Showing posts with label Culture. Show all posts
Showing posts with label Culture. Show all posts

Friday, 17 June 2016

The convergence of Thailand's 'Look West' & India's 'Act East' policy lights the path to a bright future of our partnership: PM


You Excellency Prime Minister General Prayut Chan-o-cha Ladies and Gentlemen

It is a great pleasure to welcome you to India.

Your visit is a high point in our top-level political exchanges.
You come from a land that is very familiar to us.

From the Legend of Rama to the Wisdom of Buddha our ties are founded on a shared cultural heritage. Our historical people-to-people ties provide a strong basis to our partnership.
Thailand is a trusted and valued friend, and one of our closest partners in Southeast Asia.

Friends,

Today, Prime Minister and I reviewed the full range of our bilateral engagement:
From culture to commerce;

From closer contacts between our peoples to deeper connectivity; and From counter-terrorism to defence and security.

We are both aware that rapid spread of terrorism and radical ideology poses a common challenge to both our societies.

And, we also recognize that our close security partnership would help us to secure our peoples from these threats.

In our shared objective to combat these challenges, India is particularly grateful to Thailand for its assistance and cooperation.

Beyond terrorism, we have agreed to further deepen our security engagement in the fields of cyber security, narcotics, transnational economic offenses and human trafficking.

|
Friends,

The land frontiers of our two countries are not far apart.
And, we are also maritime neighbours.

So, Prime Minister and I have agreed to forge a closer partnership in the fields of defence and maritime cooperation.

A partnership to meet our bilateral interests ; and to respond to our shared regional goals.
And a partnership, which will be shaped by:
Sharing of expertise and experiences;
Greater staff exchanges and more exercises;
Cooperation on counter-piracy on seas;
Deeper engagement in naval patrolling; and Building linkages in the field of defence R&D and production.

|
Friends,

Trade and commerce flows are an important lifeline of the interdependent world today.
Excellency and I agree that a more diversified commercial engagement between us would not only benefit both our economies. It would also enable greater regional economic prosperity.
In this context, we welcome the first meeting of the India-Thailand Joint Business Forum to be held later today. We encourage them, and the other business-sector stakeholders, to take lead in tapping the emerging business opportunities in both our countries.

Alongside trade, there are also ample avenues for greater manufacturing and investment linkages.
We see a particular synergy between Thai strengths in infrastructure, particularly tourism infrastructure, and India's priorities in this field.

Information Technology, pharmaceuticals, auto-components, and machinery are some other areas of promising collaboration.

We also see early conclusion of a balanced Comprehensive Economic and Partnership Agreement as our shared priority.

|
Friends,

Prime Minister and I are fully aware that smooth flow of goods, services, capital and human resources between our economies needs a strong network of air, land and sea links.

We have, therefore, prioritized completion of India-Myanmar-Thailand Trilateral highway; and early signing of the Motor Vehicles Agreement between our three countries.

Connectivity is also an area of priority for India’s development.

Improving access to Southeast Asia from our Northeastern States benefits both our peoples.

Friends,

Stronger connectivity is essential not just for expanding bilateral trade ties. It also brings our people closer and facilitates enhanced science, education, culture and tourism cooperation.

Next year, to commemorate the seventy years of establishment of our diplomatic relations, we will celebrate Festival of India in Thailand, and Festival of Thailand in India.

This year, India is also celebrating one hundred and twenty-fifth birth anniversary of Dr. B.R. Ambedkar, the architect of Indian Constitution.

I am delighted that the Indian Constitution will soon be translated into Thai language.

I am also happy to announce that to welcome more tourists from Thailand to India, and to help them enjoy their visits to Buddhist sites in India, we will soon facilitate double entry e-tourist visas for citizens of Thailand.

Excellency,

India has always deeply appreciated the warmth and affection of the Royal Family of Thailand for India.

Her Royal Highness Princess Maha Chakri Sirindhorn has been a frequent and very welcome visitor to India.

We look forward to welcoming her in India again later this year.

We also look forward to the honour of receiving His Royal Highness Crown Prince Vajiralongkorn in India at his earliest convenience.

In conclusion, let me say that the convergence of Thailand's 'Look West', and India's 'Act East' policy lights the path to a bright future of our partnership.

Excellency, let me once again welcome you and your delegation to India.

Thank you.

