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Wednesday, 9 March 2016

PM Modi's reply on the Motion of Thanks on the President's Address in the Rajya Sabha

आदरणीय सभापति जी , आदरणीय सभी सांसद महोदय,

अभिभाषण पर विस्‍तार से चर्चा हुई। करीब 30 माननीय सदस्‍यों ने इस चर्चा में हिस्‍सा लेकर करके अपने अनुभव का अपने ज्ञान का, देश को लाभ पहुंचाया। श्री जगत प्रकाश नड्डा जी, श्री अरूण जेटली जी, श्री गुलाम नबी आजाद जी, डॉ. विजयलक्ष्‍मी जी, प्रमोद तिवारी जी, श्रीमती रजनी जी, श्रीमान देसाई, श्री शरद यादव जी, श्री गोपाल पटेल, सीताराम जी, डी राजा जी, के केशोराम जी, कई सारे नाम हैं, सभी महानुभावों ने सदन को, और देश को लाभान्वित किया है।

राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण में एक बात जो कही गई थी जिसका इतना सकारात्‍मक प्रभाव इतना तुरंत होगा ये बात हम सबको प्रसन्‍न करती है। राष्‍ट्रपति जी ने कहा था सदन चलना चाहिए, सदन में संवाद होना चाहिए और हम सभी सदस्‍यों ने राष्‍ट्रपति जी की बात को शिरोधार्य माना और सदन को सभी ने बहुत ही सुचारू रूप से सबने मिला करके चलाया और इसके लिए मैं विशेष रूप से विपक्ष के सभी बंधुओं का मैं आभार व्‍यक्‍त करना चाहूंगा कि उन्‍होंने इस काम को आगे बढ़ाया और राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण का ये जो असर है कि मैं समझता हूं कि अपने आप में गौरव देने वाला है। मैं राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्‍यवाद करने के लिए खड़ा हुआ हूं, लेकिन सदन के साथ-साथ सदन के माननीय सदस्‍यों से भी इस बात से आग्रह करना चाहूंगा। एक तो खुशी की बात है कि सदन में सभी सदस्‍य सक्रिय हैं। अपने-अपने विचारों के लिए आग्रही हैं, करीब 300 के करीब Amendments आए हैं और हर Amendments का अपना महत्‍व भी है। लेकिन मैं सबसे आग्रह करूंगा कि हम राष्‍ट्रपति जी के wisdom पर भरोसा करते हुए समय की सीमा में जितने विषय आ सकें आ सके, इसका मतलब यह नहीं कि वो महत्‍व के नहीं हैं और इसलिए राष्‍ट्रपति पद की गरिमा और उनके wisdom पर भरोसा करते हुए मैं सभी आदरणीय सदस्‍यों से प्रार्थना करूंगा कि वे अपने संशोधन को वापस करके राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण को सर्वसम्‍मति से धन्‍यवाद प्रस्‍ताव हम पारित करें जो कि अच्‍छी परंपरा जारी रहे। हम सबने देखा होगा कि कल रात के बारह बजे तक लोकसभा का सत्र चला।

दो दिन पूर्व यह सदन भी देर शाम तक बैठा था। आम तौर पर इतने घंटे काम करने के बाद थकान महसूस होती है, लेकिन मैं उल्‍टा अनुभव कर रहा था, जिन –जिन सदस्‍यों से मेरा मिलना हुआ बात करने का मौका मिला देर रात बैठने के बाद भी वे अत्‍यन्‍त प्रसन्‍न थे, अत्‍यंत संतुष्‍ट थे, अत्‍युन्‍त आनंदित थे क्‍योंकि एक लंबे अर्से के बाद अपने पास जो कुछ कहने की बातें थी, अपने क्षेत्र की बातें थी, समस्‍याएं थी उसको इस पवित्र Forum में वो जी भर के कह पाए।

ये अवसर उनको मिला है उनके चेहरे की जो प्रसन्‍नता है, ये सदन चलने के कारण संभव हुआ है| वरना पिछली बार सदन में जैसे Question hour मैं मानता हूं कि Question hour अपने आप में एक सदस्‍यों का अपनी संपत्ति है और राष्‍ट्र के महत्‍वपूर्ण Issues पर सरकार को कठघरे में खड़ा रखना, executives को अकाउंटेबल बनाना, उनके लिए सवालिया निशान खडा़ करना।

मंत्रियों को भी हर प्रकार से सजग रखने के लिए भी सबसे बड़ी ताकतवर जगह है तो वो Question hour है। लेकिन हमने देखा कि पिछली बार सदन न चलने के कारण स्‍टार Question 269 थे, लेकिन सात को अवसर मिला और करीब 42 घंटे हमारा इस हल्‍ला बोल के अन्‍दर आहुत हो गया। उसके पूर्व के सत्र में करीब 270 इन्‍हीं सदस्‍यों के द्वारा पूछे गये स्‍टार Question थे, सिर्फ छह चर्चा में आए। करीब-करीब हमारे 72 घंटे इस माहौल के अन्‍दर आहुत हो गये।

इस बार हमारे wisdom में हमारे अनुभव ने, हमारी जिम्‍मवारियों ने, हमें बचा लिया और मान्‍य सदस्‍यों के सवालों के जवाब देने के लिए मंत्रियों को देर रात तक तैयारियां करनी पड़ रही हैं। executives को हिसाब देने के लिए सजग रहना पड़ा रहा है और यही लोकतंत्र की ताकत है और इस ताकत को मैं समझता हूं कि हम जितना तवज्‍जो दें उतना कम है। एक बात जरूर है मृत्‍यु को एक वरदान है और मृत्‍यु को ऐसा वरदान है मृत्‍यु कभी बदनाम नहीं होता। कभी मृत्‍यु पर आरोप नहीं लगते। कोई मरे तो ये कैंसर से मरा है, आरोप कैंसर पर जाता है। कोई मरे तो ये अकस्‍मात मरा है तो अकस्‍मात पर आरोप जाता है मृत्‍यु पर नहीं जाता है। बड़ी आयु में मरे तो वे उम्र के कारण मरे हैं, मृत्‍यु को कभी दोष नहीं आता। मृत्‍यु कभी बदनाम नहीं होती।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि कांग्रेस को ऐसा वरदान है... वरदान इस अर्थ में है कि अगर हम कांग्रेस की आलोचना करें तो आपने मीडिया में देखा होगा कि विपक्ष पर हमला, विपक्ष पर आरोप, कभी ये नहीं आता है कि कांग्रेस पर हमला, कांग्रेस पर आरोप| हम अगर शरद जी के खिलाफ कुछ कहें, मायावती जी के खिलाफ कुछ कहें तो अखबार में आएगा, टीवी में आएगा कि बीएसपी पर हमला, जेडीयू पर हमला, शरद जी पर हमला, मायावती जी पर हमला लेकिन कांग्रेस एक ऐसी है जब भी हमला हो तो विपक्ष पर हमला। कभी कांग्रेस को बदनामी नहीं मिलती और ये अपने आप में बड़ा गजब का विज्ञान है। अब वो तो यही है हमारे सारे साथी सोचेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है।

यहां पर हमारे विपक्ष नेता ने चर्चा प्रारंभ की थी तब मैं यहां पर उपस्थित था। हमारे नड्डा जी ने Sea change कहा, तो हमारे गुलाम नबी जी ने थोड़ा माहौल हल्‍का करने का इरादा होगा उनका तो इरादा गलत नहीं होता। लेकिन चेन्‍नई का उदाहरण दे दिया। वो एक संकट था। मानवीय दृष्टि से वो दर्दनाक घटना थी उसको इस Sea change से जोड़ करके मजाक करने से उनकी पीड़ा में हम थोड़ा मैं समझता हूं कि अच्‍छा नहीं किया।

यहां एक विषय ये भी आया कि राजस्‍थान और हरियाणा में, जो उन्‍होंने चुनाव में कुछ नियम बनाएं हैं जिसको सुप्रीम कोर्ट ने मान्‍यता दी। लेकिन हमारी democracy में qualitative चेंज लाने का जो प्रयास है उसको कुछ राजनीतिक रंग लाने का प्रयास चल रहा है। मतभेद हो सकता है, लेकिन मैं चाहूंगा कि जो लोग इतने बड़ी प्रखरता के साथ कहते हैं जो अशिक्षित रहे उनका क्‍या।

मैं खास करके गुलाम नबी साहब से और उनके साथियों में आग्रह करूंगा कि जो पांच राज्‍यों में चुनाव होने वाले हैं कम से कम 30 % लोगों को अनपढ़ लेागों को टिकट दें, बिलकुल अनपढ़ तो वो जो कह रहे हैं तो उसमें उनका क्‍या commitment है पता तो चलेगा। अनपढ़ की इतनी चिंता है होनी भी चाहिए। लेकिन मैं एक अनुभव शेयर करता हूं। मैं गुजरात में जब था तो हर वर्ष, हर वर्ष जून महीने में 13, 14, 15 जून कन्‍या शिक्षा को ले करके बेटियों को पढ़ाने के लिए ग्रुजरात में एक कैम्‍पेन चलाता था, campaign चलाता था और गुजरात में मई जून में 40-45 तापमान रहता है। पूरी सरकार गांव जाती थी मैं खुद जाता था। तीन-तीन दिन में गांव में रहता था और बेटियों को पढ़ाओ इसके लिए campaign चलाता था। स्‍कूल 15 जून से शुरू होते थे तो उसके पहले एडमिशन्स के लिए लगते थे। वहां मैं मातृ सम्‍मेलन भी करता था। एक गांव में मैं गया । मैंने ऐसे ही पूछा कि आप बता ही दें कि आप में से अनपढ़ कितने हैं। तो कोई 40 साल 45 साल और 50 साल की महिलाओं ने हाथ ऊपर किया कि हम पढ़े लिखे नहीं हैं। लेकिन पांच छह महिलाएं ऐसी थी जिनकी उम्र 80-85 थी। मैंने पूछा आप पढ़े लिखे हैं, तो बोले ये हमारी बहु अनपढ़ है हम पढ़े लिखे हैं। कैसे तो बोले हम जो हैं गायकवाड स्‍टेट के नागरिक हैं, आजादी के पहले की बात है और गायकवाड स्‍टेट में ये नियम था कि अगर बेटी को नहीं पढ़ाते हैं तो एक रूपये दंड होता था और बोले इसके कारण हम पढ़े लिखे हैं। लेकिन बाद में स्‍वतंत्रता आई सरकारें बदल गईं तो बहू हमारी अनपढ़ है। तो ये जो अनपढ़ का कारण है वो आजादी के बाद जो हमारी कमियां रहीं है उससे और इसलिए हमने चिंता शिक्षा की करने की जरूरत है ताकि ये जो कठिनाई है उस कठिनाइयों से हम बाहर आ सकते हैं।

राष्‍ट्रपति जी ने कहा है कि पहले आकाशवाणी में आकाशवाणी रेडियो पर एक कार्यक्रम चलता था और गुजराती में जो शब्‍द था मुझे मालूम नहीं है कि हिन्‍दी में वो ही शब्‍द है क्‍या। बिसराते सुर यानी जो भूले बिरसे गीत हैं उनका कार्यक्रम आखिरी आखिरी तो अब कुछ लोगों का ये tenure पूरा हो रहा है तो स्‍वाभाविक है कि आखिर आखिर में कुछ कहें। तो ये भूले बिसरे सुर आखिर में सुनाई तो देने चाहिए।

सभापति जी, एक प्रकार से upper house है हमारे यहां कहा जाता है - महाजन ये न जतापन था। जहां महापुरूष चलते हैं लोग उसके पीछे चलते हैं। इस सदन में महाजन बैठे हैं। इस सदन से जो होगा जिस प्रकार से होगा उसका असर लोकसभा में होगा। उसका असर assembly होगा। कहीं कहीं कॉरपोरेशन सिटी में भी हो रहा है और इसलिए हम ऐसा कैसा करें ताकि नीचे तक वो माहौल बने जो लोकतंत्र को पुष्‍ट करे।

देश हमारे कई बिल पारित हो, इसका इंतजार कर रहा है। जीएसटी की चर्चा हो रही है बाकी बिल की चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं। बहुत बड़ी मात्रा में अब जो जनप्रतिनिधि चुन करके आए हैं उन्‍होंने तो इसको स्‍वीकार कर लिया है। लेकिन राज्‍यों के जो प्रतिनिधि हैं वहां। अब ये जगह ऐसी है जो अपर हाऊस हमारा, एक chamber of ideas है। यहां देश को मार्गदर्शन मिलेगा, दिशा मिलेगी और इसलिए दोनों सदनों के बीच तालमेल होना बहुत जरूरी है। दोनों सदन वस्‍तुत: उसी structure के भाग हैं और सहयोग एंव सामंजस्‍य की भावना की किसी भी कमी से कठिनाइयां बढ़ेगी और हमारे संविधान के उचित रूप से कार्य करने में बाधा खड़ी होगी। ये चिंता पं0 जवाहर लाल नेहरू जी ने जताई थी। मैं आशा करता हूं कि हम पंडित जी की इस चिंता को महत्‍व दें और हम कोशिश करें कि हमारे यहां यह जो सारे पेंडिंग बिल हैं, इस बार सदन चल रहा है। एक अच्‍छे माहौल में चल रहा है। तो हम चीजों को अगर पारित करें तो देश को गति देने में, ये महाजनों का ग्रो है, वरिष्‍ठ का गृह है। वो बहुत बढ़ा role play कर सकता है। इसलिए मैं आग्रहपूर्वक प्रार्थना करता हूं, सभी मान्‍य सदस्‍यों से जो लोकसभा में जो बिल पारित हुए हैं। उनको हो सके उतना जल्‍दी पारित करके हम देश को गति देने में भूमिका अदा करें।
इस सरकार में राष्‍ट्रपति के अभिभाषण में कुछ बातें आई हैं। ये तो सही है कि देश आजाद हुआ है, सरकारें बनी हैं। लंबे अरसे तक सत्‍ता भोगने का अवसर मिला है, सत्‍ता में रहने का अवसर मिला है। कुछ काम करने का अवसर मिला है और कुछ समय पहले से थोड़ा-थोड़ा बदलाव भी शुरू हुआ है, धीरे-धीरे। इस समय हम लोगों को मौका मिला है और ऐसा तो नहीं है कि कोई काम करना नहीं चाहता, हर कोई करना चाहता है। लेकिन कभी-कभार सवाल यह होता है कि हम इतना बड़ा देश है, इसकी आवश्‍यकताओं की पूर्ति हो, होती है, चलती है, इस प्रकार से करेंगे, तो हम बहुत पीछे चले जाएंगे। हमें incremental improvement से हटकर के एक quantum jump की ओर जाना बहुत जरूरी है और इसलिए शक्‍ति भी जरा ज्‍यादा लगानी पड़ती है और शक्‍ति जोड़नी भी पड़ती है। तो उसकी दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं।

