया है और दूसरा यह भी किया है कि जनधन अकाउंट खोलो, मदद सीधी आपके खाते में जाएगी। कोई बिचौलिए के पैर आपको पकड़ने नहीं पड़ेंगे। हम सब जानते हैं यूरिया के लिए क्‍या-क्‍या होता था। रात-रात कतार में किसान खड़ा रहता था। कल यूरिया आने वाला है। और यूरिया की काला-बाजारी होती थी। कहीं-कहीं पर यूरिया लेने के लिए लोग किसान आते थे, लाठी चार्ज होता था। और मेरा तो अनुभव है मैं प्रधानमंत्री बन करके बैठा तो पहले तीन, चार, पांच महीने सारे मुख्‍यमंत्रियों की एक ही चिट्ठी आती थी कि हमारे प्रदेश में यूरिया कम है यूरिया भेजो, यूरिया भेजो, यूरिया भेजो। भारत सरकार यूरिया क्‍यों देती नहीं है। जो हमारे विरोधी लोग थे वो बयान देते थे अखबारों में भी छपता था कि मोदी सरकार यूरिया नहीं देती। पिछले दिनों यूरिया पर इतना काम किया, इतना काम किया कि गत वर्ष मुझे एक भी मुख्‍यमंत्री ने यूरिया की कमी है ऐसी  चिट्टी नहीं लिखी। पूरे देश में कहीं पर भी यूरिया को ले करके लाठी चार्ज नहीं हुआ है। कहीं पर किसान को मुसीबत झेलनी पड़ी।

और अब तो और कुछ किया है हमने यूरिया को नीम कोटिंग किया है। यह नीम कोटिंग क्‍या है? यह जो नीम के पेड़ होते हैं, उसकी जो फली होती है उसका तेल यूरिया पर लगाया गया है, उसके  कारण जमीन को ताकत मिलेगी। अगर आज आप दस किलो यूरिया उपयोग करते हैं, नीम कोटिंग है, तो छह किलो, सात किलो में चल जाएगा, तीन किलो, चार किलो का पैसा बच जाएगा। यह किसान की income में काम आएगा। किसान की income डबल कैसे होगी, ऐसे होगी। नीम कोटिंग का यूरिया। और इससे एक और फायदा है जहां-जहां नीम के पेड़ हैं वहां अगर लोग फली इकट्ठी करेंगे तो उस फली का बहुत बड़ा बाजार खड़ा हो जाएगा, क्‍योंकि यूरिया बनाने वालों को नीम कोटिंग के लिए चाहिए, क्‍योंकि भारत सरकार ने hundred percent यूरिया नीम कोटिंग का कर दिया है। इसका दूसरा परिणाम यह होगा पहले क्‍या होता था यूरिया सारा लिखा जाता था तो किसान के नाम पर। सरकार के दफ्तर में लिखा जाता था कि किसान को यूरिया की सब्सिडी में इतने हजार करोड़ गए। लेकिन क्‍या सचमुच में वो किसान के लिए जाते थे क्‍या? सब्सिडी जाती थी, यूरिया के लिए जाती थी, लेकिन यूरिया किसान तक नहीं पहुंचता था वो केमिकल के कारखाने में पहुंच जाता था। क्‍योंकि उसको सस्‍ता माल मिलता था, वो उस पर काम करता था और उसमें से वो चीजें बना करके बाजार में बेचता था और हजारों-लाखों रुपये की कमाई हो जाती थी। अब नीम कोटिंग के कारण एक ग्राम यूरिया भी किसी केमिकल फैक्‍ट्री को काम नहीं आएगा। चोरी गई, बेईमानी गई और किसान को जो चाहिए था वो किसान को पहुंच गया।

मेरे कहना का तात्‍पर्य यह है मेरे किसान भाईयों-बहनों कि अब हमें आधुनिक विज्ञान का उपयोग करते हुए कृषि के क्षेत्र में आगे बढ़ना है। हमने प्रयोग करने की हिम्‍मत दिखानी है। आज सब कुछ विज्ञान मौजूद है। आज जो सरकार ने initiative लिए हैं, वो आपके दरवाजें पर दस्‍तक दे रहे हैं। मैं खास करके युवा किसानों को निमंत्रण देता हूं आप आइये, मेरी बात पर गौर कीजिए, भारत सरकार की नई योजनाओं को ले करके आगे बढि़ए। और मैं विश्‍वास दिलाता हूं भारत का ग्रामीण जीवन, भारत के ग्रामीण गरीब का जीवन, भारत के किसान का जीवन हम बदल सकते हैं और उस काम के लिए मुझे आपका साथ और सहयोग चाहिए। मेरी आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं। राधामोहन जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं है। यह कृषि मेला के द्वारा आने वाले दिनों में सभी किसान उसका फायदा

उठाए। यही शुभकामनाओं के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Wednesday, 9 March 2016

PM Modi's reply on the Motion of Thanks on the President's Address in the Rajya Sabha

आदरणीय सभापति जी , आदरणीय सभी सांसद महोदय,

अभिभाषण पर विस्‍तार से चर्चा हुई। करीब 30 माननीय सदस्‍यों ने इस चर्चा में हिस्‍सा लेकर करके अपने अनुभव का अपने ज्ञान का, देश को लाभ पहुंचाया। श्री जगत प्रकाश नड्डा जी, श्री अरूण जेटली जी, श्री गुलाम नबी आजाद जी, डॉ. विजयलक्ष्‍मी जी, प्रमोद तिवारी जी, श्रीमती रजनी जी, श्रीमान देसाई, श्री शरद यादव जी, श्री गोपाल पटेल, सीताराम जी, डी राजा जी, के केशोराम जी, कई सारे नाम हैं, सभी महानुभावों ने सदन को, और देश को लाभान्वित किया है।

राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण में एक बात जो कही गई थी जिसका इतना सकारात्‍मक प्रभाव इतना तुरंत होगा ये बात हम सबको प्रसन्‍न करती है। राष्‍ट्रपति जी ने कहा था सदन चलना चाहिए, सदन में संवाद होना चाहिए और हम सभी सदस्‍यों ने राष्‍ट्रपति जी की बात को शिरोधार्य माना और सदन को सभी ने बहुत ही सुचारू रूप से सबने मिला करके चलाया और इसके लिए मैं विशेष रूप से विपक्ष के सभी बंधुओं का मैं आभार व्‍यक्‍त करना चाहूंगा कि उन्‍होंने इस काम को आगे बढ़ाया और राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण का ये जो असर है कि मैं समझता हूं कि अपने आप में गौरव देने वाला है। मैं राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्‍यवाद करने के लिए खड़ा हुआ हूं, लेकिन सदन के साथ-साथ सदन के माननीय सदस्‍यों से भी इस बात से आग्रह करना चाहूंगा। एक तो खुशी की बात है कि सदन में सभी सदस्‍य सक्रिय हैं। अपने-अपने विचारों के लिए आग्रही हैं, करीब 300 के करीब Amendments आए हैं और हर Amendments का अपना महत्‍व भी है। लेकिन मैं सबसे आग्रह करूंगा कि हम राष्‍ट्रपति जी के wisdom पर भरोसा करते हुए समय की सीमा में जितने विषय आ सकें आ सके, इसका मतलब यह नहीं कि वो महत्‍व के नहीं हैं और इसलिए राष्‍ट्रपति पद की गरिमा और उनके wisdom पर भरोसा करते हुए मैं सभी आदरणीय सदस्‍यों से प्रार्थना करूंगा कि वे अपने संशोधन को वापस करके राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण को सर्वसम्‍मति से धन्‍यवाद प्रस्‍ताव हम पारित करें जो कि अच्‍छी परंपरा जारी रहे। हम सबने देखा होगा कि कल रात के बारह बजे तक लोकसभा का सत्र चला।

