The Prime Minister, Shri Narendra Modi,
today joined the members of the Rajya Sabha, in bidding farewell to the
retiring members of the House.
Speaking on the occasion, he said the
country has benefited from the knowledge and experience shared by the
members who are retiring today. He said that the Rajya Sabha helps
broaden the outlook and horizons of the members. The experience enriches
them, and this wealth is for the nation and the society, he added.
He expressed the hope that the experience and knowledge of the retiring members would continue to be beneficial for the nation.
He said that the members who are
retiring today, have been a part of many important decisions. He added
that it would have been even better if two more decisions, which could
have benefited the States immensely, had been taken in the presence of
these members. One of these, he said, is the GST Bill, and the other is
the Compensatory Afforestation Fund Bill, which would have enabled a
large amount of funds to be disbursed to States for afforestation.
The Prime Minister wished the retiring members well, and on behalf of the Government, thanked them for their cooperation.
Following is the PM's farewell speech to the retiring members of Rajya Sabha:
आदरणीय सभापति जी,
राज्यसभा को
एक विशेष लाभ है जो लोकसभा को नहीं है और वो ये है कि हम ही हमारे बीच
अपनों को विदाई भी दे पाते हैं, स्वागत भी कर पाते हैं। वो सौभाग्य
लोकसभा को नहीं है और इस सदन की शुभकामनाएं, यहां से जो निवृत्त हो करके
जाते हैं, उनको निवृत्त होने के लिए नहीं, अधिक प्रवृत्त होने की प्रेरणा
देती हैं, ताकत देती है। मैं भी उन सबका आभार व्यक्त करता हूं कि
जिन्होंने गत 6 वर्ष दो सरकारों के साथ अपनी जिम्मेवारियां निभाईं, अपनी
भूमिका अदा की और राष्ट्रहित के महत्वपूर्ण निर्णयों में उन्होंने अपने
ज्ञान का, अनुभव का और क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं का लाभ हम सबको
पहुंचाया| और दोनों सरकारों को आपके अनुभव का लाभ मिला है। इस सरकार को कम
मिला, पुरानी वाली सरकार को ज्यादा मिला लेकिन देश को पूर्ण रूप में आपका
लाभ मिला है।
यहां जब हम आते हैं तब हमारी अपनी एक विचारों की
सीमा रहती है। यहां देश के हर कोने से, हर प्रकार के पार्श्व भूमि के
लोगों के साथ बैठने से विचार-विमर्श करने से हमारा अपना भी सोचने का दायरा
बहुत विशाल हो जाता है और एक प्रकार से सदन में आते समय हम जो थे, सदन से
जाते समय हम बहुत कुछ और होते हैं और ये जो बहुत कुछ और होते हैं, वो
राष्ट्र की समाज की पूंजी बनता है। मैं समझता हूं कि सदन ने हमें बड़ा
बनाने में, हमारे ज्ञानवर्द्धन में, हमारे vision के विस्तार के लिए बहुत
बड़ी अहम भूमिका निभाई है, हर साथियों ने भूमिका निभाई है। और उस महान
सम्फुट को ले करके हम जा रहे हैं तो जाने के बाद भी क्षेत्र विशेष के लिए,
समस्या विशेष के लिए और राष्ट्र के लिए आपका अनुभव काम आता रहेगा। मेरी
आप सबको हमेशा-हमेशा बहुत शुभकामनाएं रहती हैं और रहेंगी।
सदन से
जाने के बाद ये सरकार आपके लिए उसी प्रकार से काम करने के लिए तत्पर रहेगी
जिस प्रकार से एक सदस्य के तौर पर आपका हक बनता है और इसलिए जाने के बाद
भी जहां तक सरकार का मसला है, आपका वैसा ही हक बना रहेगा, और मैं भी
चाहूंगा कि आप इस हक का भरपूर लाभ उठाएं और समाज की सेवा में आपकी शक्ति,
योगदान मिलता रहे।
कई महत्वपूर्ण निर्णयों में आपका योगदान रहा
है। आप अब जब विदाई दे रहे हैं उसी के कालखंड का सत्र हम देखें तो
महत्वपूर्ण reform के निर्णय आपकी मौजूदगी में, आपकी पार्टनरशिप में, आपकी
intervention से हुए हैं। बड़े महत्वपूर्ण निर्णय हुए हैं लेकिन मुझे
हमेशा क्योंकि आप state को represent करते हैं, उस state के हित, वो आपकी
प्राथमिकता रहनी भी चाहिए और रहती भी है। दो चीजों का गिला-शिकवा आपके मन
में जरूर रहेगा। राज्य के रूप में जब देखें तो अच्छा होता आपके रहते,
आपकी मौजूदगी में, दो ऐसे निर्णय होते तो जिस राज्य को आप represent करते
हैं वो राज्य आपके प्रति हमेशा-हमेशा गर्व अनुभव करता।
एक GST,
ताकि जो बिहार से यहां आते हैं। GST से बिहार का भरपूर लाभ होने वाला था,
यूपी को भरपूर लाभ होने वाला था। एक या दो राज्य को छोड़ करके सब राज्यों
को भरपूर फायदा होने वाला था और इस सदन में आए हुए लोगों का ये दायित्व
बनता था और ये गर्व है कि अब आपको वो मौका नहीं मिला है। लेकिन आप में से
जो वापिस आएंगे मुझे विश्वास है उनको ये अवसर मिलेगा और जिस राज्य से
आएंगे उस राज्य की भलाई का एक महत्वपूर्ण काम आपके हाथों से होगा जो
वापिस आएंगे।
दूसरा महत्वपूर्ण काम जो मैं मानता हूं वो है CAMPA
का। अगर हमने इस बार उसका निर्णय किया होता तो राज्यों को, CAMPA, 42,000
crore rupees राज्यों को मिलने वाले थे और करीब-करीब एक-एक राज्य को दो
हजार-तीन हजार करोड़ रुपए के आसपास पैसे मिलने वाले थे और ये पैसे.. दो
हजार-तीन हजार करोड़ रुपए कम रकम नहीं होती है। ये forestry के लिए मिलने
वाले थे और ये वर्षा के season में ये पैसे सर्वाधिक काम आ सकते थे।
अच्छा निर्णय होना था लेकिन शायद इस बार नहीं हो पाया। वर्षा का season
चला जाएगा, 4-6 महीने और इंतजार करना पड़ेगा लेकिन ये राज्यों की भलाई का
सीध-सीधा काम रह गया।
मैं मानता हूं किआप जहां भी होंगे, आप
शुभकामनाएं देते रहिए, प्रयास करते रहिए ताकिराज्यों को जो लाभ
पहुंचाने का काम ये सदन कर सकता है, वो शायद और सदन कम कर सकता है। मुझे
विश्वास है किआपकी शक्ति, आपका अनुभव इसलिए भी काम आएगा।
मैं फिर एक बार हृदय की गहराई से आप सब को, जो आज निवृत्त हो रहे हैं,
अधिक प्रवृत्त होने के रास्ते पर जा रहे हैं, उनको बहुत-बहुत शुभकामनाएं
देता हूं और आपके सहयोग के लिए सरकार की तरफ से मैं आपका बहुत-बहुत आभार
व्यक्त करता हूं।
विशाल संख्या में पधारे हुए मेरे प्यारे भाइयो और बहनों!
आज
बाबू जगजीवन राम जी की जन्मजयंती है। अनेक वर्षों तक राष्ट्र की सेवा
में उन्होंने अपना पूरा जीवन खपा दिया। उनके जन्म दिवस को समता दिवस
के रूप में भी याद किया जाता है। दलित परिवार में पैदा होकर के राष्ट्र
के गौरव को बढ़ाने में उन्होंने जो अथार्त पुरुषार्थ किया, परिश्रम
किया। उन्होंने सामाजिक स्थितियों को कभी अपने आड़े नहीं आने दिया।
ऐसे बाबू जगजीवन राम जी की जन्मजयंती पर आज भारत सरकार ‘Stand Up India’
कार्यक्रम को launch कर रही है।
बाबू जगजीवन राम जी की एक
विशेषता रही कि वे हमेशा merit के आग्रही रहे। scholarship भी वो merit
पर लेने के आग्रही रहते थे। Merit पर जो न मिले, उसको लेने से इंकार करते
थे और बहुत कम लोगों को याद होगा कि भारत ने जो प्रथम कृषि क्रान्ति
की, agriculture revolution किया, तब हमारे देश के कृषि मंत्री बाबू
जगजीवन राम थे। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि 1971 की लड़ाई में भारत ने
जो विजय प्राप्त की, उस समय भारत के रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम थे।
लेकिन ऐसे कारण रहे देश में कि इस प्रकार की सेवाओं को, ऐसे महापुरुषों
के योगदान को करीब-करीब इतिहास में भुला दिया गया है। हम इस मत के है कि
राजनीतिक विचारधाराएं कुछ भी हो, दल कोई भी हो, लेकिन देश के लिए
जीने-मरने वाले हम सबके लिए आदरणीय होते हैं, हम सबके लिए प्रेरक होते
हैं।
शायद बाबू जगजीवन राम जी की जन्मजयंती पर पहले कभी भारत
सरकार ने कोई कार्यक्रम launch किया हो, कम से कम मेरी स्मृति में नहीं
है लेकिन मुझे आज गौरव हो रहा है और इसका बहुत बड़ा ताल्लुक भी है,
क्योंकि हमने एक योजना बनाई। योजना यह बनाई कि हमारे जो आदिवासी
भाई-बहन है, हमारे जो दलित भाई-बहन है, वे कब तक नौकरी का इंतजार करते
रहेंगे और सरकार भी कितनों को नौकरी दे पाएगी और अगर यही स्थिति रही तो
समाज के दलित, पीड़ित, शोषित, वंचित, इन मेरे भाइयों का क्या होगा,
उन नौजवानों का क्या होगा? मेरा यह विश्वास है कि परमात्मा ने जो
शक्ति और सामर्थ्य, जो समझ और हुनर ईश्वर ने हमें दिया है, वैसा ही
मेरे इन दलित परिवारों को भी दिया है और मेरे आदिवासी परिवारों को भी
दिया है। लेकिन हम लोग वो है जिन्हें अवसर मिला, वो लोग हैं जिन्हें
अवसर नहीं मिला। अगर अवसर मिलने पर हम कुछ कर सकते हैं, तो अवसर मिलने
पर मेरे दलित और आदिवासी भाई-बहन भी उतना ही उत्तम काम कर सकते हैं और
देश को बहुत योगदान दे सकते हैं।
और इसलिए, जीवन के हर क्षेत्र में
समाज के आखिरी छोर पर बैठा हुआ जो व्यक्ति है, उसको आगे आने का अवसर
मिलना चाहिए। उसको किसी की कृपा पर जीने के लिए मजबूर नहीं होना
चाहिए। अगर वो अपने पुरुषार्थ से, अपने परिश्रम से, साहस करने को तैयार
है, बुद्धि है, क्षमता है। अगर थोड़ी-सी भी सुविधा हो जाए तो वो एक नई,
भव्य, स्वप्नों को साकार करने वाली अपनी जिन्दगी को आगे बढ़ा सकता है
और उसी एक विचार में से ये ‘Stand Up India’ की कल्पना आई।
15
अगस्त को लालकिले पर से मैंने घोषणा की थी – ‘Start Up India, Stand Up
India’. ‘Stand Up India’ योजना के तहत 15 अगस्त को लालकिले से घोषणा की