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Friday, 11 March 2016

World Culture Festival‬ is a Kumbh Mela of culture: PM Modi

परम पूज्य श्री श्री रविशंकर जी ....सभी वरिष्ठ महानुभाव ,

मैं भारत की धरती पर आप सबका हृदय से स्‍वागत करता हूं। भारत इतनी विविधताओं से भरा हुआ है, विश्‍व को देने के लिए भारत के पास क्‍या कुछ नहीं है। दुनिया सिर्फ आर्थिक हितों से ही जुड़ी हुई है ऐसा नहीं है, दुनिया मानवीय मूल्‍यों से भी जुड़ सकती है और जोड़ा जा सकता है और जोड़ना चाहिए भी।

भारत के पास वो सांस्‍कृतिक विरासत है, वो सांस्‍कृतिक अधिष्‍ठान है जिसकी तलाश दुनिया को है। हम दुनिया की उन आवश्‍यकताओं को कुछ न कुछ मात्रा में, किसी न किसी रूप में हम परिपूर्ण कर सकते है। लेकिन ये तब हो सकता है जब हमें हमारी इस महान विरासत पर गर्व हो, अभिमान हो।

अगर हम ही अपने आप को कोसते रहेंगे , हमारी हर चीज की हम बुराई करते रहेगे तो दुनिया हमारी ओर क्‍यों देखेगी?

मैं श्रीमान श्री श्री रविशंकर जी का इस बात के लिए अभिनंदन करता हूं कि 35 साल से छोटे से कार्यकाल का ये मिशन दुनिया के 150 से ज्‍यादा देशों में इसी ताकत के भरोसे अब फैल चुका है, उन देशों को अपना कर चुका है। आर्ट ऑफ लिविंग के माध्‍यम से विश्‍व को भारत की एक अलग पहचान कराने में इस कार्य ने बहुत बड़ा योगदान दिया है।

मैं अभी कुछ समय पहले जब मंगोलिया गया था। मैं हैरान था मंगोलिया में एक एस्‍टेडियम में आर्ट ऑफ लिविंग के सभी बंधुओं के द्वारा मेरा reception रखा गया था। उसमें भारतीय तो बहुत कम थे। पूरा स्‍टेडियम मंगोलियन नागरिकों से भरा हुआ था और उन्‍होंने भारत का तिरंगा झंडा हाथ में लेकर के जिस प्रकार से भारतीय संस्‍कृति का परिचय करवाया, यह अपने आप में बहुत ही प्रेरक था। जहां पर राजशक्‍ति और राजसत्‍ता की पहुंच नहीं होती है, ऐसे स्‍थानों पर भी अंतर्राष्‍ट्रीय संबंधों में soft power एक बहुत बड़ी अहम भूमिका अदा करता है।

आज हम एक ऐसे कुंभ मेले का दर्शन कर रहे हैं। यह कला का कुंभ मेला है। भारत के पास ऐसी समृद्धि थी कि यहां कला पूर्णतया विकसित हुई थी। यह धरती ऐसी है जहां हर पहर का संगीत अलग है। सुबह का संगीत अलग है तो शाम का अलग है और इसलिए बाजार में संगीत की दुनिया को खोजने जाएंगे, तन को डुलाने वाले संगीत से तो बाजार भरा पड़ा है लेकिन मन को डुलाने वाला संगीत तो हिन्‍दुस्‍तान में भरा है और दुनिया अब मन को डुलाना चाहती है और यही संगीत की साधना है जो दुनिया के मन को डुला सकती है।

जब कला के द्वारा किसी देश को देखा जाता है तो इस देश की अंतर्भूत ताकत को पहचाना जाता है। आज विश्‍व भारत की कला की शक्‍ति और कला साधना सदियों से करते आए हुए लोग आज विश्‍व को एक अनमोल भेंट दे रहे हैं। ऐसे अवसर पर यह समारोह प्रकृति ने भी कसौटी करी लेकिन यही तो आर्ट ऑफ लिविंग है। सुविधा और सरलता के बीच जीने के लिए जी सकते हैं, उसमें आर्ट नहीं होती है। जब अपने इरादे को लेकर के चलते है तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए। जब अपने सपनों को लेकर के चलते है तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए। जब संकटों से जूझते हैं तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए। जब अपने लिए नहीं औरों के लिए जीते हैं तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए। जब स्‍व से समस्‍ति की यात्रा करते हैं तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए। जब मैं से छूटकर के हम की ओर चलते हैं तब आर्ट ऑफ लिविंग चाहिए।

हम वो लोग जो अहम् ब्रह्मास्मि से शुरू करते हैं और वसुधैव कुटुम्‍बकम की यात्रा करते हैं यह आर्ट ऑफ लिविंग है। हम वो लोग है जिन्होंने उपनिषद से उपग्रह तक की यात्राएं की हैं और यही जीवन जीने की कला हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने, ज्ञानियों ने, तपस्‍वियों ने हमें विरासत में दी है। संकटों से जूझ रहा मानव, व्‍यक्‍तिगत जीवन में समस्‍याओं से जूझ रहा मानव... भारत की पारिवारिक समस्‍या, परिवार family, यह ऐसी धरोहर हमारी दुनिया जब जानती है उसको अचरज होता है। हमने यह कला सीखी है, सदियों से सीखी है। लेकिन अगर उसमें खरोच आ रही है तो उसको फिर से ठीक-ठाक करने की आवश्‍यकता है |