दो दिन पूर्व यह सदन भी देर शाम तक बैठा था। आम तौर पर इतने घंटे काम करने के बाद थकान महसूस होती है, लेकिन मैं उल्‍टा अनुभव कर रहा था, जिन –जिन सदस्‍यों से मेरा मिलना हुआ बात करने का मौका मिला देर रात बैठने के बाद भी वे अत्‍यन्‍त प्रसन्‍न थे, अत्‍यंत संतुष्‍ट थे, अत्‍युन्‍त आनंदित थे क्‍योंकि एक लंबे अर्से के बाद अपने पास जो कुछ कहने की बातें थी, अपने क्षेत्र की बातें थी, समस्‍याएं थी उसको इस पवित्र Forum में वो जी भर के कह पाए।

ये अवसर उनको मिला है उनके चेहरे की जो प्रसन्‍नता है, ये सदन चलने के कारण संभव हुआ है| वरना पिछली बार सदन में जैसे Question hour मैं मानता हूं कि Question hour अपने आप में एक सदस्‍यों का अपनी संपत्ति है और राष्‍ट्र के महत्‍वपूर्ण Issues पर सरकार को कठघरे में खड़ा रखना, executives को अकाउंटेबल बनाना, उनके लिए सवालिया निशान खडा़ करना।

मंत्रियों को भी हर प्रकार से सजग रखने के लिए भी सबसे बड़ी ताकतवर जगह है तो वो Question hour है। लेकिन हमने देखा कि पिछली बार सदन न चलने के कारण स्‍टार Question 269 थे, लेकिन सात को अवसर मिला और करीब 42 घंटे हमारा इस हल्‍ला बोल के अन्‍दर आहुत हो गया। उसके पूर्व के सत्र में करीब 270 इन्‍हीं सदस्‍यों के द्वारा पूछे गये स्‍टार Question थे, सिर्फ छह चर्चा में आए। करीब-करीब हमारे 72 घंटे इस माहौल के अन्‍दर आहुत हो गये।

इस बार हमारे wisdom में हमारे अनुभव ने, हमारी जिम्‍मवारियों ने, हमें बचा लिया और मान्‍य सदस्‍यों के सवालों के जवाब देने के लिए मंत्रियों को देर रात तक तैयारियां करनी पड़ रही हैं। executives को हिसाब देने के लिए सजग रहना पड़ा रहा है और यही लोकतंत्र की ताकत है और इस ताकत को मैं समझता हूं कि हम जितना तवज्‍जो दें उतना कम है। एक बात जरूर है मृत्‍यु को एक वरदान है और मृत्‍यु को ऐसा वरदान है मृत्‍यु कभी बदनाम नहीं होता। कभी मृत्‍यु पर आरोप नहीं लगते। कोई मरे तो ये कैंसर से मरा है, आरोप कैंसर पर जाता है। कोई मरे तो ये अकस्‍मात मरा है तो अकस्‍मात पर आरोप जाता है मृत्‍यु पर नहीं जाता है। बड़ी आयु में मरे तो वे उम्र के कारण मरे हैं, मृत्‍यु को कभी दोष नहीं आता। मृत्‍यु कभी बदनाम नहीं होती।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि कांग्रेस को ऐसा वरदान है... वरदान इस अर्थ में है कि अगर हम कांग्रेस की आलोचना करें तो आपने मीडिया में देखा होगा कि विपक्ष पर हमला, विपक्ष पर आरोप, कभी ये नहीं आता है कि कांग्रेस पर हमला, कांग्रेस पर आरोप| हम अगर शरद जी के खिलाफ कुछ कहें, मायावती जी के खिलाफ कुछ कहें तो अखबार में आएगा, टीवी में आएगा कि बीएसपी पर हमला, जेडीयू पर हमला, शरद जी पर हमला, मायावती जी पर हमला लेकिन कांग्रेस एक ऐसी है जब भी हमला हो तो विपक्ष पर हमला। कभी कांग्रेस को बदनामी नहीं मिलती और ये अपने आप में बड़ा गजब का विज्ञान है। अब वो तो यही है हमारे सारे साथी सोचेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है।

यहां पर हमारे विपक्ष नेता ने चर्चा प्रारंभ की थी तब मैं यहां पर उपस्थित था। हमारे नड्डा जी ने Sea change कहा, तो हमारे गुलाम नबी जी ने थोड़ा माहौल हल्‍का करने का इरादा होगा उनका तो इरादा गलत नहीं होता। लेकिन चेन्‍नई का उदाहरण दे दिया। वो एक संकट था। मानवीय दृष्टि से वो दर्दनाक घटना थी उसको इस Sea change से जोड़ करके मजाक करने से उनकी पीड़ा में हम थोड़ा मैं समझता हूं कि अच्‍छा नहीं किया।

यहां एक विषय ये भी आया कि राजस्‍थान और हरियाणा में, जो उन्‍होंने चुनाव में कुछ नियम बनाएं हैं जिसको सुप्रीम कोर्ट ने मान्‍यता दी। लेकिन हमारी democracy में qualitative चेंज लाने का जो प्रयास है उसको कुछ राजनीतिक रंग लाने का प्रयास चल रहा है। मतभेद हो सकता है, लेकिन मैं चाहूंगा कि जो लोग इतने बड़ी प्रखरता के साथ कहते हैं जो अशिक्षित रहे उनका क्‍या।