हमने एक बल दिया है good governance पर, और जब मैं good governance की बात करता हूं, सुशासन की बात करता हूं तो उसकी पहली शर्त होती है transparency. हम यह भली-भांति जानते हैं कि इसके पूर्व, हमारे आने से पहले देश और दुनिया में, सही और गलत, इसका अपवाद हो सकता है। लेकिन यह माहौल बना हुआ था, विश्‍वास टूट चुका था। आशंका के दायरे में हम दबे हुए थे और सब ओर भ्रष्‍टाचार, भाई-भतीजावाद, इन चीजों ने हिन्‍दुस्‍तान के मन को झटक दिया था। दुनिया में भी इसके कारण भारत की छवि को गहरा नुकसान हुआ था। देश में विश्वास पैदा करने के लिए आवश्‍यक है और लोगों की जिम्‍मेवारी भी है कि transparency, policy driven government , individual के beam पर सरकारें नहीं चल सकती। सरकार नीतियों के आधार पर चलनी चाहिए, इस पर हमारा बल रहा है।

पिछले दिनों चाहे कोयले की चर्चा हो, स्‍पेक्‍ट्रम की चर्चा हो, न-जाने क्‍या-क्‍या बातें उठी, अब तो मामले सारे कोर्ट में भी पड़े हुए हैं। लेकिन हमने transparency पर बल दिया है। उसका परिणाम यह है – कोयला auction में हम गए 3.33 लाख करोड़, स्‍पेक्‍ट्रम में गए 1 लाख करोड़, हम एफएम रेडियो में गए। अभी-अभी चल रहा है। शायद आप लोगों को ज्ञान होगा 6 अन्‍य minerals का और अभी-अभी auction में जो 18 हजार करोड़ रुपया cross कर गया। ये एक कोशिश हमारी कि transparency और मैंने उसके लिए उदाहरण नहीं लिए।
अभी-अभी Forbes magazine, उसने एक बात कही है। हमने जो auction की परंपरा शुरू की है, उसके विषय में Forbes magazine कहता है – “India has just conducted its first auction of a Gold mine. This is exactly the right way to allocate the exploration and exploitation rise of such a natural resources. This is another one of those steps along the road to India coming the much wealthier country it should be”.
अब वो जो Gold mine कहते हैं, उनकी पश्‍चिम की दुनिया में इनके लिए, कोयला वगैरह सबको वो Gold mine के रूप में माना जाता है। उस अर्थ में वो Gold mine लिखा है। हमारे यहां कोई सोना की खदान ही नहीं दी गई है। Forbes magazine ने आगे एक जगह पर अच्‍छी बात कही है, हमने जो प्रयास किया है उस पर उन्‍होंने कहा है। एक ही वाक्‍य मैं अलग से पढ़ना चाहूंगा, This is the way this matter should be handled . मैं समझता हूं इसमें काफी कुछ आ जाता है।

दूसरा पहलू है good governance का accountability. हमें यह मानकर चले कि कुल मिलाकर के जो deterioration आया है उसमें हम खबरों की speed से चलते चले जा रहे हैं, पीछे की चीजें छूटती चली जा रही हैं। खबरें आती हैं जाती हैं, घटनाएं आती हैं जाती हैं, accountability का विषय छूट जाता है। हमने कोशिश की है कि accountability पर बल दिया जाए। मैं लगातार इन दिनों Infrastructure के review कर रहा हूं। इस सदन के सभी माननीय सदस्‍यों को आश्‍चर्य होगा 10-10, 20-20 साल से हमारे बड़े-बड़े प्रोजेक्‍ट लटके पड़े हुए हैं। या तो environment वालों ने रोक दिया होगा, कोर्ट-कचहरी ने रोक दिया होगा, या स्‍थानीय कोई body होगी छोटी, नगरपालिका वो रोककर के बैठ गई होगी। रुका हुआ है, क्‍यों रुका हुआ है, कोई देखता नहीं, पूछता नहीं, इसी कारण, कभी financial कारण भी रहे होंगे लेकिन 10-10, 20-20 साल से रुके हुए प्रोजेक्‍ट। मैंने पिछले दिनों करीब 300 प्रोजेक्‍ट का खुद review किया और उसकी worth है करीब 15 लाख करोड़ रुपया। मैं इस सदन को नम्रतापूर्वक कहता हूं कि वो सारे छोटे-छोटे संकटों में फंसे हुए, ये 15-15, 20 साल पुराने stalled projects आज चालू हो गए है, गति बढ़ रही है।

Good governance का तीसरा पहलू होता है – decentralization. इतना बड़ा देश हम centralized mechanism से नहीं चला सकते। जितनी बड़ी मात्रा में decentralize करेंगे और इसलिए सरकार ने नीतिगत रूप से decentralize करने की दिशा में नीतिगत कदम उठाए हैं जैसे environment. हम environment की हर permission को दिल्‍ली ले आए। एक दफ्तर में ले गए, एक व्‍यक्‍ति के पास ले गए और क्‍या परिणाम आया हम जानते हैं, क्‍या-क्‍या बातें सुनी गई, क्‍या-क्‍या बातें कही गई, किस पर क्‍या-क्‍या लगा सब मालूम हैं। हमने 10 regional offices को strengthen किया ताकि उनको वहां की समस्‍या की समझ है, वो जानते हैं इस चीजों को, उसको हमने किया। कुछ चीजें सरकार की, मैं तो हैरान हूं, एक गांव के बीच में से रेल जा रही है। इधर से पानी उस तरफ ले जाना है तो पाइपलाइन डालने में, पचासों permissions में वो अटकें पड़े हुए थे और बिना पानी को एक इलाका तरसता था। bridge बन गया है, दोनों तरफ road बनाना है, अटका पड़ा है। कभी दोनों तरफ road बन गए है, रेल वाले ऊपर bridge डालने के लिए permission नहीं दे रहे हैं, ऐसी छोटी-छोटी चीजें। हमने रेल, road, पाइपलाइन, बिजली transmission, इसके लिए केन्‍द्र के पास आना ही जरूरी नहीं है, सरकार ने व्‍यवस्‍था कर दी, वहीं पर हो जाएगा। इतना ही नहीं, हमने राज्‍यों के environment clearance के rights बढ़ा दिए, राज्‍यों को अधिकार ज्‍यादा दे दिए ताकि वो भी, हम जितने जिम्‍मेवार है, उतने भी राज्‍य के लोग जिम्‍मेवार है और वो कोई देश को बर्बाद करना नहीं चाहते।

अब जैसे sand. आज हमारे यहां नदी में बालू, housing constructions में से कितनी। हर नदी दिल्‍ली तक इंतजार करती है कि permission मिले। हमने इसको राज्‍य नहीं district level पर दे दिया, district authority उस पर निर्णय करेगा और वो तय करेगी। Online प्रक्रियाओं को लोग देख सकते हैं। पहले रेलवे के टेंडर की सारी प्रक्रिया यहां होती थी। आज हमने उसको zonal general manager के under में डाल दिया, टेंडर प्रक्रिया वही से चल रही है, गति से चल रही है। पहले एक 300 करोड़-500 करोड़ के प्रोजेक्‍ट भी cabinet approval के लिए आते थे, इंतजार करना पड़ता था। हमने तय कर दिया कि वो ministry करेगी। एक हजार करोड़ से ऊपर होगा तभी cabinet में लाना है। decentralization के द्वारा इसको आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

Good governance की एक महत्‍वपूर्ण बात होती है effective delivery. अब जन-धन account की यहां चर्चा हो रही है। हमारे माननीय विपक्ष नेता जी ने भोपाल के अच्‍छे उदाहरण दिए। बहुत आभारी हूं मैं कि एक जो विपक्ष ने करना चाहिए वैसा सटीक काम उन्‍होंने किया है। भोपाल जिले में किस गांव में कौन ‘जन-धन’ account से रह गया है और उसका recording तक करके ले आए। होना यही चाहिए तभी executive accountable बनेगी और ये सदन के सदस्‍यों का यही काम होता है। यह मुद्दा मेरी सरकार, तेरी सरकार नहीं होता है और मैं मानता हूं कि एक सही दिशा का यह प्रयास है। उसमें तथ्‍य क्‍या है, वो तो कल अरुण जी ने कह दिया। मैं तथ्‍य पर चर्चा नहीं करूंगा, मैं इस प्रयास को अच्‍छा मानता हूं। क्‍योंकि कभी-कभार नीचे से, व्‍यवस्‍था से खबर आएगी और मान लेते हैं, लेकिन विपक्ष सजग रहा, देखा और कितनी मेहनत की है। सत्‍ता में इतनी मेहनत की होती तो ‘जन-धन’ account का काम मुझे करना ही नहीं पड़ता। बाल की खाल उधेड़ी। लेकिन फिर भी अच्‍छा किया। साहब आपने microscope लेकर के देखा। मोदी कह रहा है जन-धन होगा, देखो यार कहीं तो होगा कोई कोने में। बहुत microscope लेकर के निकले लेकिन साहब आप इतने साल microscope लेकर के नहीं, अगर binocular से भी देखकर के काम किया होता तो आज यह मेहनत करने का मेरे जिम्‍मे नहीं आता। आज microscope लेकर के घूम रहे हो, अच्‍छा होता जब सत्‍ता में थे binocular से भी देखकर के काम को निपटाने का प्रयास किया होता। मेरे कहने का तात्‍पर्य यही है कि हम effective delivery पर बल दें वरना कभी जो last mile delivery, हमारे यहां जो लोग सरकार में रहे उनको मालूम है। हमें उसमें जितना ही हम पुरुषार्थ करे, हमें करना चाहिए।

हमारे सीताराम जी ने एक विषय छोड़ा था। उन्‍होंने कहा था कि ये targeted subsidy के नाम पर आप subsidy कम कर रहे हैं। वैसे वो उनके nature का विषय नहीं है लेकिन क्‍यों बोल दिए मुझे समझ में नहीं आता है। लेकिन हो सकता है politics में कुछ चीजें करनी भी पड़ती हैं। मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं चंडीगढ़ शहर का। चंडीगढ़ शहर में ज्‍यादातर घरों में बिजली है, ज्‍यादातर घरों में गैस कनेक्‍शन है। उसके बावजूद भी चंडीगढ़ में 30 लाख लीटर केरोसिन जाता था। जबकि उनका कोई उपयोग उनको नहीं था। कुछ परिवार थे जिनके पास गैस नहीं था, शायद उनको उपयोग होगा। 30 लाख लीटर केरोसिन। हमने सोचा कि भई जरा हम JAM योजना को लागू करे। सर्वे किया, आधार का उपयोग किया, गैस कनेक्‍शन का डाटा इकट्ठा किया। कुछ परिवार रह गए हैं जिनके पास गैस कनेक्‍शन नहीं है। हमने एक अभियान चलाया है। आने वाले कुछ दिनों में शायद पूरा हो जाएगा। लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि 30 लाख लीटर केरोसिन जो कि जाता था और धन्‍ना सेठों के द्वारा बाजार में चला जाता था, पूंजीपतियों के पास चला जाता था। ये पूंजीपति लोग उसका black marketing करते थे, डीजल में mix करते थे, environment को बर्बाद करते थे, ये targeted subsidy का परिणाम यह है कि यह जो धन्‍ना सेठ या पूंजीपति लोगों के हाथ में 30 लाख लीटर केरोसिन जाता था बहुत तो बंद हो गया, बाकी भी अब बंद हो जाएगा और इसके कारण देश की करोड़ों रुपयों की subsidy बचेगी।