थी कि भारत के हर बैंक की ब्रांच अपने क्षेत्र में एक दलित को और अगर
वहां दलित बस्ती नहीं है तो आदिवासी को और एक महिला को बैंक की तरफ से
लोन देंगे। आज देश में सवा लाख बैंक हैं। एक लाख से ज्यादा स्थानों पर
फैले हुए हैं। आम तौर पर कोई उद्योग या व्यापार शुरू होता है, तो जो
established शहर होते हैं वहीं पर बढ़ोतरी होती है। हमारी इस योजना के तहत
सवा लाख बैंक जब पैसे देंगे तो सवा लाख स्थानों पर कोई न कोई उपक्रम शुरू
होगा और ढाई लाख लोगों के द्वारा ढाई लाख उपक्रम शुरू होंगे। एक जिले में,
एक जगह पर, एक जहां प्रगति हो रही है वहीं नहीं, एक फैला हुआ काम और
इसलिए हर ब्रांच को कहा है कि आपकी जिम्मेवारी होगी कि आपकी ब्रांच
जिस इलाके में है, उस इलाके के किसी नौजवान, जो कि दलित हो, या
आदिवासी हो और एक महिला, दो लोगों को आपको लोन देना होगा और उनको नया
उद्योग, नया व्यवसाय करने के लिए मदद करनी होगी।
आप कल्पना कर
सकते हैं कि आज जो Job seeker है, वो Job creator बन जाएगा। जो आज नौकरी
तलाशता है, वो नौकरी देने वाला बन जाएगा। अगर ऐसे ढाई लाख यूनिट शुरू होते
हैं, कोई एक को रोजगार दे, कोई दो को दे, कोई पाँच को दे, हमारे देश के
नौजवानों के लिए एक रोजगार का नया अवसर प्राप्त होगा।
यह जो
‘Stand Up’ योजना है। मुद्रा योजना और ‘Stand Up’ योजना में एक बहुत बड़ा
फर्क है। मुद्रा योजना में भी गारंटी के बिना उद्योगकार बैंक से, कुछ आगे
बढ़ना है, तो पैसे ले सकता है। अख़बार बेचने वाला, कमाना है तो ले सकता है
पैसे। चाय बेचने वाला हो, चना बेचने वाला हुआ, धोबी हो, नाई हो, छोटे-छोटे
लोग जिनको बेचारे को पैसे बड़ी ब्याज से लेने पड़ते हैं। साहूकार लोग
उनको लूट लेते हैं। वो एक बार पैसे लेता है तो ब्याज देने के चक्कर से
बाहर ही नहीं आता है। जीवनभर वो कर्जदार रहता है और देश में 6 करोड़ से
ज्यादा लोग ऐसे कुछ न कुछ काम करते हैं जो देश की आर्थिक गतिविधि को
चलाते हैं। छोटे-छोटे लोग हैं, छोटे दुकानदार हैं। किसी को पाँच हजार
चाहिए, किसी को दस हजार चाहिए, किसी को पचास हजार चाहिए। बैंक के
दरवाजे उनके लिए बंद थे और ये इतने गरीब थे कि कोई उनके लिए गारंटी नहीं
देता था। हमने मुद्रा योजना के तहत बिना कोई गारंटी ऐसे लोगों को लोन
मुहैया कराया। अभी अरुण जी बता रहे थे कि हमारा लक्ष्य तो सवा लाख करोड़
से भी कम था, लेकिन हम उससे भी आगे निकल गए और करीब-करीब सवा तीन करोड़
से ज्यादा लोगों को ये पैसे दिए। आज वो अपना कारोबार चला रहे हैं। अपने
व्यवसाय का विकास कर रहे हैं और ब्याज के चंगुल से बच गए हैं लेकिन
मुद्रा में 10 लाख रुपए तक की रकम मिलती है।
यह जो दलित
परिवारों के लिए योजना बनाई है, आदिवासी परिवारों के लिए योजना बनाई
है, महिलाओं को उद्यमी बनाने के लिए जो योजना बनाई है, उसके तहत 10 लाख
से लेकर के एक करोड़ रुपए तक की राशि बैंक उनको देगी और उस ब्रांच के
इलाके में होगा ताकि हिन्दुस्तान में एक लाख रुपए से अधिक जगह पर कोई न
कोई नया काम शुरू होगा। अकेला उत्तर प्रदेश में हो, अकेला दिल्ली में
हो, अकेला जयपुर, मुम्बई, अहमदाबाद में हो, नहीं। छोटे-छोटे स्थान पर काम
शुरू होना चाहिए। इस देश को आगे बढ़ाना है और इसलिए बैंक की ब्रांच को .
. कोई एक बैंक, उसकी सौ ब्रांच है और बैंक दो सौ लोगों को एक जगह पर दे
दे, वो हमें मंजूर नहीं है। अगर सौ ब्रांच है तो जहां ब्रांच होगी, वहीं पर
उनको देना होगा, ताकि उस पिछड़े इलाके का भी विकास हो। इस योजना के तहत
यह किया गया है।
आज आपने देखा होगा। सामान्य परिवार के लोग,
उनको एक योजना के तहत सहभागी बनाया है और मैं भाई मिलिन्द को अभिनन्दन
देता हूं कि उन्होंने दलित युवकों में एक नई चेतना जगायी है। स्वयं तो
उद्योगकार है, लेकिन उन्होंने तय किया कि वे दलित युवकों को
आत्मसम्मान के साथ जीने वाले, अपने पैरों पर खड़े रहकर काम करने वाले और
देश के विकास में योगदान देने वाले बनाना चाहते हैं। मैं तो हैरान था,
दलित महिलाओं का भी उन्होंने एक संगठन खड़ा किया। मैं उस दिन जब गया
था, 300 महिला उद्यमी दलित, वो सैंकड़ों-करोड़ों का कारोबार कर रही है,
अगर यह ताकत है तो उस ताकत को ध्यान में लेकर के योजना बनाई जाए तो देश को
विकास की ऊंचाइयों पर कैसे ले जा सकते हैं, इसका हम उत्तम उदाहरण दे
सकते हैं। मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से आज का कार्यक्रम मैं उत्तम से
उत्तम कार्यक्रम मानता हूं क्योंकि मैं देख रहा हूं कि मेरे दलित
भाइयों के, मेरे आदिवासी भाइयों के जीवन में वो बदलाव आने वाला है और समाज
में वो सम्मान के साथ जीएंगे और नई पीढ़ी को रोजगार देने की उनमें ताकत
आएगी। इस प्रकार की रचना होना, यह अपने आप में समाज में एक बहुत बड़ा बदलाव
लाने का कारण बन रहा है।
आज एक और कार्यक्रम भी इसके साथ जोड़
दिया। प्रमुख कार्यक्रम तो मेरा ‘Stand Up India’ का था लेकिन हमारे महेश
शर्मा जी, अपने इस क्षेत्र में ई-रिक्शा के लिए कितने दिनों से काम
पर लगे हुए थे। तो उनका आग्रह था कि इस कार्यक्रम को भी इसके साथ जोड़
दिया जाए। मैंने कहा, जरूर जोड़ देंगे और मुझे अभी रिक्शा वाले
परिवारों के साथ चाय पर चर्चा करने का मौका मिला। मैं उनकी बातें सुन रहा
था। वे वो लोग थे जो पहले किराये की रिक्शा लेकर के, दिनभर मेहनत
करके, अपने परिवार का गुजारा चलाते थे लेकिन ज्यादातर पैसे किराये पर,
जिससे किराये पर लिया है रिक्शा, उसी पर चला जाता था। अपनी जेब में
बहुत कम आता था और मेहनत भी इतनी करनी पड़ती कि एक उम्र से ज्यादा काम
नहीं कर सकता था। मेहनत भी इतनी पड़ती थी कि ग्राहक खड़ा हो तो भी थक जाते
थे, खींचने की ताकत नहीं रहती थी। यह जो अवस्था उन्होंने अपनी जिन्दगी
में जी. .
भारत सरकार ने एक योजना बनाई। इस योजना के तहत, मेरे
मित्र भाई ब्रिजेश इस काम को बखूबी निभाते रहते है और पाँच हजार से
ज्यादा, 5100 ई-रिक्शा आज देने का कार्यक्रम हो रहा है। अब ये अपनी
ई-रिक्शा के मालिक बन जाएंगे, जो कल तक किराये की रिक्शा पर गुजारा
करते थे। योजना ऐसी बनी है कि दिन भर की कमाई में से, थोड़े पैसे डालकर
के वो उसके मालिक बन जाएंगे। दूसरा, ई-रिक्शा होने के कारण शरीर को जो
मजदूरी करनी पड़ती थी वो कम हो जाएगी। दिन में ज्यादा सफर कर पाएंगे,
ज्यादा काम कर पाएंगे।
आज एक Mobile application को भी launch
किया है, Ola. मोबाइल फोन पर जो Ola के application को download करेगा, वो
उस पर एक क्लिक करेगा सिर्फ तो नज़दीक में ये जो ई-रिक्शा वाला खड़ा
होगा, उसके मोबाइल फोन पर सूचना जाएगी कि फलानी जगह पर कोई रिक्शा के
लिए खड़ा है। दो-तीन-चार मिनट में रिक्शा आकर के खड़ा हो जाएगा। अभी
मैं रिक्शा में बैठकर के आया। उसी technology से रिक्शा को बुलाया और
उसी रिक्शा में बैठकर के आया। जेब में पैसों की भी जरूरत नहीं, अगर आपका
जन-धन account है, रुपे कार्ड है तो आप मोबाइल फोन से ही अपना पाँच रुपया -
सात रुपया - दस रुपया, जो भी किराया होगा, वो आप मोबाइल से उसको दे सकते
हैं, आराम से। पहले तो चार लोग हाथ ऊपर करे, कोई ऑटो रिक्शा वाले देखे न
दिखे, आज आप मोबाइल फोन से ऑटो रिक्शा, ई-रिक्शा को बुला सकते हैं और
ई-रिक्शा में बैठकर के आप आगे जा सकते हैं। इस व्यवस्था के कारण उनको
ग्राहक ढूंढने के लिए घूमना नहीं पड़ेगा, वरना वो तो इधर-उधर देखते रहते
हैं कि कोई मिल जाता है - कोई मिल जाता है, अब जरूरत नहीं है। वो एक जगह
पर खड़े है, जैसा ही अपने मोबाइल फोन पर सूचना आई, वो दौड़ेगा और लेकर आगे
जाएगा।
उसके कारण जो fuel का खर्चा होता है, वो भी नहीं होता और
इसमें fuel battery है। इसकी भी व्यवस्था है कि जिस प्रकार से ये पाँच
हजार ई-रिक्शाएं मिली हैं उसी प्रकार से इन रिक्शाओं को charging करने
के लिए Energy Bank भी बनाए गए हैं। जहां पर solar energy से battery
charge होगी। आपकी ई-रिक्शा की battery down हो गई है, आप वहां जाएंगे,
अपनी battery वहां छोड़ दीजिए, दूसरी battery ले लीजिए, charging का पैसा
दे दीजिए, आप गाड़ी दिन भर चलाते रहिए। इसके कारण सैंकड़ों लोगों को ये
solar energy से battery charging की दुकानें भी चलाने का मौका मिलेगा और
आग्रह यह रखा है कि ये ई-रिक्शा उनको मिलेगी जो रिक्शा के मालिक नहीं
है। जो सिर्फ ड्राइवर है और किराये की रिक्शा चलाते थे, यानी कि गरीब
को मिलेगा और गरीब, पीडि़त, शोषित, इनको अपने पैरों पर खड़े रखने की ताकत
कैसे मिले उस दिशा में हमारी सारी योजनाएं आज काम कर रही हैं। और उसका
नतीजा है कि आज यहां 5100 ई-रिक्शाएं गरीब परिवार के हाथ में जा रही हैं
और मैं उनके चेहरे को देख रहा था और उनको सब मालूम था बोले हमारी ट्रेनिंग
हो गई है। कुछ काम रिपेयर करना हो तो रिपेयरिंग करना हमको सिखा दिया गया
है, हमको ई-रिक्शा कैसे चलानी उसका ड्राइविंग सिखा दिया गया है, बैंक के
साथ कैसे कारोबार करना, वो सिखा दिया गया है। हमें app के द्वारा कोई सूचना
आए तो कैसे जाना वो सिखा दिया गया है, यानी एक प्रकार से skill
development का पूरा काम इन परिवारों का हो चुका है। आज ये दोनों चीजें
ई-रिक्शा के द्वारा environment को भी फायदा है। आज पूरी दुनिया global
warming से परेशान है। हम लोगों को विदेशों से तेल लाना पड़ता है,
अरबों-खरबों रुपया जाता है। अब वो तेल में भी बचत होगी, क्योंकि सूरज से,
सूरज की गर्मी से तैयार होने वाली बैटरी से ये ई-रिक्शाएं चलने वाली हैं।