मैं खास करके गुलाम नबी साहब से और उनके साथियों में आग्रह करूंगा कि जो पांच राज्‍यों में चुनाव होने वाले हैं कम से कम 30 % लोगों को अनपढ़ लेागों को टिकट दें, बिलकुल अनपढ़ तो वो जो कह रहे हैं तो उसमें उनका क्‍या commitment है पता तो चलेगा। अनपढ़ की इतनी चिंता है होनी भी चाहिए। लेकिन मैं एक अनुभव शेयर करता हूं। मैं गुजरात में जब था तो हर वर्ष, हर वर्ष जून महीने में 13, 14, 15 जून कन्‍या शिक्षा को ले करके बेटियों को पढ़ाने के लिए ग्रुजरात में एक कैम्‍पेन चलाता था, campaign चलाता था और गुजरात में मई जून में 40-45 तापमान रहता है। पूरी सरकार गांव जाती थी मैं खुद जाता था। तीन-तीन दिन में गांव में रहता था और बेटियों को पढ़ाओ इसके लिए campaign चलाता था। स्‍कूल 15 जून से शुरू होते थे तो उसके पहले एडमिशन्स के लिए लगते थे। वहां मैं मातृ सम्‍मेलन भी करता था। एक गांव में मैं गया । मैंने ऐसे ही पूछा कि आप बता ही दें कि आप में से अनपढ़ कितने हैं। तो कोई 40 साल 45 साल और 50 साल की महिलाओं ने हाथ ऊपर किया कि हम पढ़े लिखे नहीं हैं। लेकिन पांच छह महिलाएं ऐसी थी जिनकी उम्र 80-85 थी। मैंने पूछा आप पढ़े लिखे हैं, तो बोले ये हमारी बहु अनपढ़ है हम पढ़े लिखे हैं। कैसे तो बोले हम जो हैं गायकवाड स्‍टेट के नागरिक हैं, आजादी के पहले की बात है और गायकवाड स्‍टेट में ये नियम था कि अगर बेटी को नहीं पढ़ाते हैं तो एक रूपये दंड होता था और बोले इसके कारण हम पढ़े लिखे हैं। लेकिन बाद में स्‍वतंत्रता आई सरकारें बदल गईं तो बहू हमारी अनपढ़ है। तो ये जो अनपढ़ का कारण है वो आजादी के बाद जो हमारी कमियां रहीं है उससे और इसलिए हमने चिंता शिक्षा की करने की जरूरत है ताकि ये जो कठिनाई है उस कठिनाइयों से हम बाहर आ सकते हैं।

राष्‍ट्रपति जी ने कहा है कि पहले आकाशवाणी में आकाशवाणी रेडियो पर एक कार्यक्रम चलता था और गुजराती में जो शब्‍द था मुझे मालूम नहीं है कि हिन्‍दी में वो ही शब्‍द है क्‍या। बिसराते सुर यानी जो भूले बिरसे गीत हैं उनका कार्यक्रम आखिरी आखिरी तो अब कुछ लोगों का ये tenure पूरा हो रहा है तो स्‍वाभाविक है कि आखिर आखिर में कुछ कहें। तो ये भूले बिसरे सुर आखिर में सुनाई तो देने चाहिए।

सभापति जी, एक प्रकार से upper house है हमारे यहां कहा जाता है - महाजन ये न जतापन था। जहां महापुरूष चलते हैं लोग उसके पीछे चलते हैं। इस सदन में महाजन बैठे हैं। इस सदन से जो होगा जिस प्रकार से होगा उसका असर लोकसभा में होगा। उसका असर assembly होगा। कहीं कहीं कॉरपोरेशन सिटी में भी हो रहा है और इसलिए हम ऐसा कैसा करें ताकि नीचे तक वो माहौल बने जो लोकतंत्र को पुष्‍ट करे।

देश हमारे कई बिल पारित हो, इसका इंतजार कर रहा है। जीएसटी की चर्चा हो रही है बाकी बिल की चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं। बहुत बड़ी मात्रा में अब जो जनप्रतिनिधि चुन करके आए हैं उन्‍होंने तो इसको स्‍वीकार कर लिया है। लेकिन राज्‍यों के जो प्रतिनिधि हैं वहां। अब ये जगह ऐसी है जो अपर हाऊस हमारा, एक chamber of ideas है। यहां देश को मार्गदर्शन मिलेगा, दिशा मिलेगी और इसलिए दोनों सदनों के बीच तालमेल होना बहुत जरूरी है। दोनों सदन वस्‍तुत: उसी structure के भाग हैं और सहयोग एंव सामंजस्‍य की भावना की किसी भी कमी से कठिनाइयां बढ़ेगी और हमारे संविधान के उचित रूप से कार्य करने में बाधा खड़ी होगी। ये चिंता पं0 जवाहर लाल नेहरू जी ने जताई थी। मैं आशा करता हूं कि हम पंडित जी की इस चिंता को महत्‍व दें और हम कोशिश करें कि हमारे यहां यह जो सारे पेंडिंग बिल हैं, इस बार सदन चल रहा है। एक अच्‍छे माहौल में चल रहा है। तो हम चीजों को अगर पारित करें तो देश को गति देने में, ये महाजनों का ग्रो है, वरिष्‍ठ का गृह है। वो बहुत बढ़ा role play कर सकता है। इसलिए मैं आग्रहपूर्वक प्रार्थना करता हूं, सभी मान्‍य सदस्‍यों से जो लोकसभा में जो बिल पारित हुए हैं। उनको हो सके उतना जल्‍दी पारित करके हम देश को गति देने में भूमिका अदा करें।
इस सरकार में राष्‍ट्रपति के अभिभाषण में कुछ बातें आई हैं। ये तो सही है कि देश आजाद हुआ है, सरकारें बनी हैं। लंबे अरसे तक सत्‍ता भोगने का अवसर मिला है, सत्‍ता में रहने का अवसर मिला है। कुछ काम करने का अवसर मिला है और कुछ समय पहले से थोड़ा-थोड़ा बदलाव भी शुरू हुआ है, धीरे-धीरे। इस समय हम लोगों को मौका मिला है और ऐसा तो नहीं है कि कोई काम करना नहीं चाहता, हर कोई करना चाहता है। लेकिन कभी-कभार सवाल यह होता है कि हम इतना बड़ा देश है, इसकी आवश्‍यकताओं की पूर्ति हो, होती है, चलती है, इस प्रकार से करेंगे, तो हम बहुत पीछे चले जाएंगे। हमें incremental improvement से हटकर के एक quantum jump की ओर जाना बहुत जरूरी है और इसलिए शक्‍ति भी जरा ज्‍यादा लगानी पड़ती है और शक्‍ति जोड़नी भी पड़ती है। तो उसकी दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं।

हमने एक बल दिया है good governance पर, और जब मैं good governance की बात करता हूं, सुशासन की बात करता हूं तो उसकी पहली शर्त होती है transparency. हम यह भली-भांति जानते हैं कि इसके पूर्व, हमारे आने से पहले देश और दुनिया में, सही और गलत, इसका अपवाद हो सकता है। लेकिन यह माहौल बना हुआ था, विश्‍वास टूट चुका था। आशंका के दायरे में हम दबे हुए थे और सब ओर भ्रष्‍टाचार, भाई-भतीजावाद, इन चीजों ने हिन्‍दुस्‍तान के मन को झटक दिया था। दुनिया में भी इसके कारण भारत की छवि को गहरा नुकसान हुआ था। देश में विश्वास पैदा करने के लिए आवश्‍यक है और लोगों की जिम्‍मेवारी भी है कि transparency, policy driven government , individual के beam पर सरकारें नहीं चल सकती। सरकार नीतियों के आधार पर चलनी चाहिए, इस पर हमारा बल रहा है।