तीसरा, देश को import करने में भी राहत मिल जाएगी। कहने का हमारा तात्‍पर्य यह है कि हम जब technology के माध्‍यम से इस काम को जो हम कर रहे हैं, इस काम के संबंध में subsidy सही व्‍यक्‍ति को मिले, नियम में जितनी मिलनी चाहिए उतनी मिले, समय पर मिले, उस दिशा में हमारा एक प्रयास है। यह रुपए बचाने का खेल नहीं है। एक व्‍यवस्‍था में transparency लाना नहीं, leakages बंद करने की, दलालों को निकालने का एक उत्‍तम प्रकार का प्रयास है। उसमें भी कुछ कमियां है तो ठीक करनी है और आप लोगों का उसमें सहयोग मिलेगा, कहीं से कोई जानकार मिलेगी तो ठीक करने में सुविधा बढ़ेगी। तो मैं आश्वस्त कर देता हूं सबको कि ऐसी कोई बात ध्‍यान में आए तो जरूर सरकार के ध्‍यान में लाइए ताकि हम इसको कर पाए।

एक विषय है, माननीय हमारे गुलाब नबी साहब ने विषय निकाला – skill development का। आपने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने इसको शुरू किया था, वगैरह-वगैरह। वैसे हमारे देश में skill परंपरागत है लेकिन हर सरकार ने किसी न किसी रूप में प्रयास किया है। अब बात कहा जाकर के अटकती है। अब जैसे मान लीजिए आज हम गंगा सफाई करते हैं तो स्‍वाभाविक से आपसे आवाज उठेगी, ये तो हमने शुरू किया था। सही बात है। श्रीमान राजीव गांधी जी ने उस पर बल दिया, शुरू किया।

अब सवाल यह उठता है कि शुरू किया, उसका credit लेने के उत्‍साह में यह भी तो जवाब देना पड़ेगा कि 30 साल के बाद भी गंदी क्‍यों हैं, अगर शुरू किया था तो 30 साल के बाद गंगा गंदी क्‍यों हैं, क्‍या कमी रह गई? और इसलिए हर बार, ये तो हमारे समय हुआ था, ये उत्‍साह का अपना एक महत्‍व है। श्रेय लेने का प्रयास करने में कुछ बुरा है, ऐसा नहीं है, ये तो आपको मन करेगा। देखिए दुनिया में दो तरह के व्‍यक्‍ति होते हैं - एक वो जो कार्य करते है और दूसरे वे जो उसका श्रेय लेते है। आप इनमें से पहली तरह का व्‍यक्‍ति बनने का प्रयास करें क्‍योंकि इसमें competition बहुत कम है। यह बात श्रीमती इंदिरा जी ने कही थी। अब skill development. देखिए साहब 2008 में, मैं मानता हूं skill development पिछली सरकार में जो चला। उसमें एक skill की mastery आ गई और mastery थी कमेटियां बनाने और कमेटियां बिखरने की। उसमें mastery आ गई, skill development वो हुआ।

2008 में PM’s national council, National skill Development Coordination Board, National Skill Development Corporation फिर 2009 में National Policy on Skill Development, कमेटियां पर कमेटियां, कमेटियां पर कमेटियां और मीटिंगे नहीं होती थी। एक कमेटी की तो मीटिंग शायद ढाई-तीन साल के बाद अचानक एक कर ली गई थी लेकिन वो भी इसलिए कर ली गई थी कि अगली मीटिंग कब करेंगे। आखिरकार, इतनी सारी कमेटियों के बाद 2013 में यह तय कर दिया कि National Skill Development Agency बनाई जाए और बाकी सब दुकानें बंद कर दी जाए। साहब ये skill development का हाल था। Skill Development के विषय में आप अज्ञान नहीं थे, आपको ज्ञान था कि एक जरूरी है, देश में इतनी बड़ी संख्‍या में नौजवान है करना चाहिए। लेकिन कभी-कभार तो महाभारत याद आता है ज्ञानम न धर्मम नचे बिन प्रभुति। ज्ञान तो बहुत था लेकिन करना प्रवृत्‍ति नहीं थी। अब कौन-क्‍या ये मैं ज्‍यादा चर्चा नहीं करता।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल में 2014 में हमने skill development एक अलग ministry बनाई। skill development scheme के लिए common norms तय किए। skill initiatives, consistent quality हासिल करने पर बल दिया गया। NSDC के तहत हमने डेढ़ साल में ढाई गुना उसमें बढ़ोतरी की। Industrial training institutions (ITI) हमने डेढ़ साल के भीतर-भीतर 20% उसमें इजाफा किया। पिछले दो वर्ष में क्षमता 15 लाख 23 हजार सीटों से बढ़कर के 18 lakh 65 thousand कर दी गई, 20% हमने बढ़ोतरी की। 1 लाख 70 हजार प्रतिवर्ष जो तय होते थे उसमें हमने 53 thousand और जोड़ दिए। 10th और 12th उसमें vocational education करीब बारह सौ तेरह सौ स्‍कूल में चलता था। आज हमने उसको एकदम से quantum jump लगाकर के तीन हजार पहुंचा दिया। डेढ़ लाख अतिरिक्‍त छात्रों का लाभ उसके लिए हुआ। International mobility , एक बात मानकर के चलें कि 2030 वो समय आएगा, जब दुनिया की नज़र हिन्‍दुस्‍तान के workforce पर रहने वाली है।
हमने अभी से global standard का workforce तैयार करने की दिशा में हमें काम करना चाहिए। International mobility पर हमें बल देना चाहिए और उसके लिए ऑस्‍ट्रेलिया और UK के जो standards है उसको match होते हुए, कामों को हमने शुरू किया है और भी requirements के अनुसार उस standard को लेने की दिशा में हम काम करना चाहते हैं।

Apprenticeship, किसी न किसी कारण से हमने apprenticeship को एक ऐसी अवस्‍था बना दी कि सब उद्योगकार, व्‍यापारी दरवाजे बंद करके बैठ गए, किसी को घुसने ही नहीं देते और किसी को भी नौकरी चाहिए तो लोग पूछते है experience है क्‍या? Experience लेने जाता है तो दरवाजा बंद है। जब तक हम apprenticeship को बल नहीं देते, हमारे नौजवानों को experience नहीं मिलेगा। experience नहीं मिलेगा तो उनके लिए job opportunity नहीं होगी और उसको ध्‍यान में रखते हुए हमने apprenticeship के trainee जो पहले 3 लाख 12 हजार थे। सवा साल के भीतर-भीतर 2 लाख 70 हजार और उसमें जोड़ दिए, हमने वो व्‍यवस्‍था की है।

पहले हमारे यहां target होता था - कितने बच्‍चों को तैयार किया। उसी को पूरा करने की दिशा में प्रयास था। हमने market में requirement क्‍या है, किस प्रकार के syllabus की जरूरत है, किस प्रकार की training की जरूरत है, उसका सर्वे किया और according to that हमने skill develop किया ताकि job के साथ उसको connect किया जाए और उसको उसका काम मिल जाए और उस दिशा में हमने प्रयास किया है। अब मैं देख रहा हूं कि पिछले दिनों हमारे देश में manufacturing को बल तो देना ही होगा। हम सब जानते हैं कि कोई भी सरकार हो, भाषण के लिए हम कुछ भी कहे लेकिन देना पड़ेगा। इसके कारण हमने FDI पर बल दिया, FDI में बढ़ोतरी हुई, 48% करीब। हमने 2015 में electronic manufacturing में छह गुना बढ़ोतरी हुई है। 2015 में software export सबसे ज्‍यादा हुआ है। हमारे major Ports 2015 में सबसे ज्‍यादा handling हुआ है। 2015 में सबसे ज्‍यादा कार उत्‍पादन हुआ है। 50 नई मोबाइल कंपनियां manufacturing के लिए आई है। यह सारी बातें skill और रोजगार के साथ जुड़ने वाली है और skill और रोजगार की दिशा में ये काम करने वाले हमारे प्रयास है और उसका परिणाम यह होगा कि हमारे देश में रोजगार की संभावनाएं बढेंगी।

Ease of doing business में 12 rank हम quantum jump लगाया है। हम ऊपर गए है। World Economic Forum में Global competitive index में हम 16 स्‍थान ऊपर गए है। Moodys ने जो up gradation दिया हमारे लिए, positive दिया है, जो global environment में भारत की साख को बढ़ाता है, भारत की ताकत की पहचान कराता है। Employment की चर्चा skill development में हो, manufacturing sector में बढ़ावा हो, एक रोजगार के लिए मानदंड के रूप में एक institute को हमने मान्‍यता मिली हुई। Monster Employment Index, ये online recruitment के आधार पर analysis करता है। January 2016 में index 229 था। यह index 2014 में सिर्फ 150 था और आज आप देख सकते हैं 150 से बढ़कर के 229 index को हम प्राप्‍त कर गए है। हमने रोजगारी को बढ़ावा देने के लिए जो micro and small industry है उसको हमने Tax के अंदर सुविधाएं दी हैं। Start Up को बल दिया है। तीन साल के लिए टैक्‍स में हमने रियायत दी है ताकि नौजवानों को Start Up के लिए मौका मिले। मुद्रा बैंक के द्वारा करोड़ों-करोड़ों लोगों को हमने धन दिया है, जो पुराने थे उन्होंने expansion किया है। expansion के कारण उसको एक-दो लोगों को और रोजगार देने का उसको अवसर मिला है और इसमें भी ज्‍यादा SC, ST और women हैं | मुद्रा के लाभार्थी सबसे ज्‍यादा SC, ST, OBC and women है। नए उद्योग जो लगेंगे ही, उसके लिए हमने टैक्‍स को 25% पर रख दिया है और कोई benefit अगर लेना चाहता नहीं है तो ये benefit मिलेगा।

एक महत्‍वपूर्ण निर्णय इस बजट में आपने सुना होगा। हम जो पूंजीपतियों की चर्चा करते हैं। जो लोग first UPA में सरकार का समर्थन करते थे और वो जो पूंजीपतियों का विरोध कर करके गाड़ी चलाते रहते हैं। आप देखिए हमारे देश में बड़े-बड़े मॉल हो, वो तो सात दिन चल सकते हैं, लेकिन गांव के अंदर एक छोटा दुकानदार हो, वो सात दिन खुली नहीं रख सकता है। हमने बजट में इस बार घोषित किया है कि छोटे दुकानदार भी सात दिन चला सते हैं, देर रात चला सकते हैं। इसका परिणाम यह आने वाला है कि हर छोटा दुकानदार भी एक न एक काम करने वाले को रखेगा, एक-एक दुकान पर एक नए व्‍यक्‍ति के रोजगार की संभावना होने वाली है। उस दिशा में महत्‍वपूर्ण काम मैं समझता हूं आने वाले दिनों में रोजगार की दिशा में होने वाला है।
चेयरमैन श्री, मैं अब थोड़ी किसानों के संबंध में बात करना चाहता हूं। जब हमने कहा कि क्‍यों न देश जिसमें किसान हो, progressive किसान हो, राज्‍य सरकारें हो, केन्‍द्र सरकारें हो, हम सब मिलकर के, हमने बहुत जिम्‍मेदारी के साथ इन शब्‍दों का प्रयोग किया हुआ है। सब मिलकर के ये लक्ष्‍य क्‍यों तय करे कि 2022 में किसान की income double हो और मैं हमारे मनमोहन सिंह जैसा तो अर्थशास्‍त्री नहीं हूं लेकिन जिस अवस्‍था में से पला-बढ़ा हूं तो गरीब किसानों को नजदीक से देखा है और इसलिए मुझे वो बढ़ा ज्ञान तो नहीं है लेकिन छोटी-सी चीजों का पता है। अगर हम सही दिशा में प्रयास करे तो परिणाम आएगा। मैं एक हमारे देश में इस विषय के जानकार है, श्रीमान एम. एस. स्वामीनाथन, उनका एक latest article का quote मैं कहना चाहता हूं “seeds have been sown for agricultural transformation and for attracting and retaining youth in farming. The dawn of a new era in farming is in sight.”