धुआं भी नहीं होने वाला है, environment का problem नहीं होने वाला है, और
इसके कारण सामान्य मानवी के आरोग्य को भी इसके कारण फायदा तो होगा ही
होगा, लेकिन दुनिया में भी जो global warming की चिंता है, उसका उपाय भी
इसी से प्रस्तुत होगा और ये काम भी आज आपकी इस नगरी में प्रारंभ हो रहा
है।
मैं वित्त मंत्री श्रीमान अरुण जेटली जी का अभिनंदन करना
चाहता हूं, उन्होंने Banking Sector को, आपने देखा होगा, हमारे देश में
वित्त मंत्रालय यानी office, file, बिल पास करना, न करना, उसके आगे देश को
वित्त मंत्रालय क्या होता है ये कभी पता ही नहीं था। ज्यादा से ज्यादा
वित्त मंत्रालय से कौन जुड़ते थे तो शेयर मार्केट वाले आएंगे, बड़े
उद्योगकार आएंगे। पहली बार आप देखते होंगे कि वित्त मंत्रालय द्वारा जनता
के बीच जा करके कभी जन-धन योजना, कभी जीवन बीमा योजना, कभी जीवन ज्योति
योजना, कभी मुद्रा योजना, कभी Stand Up योजना, कभी RuPay Card की योजना,
गरीब व्यक्ति के साथ देश का वित्त मंत्रालय जुड़ा हुआ हो, वो 21वीं सदी
की पहली घटना है भाइयो-बहनों। एक-एक department को गरीबों के काम के लिए
कैसे लाया जा सकता है, गरीबों की भलाई के लिए कैसे लाया जा सकता है, इसका
एक जीता-जागता उदाहरण है।
हमारे देश में बैंकों का राष्ट्रीयकरण
हुआ था, गरीबों के नाम पर। लेकिन मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि आजादी
के 70 साल होंगे, इस देश के 40 प्रतिशत लोग ऐसे थे कि जिनको कभी बैंक का
दरवाजा देखने को सौभाग्य नहीं मिला आज तक। हमने बीड़ा उठाया। पिछली बार
मैंने 15 अगस्त को कहा था और कुछ ही दिनों के भीतर-भीतर सभी बैंक के
कर्मचारी, मैं सार्वजनिक रूप से बैंक के सभी कर्मचारियों का, सर्वजनिक रूप
से फिर से अभिनंदन करना चाहता हूं, उनका धन्यवाद करना चाहता हूं कि वो
घर-घर गए, banking hours के बाद भी काम किया, Saturday, Sunday को काम
किया, और देश के गरीब लोगों को Bank के खाते से जोड़ दिया। और हमने तो कहा
था कि zero balance से बैंक का खाता खुलेगा। आपको एक रुपया नहीं होगा, अरे
वो फोन का stationary का जो खर्चा होता है, आठ आना, रुपया, वो भी नहीं
होगा। बस आप खाता खुलवा दीजिए। अपना Bank account खुलवा दीजिए। हमने गरीबों
से कहा था आपके पैसों की जरूरत नहीं है, बस आप जुड़ जाइए। लेकिन मेरे देश
के गरीबों की अमीरी देखिए, मेरे देख के गरीबों की अमीरी देखिए, देश ने
अमीरों की गरीबी देख ली है, बैंको से रुपये ले करके भागना कैसा, इसको
रास्ते लोग खोज रहे हैं। लेकिन एक गरीब देखिए, जिसको तो हमने कहा था कि
zero balance से तुम account खुलाओ लेकिन उसकी ईमानदारी देखिए, उसकी अमीरी
देखिए, उसने कहा नहीं-नहीं मोदीजी हम ऐसे तो नहीं करेंगे, हम कुछ देना
चाहेंगे। और आज मैं गर्व के साथ कहता हूं कि प्रधानमंत्री जन-धन योजना के
अंतर्गत गरीबों ने जो बैंक एकाउंट खुलवाए, उसमें किसी ने पचास रुपये, किसी
ने सौ रुपये, किसी ने दो सौ रुपये डाला। वो रकम 35 हजार करोड़ रुपये से भी
ज्यादा हुई, 35 हजार करोड़। ये है मेरे देश के गरीबों की अमीरी। और जिस
देश के गरीबों की अमीरी देखतें हैं, तो सरकार का भी मन करता है कि उन
गरीबों के लिए खप जाना चाहिए। पूरी सरकार गरीबों के लिए स्व-स्वाहा कर
देनी पड़े तो कर देनी चाहिए, इस मिजाज से मैं काम कर रहा हूं। और मैं मानता
हूं देश आगे तब बढ़ेगा जब देश के गरीब के द्वारा देश की विकास यात्रा में
भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
हमारी सारी योजनाएं देश के गरीबों को
देश की विकास यात्रा में भागीदार बनाने की एक सुनिश्चित रणनीति के तहत चल
रही है। एक के बाद दूसरी योजना, पहली योजना से दूसरी जुड़ी हुई होती है।
और इन सारी योजनाओं के तहत एक ऐसा आर्थिक क्षेत्र जो अनछुआ था, किसी ने कभी
सोचा तक नहीं था, ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करने की दिशा में हम प्रयास कर
रहे हैं।
मैं फिर एक बार वित्त मंत्रालय को हृदय से बहुत-बहुत
अभिनंदन करता हूं। वित्त मंत्रालय के सभी अधिकारियों की टीम को अभिनंदन
करता हूं कि देश को उन्होंने उत्तम बजट तो दिया लेकिन देश के गरीबों के
लिए एक के बाद एक योजनाएं दे करके देश के गरीबों को ताकत देने का काम किया
है इसलिए वे भी बहुत-बहुत बधाई के पात्र हैं।
आज जिन परिवारों को
ई-रिक्शा मिली है, उनको मैं जब बैठा था, मैंने कहा था लेकिन बाकी लोग वहां
नहीं थे, उनसे मैं कहना चाहता हूं। और ये ई-रिक्शा वाले मेरा एक काम
करेंगे? करेंगे? पक्का करेंगे? आप मुझे वादा कीजिए आप अपने बच्चों को
पढ़ाएंगे। और राजनेताओं आपसे वोट मांगने आते होंगे, मैं आपसे आपके बच्चों
की शिक्षा की भीख मांगने आया हूं। और उसमें भी आप अपनी बेटियों को तो
अवश्य पढ़ाएंगे। आप देखिए कुछ ही सालों में आपको ई-रिक्शा भी नहीं चलाने
पड़ेगी, आपके बच्चे, आपके परिवार को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। और इसलिए
इस सरकार की योजनाओं का लाभ आपके बच्चों को सबसे पहले मिलना चाहिए और वो
शिक्षा के रूप में मिलना चाहिए। आप देखिए आपकी तो जिंदगी बदल जाएगी, भारत
का भविष्य बदल जाएगा और इसलिए मैं आज इन ई-रिक्शा वालों को भी शुभकामनाएं
देता हूं। मेरे दलित परिवारों को आज से जो ‘Stand-up India’ से Loan मिलना
शुरू हो रहा है, सवा लाख branches, आगे आएं वहां के नौजवान, इस
opportunity का फायदा उठाएं और वे भी समाज में एक अग्रिम कक्षा के
उद्योगकार, व्यापारी, साहसिक बन करके आएं और देश को नए सिरे से आपको मदद
करें इसी एक अपेक्षा के साथ आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद।
आज मुझे Ambedkar Memorial Lecture देने के लिए अवसर मिला है। यह छठा
लेक्चर है। लेकिन यह मेरा सौभाग्य कहो, या देश को सोचने का कारण कहो, मैं
पहला प्रधानमंत्री हूं जो यहां बोलने के लिए आया हूं। मैं मेरे लिए इसे
सौभाग्य मानता हूं। और इसके साथ-साथ भारत सरकार की एक योजना को साकार करने
का अवसर भी मिला है कि 26-अलीपुर जहां पर बाबा साहब का परिनिर्वाण का
स्थल है वहां एक भव्य प्रेरणा स्थली बनेगी। किसी के भी मन में सवाल आ
सकता है कि जिस महापुरुष ने 1956 में हमारे बीच से विदाई ली, आज 60 साल के
बाद वहां पर कोई स्मारक की शुरुआत हो रही है। 60 साल बीत गए, 60 साल बीत
गए।
मैं नहीं जानता हूं कि इतिहास की घटना को कौन किस रूप में जवाब
देगा। लेकिन हमें 60 साल इंतजार करना पड़ा। हो सकता है ये मेरे ही भाग्य
में लिखा गया होगा। शायद बाबा साहब के मुझे पर आशीर्वाद रहे होंगे के मुझे
ये सौभाग्य मुझे मिला।
मैं सबसे पहले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री
अटल बिहारी वाजपेयी जी का हृदय से अभिनंदन करना चाहता हूं। क्योंकि
वाजपेयी जी की सरकार ने यह निर्णय न किया होता, क्योंकि यह संपत्ति तो
प्राइवेट चली गई थी। और जिस सदन में बाबा साहब रहते थे, वो तो पूरी तरह
ध्वस्त करके नई इमारत वहां बना दी गई थी। लेकिन उसके बावजूद भी वाजपेयी
जी जब सरकार में थे, प्रधानमंत्री थे, उन्होंने इसको acquire किया। लेकिन
बाद में उनकी सरकार रही नहीं। बाकी जो आए उनके दिल में अम्बेडकर नहीं रहे।
और उसके कारण मकान acquire करने के बाद भी कोई काम नहीं हो पाया। हमारा
संकल्प है कि 2018 तक इस काम को पूर्ण कर दिया जाए। और अभी से मैं विभाग
को भी बता देता हूं, मंत्रि श्री को भी बता देता हूं 2018, 14 अप्रैल को
मैं इसका उद्घाटन करने आऊंगा। Date तय करके ही काम करना है और तभी होगा। और
होगा, भव्य होगा ये मेरा पूरा विश्वास है।
इसकी जो design आपने
देखी है, इसे आप भी विश्वास करेंगे दिल्ली के अंदर जो iconic buildings
है, उसमें अब इस स्थान का नाम हो जाएगा। दुनिया के लिए वो iconic building
होगा, हमारे लिए प्रेरणा स्थली है, हमें अविरत प्रेरणा देने वाली स्थली
है, और इसलिए आने वाली पीढि़यों में जिस-जिसको मानवता की दृष्टि से मानवता
के प्रति commitment के लिए कार्य करने की प्रेरणा पानी होगी तो इससे बढ़
करके प्रेरणा स्थली क्या हो सकती है।
कभी-कभार मेरी एक शिकायत
रहती है और यह शिकायत मैं कई बार बोल चुका हूं लेकिन हर बार मुझे दोहराने
का मन करता है। कभी हम लोग बाबा साहब को बहुत अन्याय कर देते हैं जी। उनको
दलितों का मसीहा बना करके तो घोर अन्याय करते है। बाबा साहब को ऐसे सीमित
न करें। वे अमानवीय, हर घटना के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले महापुरूष थे। हर
पीढ़ी, शोषित, कुचले, दबे, उनकी वो एक प्रखर आवाज़ थे। उनको भारत की सीमाओं
में बांधना भी ठीक है। उनको ‘विश्व मानव’ के रूप में हमने देखना चाहिए।
दुनिया जिस रूप से मार्टिन लूथर किंग को देखती है, हम बाबा अम्बेडकर साहब
को उससे जरा भी कम नहीं देख सकते। अगर विश्व के दबे-कुचले लोगों की आवाज़
मार्टिन लूथर किंग बन सकते हैं, तो आज विश्व के दबे कुचले लोगों की आवाज़
बाबा साहब अम्बेडकर बन सकते हैं। और इसलिए मानवता में जिस-जिस का विश्वास
है उन सबके लिए ये बहुत आवश्यक है कि बाबा साहेब मानवीय मूल्यों के
रखवाले थे।
और हमें संविधान में जो कुछ मिला है, वो जाति विशेष के
कारण नहीं मिला है। अन्याय की परंपराओं को नष्ट करने का एक उत्तम प्रयास
के रूप में हुआ है। कभी इतिहास के झरोखे से मैं देखूं तो मैं दो