पिछले दिनों चाहे कोयले की चर्चा हो, स्‍पेक्‍ट्रम की चर्चा हो, न-जाने क्‍या-क्‍या बातें उठी, अब तो मामले सारे कोर्ट में भी पड़े हुए हैं। लेकिन हमने transparency पर बल दिया है। उसका परिणाम यह है – कोयला auction में हम गए 3.33 लाख करोड़, स्‍पेक्‍ट्रम में गए 1 लाख करोड़, हम एफएम रेडियो में गए। अभी-अभी चल रहा है। शायद आप लोगों को ज्ञान होगा 6 अन्‍य minerals का और अभी-अभी auction में जो 18 हजार करोड़ रुपया cross कर गया। ये एक कोशिश हमारी कि transparency और मैंने उसके लिए उदाहरण नहीं लिए।
अभी-अभी Forbes magazine, उसने एक बात कही है। हमने जो auction की परंपरा शुरू की है, उसके विषय में Forbes magazine कहता है – “India has just conducted its first auction of a Gold mine. This is exactly the right way to allocate the exploration and exploitation rise of such a natural resources. This is another one of those steps along the road to India coming the much wealthier country it should be”.
अब वो जो Gold mine कहते हैं, उनकी पश्‍चिम की दुनिया में इनके लिए, कोयला वगैरह सबको वो Gold mine के रूप में माना जाता है। उस अर्थ में वो Gold mine लिखा है। हमारे यहां कोई सोना की खदान ही नहीं दी गई है। Forbes magazine ने आगे एक जगह पर अच्‍छी बात कही है, हमने जो प्रयास किया है उस पर उन्‍होंने कहा है। एक ही वाक्‍य मैं अलग से पढ़ना चाहूंगा, This is the way this matter should be handled . मैं समझता हूं इसमें काफी कुछ आ जाता है।

दूसरा पहलू है good governance का accountability. हमें यह मानकर चले कि कुल मिलाकर के जो deterioration आया है उसमें हम खबरों की speed से चलते चले जा रहे हैं, पीछे की चीजें छूटती चली जा रही हैं। खबरें आती हैं जाती हैं, घटनाएं आती हैं जाती हैं, accountability का विषय छूट जाता है। हमने कोशिश की है कि accountability पर बल दिया जाए। मैं लगातार इन दिनों Infrastructure के review कर रहा हूं। इस सदन के सभी माननीय सदस्‍यों को आश्‍चर्य होगा 10-10, 20-20 साल से हमारे बड़े-बड़े प्रोजेक्‍ट लटके पड़े हुए हैं। या तो environment वालों ने रोक दिया होगा, कोर्ट-कचहरी ने रोक दिया होगा, या स्‍थानीय कोई body होगी छोटी, नगरपालिका वो रोककर के बैठ गई होगी। रुका हुआ है, क्‍यों रुका हुआ है, कोई देखता नहीं, पूछता नहीं, इसी कारण, कभी financial कारण भी रहे होंगे लेकिन 10-10, 20-20 साल से रुके हुए प्रोजेक्‍ट। मैंने पिछले दिनों करीब 300 प्रोजेक्‍ट का खुद review किया और उसकी worth है करीब 15 लाख करोड़ रुपया। मैं इस सदन को नम्रतापूर्वक कहता हूं कि वो सारे छोटे-छोटे संकटों में फंसे हुए, ये 15-15, 20 साल पुराने stalled projects आज चालू हो गए है, गति बढ़ रही है।

Good governance का तीसरा पहलू होता है – decentralization. इतना बड़ा देश हम centralized mechanism से नहीं चला सकते। जितनी बड़ी मात्रा में decentralize करेंगे और इसलिए सरकार ने नीतिगत रूप से decentralize करने की दिशा में नीतिगत कदम उठाए हैं जैसे environment. हम environment की हर permission को दिल्‍ली ले आए। एक दफ्तर में ले गए, एक व्‍यक्‍ति के पास ले गए और क्‍या परिणाम आया हम जानते हैं, क्‍या-क्‍या बातें सुनी गई, क्‍या-क्‍या बातें कही गई, किस पर क्‍या-क्‍या लगा सब मालूम हैं। हमने 10 regional offices को strengthen किया ताकि उनको वहां की समस्‍या की समझ है, वो जानते हैं इस चीजों को, उसको हमने किया। कुछ चीजें सरकार की, मैं तो हैरान हूं, एक गांव के बीच में से रेल जा रही है। इधर से पानी उस तरफ ले जाना है तो पाइपलाइन डालने में, पचासों permissions में वो अटकें पड़े हुए थे और बिना पानी को एक इलाका तरसता था। bridge बन गया है, दोनों तरफ road बनाना है, अटका पड़ा है। कभी दोनों तरफ road बन गए है, रेल वाले ऊपर bridge डालने के लिए permission नहीं दे रहे हैं, ऐसी छोटी-छोटी चीजें। हमने रेल, road, पाइपलाइन, बिजली transmission, इसके लिए केन्‍द्र के पास आना ही जरूरी नहीं है, सरकार ने व्‍यवस्‍था कर दी, वहीं पर हो जाएगा। इतना ही नहीं, हमने राज्‍यों के environment clearance के rights बढ़ा दिए, राज्‍यों को अधिकार ज्‍यादा दे दिए ताकि वो भी, हम जितने जिम्‍मेवार है, उतने भी राज्‍य के लोग जिम्‍मेवार है और वो कोई देश को बर्बाद करना नहीं चाहते।

अब जैसे sand. आज हमारे यहां नदी में बालू, housing constructions में से कितनी। हर नदी दिल्‍ली तक इंतजार करती है कि permission मिले। हमने इसको राज्‍य नहीं district level पर दे दिया, district authority उस पर निर्णय करेगा और वो तय करेगी। Online प्रक्रियाओं को लोग देख सकते हैं। पहले रेलवे के टेंडर की सारी प्रक्रिया यहां होती थी। आज हमने उसको zonal general manager के under में डाल दिया, टेंडर प्रक्रिया वही से चल रही है, गति से चल रही है। पहले एक 300 करोड़-500 करोड़ के प्रोजेक्‍ट भी cabinet approval के लिए आते थे, इंतजार करना पड़ता था। हमने तय कर दिया कि वो ministry करेगी। एक हजार करोड़ से ऊपर होगा तभी cabinet में लाना है। decentralization के द्वारा इसको आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

Good governance की एक महत्‍वपूर्ण बात होती है effective delivery. अब जन-धन account की यहां चर्चा हो रही है। हमारे माननीय विपक्ष नेता जी ने भोपाल के अच्‍छे उदाहरण दिए। बहुत आभारी हूं मैं कि एक जो विपक्ष ने करना चाहिए वैसा सटीक काम उन्‍होंने किया है। भोपाल जिले में किस गांव में कौन ‘जन-धन’ account से रह गया है और उसका recording तक करके ले आए। होना यही चाहिए तभी executive accountable बनेगी और ये सदन के सदस्‍यों का यही काम होता है। यह मुद्दा मेरी सरकार, तेरी सरकार नहीं होता है और मैं मानता हूं कि एक सही दिशा का यह प्रयास है। उसमें तथ्‍य क्‍या है, वो तो कल अरुण जी ने कह दिया। मैं तथ्‍य पर चर्चा नहीं करूंगा, मैं इस प्रयास को अच्‍छा मानता हूं। क्‍योंकि कभी-कभार नीचे से, व्‍यवस्‍था से खबर आएगी और मान लेते हैं, लेकिन विपक्ष सजग रहा, देखा और कितनी मेहनत की है। सत्‍ता में इतनी मेहनत की होती तो ‘जन-धन’ account का काम मुझे करना ही नहीं पड़ता। बाल की खाल उधेड़ी। लेकिन फिर भी अच्‍छा किया। साहब आपने microscope लेकर के देखा। मोदी कह रहा है जन-धन होगा, देखो यार कहीं तो होगा कोई कोने में। बहुत microscope लेकर के निकले लेकिन साहब आप इतने साल microscope लेकर के नहीं, अगर binocular से भी देखकर के काम किया होता तो आज यह मेहनत करने का मेरे जिम्‍मे नहीं आता। आज microscope लेकर के घूम रहे हो, अच्‍छा होता जब सत्‍ता में थे binocular से भी देखकर के काम को निपटाने का प्रयास किया होता। मेरे कहने का तात्‍पर्य यही है कि हम effective delivery पर बल दें वरना कभी जो last mile delivery, हमारे यहां जो लोग सरकार में रहे उनको मालूम है। हमें उसमें जितना ही हम पुरुषार्थ करे, हमें करना चाहिए।