मैं श्री श्री रविशंकर जी के माध्‍यम से यह जो काम चल रहा है इसका अभिनंदन करता हूं, बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं और सभी कलाकारों को, सभी साधकों को, सभी आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यकर्ताओं को इस भव्‍य समारोह के द्वारा भारत की विशिष्‍ट छवि विश्‍व के सामने पहुंचाने के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं|

धन्‍यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Sunday, 21 February 2016

Text of PM’s address at the centenary celebration of Gaudiya Mission at Kolkata

पश्चिम बंगाल के राज्‍यपाल श्रीमान केसरी नाथ जी त्रिपाठी, त्रिपुरा के राज्यपाल, श्रीमान तथागत राय, केन्द्र में मंत्री परिषद में मेरे साथी श्रीमान बाबुल सुप्रियो जी, पश्चिम बंगाल के मंत्री श्रीमान हकीम जी, गौड़िया मिशन अध्‍यक्ष श्रीमंत भक्ति शौर्य परिराज गोस्वामी महाराज जी, मायापुर से चैतन्य मठ के आचार्य, श्रीमंत भक्ति प्रज्ञानज्योति महाराज जी, भजन कुटीर वृंदावन के आचार्य श्रीमान भक्ति गोपनन्द बोन महाराज जी, देवानन्द गौड़िया मठ के आचार्य श्रीमंत भक्ति वेदांत प्रजाटक महाराज जी, गौड़िया मिशन के सचिव भक्ति सुंदर सन्यासी महाराज जी, गौड़िया संघ के आचार्य श्रीमत भक्ति प्रसून साधू महाराज, नई दिल्ली के पहाड़गंज से गौड़िया मठ के भक्ति विष्णु विचार विष्णु महाराज जी, श्यामवेदी गौड़िया मठ विजयवाड़ा के प्रभारी भक्ति, विदभगता भागवत महाराज जी और विशाल संख्या में पधारे हुए गौड़िया मठ के सभी अनुयायी भक्तजन।

कुछ समय पहले महाराज जी मेरे पास आए थे। उनका आग्रह था कि शताब्‍दी वर्ष का समारोह है, आप उसमें आइए। मेरा ये बड़ा सौभाग्य है कि मुझे इस महान परम्परा के सभी प्रतिनिधियों का एक साथ दर्शन करने का मुझे सौभाग्य मिला है। भारत दुनिया के लोगों को एक अचरज रहा है क्या कारण है इतने घाव और इतने आघातों के बाद भी यह देश आज भी खड़ा है। इस जहां से पता नहीं कौन-कौन मिट गए सारी हम कविताएं पढ़ते रहते हैं। क्या बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। काल के प्रहारों के बीच वो ही टिक पाता है, जिसके भीतर एक अंतर्भुत आत्मिक शक्ति होती है। इस विशाल भारत की अंतर्भुत आत्मिक शक्ति तो उसका अध्यात्म है। शायद दुनिया में ऐसी आध्यात्मिक परम्परा कहीं नजर नहीं आएगी, जहां पर इस महान विचार को मानने वाले, स्वीकार करने वाले, इतनी विविधताओं से भरे हुए हों। ये समाज इतना विशाल है, व्यापक है, गहन है, गहरा है कि जहां मूर्ति पूजा को मानने वाला भी उसका गौरव गान करता है और मूर्ति पूजा का घोर विरोध करने वाला भी उसकी प्रशंसा करता है।