अब किसान की आय दोगुना हो सकती है कि नहीं हो सकती है। किसान मतलब, अगर जो हम soil health card के काम को लेकर के चले है, उसको हम सफलता से लागू करे और किसान soil health card के advices के अुनसार अपनी जमीन का उपयोग करना शुरू करे। productivity बढ़ सकती है, input cost कम हो सकती है। आज किसान की मुसीबत यह है कि पड़ोसी ने अगर लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाल दी तो उसको भी लगता है कि मैं लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाल दूं । पड़ोसी ने अगर पीले डिब्‍बे वाली डाल दवाई दी तो वो भी पीले डब्‍बे वाली दवाई डाल देता है। पड़ोसी ने इतने kg यूरिया डाल दिया तो वो भी। उसकी जमीन उसके लिए योग्‍य है कि नहीं है।

अगर हम कोशिश करें। हमारी agriculture universities, agriculture graduates ये सारे लोग इसमें लगे और soil testing का जो काम चला है, उसको अगर खेती के साथ सीधा-सीधा जोड़कर के हम आगे बढ़े परिणाम ला सकते हैं। दूसरी बात, हमारे यहां हम timber import करते हैं। अगर हम हमारे किसानों को जहां उसकी जमीन की सीमा समाप्‍त होती है वहां वो एक-दो मीटर जमीन बर्बाद करता है। बाड़ लगा देता है, एक मीटर इधर वाले की जाती है, एक मीटर उधर वाले की जाती है। अगर वो दोनों मिलकर के timber की खेती करें । पेड लगा दे तो 15-20 साल में permanent income का source बन सकता है और जमीन को कोई नुकसान नहीं होने वाला है। जमीन को अतिरिक्‍त फायदा होने वाला है। उस दिशा में काम कर रहे हैं। हम कृषि के साथ fisheries, poultry , animal husbandry, milk production, दूसरा value addition. Income बढ़ाने के लिए जरूरी नहीं है कि agro product ही बने. Value addition से, अभी हमने एक निर्णय कोका कोला कंपनी पर हमने दबाव डाला, उनसे बातचीत की, laboratory में testing करवाया। हमने आग्रह किया कि आप कोका कोला के अंदर 5% natural orange juice mix करिये और मुझे खुशी है कि अभी महाराष्‍ट्र government के साथ उनका agreement हुआ और विदर्भ के अंदर जो संतरा पैदा होता है वो संतरा अब कोका कोला के अंदर 5% मिक्स होगा तो वि‍दर्भ के कि‍सान का संतरा बि‍कने में कोई दि‍क्‍कत नहीं आएगी।

हमें value addition की दि‍शा में प्रयास करना होगा और इसलि‍ए अगर आलू कि‍सान बेचता है तो कम कमाई होती है लेकि‍न wafer बनाकर के बेचता है तो ज्‍यादा कमाई होती है। हरी मि‍र्च बेचता है तो कम कमाई होती है लेकि‍न लाल मि‍र्च का पाउडर बनाकर के बेचता है तो ज्‍यादा कीमत मि‍लती है। हम लोगों ने value addition पर बल देना शुरू कि‍या है जि‍सके कारण हमारे कि‍सान की income में बढ़ोतरी होना पूरी तरह लाजि‍मी है। उसी प्रकार से blue economy, हमारे जो सागर, जो हमारे fisheries में हमारे fisherman लगे हैं। हमारे समुद्री तट पर seaweed की खेती, पूरी संभावना है आज दुनि‍या में pharmaceuticals के manufacturing में base material के लि‍ए seaweed बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरा है। हमारे fisherman के परि‍वार समुद्री तट पर आराम से seaweed की खेती कर सकते है और वो seaweed की marketing और हमारे pharmaceuticals से हम tie up करे, हमारे fisherman की income भी हम बढ़ा सकते हैं। कहने का तात्‍पर्य यह है कि‍हम जो सोचते हैं कि‍agriculture sector में हम कि‍सानों की आय बढ़ा नहीं सकते, ये नि‍राशा का कोई कारण नहीं है। अगर हम वैज्ञानि‍क तरीके से, उसी प्रकार से National Agriculture Market, आज National Agriculture Market के द्वारा, e-platform के द्वारा, कि‍सान अपने गांव में बैठकर के यह तय कर सकता है कि‍अगर महाराष्‍ट्र के अंदर उसकी पैदावार की कीमत ज्‍यादा है, वहां बेच सकता है। 14 अप्रैल बाबा साहेब आम्‍बेडकर की जन्‍मजयंती पर यह सरकार इसको launch करने जा रही है। कि‍सान अपनी जहां ज्‍यादा कीमत मि‍लेगी, वहां market में जाने के लि‍ए उसको सुवि‍धा मि‍लने वाली है।

दुनि‍या में honey का बहुत बड़ा market है। लेकि‍न भारत में हमारे कृषि‍क्षेत्र में honey bee का वैज्ञानि‍क तरीके से कोई प्रयास नहीं हुआ, registration तक available नहीं है। हमने इस पर बल दि‍या है।
अगर उस पर हमारा किसान काम करता है और हनी बी को बिगड़ने का सवाल ही नहीं होता है लंबे समय अर्से तक रहता है। हमारे किसान की इनकम में अतिरिक्‍त बढ़ोतरी कर सकता है। हमने किसान की income बढ़ाने के लिए और पहलुओं पर बल देने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं।

चैयरमैन श्री, यहां पर स्‍वच्‍छता की चर्चा हुई और ये कहा गया कि ये काम तो हमारे समय में भी चलता था। हमने किसी भी बात नहीं कही है। ये सब आप ही की देन है। हम कभी claim नहीं करते ये आप ही की देन है कि आज हमको दिन रात मेहनत करके स्‍कूलों में चार लाख टॉयलेट बनाने पड़े। आपने अगर बना करके दिया होता तो काम हमारा कम हो जाता और इसिलए कोई ये नहीं कहता कहने का तात्‍पर्य समस्‍याएं पुरानी हैं, समस्‍याएं नई नहीं हैं। समस्‍याओं के समाधान करने के प्रयास अभिरथ चले हैं। हर किसी ने अपने-अपने समय कुछ न कुछ जोड़ने का प्रयास किया है। उस समय की स्‍थिति के अनुसार available resources के अनुसार हमने भी एक प्रयास किया है और यह खुशी की बात है। देखिए 1986 में central rural sanitation programme आया था, तब से लेकर के। रिकॉर्ड पर यह चीजें available है। उसके बावजूद भी हम अभी तक परिणाम प्राप्‍त नहीं कर सके। परिणाम प्राप्‍त करना है तो जन आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा ।

और मैं आज इस बात को संतोष के साथ कह सकता हूं कि‍ आज स्‍वच्‍छता, ये जन आंदोलन बनने की दि‍शा में जा रहा है। हमारी संसद ने देश आजाद होने के बाद कभी भी स्‍वच्‍छता पर debate नहीं की थी। पहली बार इस देश में पार्लि‍यामेंट ने दो-दो, तीन-तीन घंटे तक स्‍वच्‍छता पर चर्चा की। हो सकता है सरकार की आलोचना हुई होगी लेकि‍न कम से कम इस सदन के लोग, उस सदन के लोग इस बात पर sensitize हुए है कि‍अब इसको ऐसे नहीं रहने देना चाहि‍ए, बदलना चाहि‍ए। एक अच्‍छा माहौल बन रहा है। हम सब उसको बल कैसे दे, उस दि‍शा में सोचना है। कोई दावा नहीं करता है कि‍हम ही लाए।

हमारे बाद कोई आएंगे तो वो उसको improve करेंगे। उनके बाद कोई आएगा और improve करेंगे और हो सकता है स्‍थि‍ति‍ऐसी आए करना न पड़े और वो जन सामान्‍य का वि‍षय बन जाए। लेकि‍न हमें करना होगा और जब तक हम इसको नहीं करेंगे। हमने अभी शहरों की एक challenging mode में competition शुरू की है। उसका परि‍णाम यह आया है Urban Development Ministry कर रही है। आज शहरों में उस शहर की elected body पर दबाव पड़ रहा है कि‍भई उन तीन में तुम्‍हारा नाम क्‍यों नहीं है हमारे शहर का नाम क्‍यों नहीं है? मैं बनारस का MP हूं, बनारस के नागरि‍क municipality पर दबाव डाल रहे हैं कि‍क्‍या बात है यह स्‍वच्‍छता के अंदर बनारस नज़र क्‍यों नहीं आ रहा? जनता का pressure बढ़ रहा है। ये बढ़ना चाहि‍ए और मैं तो चाहता हूं आप भी जहां-जहां हो ये pressure बढ़ाइए। सरकार को मजबूर कीजि‍ए। सभी elected bodies को मजबूर कीजि‍ए। हम स्‍वच्‍छता को हमारे देश हि‍त का एक महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम माने। महात्‍मा गांधी का जो सपना था, 2019 में पूरा करना, हम सबका दायि‍त्‍व क्‍यों नहीं हो सकता।

इस सरकार उस सरकार का नहीं हो सकता है मेरे माननीय सभी सदस्‍यगण ये हम सबका होना है। मैं देख रहा हूं मीडिया हाऊस दुनियाभर के विषय में दुनियाभर के विषय में हमारी आलोचना करते हैं। सरकारों की आलोचना करते हैं। ये एक विषय ऐसा है कि देश का मीडिया पार्टनर बना है। कहीं न कहीं मीडिया के लोग इस काम को कर रहे हैं खुद कार्यक्रम कर रहे हैं। खुद उसको promote कर रहे हैं। इसको एक हम सबका कार्यक्रम बनाएंगे तो देश के और देश के Tourism बढ़ाने के लिए काम आएगा और स्‍वच्‍छता जो पूंजीपतियों का विरोध करते हैं, उनके लिए तो सबसे पहले करने जैसा काम है, क्‍योंकि WHO का रिपोर्ट कहता है, इंटर नेशनल एजेंसी का रिपोर्ट कहता है कि गंदगी के कारण गरीबी में जीने वाले परिवारों को सालाना average सात हजार रूपया दवाई में खर्च होता है। अगर ये उसकी बीमारी चली जाए इसके कारण कितनी बड़ी सेवा होगी।

मैं मानता हूं, ये काम ऐसा है जिन्‍होंने किया है उसे हम आगे बढ़ाए। जितना किया है उसको और अधिक करें। अभी मैं छत्‍तीसगढ़ गया था। मैंने एक मां के पैर छुए, आदिवासी मां, पढ़ी-लिखी नहीं 90 प्‍लस उम्र है। उस मां ने अपनी तीन बकरियां बेच करके टॉयलेट बनाया। उस गांव में वो पहली महिला थी जिसे टॉयलेट बनाया। हम लोगों के लिए इससे बडा़ inspiration क्‍या हो सकता है और इसलिए और इसलिए मैं चाहूंगा कि इसको सरकार कार्यक्रम, पक्ष का कार्यक्रम, ये सरकार वो सरकार की सीमाओं में न बांधें। उसको देशहित के लिए सोचें और उसको हम बनाएंगे तो मैं समझता हूं कि बहुत अच्‍छा होगा।

कल हमारे सीताराम जी, जो उनका बेसिक फिलॉस्‍पी है उसको कल प्रकट कर रहे थे कि इतने exemption हैं, इतना फलां, आंकड़ा कहां से लाए। वो तो भगवान जाने। हां, वो आंकड़ा ढूंढा मुझे मिला नहीं। मुझे बाद में दिखा देना जी, लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि मैं वो आंकड़े की बताना चाहता हूं। टेक्‍स exemption है। जरा हम देखें 10 हजार 350 करोड़ रूपये exemption उसमें दाल और सब्‍जी में, क्‍या हम उसका विरोध करेंगे। 5800 करोड़ रूपये exemption किसके लिए चीनी के लिए।

शरद जी जो आपके बगल में बैठे है बाद में समझा देंगे आपको। 19 हजार 120 करो़ड़ रूपये exemption किसके लिए। जम्‍मू कश्‍मीर, हिमाचल, उत्‍तराखंड उनके उद्योगों के लिए। नार्थ ईस्‍ट के लिए, हम उसका भी विरोध करेंगे क्या ।
 
मैं समझता हूं कि कभी-कभार बारीकियों में जाएंगे तो हमें पता चलेगा कि हमारे जो इन बातों को ले करके आपको चिंता हो रही है। यही सरकार है, कल अरूण जी ने आपको विस्‍तार से बताया है finance की चर्चा होगी तो बताएंगे कि हमने टैक्‍स किस पर लगा रहे हैं और टैक्‍स से मु‍क्ति किसको दे रहे हैं। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा और इसके लिए। और जो चीजें हमें विरासत में दी हैं कभी आपने बाहर से समर्थन करके सरकारें चलाई उसने जो हमें विरासत में दी हैं। आज उसी को सफाई करने में हमारा दम उखड़ रहा है और इसलिए समाप्‍त करने से पहले एक मशहूर शायर निदा फाजली की जो आवाज है। अभी अभी उनका स्‍वर्गवास हुआ। उनकी बात कह करके मेरी बात मैं समाप्‍त करूंगा।

सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
किसी के वास्‍ते, राहें कहां बदलती हैं,
किसी के वास्‍ते, राहें कहां बदलती हैं
तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो, चलो
यहां किसी को कोई रास्‍ता नहीं देता
यहां किसी को कोई रास्‍ता नहीं देता
मुझे गिरा के मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो
यही है जिन्दगी , कुछ ख्वाब चंद उम्मीदें
इन्हीं खिलोने से जो तुम भी बहल सको तो चलो |
सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
बहुत बहुत धन्यवाद

Friday, 4 March 2016

Prime Minister’s Address during the International Conference on Rule of Law for supporting 2030 Development Agenda


Hon. Chief Justice of India,
Other Dignitaries on the dais,
Judicial minds from India and abroad
Invitees, Delegates, Ladies and Gentlemen!


I am delighted to address the International Workshop on Rule of Law and Sustainable Development. I welcome our friends from abroad and thank them for their active participation.


This workshop is being organized soon after two important international agreements which happened during 2015. One is the Paris Agreement on climate change. The other is the Agreement on Sustainable Development Goals. Therefore, this conference provides a timely and useful opportunity to discuss the way forward. This is important not only in the national context but also in the global context. I hope you will keep in mind the welfare of mankind and the concerns of the international community in your deliberations.

The role of rules and laws in achieving sustainable development goals is going to be very important in the days to come. However, rules should be such that they facilitate the achievement of these goals. Unfortunately, some times, the concern for environment is defined narrowly. We all have to realize that if there is conflict, no one’s purpose will be served. I hope that you will show us the way to build and ensure climate justice across the globe based on legal as well as social frameworks.

Last year, in September, I attended the meeting of the UN General Assembly where the Sustainable Development Goals for 2030 were adopted. These goals reflect our evolving understanding of the social, economic and environmental linkages that define our lives.

This was followed by the COP-21 where we contributed significantly in shaping the narrative. Our commitments at COP-21 underline the Indian ethos which aims at changing human lifestyle along with changes in the manner in which we engage in economic activity. The problems of environment are largely the effect of our consumptive lifestyles. If we want to make a meaningful impact, we all need to look within; before we read the books of law.

Friends!