हमारे सीताराम जी ने एक विषय छोड़ा था। उन्‍होंने कहा था कि ये targeted subsidy के नाम पर आप subsidy कम कर रहे हैं। वैसे वो उनके nature का विषय नहीं है लेकिन क्‍यों बोल दिए मुझे समझ में नहीं आता है। लेकिन हो सकता है politics में कुछ चीजें करनी भी पड़ती हैं। मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं चंडीगढ़ शहर का। चंडीगढ़ शहर में ज्‍यादातर घरों में बिजली है, ज्‍यादातर घरों में गैस कनेक्‍शन है। उसके बावजूद भी चंडीगढ़ में 30 लाख लीटर केरोसिन जाता था। जबकि उनका कोई उपयोग उनको नहीं था। कुछ परिवार थे जिनके पास गैस नहीं था, शायद उनको उपयोग होगा। 30 लाख लीटर केरोसिन। हमने सोचा कि भई जरा हम JAM योजना को लागू करे। सर्वे किया, आधार का उपयोग किया, गैस कनेक्‍शन का डाटा इकट्ठा किया। कुछ परिवार रह गए हैं जिनके पास गैस कनेक्‍शन नहीं है। हमने एक अभियान चलाया है। आने वाले कुछ दिनों में शायद पूरा हो जाएगा। लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि 30 लाख लीटर केरोसिन जो कि जाता था और धन्‍ना सेठों के द्वारा बाजार में चला जाता था, पूंजीपतियों के पास चला जाता था। ये पूंजीपति लोग उसका black marketing करते थे, डीजल में mix करते थे, environment को बर्बाद करते थे, ये targeted subsidy का परिणाम यह है कि यह जो धन्‍ना सेठ या पूंजीपति लोगों के हाथ में 30 लाख लीटर केरोसिन जाता था बहुत तो बंद हो गया, बाकी भी अब बंद हो जाएगा और इसके कारण देश की करोड़ों रुपयों की subsidy बचेगी।

तीसरा, देश को import करने में भी राहत मिल जाएगी। कहने का हमारा तात्‍पर्य यह है कि हम जब technology के माध्‍यम से इस काम को जो हम कर रहे हैं, इस काम के संबंध में subsidy सही व्‍यक्‍ति को मिले, नियम में जितनी मिलनी चाहिए उतनी मिले, समय पर मिले, उस दिशा में हमारा एक प्रयास है। यह रुपए बचाने का खेल नहीं है। एक व्‍यवस्‍था में transparency लाना नहीं, leakages बंद करने की, दलालों को निकालने का एक उत्‍तम प्रकार का प्रयास है। उसमें भी कुछ कमियां है तो ठीक करनी है और आप लोगों का उसमें सहयोग मिलेगा, कहीं से कोई जानकार मिलेगी तो ठीक करने में सुविधा बढ़ेगी। तो मैं आश्वस्त कर देता हूं सबको कि ऐसी कोई बात ध्‍यान में आए तो जरूर सरकार के ध्‍यान में लाइए ताकि हम इसको कर पाए।

एक विषय है, माननीय हमारे गुलाब नबी साहब ने विषय निकाला – skill development का। आपने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने इसको शुरू किया था, वगैरह-वगैरह। वैसे हमारे देश में skill परंपरागत है लेकिन हर सरकार ने किसी न किसी रूप में प्रयास किया है। अब बात कहा जाकर के अटकती है। अब जैसे मान लीजिए आज हम गंगा सफाई करते हैं तो स्‍वाभाविक से आपसे आवाज उठेगी, ये तो हमने शुरू किया था। सही बात है। श्रीमान राजीव गांधी जी ने उस पर बल दिया, शुरू किया।

अब सवाल यह उठता है कि शुरू किया, उसका credit लेने के उत्‍साह में यह भी तो जवाब देना पड़ेगा कि 30 साल के बाद भी गंदी क्‍यों हैं, अगर शुरू किया था तो 30 साल के बाद गंगा गंदी क्‍यों हैं, क्‍या कमी रह गई? और इसलिए हर बार, ये तो हमारे समय हुआ था, ये उत्‍साह का अपना एक महत्‍व है। श्रेय लेने का प्रयास करने में कुछ बुरा है, ऐसा नहीं है, ये तो आपको मन करेगा। देखिए दुनिया में दो तरह के व्‍यक्‍ति होते हैं - एक वो जो कार्य करते है और दूसरे वे जो उसका श्रेय लेते है। आप इनमें से पहली तरह का व्‍यक्‍ति बनने का प्रयास करें क्‍योंकि इसमें competition बहुत कम है। यह बात श्रीमती इंदिरा जी ने कही थी। अब skill development. देखिए साहब 2008 में, मैं मानता हूं skill development पिछली सरकार में जो चला। उसमें एक skill की mastery आ गई और mastery थी कमेटियां बनाने और कमेटियां बिखरने की। उसमें mastery आ गई, skill development वो हुआ।

2008 में PM’s national council, National skill Development Coordination Board, National Skill Development Corporation फिर 2009 में National Policy on Skill Development, कमेटियां पर कमेटियां, कमेटियां पर कमेटियां और मीटिंगे नहीं होती थी। एक कमेटी की तो मीटिंग शायद ढाई-तीन साल के बाद अचानक एक कर ली गई थी लेकिन वो भी इसलिए कर ली गई थी कि अगली मीटिंग कब करेंगे। आखिरकार, इतनी सारी कमेटियों के बाद 2013 में यह तय कर दिया कि National Skill Development Agency बनाई जाए और बाकी सब दुकानें बंद कर दी जाए। साहब ये skill development का हाल था। Skill Development के विषय में आप अज्ञान नहीं थे, आपको ज्ञान था कि एक जरूरी है, देश में इतनी बड़ी संख्‍या में नौजवान है करना चाहिए। लेकिन कभी-कभार तो महाभारत याद आता है ज्ञानम न धर्मम नचे बिन प्रभुति। ज्ञान तो बहुत था लेकिन करना प्रवृत्‍ति नहीं थी। अब कौन-क्‍या ये मैं ज्‍यादा चर्चा नहीं करता।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल में 2014 में हमने skill development एक अलग ministry बनाई। skill development scheme के लिए common norms तय किए। skill initiatives, consistent quality हासिल करने पर बल दिया गया। NSDC के तहत हमने डेढ़ साल में ढाई गुना उसमें बढ़ोतरी की। Industrial training institutions (ITI) हमने डेढ़ साल के भीतर-भीतर 20% उसमें इजाफा किया। पिछले दो वर्ष में क्षमता 15 लाख 23 हजार सीटों से बढ़कर के 18 lakh 65 thousand कर दी गई, 20% हमने बढ़ोतरी की। 1 लाख 70 हजार प्रतिवर्ष जो तय होते थे उसमें हमने 53 thousand और जोड़ दिए। 10th और 12th उसमें vocational education करीब बारह सौ तेरह सौ स्‍कूल में चलता था। आज हमने उसको एकदम से quantum jump लगाकर के तीन हजार पहुंचा दिया। डेढ़ लाख अतिरिक्‍त छात्रों का लाभ उसके लिए हुआ। International mobility , एक बात मानकर के चलें कि 2030 वो समय आएगा, जब दुनिया की नज़र हिन्‍दुस्‍तान के workforce पर रहने वाली है।
हमने अभी से global standard का workforce तैयार करने की दिशा में हमें काम करना चाहिए। International mobility पर हमें बल देना चाहिए और उसके लिए ऑस्‍ट्रेलिया और UK के जो standards है उसको match होते हुए, कामों को हमने शुरू किया है और भी requirements के अनुसार उस standard को लेने की दिशा में हम काम करना चाहते हैं।