महापुरूषों को विशेष रूप से देखना चाहूंगा, एक सरदार वल्लभ भाई पटेल और
दूसरे बाबा साहब अम्बेडकर।
देश जब आजाद हुआ तब, अनेक
राजे-रजवाड़ों में यह देश बिखरा पड़ा था। राजनैतिक दृष्टि से बिखराव था
व्यवस्थाओं में बिखराव था, शासन तंत्र बिखरे हुए थे और अंग्रेजों का
इरादा था कि यह देश बिखर जाए। हर राजा-रजवाड़े अपना सिर ऊचां कर करके, यह
देश को जो हालत में छोड़े, छोड़े, लेकिन सरदार वल्लभ भाई पटेल थे,
जिन्होंने राष्ट्र की एकता के लिए सभी राजे-रजवाड़ों को अपने कूटनीति के
द्वारा, अपने कौश्लय के द्वारा, अपने political wheel के द्वारा और बहुत
ही कम समय में इस काम को उन्होंने करके दिखाया। और आज से तो हिमाचल
कश्मीर से कन्या कुमारी एक भव्य भारत माता का निर्माण सरदार वल्लभ भाई
पटेल के माध्यम से हम देख पा रहे हैं। तो एक तरफ राजनैतिक बिखराव था, तो
दूसरी तरफ सामाजिक बिखराव था। हमारे यहां ऊंच-नीच का भाव, जातिवाद का जहर,
दलित, पीडि़त, शोषित, वंचित, आदिवासी इन सबके प्रति उपेक्षा का भाव और
सदियों से यह बीमारी हमारे बीच घर कर गई थी। कई महापुरूष आए उन्होंने
सुधार के लिए प्रयास किया। महात्मा गांधी ने किया, कई, यानि कोई शताब्दी
ऐसी नहीं होगी कि हिंदु समाज की बुराईयों को नष्ट करने के लिए प्रयास न
हुआ हो।
लेकिन बाबा साहब अम्बेडकर ने राजनीतिक-संवैधानिक
व्यव्स्था के माध्यम से सामाजिक एकीकरण का बीड़ा उठाया, जो काम
राजनीतिक एकीकरण का सरदार पटेल ने किया था, वो काम सामाजिक एकीकरण का बाबा
साहब अम्बेडकर जी के द्वारा हुआ।
और इसलिए ये जो सपना बाबा साहेब
ने देखा हुआ है उस सपने की पूर्ति का प्रयास उसमें कहीं कोताही नहीं बरतनी
चाहिए। उसमें कोई ढीलापन नहीं आना चाहिए। कभी-कभार बाबा साहेब के विषय में
जब हम सोचते हैं, हम में से बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि बाबा साहेब को
मंत्रिपरिषद से इस्तीफा देने की नौबत क्यों आई। या तो हमारे देश में
इतिहास को दबोच दिया जाता है, या तो हमारे देश में इतिहास को dilute किया
जाता है या divert कर दिया जाता है, अपने-अपने तरीके से होता है। Hindu
code bill बाबा साहेब की अध्यक्षता में काम चल रहा था और उस समय प्रारंभ
में शासन के सभी मुखिया वगैरह सब इस बात में साथ दे रहे थे। लेकिन जब Hindu
Code Bill Parliament में आने की नौबत आई और महिलाओं को उसमें अधिकार देने
का विषय जो था, संपत्ति में अधिकार, परिवार में अधिकार, महिलाओं को equal
right देने की व्यवस्था थी उसमें क्योंकि बाबा साहेब अम्बेडकर किसी को
भी वंचित, पीडि़त, शोषित देख ही नहीं सकते थे। और ये सिर्फ दलितों के लिए
नहीं था, टाटा, बिरला परिवार की महिलाओं के लिए भी था और दलित बेटी के लिए
भी था। ये बाबा साहेब का vision देखिए। लेकिन, लेकिन उस समय की सरकार इस
progressive बातों के सामने जब आवाज उठी, तो टिक नहीं पाई, सरकार दब गई कि
भारत में ऐसा कैसे हो सकता है कि महिलाओं को संपत्ति का अधिकार देंगे वो तो
बहू बनके कहीं चली जाती हैं! तो फिर पता नहीं क्या हो जाएगा? समाज में
कैसे बिखराव, ये सारे डर पैदा हुए, पचासों प्रकार के लोगों ने अपना डर
व्यक्त किया। ऐसे समय बाबा साहेब को लगा, अगर भारत की नारी को हक नहीं
मिलता है, तो फिर उस सरकार का बाबा साहेब हिस्सा भी नहीं बन सकते और
उन्होंने सरकार छोड़ दी थी। और जो बातें बाबा साहेब ने सोची थीं, वो बाद
में समय बदलता गया, लोगों की सोच में भी थोड़ा सुधार आता गया, धीरे-धीरे
करके कभी एक चीज सरकार ने मान ली, कभी दो मान लीं, कभी एक आई, कभी दो आईं।
धीरे-धीरे-धीरे करके बाबा साहेब ने जितना सोचा था, वो सारा बाद में सरकार
को स्वीकार करना पड़ा। लेकिन बहुत साल लग गए, बहुत सरकारें आ के चली गईं।
कहने
का मेरा तात्पर्य ये है, कि अगर में दलितों के अंदर बाबा साहेब को सीमित
कर दूंगा, तो इस देश की 50 प्रतिशत जनसंख्या माताओं, बहनों को बाबा साहेब
ने इतना बड़ा हक दिया, उनका क्या होगा? और इसलिए ये आवश्यक है कि बाबा
साहेब को उनकी पूर्णता के रूप में समझें, स्वीकार करें।
Labour
Laws, हमारे देश में महिलाओं को कोयले की खदान में काम करना बड़ा दुष्कर
था, लेकिन कानून रोकता नहीं था। और ये काम इतना कठिन था कि महिलाओं से नहीं
करवाया जा सकता। ये बाबा साहेब अम्बेडकर ने हिम्मत दिखाई और महिलाओं को
कोयले की खदानों के कामों से मुक्त कराने का बहुत बड़ा निर्णय बाबा
अम्बेडकर ने किया था।
हमारे देश में मजदूरी, सिर्फ दलित ही मजदूर
थे ऐसा नहीं, जो भी मजदूर थे, बाबा साहेब उन सबके मसीहा थे। और इसलिए 12
घंटा, 14 घंटा मजदूर काम करता रहता था, मालिक काम लेता रहता था और मजदूर को
भी नहीं लगता था कि मेरा भी कोई जीवन हो सकता है, मेरे भी कोई मानवीय हक
हो सकते हैं, उस बेचारे को मालूम तक नहीं था। और न ही कोई बाबा साहेब
अम्बेडकर को memorandum देने आया था कि हमने इतना काम लिया जाता है कुछ
हमारा करो। ये बाबा साहेब की आत्मा की पुकार थी कि उन्होंने 12 घंटे, 14
घंटे काम हो रहा था, 8 घंटे सीमित किया। आज भी हिन्दुस्तान में जो labour
laws है, उसकी अगर मुख्य कोई foundation है, वो foundation के रचियता
बाबा साहेब अम्बेडकर थे।
आप हिन्दुस्तान के 50 प्रमुख नेताओं को
ले लीजिए, जिनको देश के निर्णय करने की प्रकिया में हिस्सा लेने का अवसर
मिला है, वो कौन से निर्णय है, जिन निर्णयों ने हिन्दुस्तान को एक
शताब्दी तक प्रभावित किया। पूरी 20वीं शताब्दी में जो विचार, जो निर्णय,
देश पर प्रभावी रहे, जो आज 21वीं सदी के प्रारंभ में भी उतनी ही ताकत से
काम कर रहे हैं। अगर आप किस-किस के कितने निर्णय, इसका अगर खाका बनाओगे, तो
मैं मानता हूं कि बाबा साहेब अम्बेडकर नम्बर एक पर रहेंगे, कि जिनके
द्वारा सोची गई बातें, जिनके द्वारा किए गए निर्णय आज भी relevant हैं।
आप
देख लीजिए power generation, electricity, आज हम देख रहे हैं कि
हिन्दुस्तान में ऊर्जा की दिशा में जो काम हुआ है, उसका अगर कोई
structured व्यवस्था बनी तो बाबा साहेब के द्वारा बनी थी। और उसी का
नतीजा था कि Electric Board वगैरा, electricity generation के लिए अलग
व्यवस्थाएं खडी़ हुईं जो आगे चल करके देश में विस्तार होता गया, और भारत
में ऊर्जा की दिशा में self-sufficient बनने के लिए भारत में घर-घर ऊर्जा
पहुंचाने की दिशा में उस सोच का परिणाम था, कि उन्होंने एक structured
व्यवस्था देश को दी।
आपने
देखा होगा, अभी–अभी Parliament में एक bill हम लोग लाए। जब हम ये bill लाए
तो लोगों को लगा होगा कि वाह! मोदी सरकार ने क्या कमाल कर दिया। Bill
क्या लाए हैं, हम भारत के पानी की शक्ति को समझ करके Water-ways पर
महातम्य देना, Water-ways के द्वारा हमारे यातायात को बढाना, हमारे
goods-transportation को बढ़ाना, उस दिशा में एक बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय
अभी इस Parliament में किया है। लेकिन कोई कृपा करके मत सोचिए कि मोदी की
सोच है। यहां हमने जरूर है, सौभाग्य मिला है, लेकिन ये मूल विचार बाबा
साहेब अम्बेडकर का है। बाबा साहेब अम्बेडकर थे जिन्होंने उस समय, उस समय
भारत की maritime शक्ति और भारत के Water-ways की ताकत को समझा था और उस
की structured व्यवस्था की थी। और उसको वहां आगे बढ़ाना चाहते थे। अगर
लम्बे समय उनको सरकार में सेवा करने का मौका मिलता जो निर्णय मैंने अभी
किया Parliament में, वो आज से 60 साल पहले हो गया होता। यानी बाबा साहेब
के न होने का इस देश को कितना घाटा हुआ है, यह हमें पता चलता है और बाबा
साहेब का कोई भक्त सरकार में आता है, तो 60 साल के बाद भी काम कैसे होता
है, ये नजर आता है।
बाबा साहेब हमें क्या संदेश देकर गए, और मैं
मानता हूं जो बीमारी का सही उपचार अगर किसी ने ढूंढा है, तो बाबा साहेब ने
ढूंढा है। बीमारियों का पता बहुतों को होता है, बीमारी से मुक्ति के लिए
छोटे-मोटे प्रयास करने वाले भी कुछ लोग होते हैं लेकिन एक स्थाई समाधान,
अगर किसी ने दिया तो बाबा साहेब ने दिया, वो क्या? उन्होंने समाज को एक
ही बात कही कि भाई शिक्षित बनो, शिक्षित बनो, ये सारी समस्याओं का समाधान
शिक्षा में है। और एक बार अगर आप शिक्षित होंगे, तो दुनिया के सामने आप आंख
से आंख मिला करके बात कर पाओगे, कोई आपको नीचा नहीं देख सकता, कोई आपको
अछूत नहीं कह सकता। ये, ये जो Inner Power देने का प्रयास, ये Inner Power
था। उन्होंने बाहरी ताकतें नहीं दी थीं, आपकी आंतरिक ऊर्जा को जगाने के
लिए उन्होंने रास्ता दिखाया था। दूसरा मंत्र दिया, संगठित बनो और तीसरा
बात बताया मानवता के पक्ष में संघर्ष करो, अमानवीय चीजों के खिलाफ आवाज
उठाओ। ये तीन मंत्र आज भी हमें प्रेरणा देते रहे हैं, हमें शक्ति देते रहे
हैं। और इसलिए हम जब बाबा साहेब अम्बेडकर की बात करते हैं तब, हमारा
दायित्व भी तो बनता है और दायित्व बनता है, बाबा साहेब के रास्ते पर
चलने का। और उसकी शुरुआत आखिरी मंत्र से नहीं होती है, पहले मंत्र से होती
है। वरना कुछ लोगों को आखिरी वाला ज्यादा पसंद आता है, संघर्ष करो। पहले
वाला मंत्र है शिक्षित बनो, दूसरे वाला मंत्र है संगठित बनो। आखिर में
जरूरत ही नहीं पड़ेगी, वो नौबत ही नहीं आयेगी। क्योंकि अपने आप में इतनी
बड़ी ताकत होगी कि दुनिया को स्वीकार करना होगा। और बाबा साहेब ने जो कहा,
वो जी करके दिखाया था। वरना वे भी शिक्षा छोड़ सकते थे, तकलीफें उनको भी