I have always felt that anything which is not sustainable cannot be called development. In our culture, development means ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनो’ and “लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु’. This cannot happen unless the development process is inclusive and sustainable. Anything which compromises on the ability of future generations to meet their requirements cannot be called development. We in India have always believed in sustainability. For us, the law of nature holds great value. If we all observe it, then many man-made laws will not be required. Only the practice of सह जीवन and सह अस्तित्व will be enough to help us. In modern terminology, there is a word called stakeholder. A path becomes sustainable, if all stakeholders are benefitted. However, I must add a word of caution here. The stake should be natural. It should be inherent. It cannot be stretched to include those who may be working with ulterior motives. Nature is pure. Hence, only pure intentions can keep it intact.

We, in India, have a strong tradition of living in harmony with nature. We worship nature. We worship the sun, the moon, rivers, land, trees, animals, rain, air and fire. These elements of Nature have been given the stature of Gods in our culture. Moreover, in Indian mythology, most of the Gods and Goddesses are associated with an animal and a tree. Thus, respect for Nature is an integral part of our culture, and has been passed across generations. Protection of environment comes naturally to us. This strong tradition has been a guiding principle for all of us.

There is a well-known Sanskrit saying:
ॐ सर्वेशां स्वस्तिर्भवतु । सर्वेशां शान्तिर्भवतु ।
सर्वेशां पुर्णंभवतु । सर्वेशां मङ्गलंभवतु ।।


Which means:

We always pray for welfare, peace, fulfillment and sustainability of all; at all places and for all times.

This is our commitment; not of today but since time immemorial. If we remember this, follow this and act accordingly, India could provide leadership in sustainable development. For example, the practice of Yoga is aimed at balancing contentment and worldly desires, to lead to a path of moderation and sustainable lifestyle. When I talk of yoga, it is not just its physical dimension. Yoga is very comprehensive. The ideas of YAM, NIYAM, PRATYAHAR teach us discipline, austerity and control.

Much before the debate on sustainable development began, Mahatma Gandhi, the Father of our Nation, had said that we should act as ‘trustees’ and use natural resources wisely. It is our moral responsibility to ensure that we leave a healthy planet for future generations.


 Friends! I am sure all of us agree that poverty is the biggest challenge for environment. Therefore, eradication of poverty is one of the fundamental goals of my government. Guided by our core values, we are working towards achieving this goal with sincerity. We want to ensure a conducive environment for 1.25 billion Indians to develop, and prosper. We are encouraging education, skill development, digital connectivity and entrepreneurship to provide an enabling ecosystem for our youth to blossom. We aim to do all this in a sustainable manner.

We realize that fulfilling the demand for energy is vital to the achievement of our development goals. This is why, one of the first challenges that we took up was generation of 175 Giga watts of renewable energy. We are well on our way to achieving this objective.

We have also taken up the Swacch Bharat and Clean Ganga Initiatives. I am happy to note that millions of people across the country have joined the cleanliness drive. I take this opportunity to invite the participants to explore as to how we can strengthen this collective endeavour. I am glad to learn that this workshop will also discuss issues related to pollution and waste management. These are issues that need to be addressed proactively. I look forward to your recommendations towards strengthening such initiatives.

Friends!

The problems we face in India today are not unique. Other civilizations have also faced similar problems and were able to overcome them. I believe that through our collective efforts we will succeed as well. While doing so, we must ensure that we avoid contradictions between our need to develop and develop sustainably. Our culture teaches us Union between the व्यक्ति and समस्ती. If we become one with the universal order, there are no conflicts of interest.

Therefore, my Government is treating the challenge of adapting to climate change as an opportunity rather than a problem. We need to adopt the philosophy of योग: कर्मसु कौशलम्. We must do things in a way that causes minimum damage to the environment. This is कौशल or mastery. This is what I mean when I talk of zero defect and zero effect manufacturing. I have written some of my thoughts on this theme in my book, Convenient Action: continuity for change.

Friends! The rule of law dictates that no one can be punished for another’s misdeed. We need to recognize that there are many people who are least responsible for the problem of climate change. They are also the people who still wait for access to modern amenities. They face the adverse impact of climate change more than anyone else. This includes cyclones, droughts, floods, heat waves, and rising sea levels. The poor, vulnerable and marginalized groups have fewer resources to cope with climate disasters. Unfortunately, their present and future generations are also burdened by laws and agreements on environment. That is why I talk about Climate Justice. Moreover, the rules, laws, practices and principles of one country cannot be applied to another uniformly. Every country has its own challenges and its own ways of dealing with them. If we apply the same set of rules for all countries and for all people; it will not work.

Sustainable development is our responsibility. I am confident that we can achieve it, collectively. I am also confident that we can find ways for development which are in harmony with nature. We can find them along the road travelled by our forefathers. I hope the deliberations during this workshop will help in developing a shared understanding of these imperatives.

I wish this conference a grand success.

Thank you. 

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Sunday, 21 February 2016

Through National Rurban Mission, we want to combine the spirit of a village & facilities associated with cities: PM Modi

मेरे प्‍यारे भाइयो बहनों, आज मैं सुबह नया रायपुर में था। नया रायपुर में जब भी आता हूं कई नई चीजें देखने को मिलती हैं। लगता है दिन में जितना नया रायपुर बढ़ता है उससे ज्‍यादा रात में बढ़ता है। आज मैंने नया रायपुर में शहरों में जो गरीब होते हैं, उन गरीबों के आवास की योजना का शिलान्‍यास किया। और अभी मैं आपके बीच आया हूं। कार्यक्रम तो इन मेरे आदिवासी भाई-बहनों के बीच में है, जो दिल्‍ली से बहुत दूर है। राजनंद गांव के एक इलाके की छोटी सी जगह पर है। लेकिन कार्यक्रम बहुत बड़ा है और पूरे हिंदुस्‍तान के लिए है।

 पहले सरकार को आदत थी, कि जो कुछ भी करना है वो दिल्‍ली में से ही करना है। विज्ञान भवन में दो सौ-चार सौ लोग आ जाएं, दीप जलाएं, मीडिया वालों की मित्रता काम आ जाए, टीवी पर 24 घंटे पता चल जाए कि इतना बड़ा काम हो गया है। मैंने सरकार को दिल्‍ली से बाहर निकाल करके जन-जन के बीच में लाकर खड़ा कर दिया है। आदिवासियों के बीच में लाया हूं, किसानों के बीच में लाया हूं, गांव के बीच में लाया हूं। सरकार के अधिकारियों की फौज गांव के बीच में जाने लग गई है और विकास की एक नई दिशा चल पड़ी है। और इसलिए आज इस छोटे से स्‍थान पर इतने लाखों लोगों का जनसागर, मैं हैरान हूं इतनी बड़ी संख्या में लोग, जहां भी मेरी नजर पहुंची है, लोग ही लोग नजर आते हैं। मैं उधर पहाड़ी पर नजर कर रहा हूं पहाड़ी में भी जैसे जान आ गई है, पत्‍थर नहीं लोग नजर आ रहे हैं। क्‍या अद्भुत दृश्‍य देख रहा हूं मैं। मेरे प्‍यारे भाइयो-बहनों ये जनता-जनार्दन के आर्शीवाद इस देश को नई ऊंचाई पर पहुंचाएंगे। ये मेरा विश्‍वास हर दिन पक्‍का होता जाता है। हर दिन नया विश्‍वास पैदा होता है। ऐसा प्‍यार जो आप लोग दे रहे हैं, उससे मुझे आपके लिए ज्‍यादा दौड़ने की ताकत मिलती है, ज्‍यादा मेहनत करने की ताकत मिलती है, पसीना बहाने की प्रेरणा मिलती है।

आज मुझे यहां 104 साल की उम्र की मां कुंवरबाई का आर्शीवाद प्राप्‍त करने का सौभाग्‍य मिला। जो लोग अपने-आप को नौजवान मानते हैं, वो जरा तय करें क्‍या उनकी सोच भी जवान है क्‍या? मैं ये इसलिए कह रहा हूं कि 104 साल की मां कुंवरबाई न टीवी देखती है न अखबार पढ़ती है न वो पढ़ी-लिखी मां है, दूर-सुदूर गांव में रहती है, और उसको पता चला कि देश के प्रधानमंत्री कहते हैं कि शौचालय बनाओ। बस इस मां के कान में पड़ गया, उसने अपनी बकरियां बेच दीं और शौचालय बना दिया। 104 साल की मां के मन में विचार, ये ही हिंदुस्‍तान के बदलाव का संकेत दे रहा है। देश बदल रहा है, इसका सबूत दूर-सुदूर गांव में बैठी हुई मेरी एक आदिवासी 104 साल की मां जब शौचालय बनाने का संकल्‍प करे, और संकल्‍प करे इतना ही नहीं, पूरे गांव वालों को शौचालय बनाने के लिए मजबूर करे, इतना ही नहीं, गांव में अब कोई भी व्‍यक्ति खुले में शौचालय नहीं जाएगा ये पक्‍का करवा ले, इससे बड़ी प्ररेणा क्‍या हो सकती है। मैं आज देशवासियों को कहता हूं, मैं मीडिया वालों से भी प्रार्थना करता हूं, कि मेरा ये भाषण नहीं दिखाओगे तो चलेगा, लेकिन मेरी ये मां कुवरबाई की बात जरूर देश को बताना। ये ही तो बातें हैं जो समाज की ताकत बनती हैं। और आज मुझे मां कुंवरबाई का स्‍वागत करने का सम्‍मान करने का अवसर मिला।

मुझे आज यहां के आदिवासी क्षेत्र के दो विकास खंडों के सेवाभावी नौजवान माताएं, बहनों और भाइयों का सम्‍मान करने का अवसर मिला। अम्‍बागढ़ चौकी और छुरिया इस दो ब्लॉक, सामाजिक जागरुकता से, ये जागरुक नागरिकों के अथक प्रयास से ये दो ब्लॉक open Defection free हो गए हैं। ये दो ब्लॉक खुले में शौचलाय जाना वहां बंद हो गया और हर किसी ने शौचालय बना लिया। स्वचछ्ता, ये छोटी बात नहीं है। हिंदुस्तान के कोने-कोने में जन-जन के मन-मन में शौचालय स्वभाव बनाना है, शौचालय, स्वच्छता, बीमारी से मुक्ति, स्वस्थ भारत, सशक्त भारत इस सपनों को पूरा करने के लिए अगर कोई पहली कोई महत्वपूर्ण पंक्ति, कदम है तो वो स्वच्छता है। आज मुझे उनका सम्मान करने का अवसर मिला है। अम्बागढ़ चौकी ब्लॉक के ग्रामीण लोगों को मैं विशेषकर बधाई देता हूं। कभी-कभी देश का प्रधानमंत्री भी टैक्स लगाने से डरता है, उसको चिंता रहती है कि अरे ये करुंगा तो क्या होगा। लेकिन अम्बागढ़ चौकी के नागरिकों को मैं सलाम करता हूं कि उन्होंने खुले में कोई शौच जाए दंड करने का प्रावधान किया है और दंड करते हैं। ये बहुत बड़ी हिम्मत की बात है। समाज के लिए निर्णय़ कडवा हो तो भी करने की ताकत इन अम्बागढ़ चौकी के मेरे आदिवासी भाइयों ने आज हमें सिखाया है। उन्होंने open Defection free, खुले में शौच जाने की सदियों पुरानी आदत से लोगों को मुक्ति दिलाई है और ये जब आप खुले में शौच जाने वाला बंद कराते हैं तो वो सबसे पहले माताओं-बहनों के सम्मान का काम होता है। आज मजबूरन उनको खुले में, जंगलों में शौच के लिए जाना पड़ता है। अगर हम हमारी माताओं-बहनों को इस मुसीबत से मुक्त करा दें तो देश की कोटि-कोटि माताओं-बहनों का आशीर्वाद ये भारत को एक महान शक्तिशाली देश बना देगा और उस काम को यहां के हमारे आदिवासी भाईयों-बहनों ने करके दिखाया है, 104 वर्ष की मां ने करके दिखाया है। इससे बड़ा सफलता का मार्ग क्या हो सकता है। मैं इन सभी को सार्वजनिक रूप से सर झुका करके नमन करता हूं, मैं उनका बहुत-बहुत वंदन करता हूं, उनका हृदय से अभिंनंदन करता हूं।