Apprenticeship, किसी न किसी कारण से हमने apprenticeship को एक ऐसी अवस्‍था बना दी कि सब उद्योगकार, व्‍यापारी दरवाजे बंद करके बैठ गए, किसी को घुसने ही नहीं देते और किसी को भी नौकरी चाहिए तो लोग पूछते है experience है क्‍या? Experience लेने जाता है तो दरवाजा बंद है। जब तक हम apprenticeship को बल नहीं देते, हमारे नौजवानों को experience नहीं मिलेगा। experience नहीं मिलेगा तो उनके लिए job opportunity नहीं होगी और उसको ध्‍यान में रखते हुए हमने apprenticeship के trainee जो पहले 3 लाख 12 हजार थे। सवा साल के भीतर-भीतर 2 लाख 70 हजार और उसमें जोड़ दिए, हमने वो व्‍यवस्‍था की है।

पहले हमारे यहां target होता था - कितने बच्‍चों को तैयार किया। उसी को पूरा करने की दिशा में प्रयास था। हमने market में requirement क्‍या है, किस प्रकार के syllabus की जरूरत है, किस प्रकार की training की जरूरत है, उसका सर्वे किया और according to that हमने skill develop किया ताकि job के साथ उसको connect किया जाए और उसको उसका काम मिल जाए और उस दिशा में हमने प्रयास किया है। अब मैं देख रहा हूं कि पिछले दिनों हमारे देश में manufacturing को बल तो देना ही होगा। हम सब जानते हैं कि कोई भी सरकार हो, भाषण के लिए हम कुछ भी कहे लेकिन देना पड़ेगा। इसके कारण हमने FDI पर बल दिया, FDI में बढ़ोतरी हुई, 48% करीब। हमने 2015 में electronic manufacturing में छह गुना बढ़ोतरी हुई है। 2015 में software export सबसे ज्‍यादा हुआ है। हमारे major Ports 2015 में सबसे ज्‍यादा handling हुआ है। 2015 में सबसे ज्‍यादा कार उत्‍पादन हुआ है। 50 नई मोबाइल कंपनियां manufacturing के लिए आई है। यह सारी बातें skill और रोजगार के साथ जुड़ने वाली है और skill और रोजगार की दिशा में ये काम करने वाले हमारे प्रयास है और उसका परिणाम यह होगा कि हमारे देश में रोजगार की संभावनाएं बढेंगी।

Ease of doing business में 12 rank हम quantum jump लगाया है। हम ऊपर गए है। World Economic Forum में Global competitive index में हम 16 स्‍थान ऊपर गए है। Moodys ने जो up gradation दिया हमारे लिए, positive दिया है, जो global environment में भारत की साख को बढ़ाता है, भारत की ताकत की पहचान कराता है। Employment की चर्चा skill development में हो, manufacturing sector में बढ़ावा हो, एक रोजगार के लिए मानदंड के रूप में एक institute को हमने मान्‍यता मिली हुई। Monster Employment Index, ये online recruitment के आधार पर analysis करता है। January 2016 में index 229 था। यह index 2014 में सिर्फ 150 था और आज आप देख सकते हैं 150 से बढ़कर के 229 index को हम प्राप्‍त कर गए है। हमने रोजगारी को बढ़ावा देने के लिए जो micro and small industry है उसको हमने Tax के अंदर सुविधाएं दी हैं। Start Up को बल दिया है। तीन साल के लिए टैक्‍स में हमने रियायत दी है ताकि नौजवानों को Start Up के लिए मौका मिले। मुद्रा बैंक के द्वारा करोड़ों-करोड़ों लोगों को हमने धन दिया है, जो पुराने थे उन्होंने expansion किया है। expansion के कारण उसको एक-दो लोगों को और रोजगार देने का उसको अवसर मिला है और इसमें भी ज्‍यादा SC, ST और women हैं | मुद्रा के लाभार्थी सबसे ज्‍यादा SC, ST, OBC and women है। नए उद्योग जो लगेंगे ही, उसके लिए हमने टैक्‍स को 25% पर रख दिया है और कोई benefit अगर लेना चाहता नहीं है तो ये benefit मिलेगा।

एक महत्‍वपूर्ण निर्णय इस बजट में आपने सुना होगा। हम जो पूंजीपतियों की चर्चा करते हैं। जो लोग first UPA में सरकार का समर्थन करते थे और वो जो पूंजीपतियों का विरोध कर करके गाड़ी चलाते रहते हैं। आप देखिए हमारे देश में बड़े-बड़े मॉल हो, वो तो सात दिन चल सकते हैं, लेकिन गांव के अंदर एक छोटा दुकानदार हो, वो सात दिन खुली नहीं रख सकता है। हमने बजट में इस बार घोषित किया है कि छोटे दुकानदार भी सात दिन चला सते हैं, देर रात चला सकते हैं। इसका परिणाम यह आने वाला है कि हर छोटा दुकानदार भी एक न एक काम करने वाले को रखेगा, एक-एक दुकान पर एक नए व्‍यक्‍ति के रोजगार की संभावना होने वाली है। उस दिशा में महत्‍वपूर्ण काम मैं समझता हूं आने वाले दिनों में रोजगार की दिशा में होने वाला है।
चेयरमैन श्री, मैं अब थोड़ी किसानों के संबंध में बात करना चाहता हूं। जब हमने कहा कि क्‍यों न देश जिसमें किसान हो, progressive किसान हो, राज्‍य सरकारें हो, केन्‍द्र सरकारें हो, हम सब मिलकर के, हमने बहुत जिम्‍मेदारी के साथ इन शब्‍दों का प्रयोग किया हुआ है। सब मिलकर के ये लक्ष्‍य क्‍यों तय करे कि 2022 में किसान की income double हो और मैं हमारे मनमोहन सिंह जैसा तो अर्थशास्‍त्री नहीं हूं लेकिन जिस अवस्‍था में से पला-बढ़ा हूं तो गरीब किसानों को नजदीक से देखा है और इसलिए मुझे वो बढ़ा ज्ञान तो नहीं है लेकिन छोटी-सी चीजों का पता है। अगर हम सही दिशा में प्रयास करे तो परिणाम आएगा। मैं एक हमारे देश में इस विषय के जानकार है, श्रीमान एम. एस. स्वामीनाथन, उनका एक latest article का quote मैं कहना चाहता हूं “seeds have been sown for agricultural transformation and for attracting and retaining youth in farming. The dawn of a new era in farming is in sight.”