जो साकार को स्वीकार करता है वो भी इस राह पर चलता है, जो निराकार को समर्पित है वो भी उसी प्रकार से चल रहा है। जो परमात्मा की पूजा करता है वो भी इसे शिरोधार्य मानता है। जो प्रकृति की पूजा करता है वो भी इसे शिरोधार्य मानता है। और ऐसी कौन सी ताकत है? वो ताकत पूजा पाठ सिर्फ नहीं है, सिर्फ ग्रंथ नहीं है, सिर्फ वाणी नहीं है। वो ताकत हमारी आध्यात्मिक चेतना में है। हम सम्प्रदायों से बंधे हुए लोग नहीं हैं। समय रहते सम्प्रदाय आते हैं, जाते हैं, पंथ और परम्पराएं विकसित होती हैं। लेकिन हम अध्यात्मता के एक अटूट नाते के साथ जुड़े हुए लोग हैं और वही शक्ति है, जो हमें सतकर्म की ओर प्रेरणा देती है। चैतन्य महाप्रभू भक्ति के प्रणेता थे। भक्ति युग के पुरोधा थे। भक्त बनना आसान नहीं होता है। हाथ में माला है। मुंह में ईश्वर का जाप है। इतने मात्र से दुनिया की नजर में तो हम भक्त बनते हैं। लेकिन भक्त बनना है, तो भक्त वही होता है, जो विभक्त नहीं होता। जहां मुझ में और मुझ को बनाने वाले के बीच कोई विभक्त नहीं है। मैं और वो दोनों ही एकरूप हैं, तब मैं भक्त बनता हूं और चैतन्य महाप्रभु भक्त थे। जहां कोई विभक्त को स्थान नहीं था, वे कृष्ण में डूबे हुए थे। कृष्ण उनमें समाहित हो चुका था और तब जाकर के ये भक्ति आंदोलन खड़ा होता है। भारत की विशेषता रही है कि अनेक आक्रांत आए, शासकीय व्यवस्थाओं में जय-पराजय की घटनाएं घटती रही। अत्याचार, जुल्म चलते रहे। लेकिन उसके बावजूद भी देश की आध्यात्मिक धारा को खरोंच तक नहीं आई।
 अगर हम भारत के आजादी के आंदोलन को देखें तो आजादी की लड़ाई लड़ने वाले महापुरुष हमारे सामने आते हैं। उनका बलिदान, उनका त्याग, तपस्या को कोई कम नहीं आंक सकता है। लेकिन इस बात को हम भूल नहीं सकते कि भारत के आजादी के आंदोलन की पीठिका अगर किसी ने तैयार की थी, तो इस भक्ति आंदोलन ने की थी। चाहे चैतन्य महाप्रभू हों, चाहे आचार्य शंकर देव हों, चाहे तिरुवल्लुवर हों, चाहे बश्वेश्वर हों। अनगिनत ऐसे संत पुरुषों, ऐसे भक्ति मार्गी आध्यात्मिक चेतना से भरे हुए दिव्यांश ऐसे हमारे महात्मा, जिन्होंने भक्ति आंदोलन के माध्यम से भारत की उस आध्यात्मिक धारा को सदा-सर्वदा चेतनमंत रखा। उसको खरोंच तक नहीं आने दी और उसके स्वाभिमान को टिकाए रखा उसके सत्व को टिकाए रखा। और तभी जाकर के जब आजादी के आंदोलन ने विराट रूप लिया, तो ये ताकत उसके साथ एक बहुत बड़ी पीठिका के रूप में काम आ गई।