आई थीं, मुसीबतें उनको भी आई थीं, अपमान उनको भी झेलने पड़े थे। और मुझे
खुशी हुई अभी हमारे बिहार के गवर्नर एक delegation लेकर बड़ौदा गए थे और
बड़ौदा जा करके सहजराव परिवार को उन्होंने सम्मानित किया। इस बात के लिए
सम्मानित किया कि यह सहजराव गायकवाड़ थे, जिसको सबसे पहले इस हीरे की
पहचान हुई थी। और इस हीरे को मुकुटमणि में जड़ने का काम अगर किसी ने सबसे
पहले किया था तो सहजराव गायकवाड़ ने किया था। और तभी तो भारत को सहजराव
गायकवाड़ की एक भेंट है कि हमें बाबा साहेब अम्बेडकर मिले। और इसलिए
धन्यवाद प्रस्ताव करने के लिए सहजराव गायकवाड़ के परिवार के पास जा करके
काफी समाज के लोग गए थे, और उनका सम्मान किया, परिवार का। वरना उस समय एक
peon भी बाबा साहेब को हाथ से पानी देने के लिए तैयार नहीं था। वो नीचे
रखता था, फिर बाबा साहेब उठाते थे। ऐसे माहौल में गायकडवाड़ जी ने बाबा
अम्बेडकर साहेब को गले लगा लिया था। ये हमारे देश की विशेषता है। इन
विशेषताओं को भी हमें पहचानना होगा। और इन विशेषताओं के आधार पर हमने आगे
की हमारी जीवन विकास की यात्रा को आगे बढ़ाना होगा।
कभी-कभार हमारे
देश में बाबा साहेब अम्बेडकर ने जिस भावना से जिन कामों को किया, वो
पूर्णतया पवित्र राष्ट्र निष्ठा थी, समाज निष्ठा थी। राज निष्ठा की
प्रेरणा से बाबा साहेब अम्बेडकर ने कभी कोई काम नहीं किया। राष्ट्र
निष्ठा और समाज निष्ठा से किया और इसलिए हमने भी हमारी हर सोच हमारे हर
निर्णय को इस तराजू से तौलने का बाबा अम्बेडकर साहब ने हमें रास्ता
दिखाया है कि राष्ट्र निष्ठा के तराजू से तोला जाए, समाज निष्ठा के
तराजू से तोला जाए, और तब जा करके वो हमारा निर्णय, हमारी दिशा, सही सिद्ध
होगी।
कुछ लोगों ने एक बात, कुछ लोगों का हमसे, हम लोग वो हैं
जिनको कुछ लोग पसंद ही नहीं करते हैं। हमें देखना तक नहीं चाहते हैं। उनको
बुखार आ जाता है और बुखार में आदमी कुछ भी बोल देता है। बुखार में वो मन का
आपा भी खो देता है, और इसलिए असत्य, झूठ, अनाप-शनाप ऐसी बातों को
प्रचारित किया जाता है। मैं आज जब, जिन लोगों ने 60 साल तक कोई काम नहीं
किया, उस 26-अलीपुर के गौरव के लिए आज यहां खड़ा हूँ तब, मुझे बोलने का हक
भी बनता है।
मुझे बराबर याद है, जब वाजपेयी जी की सरकार बनी तो
चारों तरफ हो-हल्ला मचा था अब ये भाजपा वाले आ गए हैं, अब आपका आरक्षण
जाएगा। जो लोग पुराने हैं उनको याद होगा। वाजपेयी जी की सरकार के समय ऐसा
तूफान चलाया, गांव-गांव, घर-घर, ऐसा माहौल बना दिया जैसे बस चला ही जाएगा।
वाजपेयी जी की सरकार रही, दो-टंब रही लेकिन खरोंच तक नहीं आने दी थी। फिर
भी झूठ चलाया गया।
मध्यप्रदेश में सालों से भारतीय जनता पार्टी
राज कर रही है, गुजरात में, महाराष्ट्र में, पंजाब में, हरियाणा में,
उत्तर प्रदेश में, अनेक राज्यों में, हम जिन विचार को लेकर के निकले है,
उस विचार वालों को सरकार चलाने का अवसर मिला, दो-तिहाई बहुमत से अवसर मिला,
लेकिन कभी भी दलित, पीडि़त, शोषित, tribal, उनके आरक्षण को खरोंच तक नहीं
आने दी है। फिर भी झूठ चलाया जा रहा है, क्यों? बाबा साहेब अम्बेडकर ने
जो राष्ट्र निष्ठा और समाज निष्ठा के आधार पर देश को चलाने की प्रेरणा
दी थी, उससे हट करके सिर्फ राजनीति करने वाले लोग हैं, वो इससे बाहर नहीं
निकल पाते हैं, इसलिए से बातों को झूठे रूप में लोगों को भ्रमित करने के
लिए चला रहे हैं और इसलिए मैं, मैं जब Indu Mills के कार्यक्रम के लिए गया
था, चैत्य भूमि के पुनर्निर्माण के शिलान्यास के लिए गया था, उस समय मैंने
कहा था खुद बाबा साहेब अम्बकेडकर भी आ करके, आपका ये हक नहीं छीन सकते
हैं। बाबा साहेब के सामने हम तो क्या चीज हैं, कुछ नहीं हैं जी। उस
महापुरुष के सामने हम कुछ नहीं हैं। और इसलिए ये जो भ्रम फैलाए जा रहे हैं,
उनकी राजनीति चलती होगी, लेकिन समाज में इसके कारण दरारें पैदा होती हैं,
तनाव पैदा होते हैं और समाज को दुर्बल बना करके, हम राष्ट्र को कभी सबल
नहीं बना सकते हैं, इस बात को हम लोगों ने जिम्मेवारी के साथ समझना होगा।
बाबा
साहेब अम्बेडकर का आर्थिक चिंतन और वैसे तो अर्थवेत्ता थे। उनकी पूरी
पढ़ाई आर्थिक विषयों पर हुई और उनकी पीएचडी भी, जो लोग आज भारत की महान
परंपराओं को गाली देने में गौरव अनुभव करते हैं, उनको शायद पता नहीं है, कि
बाबा साहेब अम्बेडकर की Thesis भी भारत की उत्तम वैभवशाली व्यापार विषय
को ले करके उन्होंने पीएचडी किया था। जो भारत के पुरातन हमारे गौरव को
अभिव्यक्त करता था। लेकिन बाबा साहेब को समझना नहीं, बाबा साहेब की
विशेषता को मानना नहीं, और इसको समझने के लिए सिर्फ किताबें काम नहीं आती
हैं, बाबा साहेब को समझने के लिए समाज के प्रति संवेदना चाहिए और उस
महापुरुष के प्रति भक्ति चाहिए, तब जा करके संभव होगा, तब जा करके संभव
होगा। और इसलिए बाबा साहेब अम्बेडकर ने अपने आर्थिक चिंतन में एक बात साफ
कही थी, वो इस बात को लगातार थे कि भारत का औद्योगिकरण बहुत अनिवार्य है।
Industrialisation, उस समय से वो सोचते थे, एक तरफ labour reforms करते थे,
labour के हक के लिए लड़ाई लड़ते थे, लेकिन राष्ट्र के लिए औद्योगिकरण की
वकालत करते थे। देखिए कितना बढि़या combination है। लेकिन आज क्या हाल
है, जो labour की सोचता है वो उद्योग की सोचने को तैयार नहीं, जो उद्योग की
सोचता है वो labour की सोचने को तैयार नहीं है। और वहीँ बाबा साहेब
अम्बेडकर थे जो दोनों की सोचते थे, क्योंकि राष्ट्र निष्ठा की तराजू से
तोलते थे। और इसलिए वो दोनों की सोचते थे, और उसी का परिणाम ये है कि बाबा
साहेब औद्योगिकरण के पक्षकार थे और उनका बड़ा महत्वपूर्ण तर्क था, वो साफ
कहते थे, कि मेरे देश के जो दलित, पीडि़त, शोषित हैं, उनके पास जमीन नहीं
है और हम नहीं चाहते वो खेत मजदूर की तरह अपनी जिंदगी पूरी करें, हम चाहते
हैं वो मुसीबतों से बाहर निकलें। औद्योगिकरण की जरूरत इसलिए है कि मेरे
दलित, पीडि़त, शोषित, वंचित लोगों को रोजगार के नए अवसर उपलब्ध हो जाएं,
इसलिए औद्योगिकरण चाहिए। दलित, पीडि़त, शोषितों के पास जमीन नहीं है। खेती
उसके नसीब में नहीं है। खेत मजदूर के नाते जिंदगी, क्या यही गुजारा करेगा
क्या? और इसके लिए बाबा साहेब अम्बेडकर ने इन बातों को बल दिया।
औद्योगिकरण को बल दिया।
इसी विज्ञान भवन में मेरे लिए एक बहुत बड़ा
गौरव का दिन था, जब मैं दलित चैंबर के लोगों से यहां मिला था। मिलिंद यहां
बैठा है, और देश भर से दलित Entrepreneur आए थे। और मैं तो हैरान, आनंद
मुझे तब हुआ, कि दलितों में Women Entrepreneur भी बहुत बड़ी तादाद में आए
थे। और उनका संकल्प क्या था, मैं मानता हूं बाबा साहेब अम्बेडकर को
उत्तम से उत्तम श्रद्धाजंलि देने का प्रयास अगर कोई करता है, तो ये दलित
चैंबर के मित्र कर रहे हैं। उन्होंने कहा, हम नहीं चाहते हैं कि दलित
रोजगार पाने के लिए तड़पता रहे वो रोजगारी के लिए याचक बने, हम वो स्थिति
पैदा करना चाहते हैं कि दलित रोजगार देने वाला बने। और उन्होंने हमारे
सामने कुछ मांगे रखी थीं। और आज मैं गर्व के साथ कहता हूं, उस मीटिंग को
चार महीने अभी तो पूरे नहीं हुए हैं, इस बजट में वो सारी मांगे मान ली गई
हैं, सारी बातें लागू कर दी हैं। ये आपने अखबार में नहीं पढ़ा होगा। अच्छी
चीजें बहुत कम आती हैं।
दलित Entrepreneurship, उसके लिए अनेक
प्रोत्साहन, venture, capital, fund समेत कई बातें, इस field के लोगों ने
जिन्होंने तय किया, जिनका माद्दा है कुछ करना है हमारे दलित युवाओं के
लिए। वो बात इतनी ताकतवर थी कि सरकार को मांगे माने बिना, कोई चारा नहीं था
जी। कोई आंदोलन नहीं किया था, कोई संघर्ष नहीं था लेकिन बात में दम था। और
ये सरकार इतनी संवेदनशील है कि जिस बात से देश आगे बढ़ता है वो उसकी
प्राथमिकता होती है, और हम भी उस पर चलते हैं।
मेरा कहने का
तात्पर्य ये है भाइयो, कि हमें समाज की एकता को बल देना है। और बाबा साहेब
से ये ही तो सीखना पड़ेगा। आप कल्पना कर सकते हो कि एक महापुरुष जिसको
इतना जुल्म सहना पड़ा हो, जिसका बचपन अन्याय, उपेक्षा और उत्पीड़न से
बीता हो, जिसने अपनी मां को अपमानित होते देखा हो, मुझे बताइए ऐसे व्यक्ति
को मौका मिल जाए तो हिसाब चुकता करेगा कि नहीं करेगा? तुम, तुम मुझे पानी
नहीं भरने देते थे, तुम मुझे मंदिर नहीं जाने देते थे, तुम, मेरे बच्चों
को स्कूल में admission देने से मना करते थे। मुनष्य को जो level है ना,
वहां ये बहुत स्वाभाविक है। लेकिन जो मानव से कुछ ऊपर है वो बाबा साहेब
अम्बेडकर थे, कि जब उनके हाथ में कलम थी, कोई भी निर्णय करने की ताकत थी,
लेकिन आप पूरा संविधान देख लीजिए, पूरी संविधान सभा की debate देख लीजिए,
बाबा साहेब अम्बेडकर की बातों में, वाणी में, शब्द में, कहीं कटुता नजर
नहीं आती है, कहीं बदले का भाव नजर नहीं आता है। उनका भाव यही रहा, और वो
भाव क्या था, मैं अपने शब्दों में कह सकता हूं, कि कभी-कभार खाना खाते
समय दांतों के बीच हमारी जीभ कट जाती है, लेकिन हम दांत तोड़ नहीं देते
हैं। क्यों? क्योंकि हमें पता हैं दांत भी मेरे हैं, जीभ भी मेरी है।
बाबा साहेब अम्बेडकर के लिए सवर्ण भी उनके थे और हमारे दलित, पीडि़त,
शोषित भी, दोनों ही उनके लिए बराबर थे, और इसलिए बदले का नामो-निशान नहीं
था, कटुता का नामो-निशान नहीं था। बदले के भाव को जन्म न देने का और समाज