अब किसान की आय दोगुना हो सकती है कि नहीं हो सकती है। किसान मतलब, अगर जो हम soil health card के काम को लेकर के चले है, उसको हम सफलता से लागू करे और किसान soil health card के advices के अुनसार अपनी जमीन का उपयोग करना शुरू करे। productivity बढ़ सकती है, input cost कम हो सकती है। आज किसान की मुसीबत यह है कि पड़ोसी ने अगर लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाल दी तो उसको भी लगता है कि मैं लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाल दूं । पड़ोसी ने अगर पीले डिब्‍बे वाली डाल दवाई दी तो वो भी पीले डब्‍बे वाली दवाई डाल देता है। पड़ोसी ने इतने kg यूरिया डाल दिया तो वो भी। उसकी जमीन उसके लिए योग्‍य है कि नहीं है।

अगर हम कोशिश करें। हमारी agriculture universities, agriculture graduates ये सारे लोग इसमें लगे और soil testing का जो काम चला है, उसको अगर खेती के साथ सीधा-सीधा जोड़कर के हम आगे बढ़े परिणाम ला सकते हैं। दूसरी बात, हमारे यहां हम timber import करते हैं। अगर हम हमारे किसानों को जहां उसकी जमीन की सीमा समाप्‍त होती है वहां वो एक-दो मीटर जमीन बर्बाद करता है। बाड़ लगा देता है, एक मीटर इधर वाले की जाती है, एक मीटर उधर वाले की जाती है। अगर वो दोनों मिलकर के timber की खेती करें । पेड लगा दे तो 15-20 साल में permanent income का source बन सकता है और जमीन को कोई नुकसान नहीं होने वाला है। जमीन को अतिरिक्‍त फायदा होने वाला है। उस दिशा में काम कर रहे हैं। हम कृषि के साथ fisheries, poultry , animal husbandry, milk production, दूसरा value addition. Income बढ़ाने के लिए जरूरी नहीं है कि agro product ही बने. Value addition से, अभी हमने एक निर्णय कोका कोला कंपनी पर हमने दबाव डाला, उनसे बातचीत की, laboratory में testing करवाया। हमने आग्रह किया कि आप कोका कोला के अंदर 5% natural orange juice mix करिये और मुझे खुशी है कि अभी महाराष्‍ट्र government के साथ उनका agreement हुआ और विदर्भ के अंदर जो संतरा पैदा होता है वो संतरा अब कोका कोला के अंदर 5% मिक्स होगा तो वि‍दर्भ के कि‍सान का संतरा बि‍कने में कोई दि‍क्‍कत नहीं आएगी।

हमें value addition की दि‍शा में प्रयास करना होगा और इसलि‍ए अगर आलू कि‍सान बेचता है तो कम कमाई होती है लेकि‍न wafer बनाकर के बेचता है तो ज्‍यादा कमाई होती है। हरी मि‍र्च बेचता है तो कम कमाई होती है लेकि‍न लाल मि‍र्च का पाउडर बनाकर के बेचता है तो ज्‍यादा कीमत मि‍लती है। हम लोगों ने value addition पर बल देना शुरू कि‍या है जि‍सके कारण हमारे कि‍सान की income में बढ़ोतरी होना पूरी तरह लाजि‍मी है। उसी प्रकार से blue economy, हमारे जो सागर, जो हमारे fisheries में हमारे fisherman लगे हैं। हमारे समुद्री तट पर seaweed की खेती, पूरी संभावना है आज दुनि‍या में pharmaceuticals के manufacturing में base material के लि‍ए seaweed बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरा है। हमारे fisherman के परि‍वार समुद्री तट पर आराम से seaweed की खेती कर सकते है और वो seaweed की marketing और हमारे pharmaceuticals से हम tie up करे, हमारे fisherman की income भी हम बढ़ा सकते हैं। कहने का तात्‍पर्य यह है कि‍हम जो सोचते हैं कि‍agriculture sector में हम कि‍सानों की आय बढ़ा नहीं सकते, ये नि‍राशा का कोई कारण नहीं है। अगर हम वैज्ञानि‍क तरीके से, उसी प्रकार से National Agriculture Market, आज National Agriculture Market के द्वारा, e-platform के द्वारा, कि‍सान अपने गांव में बैठकर के यह तय कर सकता है कि‍अगर महाराष्‍ट्र के अंदर उसकी पैदावार की कीमत ज्‍यादा है, वहां बेच सकता है। 14 अप्रैल बाबा साहेब आम्‍बेडकर की जन्‍मजयंती पर यह सरकार इसको launch करने जा रही है। कि‍सान अपनी जहां ज्‍यादा कीमत मि‍लेगी, वहां market में जाने के लि‍ए उसको सुवि‍धा मि‍लने वाली है।

दुनि‍या में honey का बहुत बड़ा market है। लेकि‍न भारत में हमारे कृषि‍क्षेत्र में honey bee का वैज्ञानि‍क तरीके से कोई प्रयास नहीं हुआ, registration तक available नहीं है। हमने इस पर बल दि‍या है।
अगर उस पर हमारा किसान काम करता है और हनी बी को बिगड़ने का सवाल ही नहीं होता है लंबे समय अर्से तक रहता है। हमारे किसान की इनकम में अतिरिक्‍त बढ़ोतरी कर सकता है। हमने किसान की income बढ़ाने के लिए और पहलुओं पर बल देने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं।

चैयरमैन श्री, यहां पर स्‍वच्‍छता की चर्चा हुई और ये कहा गया कि ये काम तो हमारे समय में भी चलता था। हमने किसी भी बात नहीं कही है। ये सब आप ही की देन है। हम कभी claim नहीं करते ये आप ही की देन है कि आज हमको दिन रात मेहनत करके स्‍कूलों में चार लाख टॉयलेट बनाने पड़े। आपने अगर बना करके दिया होता तो काम हमारा कम हो जाता और इसिलए कोई ये नहीं कहता कहने का तात्‍पर्य समस्‍याएं पुरानी हैं, समस्‍याएं नई नहीं हैं। समस्‍याओं के समाधान करने के प्रयास अभिरथ चले हैं। हर किसी ने अपने-अपने समय कुछ न कुछ जोड़ने का प्रयास किया है। उस समय की स्‍थिति के अनुसार available resources के अनुसार हमने भी एक प्रयास किया है और यह खुशी की बात है। देखिए 1986 में central rural sanitation programme आया था, तब से लेकर के। रिकॉर्ड पर यह चीजें available है। उसके बावजूद भी हम अभी तक परिणाम प्राप्‍त नहीं कर सके। परिणाम प्राप्‍त करना है तो जन आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा ।