आज यहां एक योजना का और भी आरंभ हुआ, जन औषधि भंडार। गरीब व्यक्ति को, परिवार मेहनत करके गुजारा करता हो, सोचता हो 5 साल के बाद ये करेंगे, 10 साल के बाद ये करेंगे। कभी सोचता हो साईकिल लाएंगे, कभी सोचता हो बच्चों के लिए कोई अच्छे से कपड़े ले आएंगे लेकिन परिवार में अगर एक व्यक्ति को बीमारी आ जाए तो गरीब के लिए तो 10 साल का पूरा planning गड्ढे में चला जाता है, आर्थिक बोझ बन जाता है, कर्जदार बन जाता है। गरीब को सस्ती दवाई मिले, गरीब को दवाई के बिना मरने की नौबत न आए इसलिए पूरे देश में जन औषधि भंडारों को अभियान चलाया है। आज मैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और उनकी पूरी टीम को बधाई देता हूं कि आज जन औषधि भंडार खोलने का आज मेरे हाथों से, मुझे करने का उन्होंने अवसर दिया, मैं इसके लिए उनका बहुत आभारी हूं।
आज Rurban Mission इसको हम प्रारंभ कर रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं Smart City तो Smart Village क्यों नहीं, ये जो Rurban Mission है ना, वही Smart Village है। हमारे चौधरी साहब, हमारे मंत्री हैं उस विभाग के, वे अभी विस्तार से बता रहे थे। ये बात सही है कि हमारे शहरों की ओर जाना बहुत तेजी से बढ़ रहा है। लोग अपने बेटों को शहरों में भेज रहे हैं, बूढ़े मां-बाप गांव में रहते हैं, नौजवान शहरों में चले जा रहे हैं, उनको एक अच्छी जिंदगी जीनी है, एक quality of life, जहां अच्छी शिक्षा हो, अच्छी अस्पताल हो, बिजली आती हो, Internet चलता हो, कहीं शाम को परिवार से साथ पलभर घूमने-फिरने जाना हो तो अच्छी जगह हो, ये उसके मन में रहता है और इसलिए वो शहर की ओर चल पड़ता है लेकिन शहरों के हाल हम देख रहे हैं कि वहां पर झुग्गी-झोंपड़ियां बढ़ती चली जाती हैं। शहरों का विकास, पिछले कई वर्षों से लोग आते गए और शहर को बढ़ाते गए। शहर में बैठे हुए लोगों ने या राज्य सरकार चलाने वाले लोगों ने, ये लोग आएंगे तो कहां रहेंगे, उनको पानी कहां से पहुंचेगा, बिजली कहां से मिलेगी, उनका drainage का क्या होगा, उनको दैनिक जीवन क्रियाएं करनी हैं तो कहां करेंगे, कोई सोचता नहीं, लोग आते हैं। कभी एक लाख जनसंख्या होगी, थोड़े समय में डेढ़ लाख हो जाएगी, फिर दो लाख हो जाएगी, फिर तीन लाख हो जाएगी और व्यवस्था वैसी की वैसी रहेगी। पानी का टंका वही रहेगा जो पहले एक लाख लोगों के लिए था। अब पांच लाख लोगों को पानी कहां से पहुंचेगा और इसलिए पिछले कई वर्षों से पूर्वानुमान लगाकर के, विकास का नक्शा तैयार करके कि अगर शहर बढ़ेगा तो इस तरफ बढ़ाएंगे, मकान नए बनाने हैं तो इस तरफ बनाएंगे, Planning ऐसा करेंगे, ये सोचा नहीं गया। और सोचा गया है तो बहुत कम जगह पर सोचा गया और उसके कारण शहरों में जाना भी लोगों के लिए दुष्कर हो गया है। इसका उपाय क्या है, क्या लोगों को उनके नसीब पर छोड़ दिया जाए, झुग्गी-झोंपड़ी में जीने के लिए मजबूर किया जाए जी नहीं, इसका उपाय सोचना चाहिए और इस सरकार ने सोचा है और उसी में से ये Rurban Mission बना है। Rurban का सीधा-सीधा अर्थ है Rural-Urban दोनों को मिला दिया Rurban, ग्रामीण और शहरी दोनों को एक साथ मिला दिया वो है Rurban, जिसका मतलब है कि विकास ऐसा हो, जिसकी आत्मा गांव की हो और सुविधा शहर की हो, ऐसा गांव। अगर हम देखते हैं कुछ 5-7 गांवों के बीच में एकाध गांव होता है। जहां पर लोग कुछ खरीदी करने आते हैं, कुछ छोटी-मोटी चीज खरीदने आते हैं लेकिन वो गांव ही होता है। इस सरकार ने सोचा क्या देश में ऐसे जो गांव हैं, जिसके अगल-बगल में 5-7 गांव होते हैं और ये गांव धीरे-धीरे बढ़ रहा है क्या वो शहर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, अपने आप बढ़ रहा है, लोग धीरे-धीरे वहां आने लगे। पढ़ने के लिए आ गए, व्यापार करने के लिए आए, नौकरी करने के लिए आए हैं। पहले 10 हजार संख्या थी, देखते ही देखते 20 हजार संख्या हो गई, देखते ही देखते 25 हजार हो गई। क्या अभी से ऐसे जो अभी से तेज गति से बढ़ रहे हैं, ऐसे गांवों को केंद्रित करके, अगल-बगले के 5-7 गावों को जोड़कर के, 25,30,40 हजार की जनसंख्या की सुविधा के लिए एक Cluster Approach से ये Rurban Mission को लागू किया जा सकता है। पूरे देश में ऐसे 300 Rurban Center ख़ड़े करने की कामना से अभी काम प्रारंभ किया है। इस वर्ष 100 ऐसे Rurban Cluster खड़े करने की कल्पना है। जिसका विकास शहर बनने वाला है, वो ध्यान में रखा जाएगा लेकिन उसके अंदर का जो गांव है, दिल में जो गांव का भाव है, उसको जिंदा रखने के लिए पूरा प्रयास होगा। एक ऐसी रचना जो भारत के स्वभाव के साथ जुड़ती है, भारत की प्रकृति के साथ जुड़ती है।

दूसरी बात भारत के आर्थिक विकास को भी 5-50 बड़े शहरों के आधार पर नहीं चलाया जा सकता है। सवा सौ करोड़ का देश, कश्मीर से कन्याकुमारी, कच्छ से कामरोप, इतना विशाल देश, अगर लोगों को रोजगार देना है, आर्थिक प्रगति करनी है तो हमें विस्तार नीचे तक ले जाना पड़ेगा। ये Rurban जो कल्पना है, उसमें उसको Growth Center बनाने की कल्पना है। आर्थिक विकास की गतिविधि का केंद्र बिंदु बनाने की कल्पना है। छोटे-छोटे बाजार होंगे, कारोबार अगल-बगल के 5-10 गावों के लिए चलता होगा तो धीरे-धीरे वो Rurban बन जाएंगे। हमारे यहां जो Tribal belt है, उन Tribal belt में आदिवासी विस्तारों में अगर हम सोचकर के Growth Centre develop किए होते, एक-एक ब्लॉक में अगर Growth Centre develop किया होता तो हमारे आदिवासी क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए इतने साल जो बीत गए, नहीं बीतते और इसलिए सुविधाएं मिलें, शिक्षा मिले, आधुनिकता मिले, साथ-साथ आर्थिक गतिविधि भी मिले। इन सारी बातों को जोड़कर के ये Rurban की योजना बनाई है। आज छोटे गांव में डॉक्टर जाते नहीं हैं, छोटे गांव में शिक्षक नहीं जाता लेकिन अगर Rurban बना दिया तो लोग वहां जाएंगे और नजदीक में 5,10,15 किलोमीटर दूरी पर दवाई सेवाओं के लिए जाना है या शिक्षा के लिए जाना है तो आराम से जाएगा, आएगा और इसलिए अगल-बगल के भी अनेक गांवों की quality of life में बहुत बड़ा बदलाव आएगा।

इस vision के साथ आज छत्‍तीसगढ़ में चार ऐसे संकूल के लिए प्रारंभ हो रहा है। मैं छत्‍तीगढ़ सरकार को बधाई देता हूं कि एक महत्‍वपूर्ण काम की योजना वो भी आदिवासि‍यों के बीच बैठ करके देश के लिए प्रारंभ हो रही है, इसका लाभ हिंदुस्‍तान के हर कोने को मिलने वाला है। और देखते ही देखते शहरों पर दबाव कम होगा। गांवों से बाहर जाने वालों के लिए एक अच्‍छी जगह उपलब्‍ध हो जाएगी, नए शहरों का निर्माण हो जाएगा। ये नए शहर व्‍यवस्थित होगे, आयोजित होंगे, आर्थिक गतिविधि के साथ जुड़े हुए होंगे। इस कल्‍पना को ले करके ये Rurban का कार्यक्रम आज प्रारंभ कर रहे हैं। मुझे विश्‍वास है कि एक साथ देश में जब योजना चलेगी, करोड़ों-करोड़ों लोगों को इसका लाभ होने वाला है।

भाइयों, बहनों यहां बहुत बड़ी मात्रा में मेरे किसान भाई-बहन हैं। मैं दो दिन पहले एक किसी पत्रकार ने लिखा था, फीचर को मैं पढ़ रहा था, उसने लिखा कि कई वर्षों के बाद किसानों के लिए भरोसे पात्र विश्‍वास पैदा करने वाली योजना पहली बार आई हैं, जो किसानों में एक नया विश्‍वास पैदा करेंगी। ये योजना है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। हमारे देश में ज्‍यादातर खेती ईश्‍वर पर आधीन है। अगर वर्षा हो गई तो ठीक, वर्षा नहीं हुई तो सूखा, ज्‍यादा हो गई तो पानी में डूब गया। प्रकृति अगर रूठ जाए तो सबसे पहला नुकसान किसान को होता है। ऐसी स्थिति में किसान को सुरक्षा मिलना जरूरी है। एक नया विश्‍वास मिलना जरूरी है। और इस बात को ध्‍यान में रखते हुए पहली बार देश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ला रहे हैं, जो पहले की योजनाओं से बिल्‍कुल अलग है। पहले तो किसान premium लेने के लिए तैयार ही नहीं होता था। उसको लगता था इतने रुपये अगर में premium दूंगा तो फिर बीज कहां से लाऊंगा, खाद कहां से लाऊंगा, पानी खेती में कहां से पिलाऊंगा, पशु को चारा कहां से खिलाऊंगा, वो देता ही नहीं था और एक बार अगर दे दिया तो पता चलता था दो-दो साल तक बीमा का पैसा ही नहीं आता है, कभी पता चलता था आया तो बीमा तो 30 हजार का लिया था लेकिन 6 हजार रुपया ही मिला। और बीमा तो उसको मिला जिसको बैंक का लोन मिला था, तो सीधे बैंक वाले को चला गया, किसान के पास तो कुछ आता ही नहीं था। ये जितनी बीमारियां थीं, सारी बीमारियों को हमने खत्‍म कर दिया। एक नई ताकत वाली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लाए जिसमें अब उसको प्रीमियम भी ज्‍यादा नहीं देना पड़ेगा। डेढ़ पर्सेंट, दो पर्सेंट पड़ा वो। वरना पहले तो कुछ इलाकों में 52-52 प्रतिशत प्रीमियम गया है। 8, 10, 14, 15 प्रतिशत तो Routine चलता था। हमने पक्‍का कर दिया कि दो पर्सेंट से ज्‍यादा नहीं, डेढ़ पर्सेंट से ज्‍यादा नहीं। ये पक्‍का कर दिया और इसलिए अब किसान को ज्‍यादा देना नहीं पड़ेगा।

दूसरा फसल खेत में से तैयार हो गई। अच्‍छी बारिश हुई, अच्‍छी फसल हो गई, और फसल काट करके खेत में ढेर पड़ा हुआ है। ट्रैक्‍टर मिल जाए ले जाने के लिए इंतजार हो रहा है। इतने में अचानक बारिश आ गई, तो उस बेचारे को एक पैसा नहीं मिलता था। बारिश आने तो उसका तो बरबाद हो गया, ढेर किसी काम का नहीं ऐसा ही ढेर देखने का। इस सरकार ने निर्णय किया कि फसल काटने के बाद खेत में अगर ढेर करके पड़ा है, और 14 दिन के भीतर-भीतर अगर कोई आपत्ति आ गई और नुकसान हो गया, तो उसको भी फसल बीमा मिलेगा।
ये बहुत बड़ा निर्णय किया है। पहले बहुत बड़े इलाके में तय होता था कि यहां वर्षा हुई तो इसका हिसाब लगाया जाता था। इसके कारण क्‍या होता था, पांच गांव में अच्‍छी बारिश हुई हो, दस गांव बेचारे सूखे में पड़े हों, उनको मिलता नहीं था। हमने कह दिया, कि छोटी इकाई को भी अगर उसका नुकसान हुआ है, तो उसको भी भरपाई हो जाएगा, उसको फसल का बीमा मिल जाएगा। इतना ही नहीं, दो-दो साल तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। उसको technology के माध्‍यम से तत्‍काल पैसे मिल जाएं इसका प्रबंध किया जा रहा है। कभी-कभार किसान तय करता है कि जून महीने में बारिश आने वाली है, सब ready रखता है, लेकिन जब तक बारिश नहीं आती, वो बोवनी नहीं कर पाता है, जून महीना चला जाए वो बेचारा बारिश की इंतजार कर रहा है, जुलाई महीना चला जाए वो इंतजार कर रहा है, अगस्‍त महीना चला जाए वो इंतजार कर रहा है, बारिश आई नहीं। तो ऐसा किसान क्‍या करेगा? जिसको बेचारे को बारिश आई ही नहीं, बोवनी का ही मौका नहीं मिला। तो सरकार ने कहा है, इस फसल बीमा योजना के तहत अगर वो फसल बो भी नहीं पाया और उसका नुकसान हो गया, तो भी उसको 25 प्रतिशत उसका साल भर पेट भरने के लिए तुरंत पैसा दे दिया जाएगा।

भाइयो, बहनों हिंदुस्‍तान के इतिहास में किसानों के लिए इतना बड़ा सुरक्षा कवच अगर किसी ने दिया है तो पहली बार दिल्‍ली में आपने हमें बिठाया और हमने आपकी सेवा में रखा है। भाइयो, बहनों ये सरकार गरीबों के लिए है। ये सरकार दलितों के लिए है। ये सरकार आदिवासियों के लिए है। ये सरकार पीडि़तों के लिए है। ये सरकार वंचितों के लिए है। समाज में आखिरी छोर पर जो बैठे हैं, उनके कल्‍याण के लिए एक संकल्‍प करके ये सरकार आई है, और इसलिए चाहे घर बनाने की योजना हो, चाहे जन औषधि भंडार करना हो, चाहे Rurban mission हो, चाहे फसल बीमा योजना हो, चाहे स्‍वच्‍छता का अभियान हो, चाहे खुले में शौच बंद कराने का प्रयास हो, ये सारी बातें सिर्फ और सिर्फ गरीब के लिए हैं। गरीब की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए हैं।