को साथ ले के चलने की प्रेरणा देने वाला प्रयास बाबा साहेब अम्बेडकर की हर
बात में झलकता है और ये देश, सवा सौ करोड़ का देश बाबा साहेब अम्बेडकर का
हमेशा-हमेशा ऋणी रहेगा, जिसने देश की एकता के लिए अपने जुल्मों को दबा
दिया, गाढ़ दिया। भविष्य भारत का देखा और बदले की भावना के बिना समाज को
एक करने की दिशा में प्रयास किया है।
क्या हम सब, हमारे राजनीतिक
कारण कुछ भी होंगे, पराजय को झेलना बड़ा मुश्किल होता है। लेकिन उसके
बावजूद भी जय और पराजय से भी समाज का जय बहुत बड़ा होता है, राष्ट्र का जय
बहुत बड़ा होता है। और इसलिए उसके लिए समर्पित होना ये हम सबका दायित्व
बनता है। इस दायित्व को ले करके बाबा साहेब अम्बेडकर ने जो उत्तम भूमिका
निभाई है, राजनीतिक कारणों से इस महापुरुष के योगदान को अगर सही रूप में
उनके जीवनकाल से ले करके अब तक अगर हमने प्रस्तुत किया होता तो आज भी समाज
में कहीं-कहीं-कहीं तनाव नजर आता है, कभी-कभी टकराव नजर आता है, कभी-कभी
खंरोच हो जाती है। मैं दावे से कहता हूं, अगर बाबा साहेब अम्बेडकर को हमने
भुला न दिया होता, तो ये हाल न हुआ होता। अगर बाबा साहेब अम्बेडकर को फिर
से एक बार हम उसी भाव के साथ, श्रद्धा के साथ जनसामान्य तक पहुंचाने का
प्रयास करेंगे तो ये जो कमियां हैं वो कमियां भी दूर हो जाएंगी, तो ताकत उस
नाम में है, उस काम में है, उस समर्पण में है, उस त्याग में है, उस
तपस्या में है, उस महान चीजें जो हमें दे करके गए हैं उसके अंदर पड़ा हुआ
है और उसकी पूर्ति के लिए हम लोगों का प्रयास होना बहुत आवश्यक है।
और
इसलिए बाबा साहेब मानवता के पक्षकार थे। अमानवता की हर चीज को वो नकारते
थे। उसका परिमार्जन का प्रयास करते थे और हर चीज संवैधानिक तरीके से करते
थे। लोकतांत्रिक मर्यादाओं के साथ करते थे। बाबा साहेब के साथ क्या-क्या
अन्याय किया, किस-किसने अन्याय किया, ये हम सब भली-भांति जानते हैं।
हमारा संकल्प ये ही रहे दलित हो, पीडि़त हो, शोषित हो, जो गण वंचित हो,
गरीब हो, आदिवासी हो, गांव में रहने वाला हो, झुग्गी-झोंपड़ी में जीने
वाला हो, शिक्षा के अभाव में तरसने वाला हो, इन सबके लिए अगर कुछ काम करना
है तो बाबा साहेब अम्बेडकर हमारे लिए सदा-सर्वदा एक प्रेरणा हैं और वो ही
प्रेरणा हमें काम करने के लिए ताकत देती है।
आप देखिए, अभी मैं एक
दिन बैठा था, मैं हमारे सरकार के लोगों से हिसाब मांग रहा था। मैंने कहा कि
भई कितने गांव हैं जहां अब बिजली का खंभा भी नहीं पहुंचा है। आजादी के
इतने साल बाद भी हिन्दुस्तान में 18 हजार गांव ऐसे पाए कि जहां बिजली का
खंभा नहीं पहुंचा है। जिस बाबा साहेब अम्बेडकर ने power generation के लिए
पूरा structure बना करके गए, 60 साल के बाद भी 18 हजार गांव में बिजली
पहुंचेगी नहीं, तो बाबा साहेब अम्बेडकर को क्या श्रद्धाजंलि हम देंगे जी?
हमने बीड़ा उठाया है, मैंने लालकिले से बोल दिया। जैसे आज बोल दिया न, 14
अप्रैल को मैं उद्घाटन करुंगा, 2018, लालकिले से मैंने बोल दिया 1000 दिन
में मुझे 18,000 गांवों में बिजली पहुंचानी है और आप, आप अपने मोबाइल फोन
पर देख सकते हैं, आज किस गांव में बिजली पहुंची। आजादी के 60 साल के बाद अब
तक करीब-करीब 6000 से अधिक गांवों में बिजली पहुंच चुकी है, 18000 मुझे
1000 दिन में पूरे करने हैं, मैं देख रहा हूं शायद 18000, एक हजार दिन से
भी कम समय में पूरा कर दूंगा। आप कल्पना कर सकते हैं, आप, आप एक साइकिल
अपने पास रखो और सोच रहे हो कि भाई 2018 में स्कूटर लाना है। तो आप सोचते
हैं किस colour का स्कूटर लाएंगे, किस कम्पनी का स्कूटर लाएंगे, अनेकों
बार दुकान होगी तो देखते होंगे, brochure लेते होंगे, स्कूटर लाना है।
साइकिल से स्कूटर जाएं तो भी एक और जिस दिन आए स्कूटर 10 रुपये की माला
ला करके पहनाएंगे, नारियल फोड़ेंगे, मिठाई बांटेंगे, क्यों साइकिल से
स्कूटर पर आए कितना आनंद होता है। 60 साल के बाद जिस गांव में बिजली आई
होगी, कितना आनंद होगा, आप कल्पना कर सकते हैं। मैं उन 18000 गांवों को
कहता हूं कि 60 साल के बाद आपके घर में भी बिजली आती है, तो मोदी का
अभिनंदन मत करना, बाबा साहेब अम्बेडकर का करना, क्योंकि ये structure वो
बनाके गए थे, लेकिन बीच वालों ने काम को पूरा नहीं किया। बाबा साहेब
अम्बेडकर की इच्छा को मैं पूरा करने का सौभाग्य मानता हूं।
अभी
14 अप्रैल को मैं मऊ तो जा रहा हूं। ये पंचतीर्थ का निर्माण भी हमारे
सौभाग्य का कारण बना है। जहां-जहां भाजपा की सरकारें हैं उन्हीं के समय
हुआ है, ये सब। फिर भी बदनामी हमको दी जा रही है। क्या कारण था कि Indu
Mills पर चैत्य भूमि का कार्य पहले की सरकारों ने नहीं किया। क्या कारण था
26-अलीपुर का फैसला आज करने की नौबत आई? क्या कारण है कि लंदन का मकान आज
हम ले करके आए और राष्ट्र के लिए प्रेरणा दी? कोई भी मेरा दलित अब जाएगा
लंदन उस मकान को जरूर देखने जाएगा। पढ़ने के लिए जाएगा या घूमने के लिए
जाएगा, जरूर देखने जाएगा, मुझे विश्वास है। ये पंचतीर्थ की यात्रा, एक
प्रेरक यात्रा बनी है कि समाज जीवन में कैसा परितर्वन आया और हर काम
दिल्ली के अंदर दो स्मारक, 26-अलीपुर और हमारा जो मैंने 15-जनपथ जिसका
मैनें, शायद एक साल हो गया और construction उसका तेजी से चल रहा है, उसका
लोकार्पण तो बहुत जल्द होने की नौबत आ जाएगी।
तो ये सारे काम
भारतीय जनता पार्टी के लोगों को सरकार बनाने का सौभाग्य मिला तब हुए हैं।
और इसलिए क्योंकि हमारी ये श्रद्धा है। अभी 14 अप्रैल को मैं मऊ तो जा रहा
हूं, लेकिन उस दिन हम एक बड़ा कार्यक्रम कर रहे हैं, मुंबई में। कौन सा
कार्यक्रम? बाबा साहेब अम्बेडकर ने जो सपना देखा था भारत की जल शक्ति का
maritime का water-way का। हम एक Global Conference 14 अप्रैल को पानी के
संदर्भ में मुंबई में करने जा रहे हैं, वो भी बाबा साहेब अम्बेडकर की
जन्म-जयंती पर तय की है।
मैं मऊ में कार्यक्रम launch करने वाला
हूं। हमारे देश के किसानों को, क्योंकि बाबा साहेब अम्बेडकर का आर्थिक
चिंतन बड़ा ताकतवर चिंतन है जी और आज भी relevant है। बाबा साहेब अम्बेडकर
ने किसानों की चिंता की है, अपने चिंतन में। किसान जो पैदावार करता है
उसकी market को ले करके बहुत बड़ी कठिनाइयां हैं। और बेचारा घर से निकलता
है मंडी में जाता है तब तक मंडी में कोई लेने वाला नहीं होता है। आखिरकार
अपनी सब्जी वहीं पशुओं को खाने के लिए छोड़ करके घर वापिस चला जाता है, ये
हमने देखा है। 14 अप्रैल को हम एक E-market , E-platform तैयार कर रहे
हैं, जो हमारा किसान अपने मोबाइल फोन पर तय कर पाएगा कि किस मंडी में क्या
दाम है, और कहां माल बेचने से ज्यादा पैसा मिल सकता है, वो मेरा किसान तय
कर सकता है, ये भी, ये भी 14 अप्रैल, बाबा साहेब की जन्म-जयंती के दिन हम
लोग उसका प्रारंभ करने वाले हैं।
कहने का मेरा तात्पर्य ये है कि
उस दिशा में देश को चलाना है। ऐसे महापुरुषों के चिंतन वो हमारी प्रेरणा
हैं, हमें ताकत देते हैं और हम उनसे सीखते हैं। और मजा ये है कि उनकी बातें
आज भी relevant हैं। उन बातों को ले करके चल रहे हैं और राष्ट्र के
निर्माण के लिए, राष्ट्र के कल्याण के लिए ये ही सही राह है। एस: पंथ:,
ये ही एक मार्ग है। उस मार्ग को ले करके हम आगे बढ़ रहे हैं। मैं फिर एक
बार आप सब के बीच आने का मुझे सौभाग्य मिला और ये 60 साल से जो निर्णय
नहीं हो पा रहा था, वाजपेयी जी ने जो सपना देखा था, उस सपने को पूरा करने
का सौभाग्य हमें मिला है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि 14 अप्रैल,
2018, आप सब मौजूद रहिए। फिर एक बार उस भव्य स्मारक को बनाएंगे।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
मंच पर विराजमान सभी महानुभाव और विशाल संख्या में पधारे हुए प्यारे भाइयो और बहनों,
ये आपका उत्साह देख करके मैं अंदाज लगा
सकता हूं कि इस bridge के प्रति आप लोगों के मन में कितना महात्मय है, इस
bridge के कारण न सिर्फ यातायात लेकिन यहां के आर्थिक जीवन में भी कितना
बड़ा बदलाव आ सकता है इसका भली-भांति अंदाज आप सबके उत्साह के कारण मैं
अनुमान लगा सकता हूं।
मां गंगा उत्तरी बिहार और दक्षिणी बिहार,
दोनों को जोड़ती है लेकिन नागरिकों को जुड़ने के लिए व्यवस्थाएं आवश्यक
होती हैं। अब आप कल्पना कर सकते हैं जब नीतीश जी रेल संभालते थे, अटल
बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे, तब का ये सपना इतने सालों के बाद आज
पूरा हो रहा है। अगर पिछले दस साल में इसको अगर neglect न किया गया होता,
routine budget के हिस्से से भी अगर काम किया होता तो भी शायद पांच-सात
साल पहले ये काम पूरा हो गया होता। 600 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला
प्रोजेक्ट विलंब होने के कारण 3000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। ये पैसे
जनता-जनार्दन के हैं लेकिन कोई न कोई ऐसे कारण आते हैं कि हमारे देश में
विकास की प्रक्रिया अलग हो जाती है और बाकी प्रक्रियाएं उभर करके आ जाती
हैं। पिछले 18 महीनों में इसका सबसे ज्यादा काम इतने कम समय में, 18
महीनों में हुआ। करीब 34 प्रतिशत काम जो अधूरा पड़ा था इसको पूरा किया गया
और हम मानते हैं कि अगर भारत का sustainable development करना है, अगर भारत
को आने वाले 25 साल, 30 साल तक लगातार विकास के नए-नए आंक पार करते जाना
है वो तब तक संभव नहीं होगा जब तक हमारा पूर्वी हिंदुस्तान develop नहीं