और मैं आज इस बात को संतोष के साथ कह सकता हूं कि‍ आज स्‍वच्‍छता, ये जन आंदोलन बनने की दि‍शा में जा रहा है। हमारी संसद ने देश आजाद होने के बाद कभी भी स्‍वच्‍छता पर debate नहीं की थी। पहली बार इस देश में पार्लि‍यामेंट ने दो-दो, तीन-तीन घंटे तक स्‍वच्‍छता पर चर्चा की। हो सकता है सरकार की आलोचना हुई होगी लेकि‍न कम से कम इस सदन के लोग, उस सदन के लोग इस बात पर sensitize हुए है कि‍अब इसको ऐसे नहीं रहने देना चाहि‍ए, बदलना चाहि‍ए। एक अच्‍छा माहौल बन रहा है। हम सब उसको बल कैसे दे, उस दि‍शा में सोचना है। कोई दावा नहीं करता है कि‍हम ही लाए।

हमारे बाद कोई आएंगे तो वो उसको improve करेंगे। उनके बाद कोई आएगा और improve करेंगे और हो सकता है स्‍थि‍ति‍ऐसी आए करना न पड़े और वो जन सामान्‍य का वि‍षय बन जाए। लेकि‍न हमें करना होगा और जब तक हम इसको नहीं करेंगे। हमने अभी शहरों की एक challenging mode में competition शुरू की है। उसका परि‍णाम यह आया है Urban Development Ministry कर रही है। आज शहरों में उस शहर की elected body पर दबाव पड़ रहा है कि‍भई उन तीन में तुम्‍हारा नाम क्‍यों नहीं है हमारे शहर का नाम क्‍यों नहीं है? मैं बनारस का MP हूं, बनारस के नागरि‍क municipality पर दबाव डाल रहे हैं कि‍क्‍या बात है यह स्‍वच्‍छता के अंदर बनारस नज़र क्‍यों नहीं आ रहा? जनता का pressure बढ़ रहा है। ये बढ़ना चाहि‍ए और मैं तो चाहता हूं आप भी जहां-जहां हो ये pressure बढ़ाइए। सरकार को मजबूर कीजि‍ए। सभी elected bodies को मजबूर कीजि‍ए। हम स्‍वच्‍छता को हमारे देश हि‍त का एक महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम माने। महात्‍मा गांधी का जो सपना था, 2019 में पूरा करना, हम सबका दायि‍त्‍व क्‍यों नहीं हो सकता।

इस सरकार उस सरकार का नहीं हो सकता है मेरे माननीय सभी सदस्‍यगण ये हम सबका होना है। मैं देख रहा हूं मीडिया हाऊस दुनियाभर के विषय में दुनियाभर के विषय में हमारी आलोचना करते हैं। सरकारों की आलोचना करते हैं। ये एक विषय ऐसा है कि देश का मीडिया पार्टनर बना है। कहीं न कहीं मीडिया के लोग इस काम को कर रहे हैं खुद कार्यक्रम कर रहे हैं। खुद उसको promote कर रहे हैं। इसको एक हम सबका कार्यक्रम बनाएंगे तो देश के और देश के Tourism बढ़ाने के लिए काम आएगा और स्‍वच्‍छता जो पूंजीपतियों का विरोध करते हैं, उनके लिए तो सबसे पहले करने जैसा काम है, क्‍योंकि WHO का रिपोर्ट कहता है, इंटर नेशनल एजेंसी का रिपोर्ट कहता है कि गंदगी के कारण गरीबी में जीने वाले परिवारों को सालाना average सात हजार रूपया दवाई में खर्च होता है। अगर ये उसकी बीमारी चली जाए इसके कारण कितनी बड़ी सेवा होगी।

मैं मानता हूं, ये काम ऐसा है जिन्‍होंने किया है उसे हम आगे बढ़ाए। जितना किया है उसको और अधिक करें। अभी मैं छत्‍तीसगढ़ गया था। मैंने एक मां के पैर छुए, आदिवासी मां, पढ़ी-लिखी नहीं 90 प्‍लस उम्र है। उस मां ने अपनी तीन बकरियां बेच करके टॉयलेट बनाया। उस गांव में वो पहली महिला थी जिसे टॉयलेट बनाया। हम लोगों के लिए इससे बडा़ inspiration क्‍या हो सकता है और इसलिए और इसलिए मैं चाहूंगा कि इसको सरकार कार्यक्रम, पक्ष का कार्यक्रम, ये सरकार वो सरकार की सीमाओं में न बांधें। उसको देशहित के लिए सोचें और उसको हम बनाएंगे तो मैं समझता हूं कि बहुत अच्‍छा होगा।

कल हमारे सीताराम जी, जो उनका बेसिक फिलॉस्‍पी है उसको कल प्रकट कर रहे थे कि इतने exemption हैं, इतना फलां, आंकड़ा कहां से लाए। वो तो भगवान जाने। हां, वो आंकड़ा ढूंढा मुझे मिला नहीं। मुझे बाद में दिखा देना जी, लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि मैं वो आंकड़े की बताना चाहता हूं। टेक्‍स exemption है। जरा हम देखें 10 हजार 350 करोड़ रूपये exemption उसमें दाल और सब्‍जी में, क्‍या हम उसका विरोध करेंगे। 5800 करोड़ रूपये exemption किसके लिए चीनी के लिए।

शरद जी जो आपके बगल में बैठे है बाद में समझा देंगे आपको। 19 हजार 120 करो़ड़ रूपये exemption किसके लिए। जम्‍मू कश्‍मीर, हिमाचल, उत्‍तराखंड उनके उद्योगों के लिए। नार्थ ईस्‍ट के लिए, हम उसका भी विरोध करेंगे क्या ।
 
मैं समझता हूं कि कभी-कभार बारीकियों में जाएंगे तो हमें पता चलेगा कि हमारे जो इन बातों को ले करके आपको चिंता हो रही है। यही सरकार है, कल अरूण जी ने आपको विस्‍तार से बताया है finance की चर्चा होगी तो बताएंगे कि हमने टैक्‍स किस पर लगा रहे हैं और टैक्‍स से मु‍क्ति किसको दे रहे हैं। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा और इसके लिए। और जो चीजें हमें विरासत में दी हैं कभी आपने बाहर से समर्थन करके सरकारें चलाई उसने जो हमें विरासत में दी हैं। आज उसी को सफाई करने में हमारा दम उखड़ रहा है और इसलिए समाप्‍त करने से पहले एक मशहूर शायर निदा फाजली की जो आवाज है। अभी अभी उनका स्‍वर्गवास हुआ। उनकी बात कह करके मेरी बात मैं समाप्‍त करूंगा।

सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
किसी के वास्‍ते, राहें कहां बदलती हैं,
किसी के वास्‍ते, राहें कहां बदलती हैं
तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो, चलो
यहां किसी को कोई रास्‍ता नहीं देता
यहां किसी को कोई रास्‍ता नहीं देता
मुझे गिरा के मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो
यही है जिन्दगी , कुछ ख्वाब चंद उम्मीदें
इन्हीं खिलोने से जो तुम भी बहल सको तो चलो |
सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
बहुत बहुत धन्यवाद