भाइयों, बहनों ये ही बातें हैं जो आने वाले दिनों में परिणाम लाने वाली हैं। और मेरा तो विश्‍वास जब 104 साल की मां कुंवरबाई आर्शीवाद दें तो मेरा विश्‍वास लाखों गुना बढ़ जाता है, लाखों गुना बढ़ जाता है। ये ही रास्‍ता है, इसी रास्‍ते से देश का कल्‍याण होने वाला है, और उस रास्‍ते पर हम चल पड़े हैं। फिर एक बार मैं आपका बहुत-बहुत आभार व्‍यक्‍त करता हूं, आप सबको नमन करता हूं, आप सबको धन्‍यवाद करता हूं। भारत माता की जय।
Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Sunday, 14 February 2016

Swami Dayananda Saraswati ji’s life inspires us even today do something good for the nation: PM Modi

हिमाचल प्रदेश के राज्यापाल श्रीमान आचार्य देवव्रत जी, D.A.V. कॉलेज management कमेटी के अध्यकक्ष डॉ. पूनम सूरी जी और विशाल संख्या में पधारे हुए सभी आर्य पुत्र-पुत्रियां, 
मैं आर्य समाज की इस महान परंपरा और उस से संबंधित सभी महानुभाव का हृदय से आभार व्यक्त‍ करता हूं। इस विशाल शक्ति स्रोत का, संस्कार की धारा का, आचमन लेने का मुझे सौभाग्य मिला है। मुझे पूनम जी बता रहे थे कि आर्य समाज में दो मुख्य धाराएं पिछले 130 साल से चल रही थी और 130 साल के बाद आज यह पहला अवसर आया है कि जब दोनों धाराएं मिल करके आगे बढ़ने का संकल्प कर रही है। यह बात मेरे लिए इतनी गौरवपूर्ण है, इतनी आनंददायक है, जिसका मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। जब यह दोनों शक्तियां, दोनों संस्कार प्रवाह एक बन करके नई दिशा, नया संकल्प ले करके चलेंगे तो राष्ट्र का कितना कल्याण होगा, इसका मैं भलिभांति अनुमान लगा सकता हूं। और इसके लिए मैं इस निर्णय प्रक्रिया से जुड़े हुए सभी महानुभावों का अंत:करण पूर्वक हृदय से धन्यवाद करता हूं, साधुवाद करता हूं।

पूनम जी बता रहे थे कि गुजरात की धरती ने स्वामी दयानंद जी दिए, लेकिन इस बात में आज चलते-चलते वो मेरे तक पहुंच गए। उस महापुरूषों के नामों की श्रृंखला में मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति का नाम जुड़े, ऐसा कोई हक मेरा बनता नहीं है। वो महापुरूष इतने बड़े थे उनके चरणर ले करके हम कुछ अच्छा पा सके, उनका आशीर्वाद मिले और हम सबको जिस समय जो दायित्व मिलता है, उस दायित्व को पूर्ण समर्पण के भाव से हम निभाएं, यही शक्ति हमें मिलती रहे, ताकि हम देश का अच्छा कल्याण कर पाएं।

1857 इस देश ने स्वतंत्रता संग्राम के द्वारा अपनी आत्मिक शक्ति का दर्शन कराया था। शताब्दियों की गुलामी के बाद एक चेतना प्रकट हुई थी और वह भी छुटपुट नहीं, दो-पांच-पचास आजादी के दिवानों के पराक्रम तक सीमित नहीं। एक प्रकार से पूरा देश उठ खड़ा हुआ था, लेकिन इच्छित परिणाम प्राप्त नहीं हुए। विदेशी ताकतों ने देश को फिर से एक बार दबोच दिया। उस पार्श्व भूमि को हम देखें, 1857 के स्वातंत्र संग्राम के बाद के उन दिनों को याद करें, इतिहास के पन्नों को देखें। तब ध्यान आता है कि 1875 में आर्य समाज की स्थापना क्यों हुई होगी। उसकी पार्श्व भूमि वो 1857 का स्वातंत्र संग्राम है।

स्वामी दयानंद जी ज्ञान मार्ग के प्रणेता थे। वेद के प्रकाश में सत्य को पा करके, सत्य के प्रकाश को आने वाली पीढ़ियों को परिचित कराने का स्वावमी दयानंद जी ने प्रयास किया था। वे स्वभाव से क्रांतिकारी थे और क्रांतिकारी होने के नाते वे अंधविश्वास के खिलाफ लड़ना, परंपराओं को चुनौती देना और वो भी परिस्थितियों से भाग करके नहीं, अपने आप को महान हिन्दू संस्कृति आर्य परंपरा का सिपाही मानते हुए, उसके भीतर रहते हुए, उन्हीं गेरूए वस्त्रों को धारण करते हुए, उसी समाज की बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ना यह बहुत बड़ी ताकत लगती है। व्यवस्था से बाहर जा करके आलोचना करना, अपने आप को बड़ा बताना अलग बात है। व्यवस्था के भीतर रह करके उसी परंपराओं का गौरव करते हुए जो काल बाह्य चीजें हैं उसको चुनौती देने के लिए एक अनन्य प्रकार की शक्ति लगती है और उस शक्ति के स्रोत पूज्य स्वामी दयानंद जी थे।

और उस महा पारस के विचार प्रक्रिया, चिंतन के प्रति समर्पण, ज्ञान के अधिष्‍ठान पर विचार, मनन, चिंतन उसके आधार पर निरंतर प्रजा जीवन में purification होता रहे इस बात को उन्हों ने बल दिया और उसी का परिणाम है कि महर्षि जी के जाने के बाद भी उतनी ही तीव्रता से, उतने ही समर्पण भाव से यह आंदोलन आज भी चल रहा है। और इसलिए उस विचार बीज की वो ताकत है। उस विचार बीज का वो सामर्थ्य है कि उसके कारण आर्य समाज रूपी एक विशाल वट वृक्ष आज पूरे देश को छाया दे रहा है। हमारे सपनों को पनपने का अवसर दे रहा है। चुनौतियों से जुझने का सामर्थ्यद दे रहा है। और इसलिए मैं आज इस महान परंपरा, महान संगठन, इस महान आंदोलन को नमन करता हूं और पूज्य महर्षि स्वामी दयानंद जी के चरणों में भी वंदन करता हूं।

इतना बड़ा विशाल परिवार, 20 लाख छात्र हो, 60 हजार से ज्या दा आचार्य-प्राचार्य हो। और जैसे परम जी बता रहे थे कि करीब दो करोड़ परिवारों से तो हमारा रोज का नाता रहता है। और एक श‍ताब्दी से ज्यादा समय से सेवा जिस संस्था ने की हो, तो उसका एल्‍युमिनाई भी कितना बड़ा होगा। यहां तो आपने 40 लाख लिखा है, लेकिन मैं नहीं मानता हूं कि 40 लाख होगा। वो बहुत बड़ा विशाल परिवार होगा। यह सब मिल करके हर वर्ष एक विषय तय करे और पूरी शक्ति उस विषय पर लगा दे। आप देखिए नतीजे नजर आने लगेंगे। दुनिया को ध्यान आएगा, अगर D.A.V. तय कर ले कि 2020 में जब ओलंपिक होगा तब D.A.V. का छात्र Gold medal ले करके आएगा, मैं कहता हूं कर सकते हैं।

नये संकल्प क्या हो सकते ? नये संकल्प यही हो कि भारत की विश्व् में गरिमा कैसे बढ़े। D.A.V. का सिर्फ हिंदुस्तान में डंका क्यों बजे, दुनिया में क्यों न बजे? और इसलिए जब आर्य समाज को 150 वर्ष होंगे, 2025 में। 1875 में प्रारंभ हुआ आर्य समाज, 2025 में एक सौ पचास वर्ष होंगे। क्या, अभी से गुरूकुल परंपरा हो, D.A.V हो, आर्य समाज की और संगठन हो। यह कोई पांच सूत्री, 10 सूत्री कार्यक्रम बना सकते हैं कि आर्य समाज के 150 वर्ष जब मनाएंगे, तब तक हम 2025 तक यह जो हमारे पास 10-11 साल है, 8-9 साल है उसका उपयोग इन बातों को हम परिणाम तक ला करके रहेंगे। ऐसा संकल्प किया जा सकता है? और तब मैं मानता हूं स्वामी दयानंद सरस्व्ती जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

और इसलिए अभी से एक रोड मैप बने। आर्य समाज को यह कहने की जरूरत नहीं है क्या करो, क्या न करो? उनकी मूल धारा ही राष्ट्र के कल्याण के लिए साथ जुड़ी हुई है। जिसमें भारत का भला हो उसी में आर्य समाज को भलाई दिखती है। और इसलिए भारत का भला और 21वीं सदी का भारत, 18वीं शताब्दी का भारत नहीं, आधुनिक भारत, वैज्ञानिक भारत, विश्व का नेतृत्व‍ करने का सामर्थ्य रखने वाला भारत, उस भारत के सपनों को पूरा करने के लिए हमने अपने आप को तैयार करना होगा। उसी प्रकार से अभी पूनम जी मुझे बता रहे थे कि हमें एक काम दीजिए आप और हम उसको करके दिखाना चाहते हैं। सामान्यतः ऐसे किसी function में जाते हैं तो वो जो बुलाने वाले लोग होते हैं बुलाते समय तो हमें बहुत बताते हैं कि आप बहुत बड़े आदमी हो, आप आइये, हमारी शोभा बढ़ेगी, हमारा यह होगा, हमारा वो होगा। और जब जाते हैं तो memorandum पकड़ा देते हैं कि हमारे लिए यह करो, हमारे लिए वो करो। यह अकसर हमारा अनुभव रहता है और वो गलत है ऐसा मैं नहीं कहता हूं। स्वाभाविक भी है, लेकिन यहां मेरा अनुभव अलग हो रहा है। यहां मुझसे कुछ मांगा नहीं जा रहा है। मुझे कहा जा रहा है कि मोदी जी हमें कोई काम बताओ। मैं इस बात को छोटी नहीं मानता हूं, बहुत बड़ी बात है यह मेरे लिए कि कोई मेहमान के रूप में कहीं जाए और बुलाने वाला हमसे कुछ मांगे नहीं। और ऊपर से यह कहे कि हमारे लिए कोई काम बताइए तो मैंने पूनम जी को कहा, क्या लगता है, क्या कर सकते हैं आप? तो उन्होंने कहा क्या गंगा सफाई का जो आपका सपना है, क्या उसमें हम जुड़ सकते हैं क्या ? हम हमारे D.A.V. के छात्रों को गंगा सफाई के काम से जोड़ेंगे। हमारे शिक्षकों को जोड़ेंगे, हमारे अभिभावकों को जोड़ेंगे। गंगा सफाई का अभियान करते-करते कई सरकारें आई और चली गई, पूरा नहीं हुआ। लेकिन आज मुझे लगता है कि गंगा सफाई होकर रहेगी, अगर मुझे ये साथ मिल जाए।  
जब जनता-जनार्दन के आशीर्वाद होते हैं तो कोई समस्या , समस्या़ नहीं रहती है। वो समस्या अपने आप में अवसर में पलट जाती है और आज मैं देख रहा हूं कि D.A.V. की यह शक्ति, आर्य समाज की शक्ति, गुरुकुलों की शक्ति, आर्य समाज से जुड़े हुए सभी साधु महात्माओं की शक्ति, यह सब जब गंगा सफाई के आंदोलन का हिस्सा बन जाए तो फिर तो गंगा सफाई, मैं नहीं मानता हूं वो सपना कभी अधूरा रह सकता है और यही नया संकल्प है। गंगा साफ हो तो सिर्फ वहां पर जाने-आने वालों के लिए या नजदीक में रहने वालों के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान का गौरव बढ़ाने वाली वो घटना होगी।

एक काम हम शुरू करे, हम गंगा को गंदी नहीं होने देंगे। एक बार हम तय कर ले कि हम गंगा को गंदी नहीं होने देंगे तो गंगा में अपने आप ताकत है, सफाई तो वो अपने आप कर लेगी। आज मुसीबत गंगा की वो नहीं है, मुसीबत हम है जो उसे गंदा करते हैं। एक बार गंगा तट पर रहने वाले सभी, एक बार संकल्प कर ले। गंगा के दर्शन के लिए आने वाले लोग संकल्प कर ले कि हम गंगा को गंदी नहीं होने देंगे तो गंगा सफाई सफल होने में कोई कठिनाई नहीं आएगी। यह मेरा विश्वा स है और D.A.V. का यह दो करोड़ का परिवार लग जाए तो मैं नहीं मानता हूं कि हमारी गंगा अशुद्ध रह सकती है। जब हम आर्य समाज के डेढ़ सौ साल मनाए, तब हम इस भारत मां के चरणों में शुद्ध गंगा कैसे दे, साफ-सुथरी गंगा कैसे दे? यह सपने लेकर के चले, यह मैं आपसे अनुरोध करता हूं।