कभी-कभी हम लोग यहां वैष्णव आंदोलन की चर्चा कर रहे हैं। लेकिन जब हम ‘वैष्‍णव जन तो तेने रे कहिये’ ये जब गाते हैं या सुनते हैं, हम में से कभी किसी को विचार नहीं आया होगा कि जो ‘वैष्‍णव जन तो तेने रे कहिये’ मैं गा रहा हूं जिसको मैं सुनता हूं तो मुझे परिचित लगता है। वो किस भाषा में लिखा गया है। ये सवाल कभी किसी के मन में उठा नहीं है। यहां बैठे हुए लोगों को भी मैं दावे से कहता हूं आपके मन में भी ‘वैष्‍णव जन तो तेने रे कहिये’ ये सुनने के बाद कभी ये सवाल नहीं उठा होगा कि किस भाषा में लिखा गया है? कहने का तात्पर्य यह है कि उसके भाव के साथ हम इतने घुल-मिल गये हैं, उसमें हम इतने विलीन हो चुके हैं कि भाषा हमारे लिए कारण नहीं रही है। भाव ही हैं जो हमें प्रेरणा देते रहते हैं। और ये ‘वैष्‍णव जन तो तेने रे कहिये‘ उसी काल में लिखा गया जब चैतन्य महाप्रभू जिस आंदोलन को चलाते थे, गुजरात की धरती पर नरसिंह मेहता, अस्‍पृश्‍यता के खिलाफ लड़ाई लड़ते थे। और उन्होंने गीत लिखा और महात्मा गांधी को बहुत प्रिय था। लेकिन मैंने कुछ उसमें छेड़छाड़ करने कोशिश की थी कभी। हक़ तो नहीं है मुझे। सैंकड़ों साल पहले जो महापुरुष पैदा हुए, उन्होंने जो बात कही उसको हाथ लगाने का हक़ तो नहीं है, लेकिन लोगों को समझाने के लिए मुझे सरल रहता था। तो मैं कभी उसका उपयोग करता था पहले। मैं कहता था ‘वैष्‍णव जन तो तेने रे कहिये जो पीर पराई जाने रे, पर दुखे उपकार करे तोहे मन अभिमान ना आने रे।‘ तो मैंने कहा कि जो आज जनप्रतिनिधि हैं ये वैष्‍णव जन की जगह प्रतिनिधि शब्द लिख देना चाहिए। ‘जनप्रतिनिधि तेने रे कहिए जो पीड़ पराई जाने रे, पर दुखे उपकार करे तोहे मन अभिमान ना आने रे।‘ वाछ-काछ मन निश्चल राखे, पर धन नवजाले हाथ रे।‘ यानी चार सौ साल पहले भी करप्‍शन की चिंता थी। पर धन नवजाले हाथ रे, लोक प्रतिनिधि तो तेने रे कहिए। वैष्‍णव की बात नरसिंह मेहता जी की बात गांधी जी को क्यों इतनी प्यारी लगी होगी तो मुझे उसके एक-एक शब्द में ताकत नजर आती है। और कृष्णा एक ऐसा विराट रूप, न जाने कितना कुछ लिखा गया है। न जाने कितना कुछ कहा गया है। उसमें शास्त्र की भी अनुभूति होती है और शस्त्र का भी अहसास होता है। कोई ऐसा व्यक्तित्व जिसके हर रूप को भक्त पसंद करते हों और हर रूप की अलग भक्त धारा हो। कुछ लोग हैं जिनको मक्खन चोरी करने वाला ही कन्हैया प्यारा लगता है। तो कुछ लोग हैं जिनको सुदर्शनधारी से नीचे कृष्ण अच्छा नहीं लगता है। उनको तो सुदर्शन चक्रधारी चाहिए। और कुछ लोग हैं जो बांसुरी बजाने वाला, राधा के साथ गोपियों के साथ रास करने वाला कृष्ण पसंद आता है। कितनी विविधता है कितने स्वरूप और हर किसी को मानने वाला एक तबका एक जीवन की ऐसी प्रेरणा दे सकता है, उसका हम अंदाज कर सकते हैं और जिस गीता की रचना हुई, शायद विश्व में ऐसी कोई रचना नहीं है, जो युद्ध भूमि में रची गई हो। यानी निर्लिप्‍त जीवन क्या होता है अपने पास पड़ोस में क्या चल रहा है, उससे भी परे एक व्यक्तित्व की ऊंचाई क्या होती है कि जहां युद्ध होता हो, अपने मरते हों अपने को मरते देखते हो और उस समय एक शास्त्र का सृजन होता हो ये कौन सी ताकत होगी कि जो युद्ध भूमि में पैदा हुई और इसलिए और युद्ध के समय भी जहां जय और पराजय के संघर्ष के बावजूद भी अलिप्तता की चर्चा जिस संदेश में कही गई हो। गीता का संदेश वो ताकत तो देता है। और उस अर्थ में गौड़िया मिशन के द्वारा वैश्णव परम्परा को जीवित रखते हुए और आखिर ये परम्परा जैसा अभी महाराज जी बता रहे थे। दरीद्र नारायण की सेवा, ‘सेवा परमो धर्मः’ यही तो हमारा जीवन का उद्देश्य रहा होना चाहिए। जो औरों के लिए जीना जानता है। जो औरों के लिए अपने आपको आहूत करना जानता है। जो औरों के लिए अपने आपको खपाना जानता है। और हमारे देश के महान महापुरुषों की सारी माला देख लें, उस माला में यही तो संदेश है। हम कभी-कभी एक चिंतन सुनते हैं दुनिया में Live and let Live ‘जिओ और जीने दो।‘ ये देश उससे एक कदम आगे है। ये कहता है जिओ और जीने दो और अगर उसके जीने की क्षमता नहीं है, तो उसको जीने के लिए मदद करो। गुजराती में बहुत अच्छा शब्द है ‘जीवो अने जिवाड़ो।‘ औरों को जीने के लिए हम जो कुछ भी कर सकते हैं करें। सिर्फ उसको उसके नसीब पर न छोड़ें। इस महान विचार और चिंतन को लेकर के हम निकले हुए लोग हैं और वैष्‍णव एक प्रकार से विश्व को अपने-आप में समाने की बात करता है। ‘वसुधैव कुटम्बकम’ ये मंत्र उसी बात का परिचायक है कि जिसमें पूरे ब्रह्माण्ड को अपने में समाने की चर्चा होती है। ऐसी इस महान परम्परा को मैं प्रणाम करता हूं। दुनिया में समय रहते व्यक्ति में जैसे दोष आते हैं, व्यवस्था में जैसे दोष आते हैं, वैसे समाज में भी दोष आते हैं, बहुत सी पुरानी बातें समाज के लिए कालबाह्य होती है। और कभी-कभी उसको लेकर के चलना समाज के लिए बोझ बन जाता है। समाज के लिए संकट बन जाता है। लेकिन बहुत कम समाज ऐसे होते हैं कि जहां अपने अंदर आ रही बीमारियों को पहचान पाएं, अपने अंदर आ रही बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत करें और समाज में भी ऊंचाई देखिए कि समाज के भीतर घुसी हुई बुराइयों के खिलाफ लड़ने वालों को समाज आध्यात्मिक रूप में स्वीकार करता है, उनकी पूजा करता है। भारत में हर सदी में आपने देखा होगा कि समाज की कोई न कोई बुराई के खिलाफ हिन्दू समाज में से ही कोई सुधारक पैदा हुआ। उसने उस समाज को रोका, टोका, बुराइयों से बचने के लिये निकलने के लिए कहा और प्रारंभ में उसको सहना पड़ा। यही तो बंगाल की धरती है। राजा राममोहन राय सती प्रथा के खिलाफ इतनी बड़ी लड़ाई लड़े। ईश्वर चंद विद्यासागर समाज की बुराइयों के प्रति कितनी जागरूकता लाए थे। ये हमारी सदियों पुरानी परम्परा रही है कि हर कालखंड में जब-जब समाज में विकृति आई, समाज में दोष आए बुराइयां आईं। कोई न कोई महापुरुष निकला, इसी समाज में से निकला और उसने समाज को कोसा, डांटा, सुधारने का प्रयास किया और समाज ने उसको महात्मा के रूप में स्वीकार किया, महापुरुष के रूप में स्वीकार किया। दोनों तरफ ताकत नजर आती है। जो समाज सुधार को स्वीकार नहीं करता है। जो समाज कालबाह्य बोझ से मुक्ति पाने का सामर्थ्‍य नहीं रखता है, वो समाज कभी टिक नहीं सकता, जी नहीं सकता, न कभी प्राणवान अवस्था में रह सकता है। एक मुर्दे की तरह वो समय बिताता है।