होगा। चाहे पूर्वी उत्तर प्रदेश हो, चाहे बिहार हो, चाहे पश्चिम बंगाल हो,
असम हो, नार्थ-ईस्ट हो, उड़ीसा हो, ये सारे क्षेत्र जितने तेजी से
develop होंगे हिंदुस्तान उतनी ही तेजी से आगे बढ़ने वाला है। अब भारत के
विकास की जो Nerve centre है वो Nerve centre Eastern India में है और अगर
हम पूर्वी भारत को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो हम यह shortcut के रास्ते से
नहीं कर पाएंगे।
अब तक हम तत्कालीन समस्याओं को स्पर्श
करते गए। लोगों की तत्कालीन आवश्यकताओं को address करते गए लेकिन अब समय
की मांग है कि हम लोगों की तत्कालीन आवश्यकताओं को तो जरूर address करें
लेकिन इस पूरे क्षेत्र को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाना है तो लंबे अरसे
की व्यवस्थाओं को भी विकसित करना अनिवार्य है।
Rail और road, infrastructure, उसके अंदर
इतनी ताकत होती है कि वह विकास की न सिर्फ नींव रख देते हैं बल्कि विकास
को गति भी दे देते हैं और इसलिए पिछली सरकार ने पांच साल में रेलवे के पीछे
बिहार में जितना खर्चा किया, उससे करीब-करीब ढाई गुना ज्यादा पिछले डेढ़
साल में वर्तमान सरकार ने किया है। यह इसलिए किया है कि बिल्कुल मेरा यह
conviction है कि भारत का भाग्य बदलना है तो हमें बिहार का भाग्य पहले
बदलना होगा। बिहार को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाना होगा। केन्द्र और
राज्य मिलकर के, कंधे से कंधा मिलाकर के इस काम को करेंगे, यह मेरा पूरा
विश्वास है और इसलिए infrastructure मुख्यतः , रेलवे और road आज उत्तर
बिहार-दक्षिण बिहार को जोड़ने वाले तीन प्रोजेक्ट का एक साथ लोकार्पण एवं
शिलान्यास हो रहा है।
अब आप देखिए, एक काम तो मैं आज वो कर रहा
हूं कि जहां पर पहले मोकामा दोनों तरफ डबल लाइन थी लेकिन बीच में bridge
ऐसा था कि वहां डबल लाइन नहीं थी और उसके कारण वो दोनों तरफ की डबल लाइन का
जो खर्चा है उसका कोई उपयोग ही नहीं है क्योंकि वो आकर के bottleneck बन
जाता था। अब इस बात को हमने हाथ में लिया है और मुझे विश्वास है कि हम समय
की सीमा में इसको पूरा करके देंगे और उस इलाके के विकास के लिए भी एक बहुत
बड़ी गति आ जाएगी।
मेरे बिहार के नौजवानों, आपकों एक बहुत
बड़ा तोहफा इन दिनों मिला है। दो locomotives, इसके बहुत बड़े कारखाने
बिहार के धरती पर लग रहे हैं। 2006-07 से यह कागज पर मसला चल रहा है,
भाषणों में काम आ रहा है लेकिन धरती पर कुछ हो नहीं पा रहा है। कोई टेंडर
के लिए तैयार नहीं होता था। हमने कुछ innovative चीजें कीं टेंडर में। हमने
export का लक्ष्य तय किया, हमने भारत की requirement का हिसाब लगाकर के
order place का निर्णय किया और वह एक ऐसी रचना थी कि दुनिया की बड़ी-बड़ी
कंपनियों को लगा कि अब हम इसके अंदर टेंडर लेकर के जा सकते हैं और अगर मिल
गया तो काम हो सकता है। उस प्रक्रिया ने रंग लाया। दुनिया की बहुत बड़ी
कंपनियां आईं। 40 हजार करोड़ रुपयों का Foreign direct investment इन दो
जगहों पर, बिहार की धरती पर आने वाला है, वो हिन्दुस्तान के अंदर सबसे
बड़ा माना जाएगा। यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और कम समय में यह सरकार
बनने के बाद, 18 महीने मिले है हमें दिल्ली में लेकिन 18 महीनों में बिहार
हमारी प्राथमिकता है क्योंकि भारत का विकास करने के लिए बिहार का विकास
अनिवार्य है, यह हम मानते हैं। इसलिए इस काम को भी अंजाम दिया गया है और
उसका परिणाम भी आने वाले दिनों में मिलने वाला है।
भाइयो-बहनों, आज के युग में गैस पाइपलाइन
भी उतना ही महत्व रखती है। अगर हम गैस कनेक्टिविटी करते हैं, पाइपलाइन का
खर्चा बहुत होता है लेकिन उसके बावजूद भी बिहार को गैस कनेक्टिविटी से
जोड़ने की दिशा में हम तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं जो आने वाले दिनों में
यहां के जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव लाने वाला है।
मेरे बिहार के प्यारे भाइयो-बहनों, आपने
इस बजट में देखा होगा कि हमने गरीब परिवारों को गैस कनेक्शन देने का बीड़ा
उठाया है। मैं जानता हूं काम कठिन है। गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले
पांच करोड़ परिवारों को आने वाले तीन वर्ष के अंदर-अंदर चूल्हे की जगह पर
गैस का सिलेंडर मिल जाए और उन माताओं-बहनों को धुएं से बचा लिया जाए, उनके
आरोग्य की चिन्ता की जाए, इसके लिए एक अहम जिम्मेवारी सिर पर उठाई है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि चूल्हा जलाकर के, लकड़ी जलाकर के, कोयला जलाकर के
जो मॉं खाना पकाती है तो खाना पकाते-पकाते जितना धुंआ उसके शरीर में जाता
है वो 400 सिगरेट के बराबर होता है। एक दिन में 400 सिगरेट का धुंआ अगर
हमारी माताओं के शरीर में जाए तो उनके शरीर का क्या हाल होगा, उनके
बच्चों का क्या हाल होगा। यह मानवता का काम है इसलिए हमने सरकार की
तिजोरी से जितना खर्चा लगे लेकिन बीड़ा उठाया है कि गरीब परिवारों को अब यह
चूल्हा, यह कोयला, उसका धुंआ, उससे मुक्ति दिलानी है।
मेरे प्यारे भाइयो-बहनों, हमारे देश में
आजादी के इतने साल हो गए। अब भी गांवों में बिजली नहीं पहुंची है और बिजली
पहुंचाना, यह कोई लक्ज़री नहीं है। बिजली अब जीवन का हिस्सा बन गई है। वो
कोई रईसों का खेल नहीं है, गरीबों के लिए जरूरी है। मैंने एक दिन review
लिया कि भई क्या हाल है? मैं हैरान था आजादी के 70 साल होने आए, 18 हजार
गांव ऐसे थे जहां अभी बिजली का खंभा भी नहीं पहुंचा। मैंने अफसरों को कहा,
मुझे एक हजार दिन में काम पूरा करना है। जो 70 साल में नहीं हुआ वो एक हजार
दिन में पूरा करना है। बीड़ा उठाया। अभी तो हजार दिन पूरा होने में देर
है, बहुत दिन बाकी है लेकिन मुझे आज पता चला कि 6,000 से अधिक गांवों का
काम पूरा होगा, बिजली पहुंच गई है और उसका सबसे ज्यादा लाभ उत्तर प्रदेश
और बिहार के गांवों को मिला है। मैं नीतीश जी का आभारी हूं कि इस काम को
गति देने में उनकी राज्य सरकार की तरफ से भी पूरा सहयोग मिलता रहा है और
उसके कारण यह काम भारत सरकार गति से कर रही है। मुझे तो विश्वास है अगर एक
बार भारत सरकार और बिहार सरकार तय कर ले तो पूरे हिन्दुस्तान में ये जो
18,000 गांवों का काम बाकी है, उसमें से बिहार को सबसे पहले हम पूरा करके
एक गौरावान्वित बिहार बना सकते हैं और जिस तरह काम चला है, मेरा विश्वास
है कि हो जाएगा, यह काम हो जाएगा।
मेरे प्यारे भाइयो-बहनों, चाहे बिजली हो,
सड़क हो, पानी हो, रेल हो, इन चीजों को सामान्य मानिवकी की आवश्यकताएं
हैं और उन आवश्यकताओं की पूर्ति करने का प्रयास है। बिहार से बहुत बड़ी
मात्रा में हमारे नौजवान हिन्दुस्तान के कोने-कोने में आते-जाते रहते
हैं। पढ़ने के लिए जाते हैं, रोजी-रोटी कमाने के लिए जाते हैं लेकिन रेलवे
में अगर जाना है तो उसका दम उखड़ जाता है। लंबी सफर की ट्रेनों में आरक्षण
की सीमा रहती है। इस बार हमारे रेल मंत्री श्रीमान सुरेश प्रभु जी ने एक
बड़ा अहम कदम उठाया है और मैं मानता हूं उस अहम कदम का अगर सबसे ज्यादा
कोई फायदा उठाएगा तो बिहार का नौजवान उठाएगा। वो अहम कदम यह उठाया है कि
लंबी सफर की जो ट्रेन है उसमें दो या चार डिब्बे ऐसे लगेंगे, दीन-दयाल
डिब्बे, जिसमें आप last moment भी चढ़ जाना है तो चढ़ जाओ और जहां जाना है
पहुंच जाओ। ये इसलिए किया कि गरीब व्यक्ति, उसको अगर दूर जाना है, बेटा
अगर बिहार से बाहर कहीं काम कर रहा है, अचानक मांबीमार पड़ गई और उसको
पहुंचना है तो reservation तो संभव नहीं होता है। ये एक ऐसी व्यवस्था
रहेगी कि जिसके कारण ऐसे लोग परेशानी न भुगतें, और समय पर पहुंच सकें।
विषयों को ऐसे लिया गया है कि जिसके कारण
आज हमारे देश में एक neo middle class, middle class उसका bulk भी बहुत बढ़
रहा है। बहुत बड़ी मात्रा में middle class का bulk बढ़ रहा है। वो पहले
से थोड़ी plus सुविधा चाहता है। और इसलिए हमने एक हमसफर ट्रेन शुरू करना तय
किया है जिसमें तृतीय श्रेणी की air-condition train रहेगी जो सामान्य
middle class, lower middle class के लोग आर्थिक रूप से उनको ये सुविधा
रहेगी और वे अच्छी स्पीड से चल पाएगी।
हमारे देश में रेल बहुत पुरानी है। लेकिन
रेलवे को हम अब पुरानी रहने देंगे तो रेल बोझ बन जाएगी। जिस रेल ने
हिंदुस्तान को गति दी, वह रेल अगर वैसे ही पुराने हालात में रही तो वो ही
बोझ बनते देर नहीं लगेगी इसलिए रेल का पूरी तरह नवीनीकरण होना चाहिए। उस
दिशा में सुरेश जी हमारे बड़े innovative हैं, नए-नए ideas लाते हैं,
दुनिया के लोगों से माथापच्ची करते रहते हैं। विदेशों से धन भी लाते हैं
और मैं विश्वास से कहता हूं कि बहुत ही कम समय में पूरी रेल का कायाकल्प
हो जाएगा, रेल का नवीनीकरण हो जाएगा। चाहे वो infrastructure का मसला हो,
चाहे गति का मामला हो, चाहे पैसेंजरों की qualitative सेवा का मसला हो,
चाहे रेलवे स्टेशनों की सुविधा का मसला हो, चाहे passenger की complaint
का मुद्दा हो, चाहे digital technology के द्वारा मोबाइल फोन से रेलवे की
सेवाएं लेने की बात हो, अनेक पहलुओं पर एक बहुत ही comprehensive way में
रेलवे के नवीनीकरण का काम चल रहा है।
एक
बीड़ा उठाया है, तेजस नाम की ट्रेन। ये तेजस ट्रेन 130 की स्पीड से चलाने
का इरादा है। आज हमारी ट्रेन बहुत कम स्पीड से चलती है। इतना बड़ा देश वो
अब छुक-छुक गाड़ी से नहीं चल सकता है, उसको गति देने की आवश्यकता है
इसलिए एक नया concept प्रायोगिक रूप में , तेजस के द्वारा तेज गति से चलाने
का इरादा ले करके हम आगे बढ़ रहे हैं।
मैं ये सारी बातों से आपको विश्वास
दिलाना चाहता हूं, मैं देशवासियों को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि रेल ये
सिर्फ यातायात या आवागमन का साधन नहीं है, रेल भारत के अर्थतंत्र को गति
देने वाला एक गतिशील माध्यम है और उसको गति देने की दिशा में हम स्वयं
सरकार को गतिशील बनाये हैं और ये ही आने वाले दिनों में परिणाम देने वाला
है।
आज ये जो तीनों प्रोजेक्ट प्रारंभ हुए
हैं, मैं मानता हूं पटना के लिए एक बहुत बड़ा वरदान है। आज already ट्रेनें
चलनी शुरू हो गई हैं। चाहे मुंगेर हो, चाहे मोकामा हो, ये तीनों पूरे
बिहार को एक प्रकार से अपने-आप में समाहित कर लेते हैं। इसका कितना बड़ा
प्रभाव पैदा होने वाला है, इसका बिहार के हर व्यक्ति को पता है।
मैं आज बिहार को लाख-लाख शुभकामनाएं देता हूं, बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं और Railway ministry को भी बहुत बधाई देता हूं। धन्यवाद ।
नीतीश जी ने विस्तार से सबके नाम बोले हैं इसलिए मैं पुनरावर्तन नहीं करता हूं लेकिन उन सबका मैं आदर से स्वागत करता हूं।
पटना हाईकोर्ट की शताब्दी का ये समापन
कार्यक्रम है। एक प्रकार से नई सदी की जिम्मेवारियों का आरंभ है और इसलिए
गत शताब्दी में इस हाईकोर्ट ने जिन ऊंचाइयों को प्राप्त किया है, जिन
परंपराओं के द्वारा सामान्य मानविकी में एक विश्वास पैदा किया है, जिस
कार्य संस्कृति के द्वारा समाज में आशा बनती चली गई हैं, उसमें से जो
उत्तम है, उसको carry forward करते हुए पटना की अगली शताब्दी, इस
हाईकोर्ट की अगली शताब्दी कैसी हो, उसकी नींव मजबूत रखने की जिम्मेवारी,
यहां उपस्थित सभी की है।
अगर हम आने वाली शताब्दी का foundation
जितना मजबूत रखेंगे, उतना देश के सामान्य मानविकी का व्यवस्थाओं के
प्रति, लोकतंत्र के प्रति विश्वास और गहरा होता जाएगा। और इसलिए हम जब इस
प्रकार से समारोह का आयोजन करते हैं तो उसके साथ-साथ नए संकल्पों का भी
अवसर होता है। मैं आशा करूंगा कि आज जब शताब्दी वर्ष का समापन हो रहा है
तब चाहे Bar हो या bench हो, हम नए benchmark के लिए कैसे आगे बढ़ें, मुझे
विश्वास है कि जिस व्यवस्था के पास एक शताब्दी की विरासत हो, वो देश को
बहुत कुछ दे सकते हैं और ये पटना, यहां का Bar जिसने अनेक महापुरुषों को
जन्म दिया है, अनेक गणमान्य महापुरुष आप ही के बीच से निकलकर के आए हैं।
आने वाले समय में भी उस उज्ज्वल परंपरा को आप बनाए रखेंगे, ऐसा मुझे आप
पर पूरा भरोसा है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे देश में
बहुत ही कम जगह ऐसे होती हैं जहां पर लोगों का ध्यान रहता है कि उसके 50
साल हुए, 100 साल हुए और उस अवसर को मनाया जाए। मैं एक बार जब मुख्यमंत्री
था तो एक गांव के स्कूल में गया था। वहां शिक्षा बहुत कम थी। Hardly
30-32 percent उस गांव में शिक्षा थी। तो मेरा मन कर गया भई चलो देखें तो
सही क्या है? मैं जब वहां गया तो मैं हैरान था, वहां जो स्कूल बनी थी उस
स्कूल की उम्र करीब 120 साल थी। यानी जिस गांव में 120 साल पहले स्कूल का
जन्म हुआ उस गांव की शिक्षा 30-32 पर्सेंट के इर्द-गिर्द आ करके अटकी हुई
थी। तब हमारे मन में एक चुनौती पैदा होती है कि व्यवस्थाएं अगर प्राणवान
नहीं होंगी, अगर ये व्यवस्थाएं dynamic नहीं होंगी, अगर ये व्यवस्थाएं
progressive नहीं होंगी, तो हम न समय के साथ चल पाएंगे, न हम समय की मांग
को पूरा कर पाएंगे इसलिए हम लोगों के सामने चुनौती हैं कि हमारी
व्यवस्थाओं को हम प्राणवान कैसे बनाएं। कभी-कभी व्यवस्थाओं का विकास
मुश्किल नहीं होता है लेकिन व्यवस्थाओं को प्राणवान बनाने के लिए बहुत
ताकत लगती है, बहुत लंबे अरसे तक जूझना पड़ता है। और इसलिए उस दिशा में इन
100 साल के अनुभव से हम कुछ करें।
आने वाले दिनों में ...मैं एक सुझाव के
रूप में सोच रहा हूं। जब मैं यहां बैठा था तो विचार आया, क्या हर वर्ष
हमारे कोर्ट एक बुलेटिन निकाल सकते हैं क्या कि हमारी कोर्ट में सबसे
पुराना pending case इतने साल पुराना है| कहीं 50 साल पुराना हो सकता है,
कहीं 40 साल पुराना हो सकता है। इससे एक sensitivity पैदा होगी। समाज में
भी इसके कारण एक चर्चा होगी, Bar में बैठे हुए लोग भी चर्चा करेंगे, यार हम
इतने सालों से यहां बैठे हैं, ये 50 साल से मुकदमा चल रहा है हम लोगों ने
कुछ करना चाहिए। एक ऐसा माहौल बनेगा जो परिणाम लक्ष्यीय काम की योजना के
लिए हमें प्रेरित करेगा। और ये कोई मुश्किल काम नहीं है। और ये गलत काम भी
नहीं है। अगर मान लीजिए कि कोई 50 साल पुराना कोई केस का नाम निकल गया तो
कोई आज बैठे हुए लोगों की जिम्मेवारी नहीं होगी, वो तो सब रिटायर्ड हो
चुके होंगे। लेकिन अच्छा होगा कि उसके कारण pendency की जो चिन्ता है
उसमें से बाहर निकलने का एक मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार होगा।
दूसरी एक सुविधा है इन दिनों जो आज से
पुरानी पीढ़ी के जो Bar के member थे उनको ये सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ
था, जो आज की पीढ़ी को प्राप्त हुआ है, आज के Bar को प्राप्त हुआ है। और
वो है technology. पहले अगर अगर आपको किसी केस को लड़ना है तो लंबे अरसे
तक research में टाइम जाता था, पूरी टीम लगी रहती थी पुराने reference
ढूंढने के लिए। आज Google एक ऐसा आपका bar member है कि आप जो चाहो वो
Google खोज करके निकाल करके दे देता है और आसानी से perfect judgment को
quote करके अपनी बात मनवा सकते हो और इसलिए हमारा Bar, हमारी bench, हमारी
कोर्ट इसको हम कितने ज्यादा techno savy बना सकते हैं, कितनी तेजी से हम
digital system को हमारी व्यवस्था में inject कर सकते हैं और उसके कारण
quality of argument, quality of judgments, space of the judgment, इन
सबमें एक बहुत बड़ा आमूल-चूल परिवर्तन आ सकता है। और उस दिशा में हम प्रयास
करें।
हमारे देश के आजादी के आंदोलन की तरफ
देखें तो इस बात को हमें स्वीकार करना होगा कि भारत की आजादी के आंदोलन का
नेतृत्व प्रमुखतया वकीलों के द्वारा, बैरिस्टरों के द्वारा हुआ। Bar के
ही member थे जिन्होंने देश की आजादी की लड़ाई को लड़ा। अंग्रेज़ सल्तनत
के सामने अपनी बुद्धि का उपयोग, कानूनी व्यवस्था का उपयोग करते हुए कैसे
लड़ा जा सकता है, यह मिसाल अगर किसी ने कायम की तो इस देश की Bar की
परंपरा ने की, वकीलों की परंपरा ने की है और इस इस प्रकार से इस पेश से
जुड़े हुए लोगों का एक बहुत बड़ा योगदान भारत की आजादी के आंदोलन से जुड़ा
हुआ है। उसके बाद भी जब-जब भारत में संकट आया, मूलभूत बातों पर संकट आया,
ज्यादातर Bar ने आवाज़ उठाई है, ज्यादातर न्यायालयों ने उसको एक नई ताकत
देने का प्रयास किया इसलिए भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए जहां विविधता
इतनी है। समाज को बांधकर रखना है, देश को जोड़कर रखना है तो एक सक्रिय
प्रयास और वो भी जो समाज में दूरिया पैदा न करें, समाज को जोड़ने के प्रयास
में उपकारक हो, उस प्रकार के हमारे movement की आज समय की मांग है। उसको
अगर हम Bar के माध्यम से चला दे तो बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।
कभी-कभार एक Intuit democratic values में
किस प्रकार का बदलाव आता है। एक घटना मेरे लिए बड़ी.. It was a touchy for
me so मैं share करना चाहूंगा। मैं पिछले दिनों UK के प्रवास में था तो
वहां के प्रधानमंत्री ने मुझे एक सनद गिफ्ट की। Bar की सनद गिफ्ट की और
उसका इतिहास ऐसा था कि भारत की आजादी में जो सशस्त्र क्रान्ति में
विश्वास करते थे। दो प्रवाह थे – एक अहिंसा में विश्वास करता था, एक
सशस्त्र क्रान्ति में विश्वास करता था। सशस्त्र क्रान्ति में विश्वास
करने वाले लोगों के क्रान्ति गुरु थे, श्यामजी कृष्ण वर्मा। 1930 में
उनका स्वर्गवास हुआ और लंदन में अंग्रेजों की नाक के नीचे बैठकर के वो
आजादी की लड़ाई लड़ते थे। मदनलाल ढींगरा समेत कई लोगों को प्रेरणा देते
रहते थे और इसलिए वहां के Bar ने उनकी सनद को withdraw कर लिया।
मैं
इस Bar जब गया तो Bar ने officially पुनर्विचार किया और इतने सालों के
बाद, शायद 1920 के बाद, करीब-करीब 100 साल के बाद उस सनद को उन्होंने
सम्मानपूर्वक लौटाया। यानी भारत की आजादी का एक रवैया, अंग्रेजों ने जिसकी
सनद को ले लिया था। बाद में ले लिया था लेकिन 100 साल के बाद उस सनद को
लौटाया। इस घटना का मैं इसलिए जिक्र करता हूं कि 100 साल के बाद उस
व्यक्ति का कोई रिश्तेदार भी वहां मौजूद नहीं है लेकिन न्याय
व्यवस्था से जुड़े हुए लोगों के मन में एक था कि यह स्थिति बदलनी चाहिए
और उन्होंने initiative लिया और बदला। भारत का प्रधानमंत्री वहां जाता है
तो एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में उसको लौटाया जाता है। ये है हमारे यहां
मूल्यों की प्रतिबद्धता के संबंध में पूरी वैश्विक सोच, हम उन चीजों को
लेकर के कैसे आगे बढ़े।
मैं आज इस शताब्दी समारोह के समापन के
साथ नई शताब्दी के शुभारंभ के समय आप सबको बहुत शुभकामनाएं देता हूं और
देश को बहुत-सी अमानत आपकी तरफ से मिलती रहेगी। इसी एक अपेक्षा के साथ सबका
बहुत-बहुत धन्यवाद।