दुनिया कहती है 21वीं सदी एशिया की सदी है। कुछ कहते है 21वीं सदी भारत की सदी है। सदियों से यह पाया गया है कि जब-जब मानव जाति ज्ञान युग में प्रवेश किया है, भारत विश्व का नेवृत्व करता रहा है। 21वीं सदी भी ज्ञान की सदी है और जब 21वीं सदी ज्ञान की सदी हो, स्वयं दयानंद जी ज्ञानमार्गी हो और भारत के अंदर 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 साल से कम उम्र की हो। हिन्दुस्तान आज दुनिया में सबसे जवान है और जो देश दुनिया में सबसे जवान होता है, उस देश के सपने भी जवान होते है, इरादे भी जवान होते है, संकल्प भी जवान होते है और इसलिए इस देश की युवा शक्ति जो आज मेरे सामने मैं देख रहा हूं। यह 65 प्रतिशत जनसंख्या, यह भारत का भाग्य ही नहीं, विश्व का भाग्य बदलने के लिए ताकतवर है। इसलिए हमारी कोशिश है कि हमारे देश की अमूल्य विरासत, यह अनमोल संपदा, इसको राष्ट्र के कल्याण के लिए कैसे लाया जाए? राष्ट्र को आगे बढ़ाने के लिए युवा शक्ति पर ध्यान केन्द्रित कैसे किया जाए? और इसलिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण निर्णय उठाए है।

Skill development, हम जानते हैं हम graduate हो जाए, अच्छे से अच्छेर marks ले आए, बढ़िया से बढिया इंस्टीट्यूट का सर्टिफिकेट हो, लेकिन जब समाज के अंदर पढ़ाई पूरी कर करके जीवनचर्या करने का प्रारंभ करते हैं। कहीं पर जाते हैं नौकरी पाने के लिए, नौकरी देने वाला पूछता है – कोई experience है क्या ? सबसे पहला सवाल पूछता है, आपका कोई experience है क्या ? और उसका जवाब हम नहीं दे पाते हैं। हमें यह पूछते हैं कि आपके पास सर्टिफिकेट तो है लेकिन कुछ और आता है क्या? तब भी हम मुंडी नीचे कर लेते हैं। हम नहीं चाहते कि हमारे देश का नौजवान इस प्रकार से अपने आप को अनुपयोगी समझने लग जाए। तो उसके हाथ में सर्टिफिकेट होना काफी नहीं है, उसके हाथ में हुनर होना आवश्यक है। और इसलिए हमने Skill development का अभियान चलाया है। देश के नौजवानों के पास कोई न कोई हुनर होना चाहिए और अपने पैरों पर खड़े रहने की उसमें ताकत होनी चाहिए और मुझे विश्वास है कि हमारे देश के नौजवानों को अगर सही अवसर मिल जाए तो वो परिणाम प्राप्त कर करके ले सकते हैं, दे सकते हैं।

पूरे देश में Skill development का अभियान चलाया है। हमारी सरकार बनने के बाद Skill development अलग ministry बना दी गई, अलग बजट निकाला गया, अलग अफसरों की फौज लगा दी गई, ताकि हिन्दुस्तान के कोटि-कोटि नौजवानों को Skill development का लाभ मिले। आने वाले दिनों में, 2030 में, दुनिया का हाल यह होने वाला है कि कई देश ऐसे होंगे कि जहां पर नौजवान ही नहीं होंगे। सारे बूढ़े-बूढ़े परिवार ही रहते होंगे, ऐसी स्थिति आने वाली है। सारी दुनिया को एक work force की जरूरत होगी और दुनिया को जो work force की जरूरत है वो work force supply करने की ताकत अगर किसी में होगी, तो हिन्दुस्तान में होगी। हमारे हिन्दुस्तान का नौजवान अपने बलबूते पर दुनिया का भाग्य बदल दे, ऐसे दिन आने वाले हैं।

हमने एक योजना शुरू की - मुद्रा योजना। हमारे देश के आर्थिक विकास में हमेशा दो विषयों की चर्चा चली है, या तो प्राइवेट सेक्टर या पब्लिक सेक्टर। आर्थिक कारोबार चलाने के दो ही तरीके सामने आए है - प्राइवेट सेक्टर, पब्लिक सेक्टर। हमने नया विचार किया है। यहां जो बात आई है, नई दिशा। हमने कहा, प्राइवेट सेक्टर अपना काम करे, पब्लिक सेक्टर अपना काम करे। फले-फूले बहुत आगे बढ़े, लेकिन देश को आगे बढ़ाने के लिए एक तीसरे सेक्टर की जरूरत है, और उसको हमने कहा है – पर्सनल सेक्टर। हर व्यक्ति में वो सामर्थ्य हो, अपने बलबूते पर खड़ा रहे और वो job-seeker न बने, job-creator बने। दो को, पांच को, सात को, रोजगार देने वाला बने और इसलिए हम वो ताकत खड़ी करना चाहते हैं।

समाज के छोटे-छोटे लोग, जिनको कभी बैंक के अंदर प्रवेश तक नहीं मिलता था। हमने मुद्रा योजना के तहत कहा है कि जो सामान्य लोग है, बाल काटने वाला नाई होगा, धोबी होगा, अखबार बेचने वाला होगा, दूध बेचने वाला होगा, चाय बेचने वाला होगा, सामान्य लोग समाज के, मुद्रा योजना से उनको पैसे दिए जाएंगे और किसी भी प्रकार की गारंटी के बिना पैसे दिए जाएंगे, ताकि वो साहूकारों के ब्याज के चक्कर से मुक्त हो जाए और उसको 50 हजार, लाख, दो लाख, पांच लाख रुपया चाहिए तो वो अपना कारोबार बढ़ा सकता है। आज अगर वो दो लोगों को रोजगार देता था तो पांच को दे सकता है। कोई और काम नहीं कर सकता है तो नई शुरूआत कर सकता है। कोई ऑटो रिक्शा। लाकर के अपनी गाड़ी चला सकता है। परिवार को अपने पैरों पर खड़ा कर सकता है और इसलिए मुद्रा योजना शुरू की है।

मुझे खुशी है कि हमने कोई ढोल नहीं पीटे, बड़े-बड़े मेले नहीं लगाए, राजनीतिकरण नहीं करने दिया। दो करोड़ से ज्या्दा लोगों को अब तक मुद्रा योजना का पैसा दिया जा चुका है और करीब-करीब एक लाख करोड़ रुपया कोई भी गारंटी के बिना इस देश के लोगों पर भरोसा करके देने का हमने निर्णय किया, कर दिया काम। वो देश की आर्थिक स्थिति को चलाएंगे। हमारी सरकार की नई दिशा यही है कि हम सामान्या मानिवकी पर भरोसा करते हैं। हिन्दुस्तान की सरकार, हिन्दुस्‍तान के नागरिकों पर आशंका करे, ये दूरियां मिटनी चाहिए और हमने तय किया कि हम नागरिकों के प्रति विश्वास करेंगे, भरोसा करेंगे।

आपको पता होगा, यहां जो टीचर बैठें होंगे उनको तो बराबर याद होगा। पढ़ाई आप करे, मेहनत आप करे, रात-रात जागकर के पढ़ाई आप करे, परीक्षा आप दे, marks आप लाए, position आपको प्राप्त हो। लेकिन जब कहीं नौकरी चाहिए, सरकार में अर्जी करनी है तो आपका सर्टिफिकेट तब तक नहीं माना जाता है जब तक उस नगर का कोई राजनेता उस पर ठप्पा नहीं मारता, सर्टिफाई नहीं करता, तब तक आपका वो सर्टिफिकेट, सर्टिफिकेट नहीं माना जाता। नागरिकों के प्रति इससे बड़ा अविश्वाास क्या हो सकता है? हमने आकर के निर्णय कर दिया कि सर्टिफाई करने के लिए किसी के पास जाने की जरूरत नहीं है। आप अपना सर्टिफिकेट Xerox करके भेज दीजिए। जब final निर्णय करना होगा तब original लेकर के आना, देख लेंगे बात चल जाएगी। नागरिकों पर भरोसा करना चाहिए। वैसा ही भरोसा हमने मुद्रा योजना में किया। कोई गारंटी नहीं, ले जाओ भाई। और मेरा मत है, सामान्य मानविकी, गरीब आदमी ब्याज समेत पाई-पाई चुकता कर देता है और समय से पहले चुकता कर देता है, वो कभी पैसे डुबोता नहीं है। मैंने गरीबों की अमीरी को देखा है। अमीरों की गरीबी भी देखा है, लेकिन मैंने गरीबों की अमीरी को देखा है।

जब हमने ‘प्रधानमंत्री जन-धन योजना’ की और लोगों को कहा था, zero balance से account खुलेगा। एक पैसा नहीं दोगे तो भी बैंक account खुलेगा क्यों कि मेरी इच्छा थी कि हिन्दुस्तान के गरीब से गरीब व्यक्ति का भी बैंक के ऊपर हक होना चाहिए। 60 प्रतिशत लोग उसके बाहर थे, उनको लाना था। Zero balance से बैंक account खुलने वाला था, लेकिन आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि सरकार ने तो मुफ्त में खाता खोलना तय कर दिया था, लेकिन हमारे गरीबों की अमीरी देखिए। उन्होंने कहा, नहीं-नहीं हम मुफ्त में नहीं करेंगे, पांच रुपया-दस रुपया भी रखेंगे और 30 हजार करोड़ रुपया रखा लागों ने, 30 हजार करोड़ रुपया। अगर एक बार सामान्य मानविकी पर भरोसा करे तो वो कितनी ताकत का दर्शन करा देता है, उसका यह नमूना है।

हमने नौजवानों के लिए ‘स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया’ अभियान चलाया है। Skill development हो, मुद्रा योजना से पैसा मिले, ‘स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया’ innovative चीजें करें। खासकर के हमारे दलित भाई-बहन, हमारे schedule tribe के भाई-बहन, आदिवासी भाई-बहन, वो भी अपने बलबूते पर, अपनी ताकत पर आगे आए, उसके लिए सरकार को मदद करनी चाहिए। मैंने कहा सवा लाख branches को, क्याप आप मुद्रा योजना से हर बैंक एक दलित को, एक आदिवासी को बैंक loan दे। हिन्दुस्तान में सवा लाख branches है, ढाई लाख नए उद्योगकार यहीं हमारे समाज में से आ सकते हैं। गरीब, दलित, पीड़ित, शोषित समाज में से आ सकते हैं और काम तेज गति से चल रहा है।
हमने ‘स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया’ के द्वारा देश के नौजवानों को आह्वान किया है कि नए तरीके से कुछ करने का माद्दा रखिए। आइए, सरकार आपके साथ खड़ी रहेगी और हम दुनिया के अंदर एक Start-up Capital के बलबूते पर आगे बढ़े, ताकि हमारे नौजवानों को अवसर मिले। एक के बाद एक इस प्रकार के कार्यकम जिसके कारण समाज सशक्त हो, परिवार अपने पैरों पर चल सके इतने ताकतवर हो। परिवार के सपने पूरे हो, उन बातों को लेकर के आगे बढ़ रहे हैं। आज सारी दुनिया ने माना है चाहे World Bank हो, IMF हो और भी कोई संगठन हो, हर किसी का कहना है कि दुनिया पूरी आर्थिक संकट से गुजर रही है। एक अकेला हिन्दुस्तान आज पूरे विश्व में आर्थिक रूप से तेज गति से आगे बढ़ रहा है। असामान्य स्थि‍ति है। सारी दुनिया डूब रही है, उस समय हिन्दुस्तान चमक रहा है। यह बात दुनिया के लोग कह रहे हैं। पिछले डेढ़ साल में एक के बाद एक जो कदम उठाए, आज उसका नतीजा है कि आज हिन्दु‍स्तान जो larger economies है, बड़ी economies है, उसमें सबसे ज्यादा तेज गति से आगे बढ़ने वाला देश बन गया है।

हमारी सभी समस्याओं का समाधान एक ही बात में है। हमें मुसीबतों से मुक्ति एक ही बात से मिल सकती है। हमें गरीबी से मुक्ति एक ही बात से मिल सकती है। हमें अशिक्षा से मुक्ति एक ही बात से मिल सकती है। हमें बीमारी में दवाई एक ही बात से मिल सकती है। और वो एक बात है – विकास। विकास, यही एक मार्ग है जो भारत के गरीब मानविकी को संकटों से बाहर ला सकता है। मुसीबतों से बाहर ला सकता है और इसलिए हमारी सरकार ने ध्यान केन्द्रित किया है विकास के कामों पर। देश तेज गति से आगे बढ़ना चाहिए। कृषि में विकास हो, गांवों का विकास हो, शहरों का विकास हो, गरीब को रोजगार हो, इन बातों पर हम बल दे रहे हैं और आज उसके अच्छे नतीजे दिखाई देने लगे है।

आज जब मैं आपके बीच आया हूं और आप वो लोग है जो समाज के लिए कुछ न कुछ करने के संस्कार से जुड़े हुए हैं। जो भी सात्विक शक्तियां हैं उन्हें आज प्रखरता से काम करने की आवश्यकता है। जितनी सात्विक शक्तियां एक बनकर के, प्रखर होकर के आगे आएगी, इस देश को रोकने के सपने देखने वालों के सपने चूर-चूर हो जाएंगे। इसी संकल्प को लेकर के आगे बढ़े। मैं फिर एक बार आचार्य जी का, पूनम जी का, आप सब का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं कि मुझे आज आप सब के बीच आने का अवसर मिला और पूज्य स्वामी दयानंद जी को स्मरण करने का अवसर मिला। बहुत-बहुत धन्यवाद।