हमारे समाज में हर कालखंड में, हर भू-भाग में बुराइयों के खिलाफ लड़ने वाले चैतन्य पुरुष मिले हैं हमें। और यही तो हमारी ताकत है। इसी ने तो इस समाज को चैतन्यवत रखा है। और इसलिये गौड़िया संगठन, गौड़िया मिशन को शताब्‍दी का पर्व एक प्रकार से सामाजिक सुधार के आंदोलन की शताब्‍दी है। समाज में भक्ति चेतना जगाने के आंदोलन की शताब्‍दी है। समाज में ‘सेवा परमो धर्म’ को साकार करने का संस्कार अविरत चलाए रखने का, प्रज्जवलित रखने का उस महान कार्य की शताब्‍दी है। ऐसी महान व्यवस्था को, महान परम्परा को इन सभी संतो, महंतो की जिन्दगी को, जिसके कारण ये सतत् परम्परा चली है, मैं आदर पूर्वक नमन करता हूं। चैतन्य महाप्रभू का पुण्य स्‍मरण करता हूं। इस महान परम्परा के सभी योगी पुरुषों का मैं नमन करता हूं। आप सब का बहुत-बहुत धन्यवाद।
Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Saturday, 13 February 2016

Art is Ageless, Race, Region, Religion less and Timeless: PM Modi at Bombay Art Society

कला प्रेमी भाईयो और बहनों, कुछ समय पहले वासुदेव जी मेरे निवास स्‍थान पर आए थे और बड़े हक से मुझे हुकुम करके गए थे। आपको आना पड़ेगा और उसी का परिणाम है कि मैं आज आपके बीच में हूं।

बहुत कम ऐसी व्‍यवस्‍थाएं होती है कि जो तीन शताब्दियों को प्रभावित करती है, आपकी बाम्‍बे आर्ट सोसाइटी ने तीन शताब्दियों को प्रभावित किया है। 19वीं सदी में आरंभ हुआ और 21वीं सदी तक और उसका मूल कारण है कला की अपनी एक ताकत होती है, कला का अपना एक संदेश होता है, कला के भीतर इतिहास यात्रा करता है, कला संवेदनाओं की अभिव्‍यक्ति होती है और तब जा करके तीन शताब्दियों तक ये अपनी जगह बनाती है।

शायद हिन्‍दुस्‍तान में और खास करके महाराष्‍ट्र और मुबंई में कोई रईस घराना ऐसा नहीं होगा जिसकी दिवारों पर कला लटकती न हो। कोई रईस घराना नहीं होगा लेकिन ये द्रुदेव देखिए कि जहां कला का गर्भास्‍थान होता है, उसे जगह पाने में सवा सौ साल बीत गए।

और इसलिए समाज के नाते ये सोचने की आवश्‍यकता है कि कलाकृति, ये हमारे दिवारों की शोभा है कि हमारे समाज की शक्ति है। अगर हम कलाकृति को हमारी दिवारों को सुशोभित करने का एक माध्‍यम ही सिर्फ मानते है तो शायद हम कला से सदियों दूर हैं, मीलों दूर है और ये स्थिति बदलने के लिए एक अविरत शिक्षा, अविरत संस्‍कार आवश्‍यक होता है।

यही देश ऐसा है जिसके टेम्‍पल आर्किटेक्‍चर इसकी विशेषता बारीकी से देखें कि जहां ईश्‍वर का जहां स्‍थान है अनिवार्य रूप से वहां कला का स्‍थान है। हर मंदिर में आपको नृत्‍य मंडप दिखाई देगा, हर मंदिर में आपको कलाकृतियों के द्वारा इतिहास और परंपराओं को जीवित करता हुआ दिखाई देगा। ये इनबिल्‍ट व्‍यवस्‍था इस बात का द्वोयतक है कि हमारी सांस्‍कृतिक यात्रा में कला यात्रा की कितनी अहमियत है। अन्‍यथा, ईश्‍वर के साथ-साथ कला की यात्रा न होती। चाहे दुनिया में कोई एक ऐसा चेहरा नहीं होगा कि जिसके इतने रूपों में कलाकारों ने उसकी साधना की हो। शायद, गणेश जी एक ऐसे है कि जिसको हर कलाकार ने हाथ लगाया होगा, अपने तरीके से लगाया होगा और शायद गणेश ही है कि जो अरबों-अरबों रुपयों में हमारे सामने प्रस्‍तुत है, अरबों-अरबों रुपयों में है।

यानी किस प्रकार से कलाकार उप चीजों को पाता है, पनपाता है और उस पौधे को वटवृक्ष की तरह विकसित करता है और उस अर्थ में, यहां वासुदेव जी ने एक बात कहीं लेकिन मैं उनसे थोड़ा अलग मत रखता हूं। उन्‍होंने कहा कला राज्‍यास्‍तरित हो, जी नहीं कला कभी राज्‍यास्‍तरित नहीं होनी चाहिए। कला राज्‍य पुस्‍कृत होनी चाहिए।
कला को न कोई दायरा होना चाहिए, कला को न कोई बंधन होने चाहिए और राज्‍य की जिम्‍मेवारी है की कला को पुरस्‍कृत करें और मैं शरद जी को अभिनंदन करता हूं कि जमीन देने का फैसला किया उन्‍होंने, जब वो मुख्‍यमंत्री थे। कला राज्‍य पुरस्‍कृत होनी चाहिए और कला समाज की शक्ति का हिस्‍सा होनी चाहिए। तभी जा करके कला परिणामकारी होती है।

आध्‍यात्‍मिक यात्रा से जो लोग जुड़े होएंगे, वे इस बात को शायद सरल भाषा में समझते होंगे कि शरीर की गतिविधि से पूर्व अध्‍यात्‍म मन और दिल में जगह प्राप्‍त करता है और उसके बाद उस शरीर के अभिव्यक्ति के रूप में, शरीर को एक साधन के रूप में उपयोग करता है। शरीर अध्‍यात्‍म के अनुभूति का माध्‍यम हो सकता है। वैसे कला उस पत्‍थर में नहीं होती है, उस मिट्टी में नहीं होती है, उस कलम में नहीं होती है, उस कैनवास में नहीं होती है। कला उस कलाकार के दिल और दिमाग में पहले अध्‍यात्‍म की तरह जन्‍म लेती है।

जब एक कलाकार पत्‍थर तराशता है हमें लगता है वो पत्‍थर तराशता है, हम पूछते है कि तुम पत्‍थर तराशते हो कि नहीं, कहता है मैं तो मूर्ति तराश रहा हूं। देखने में इतना बड़ा फर्क होता है। हमारे लिए वो पत्‍थर होता है, कलाकार कहता है मैं मूर्ति तराशता हूं, हम कहते है तुम पत्‍थर तराशते हो क्‍या?

ये हमारी सामाजिक जो सोच है उसको हमें बदलाव लाना पड़ेगा और तब जा करके, तब जा करके कला जीवन का महात्‍मय बढ़ेगा। हमारे यहां बच्‍चों को रटे-रटाये कविताएं ‘ट्विंकल-ट्विकल लिटिल स्‍टार’ आप किसी भी घर में जाओं तो छोटा बच्‍चा वो ले आएंगी मम्‍मी अच्‍छा बेटे गीत गाओं और वो ‘ट्विंकल-ट्विकल लिटिल स्‍टार’ करता रहेगा।

बहुत कम घर है जहां मां कहेंगी बेटे तुमने कल पेंटिंग बताया था देखों अंकल आएं है दिखाओं जरा ये बहुत कम है ये बदलाव जरूरी है। उस बालक के अंतर मन की विकास यात्रा का आधार रटे-रटाये शब्‍दों में नहीं है, उसके भीतर से निकली हुई चीजों से, उसने जो ऊपर-नीचे कागज पर जो पेंटिंग किया है उसमें है। और उसने व्‍यक्ति विकास के अधिष्‍ठान के रूप में कला एक बहुत बड़ा अहम यानी एस संपूर्ण व्‍यक्तित्‍व का विकास करने में कला बहुत अनिवार्य होती है।
आज टेक्नॉलॉजी का युग है। सारी शिक्षा इंजीनियरिंग और टेक्नॉलॉजी पर प्रभावित हो रही है। जीवन भी अधिकतम टेक्नॉलॉजी से जुड़ा हुआ है। लेकिन हमें ये सजग रूप से प्रयास करना चाहिए कि हम आने वाली पीढ़ियों को इंसान कैसे बनाए रखें। डर लगता है कभी रोबोट तो नहीं हो जाएगा। इस स्विच को दबाएं तो ये काम होगा। इस स्विच को दबाएगा तो ये काम हो जाएगा। और इसलीए उसके भीतर के इंसान को जीवित रखना है, तो कला ही एक माध्यम है। जो उसके जीवन को जीवित रख सकता है। उसके भीतर के इंसान को जीवित रख सकती है। और उस अर्थ में और जब हम Art कहते हैं न A R T ‘A’ means है Ageless ‘R’ है Race region Religion less ‘T’ है Timeless. ये आर्ट अनंत की अभिव्यक्ति होती है। और उस अर्थ में हम इसकी जितनी इसके महत्व को स्वीकारें उसको सजाएं। मैं स्कूलों से आग्रह करूंगा कि वो अपने टूर प्रोग्राम बनाते हैं। तो उस टूर प्रोग्राम में साल में एक कार्यक्रम तो कम से कम Art Gallery देखने के लिए बनाएं। बाकी सब देखने जाएंगे, बीच देखने जाएंगे आर्ट गैलरी देखने नहीं जाएंगे। उसी प्रकार से मैंने रेलवे डिपार्टमेंट को कहा है कि बिजी रेलवे प्लेटफॉर्म है और दो तरफ ट्रेन आती है बीच में उसके खम्भे होते हैं। मैंने कहा एक डिवाडर के रूप में एक बढ़िया एक बढ़िया आर्ट गैलरी रेलवे प्लेटफॉर्म पर क्यों न हो। उस नगर के कलाकारों को उभरते हुए कलाकारों को वहां जगह मिले। ऐसे कैसे हो सकता है। ताकि वहां आने वाला व्यक्ति उसको देखेगा। उस शहर का कलाकार होगा तो उसको अनुभव करेगा। और उसको अवसर मिलेगा कि चलो भई 15 दिन के बाद मेरी एक नई वहां लगने का अवसर मिलने वाला है। तो मैं और अच्छा काम करूं। अगले महीने मुझे मौका मिल सकता है। मैं और अच्छा काम करूं। हम अपनी व्यवस्थाओं को सहज कैसे बनाएं। अभी मैंने पिछली बार मन की बात में कहा था कि हमारे देश के रेलवे स्टेशनों पर कलाकार खुद समय देकर के आज रेलवे स्टेशनों का रंगरूप बदल रहे हैं। ये सरकारी योजना नहीं थी। न हीं सरकार का कोई बजट है। ये अपनी मनमरजी से कर रहे हैं। और इसका इतना प्रभाव पैदा हो रहा है। एक प्रकार से वो संस्कार कर रहे हैं। स्वच्छता पर एक भाषण देने से ज्यादा। एक कलाकार का पेंटिंग उसको स्वच्छ रखने के लिए प्रेरित कर रहा है।

एक मेरे मन में मैं नहीं जानता हूं मेरे कलाकार मित्र यहां कहीं बैठे होंगे। किस प्रकार इसको लेंगे। आने वाले युग को ध्यान में रखते हुए। हम हमारी जो कलाकृति है। उसको डीजिटल दुनिया का एक हाईब्रिड डेवलपमेंट कर सकते हैं क्‍या? जैसे कलाकार ने कृति तैयार की उसको पहले विचार कैसे आया। वो कैसे कागज पर पनपता गया। तीन महीने, छह महीने उसमें डूब गया। उस प्रोसेस का एक तीन या चार मिनट का डीजिटल वर्जन। कोई भी व्यक्ति जब उसकी कलाकृति देखता है तो साथ साथ इस प्रोसेस का डीजिटल वर्जन देखे। और विद म्यूजिकल इफैक्ट देखे। आज मुश्किल क्या है कि बहुत कम लोग होते या तो कोई कला का ज्ञानी साथ चाहिए। वो उसको समझाएगा कि देखो भई इसका मतलब यह होता है। लाल इसलिए लगाया है, पीला इस लिये लगाया है, तो उसको लगता है कि यार इतना बर्डन क्या करूं चलो अच्छा लगा चलो भई।

ये बदलाव के लिए डीजिटल वर्ल्ड को इसके कॉम्बिनेशन के रूप में कैसे लाया जाए। मैं चाहूंगा कि जो सॉफ्टवेयर आईटी की दुनिया से जुड़े हुए लोग हैं उसमें रुचि लें। और कलाकारों को एक नई ताकत युग के अनुरूप नई ताकत कैसे दें उस दिशा में प्रयास हो फिर एक बार में महाराष्ट्र सरकार को, श्रीमान शरद राव जी को हृदय से बहुत-बहुत अभिनन्दन करता हूं। वासुदेव और उनकी पूरी टीम को भी बधाई देता हूं। और ये अब कलाकृतियों को तो जगह बहुत मिली। कला का जहां गर्भास्थान होता है उसको जगह मिल गई है। और नई चेतना जगेगी। बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches