Wednesday, 9 March 2016

PM Modi's reply on the Motion of Thanks on the President's Address in the Rajya Sabha

आदरणीय सभापति जी , आदरणीय सभी सांसद महोदय,

अभिभाषण पर विस्‍तार से चर्चा हुई। करीब 30 माननीय सदस्‍यों ने इस चर्चा में हिस्‍सा लेकर करके अपने अनुभव का अपने ज्ञान का, देश को लाभ पहुंचाया। श्री जगत प्रकाश नड्डा जी, श्री अरूण जेटली जी, श्री गुलाम नबी आजाद जी, डॉ. विजयलक्ष्‍मी जी, प्रमोद तिवारी जी, श्रीमती रजनी जी, श्रीमान देसाई, श्री शरद यादव जी, श्री गोपाल पटेल, सीताराम जी, डी राजा जी, के केशोराम जी, कई सारे नाम हैं, सभी महानुभावों ने सदन को, और देश को लाभान्वित किया है।

राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण में एक बात जो कही गई थी जिसका इतना सकारात्‍मक प्रभाव इतना तुरंत होगा ये बात हम सबको प्रसन्‍न करती है। राष्‍ट्रपति जी ने कहा था सदन चलना चाहिए, सदन में संवाद होना चाहिए और हम सभी सदस्‍यों ने राष्‍ट्रपति जी की बात को शिरोधार्य माना और सदन को सभी ने बहुत ही सुचारू रूप से सबने मिला करके चलाया और इसके लिए मैं विशेष रूप से विपक्ष के सभी बंधुओं का मैं आभार व्‍यक्‍त करना चाहूंगा कि उन्‍होंने इस काम को आगे बढ़ाया और राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण का ये जो असर है कि मैं समझता हूं कि अपने आप में गौरव देने वाला है। मैं राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्‍यवाद करने के लिए खड़ा हुआ हूं, लेकिन सदन के साथ-साथ सदन के माननीय सदस्‍यों से भी इस बात से आग्रह करना चाहूंगा। एक तो खुशी की बात है कि सदन में सभी सदस्‍य सक्रिय हैं। अपने-अपने विचारों के लिए आग्रही हैं, करीब 300 के करीब Amendments आए हैं और हर Amendments का अपना महत्‍व भी है। लेकिन मैं सबसे आग्रह करूंगा कि हम राष्‍ट्रपति जी के wisdom पर भरोसा करते हुए समय की सीमा में जितने विषय आ सकें आ सके, इसका मतलब यह नहीं कि वो महत्‍व के नहीं हैं और इसलिए राष्‍ट्रपति पद की गरिमा और उनके wisdom पर भरोसा करते हुए मैं सभी आदरणीय सदस्‍यों से प्रार्थना करूंगा कि वे अपने संशोधन को वापस करके राष्‍ट्रपति जी के अभिभाषण को सर्वसम्‍मति से धन्‍यवाद प्रस्‍ताव हम पारित करें जो कि अच्‍छी परंपरा जारी रहे। हम सबने देखा होगा कि कल रात के बारह बजे तक लोकसभा का सत्र चला।

दो दिन पूर्व यह सदन भी देर शाम तक बैठा था। आम तौर पर इतने घंटे काम करने के बाद थकान महसूस होती है, लेकिन मैं उल्‍टा अनुभव कर रहा था, जिन –जिन सदस्‍यों से मेरा मिलना हुआ बात करने का मौका मिला देर रात बैठने के बाद भी वे अत्‍यन्‍त प्रसन्‍न थे, अत्‍यंत संतुष्‍ट थे, अत्‍युन्‍त आनंदित थे क्‍योंकि एक लंबे अर्से के बाद अपने पास जो कुछ कहने की बातें थी, अपने क्षेत्र की बातें थी, समस्‍याएं थी उसको इस पवित्र Forum में वो जी भर के कह पाए।

ये अवसर उनको मिला है उनके चेहरे की जो प्रसन्‍नता है, ये सदन चलने के कारण संभव हुआ है| वरना पिछली बार सदन में जैसे Question hour मैं मानता हूं कि Question hour अपने आप में एक सदस्‍यों का अपनी संपत्ति है और राष्‍ट्र के महत्‍वपूर्ण Issues पर सरकार को कठघरे में खड़ा रखना, executives को अकाउंटेबल बनाना, उनके लिए सवालिया निशान खडा़ करना।

मंत्रियों को भी हर प्रकार से सजग रखने के लिए भी सबसे बड़ी ताकतवर जगह है तो वो Question hour है। लेकिन हमने देखा कि पिछली बार सदन न चलने के कारण स्‍टार Question 269 थे, लेकिन सात को अवसर मिला और करीब 42 घंटे हमारा इस हल्‍ला बोल के अन्‍दर आहुत हो गया। उसके पूर्व के सत्र में करीब 270 इन्‍हीं सदस्‍यों के द्वारा पूछे गये स्‍टार Question थे, सिर्फ छह चर्चा में आए। करीब-करीब हमारे 72 घंटे इस माहौल के अन्‍दर आहुत हो गये।

इस बार हमारे wisdom में हमारे अनुभव ने, हमारी जिम्‍मवारियों ने, हमें बचा लिया और मान्‍य सदस्‍यों के सवालों के जवाब देने के लिए मंत्रियों को देर रात तक तैयारियां करनी पड़ रही हैं। executives को हिसाब देने के लिए सजग रहना पड़ा रहा है और यही लोकतंत्र की ताकत है और इस ताकत को मैं समझता हूं कि हम जितना तवज्‍जो दें उतना कम है। एक बात जरूर है मृत्‍यु को एक वरदान है और मृत्‍यु को ऐसा वरदान है मृत्‍यु कभी बदनाम नहीं होता। कभी मृत्‍यु पर आरोप नहीं लगते। कोई मरे तो ये कैंसर से मरा है, आरोप कैंसर पर जाता है। कोई मरे तो ये अकस्‍मात मरा है तो अकस्‍मात पर आरोप जाता है मृत्‍यु पर नहीं जाता है। बड़ी आयु में मरे तो वे उम्र के कारण मरे हैं, मृत्‍यु को कभी दोष नहीं आता। मृत्‍यु कभी बदनाम नहीं होती।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि कांग्रेस को ऐसा वरदान है... वरदान इस अर्थ में है कि अगर हम कांग्रेस की आलोचना करें तो आपने मीडिया में देखा होगा कि विपक्ष पर हमला, विपक्ष पर आरोप, कभी ये नहीं आता है कि कांग्रेस पर हमला, कांग्रेस पर आरोप| हम अगर शरद जी के खिलाफ कुछ कहें, मायावती जी के खिलाफ कुछ कहें तो अखबार में आएगा, टीवी में आएगा कि बीएसपी पर हमला, जेडीयू पर हमला, शरद जी पर हमला, मायावती जी पर हमला लेकिन कांग्रेस एक ऐसी है जब भी हमला हो तो विपक्ष पर हमला। कभी कांग्रेस को बदनामी नहीं मिलती और ये अपने आप में बड़ा गजब का विज्ञान है। अब वो तो यही है हमारे सारे साथी सोचेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है।

यहां पर हमारे विपक्ष नेता ने चर्चा प्रारंभ की थी तब मैं यहां पर उपस्थित था। हमारे नड्डा जी ने Sea change कहा, तो हमारे गुलाम नबी जी ने थोड़ा माहौल हल्‍का करने का इरादा होगा उनका तो इरादा गलत नहीं होता। लेकिन चेन्‍नई का उदाहरण दे दिया। वो एक संकट था। मानवीय दृष्टि से वो दर्दनाक घटना थी उसको इस Sea change से जोड़ करके मजाक करने से उनकी पीड़ा में हम थोड़ा मैं समझता हूं कि अच्‍छा नहीं किया।

यहां एक विषय ये भी आया कि राजस्‍थान और हरियाणा में, जो उन्‍होंने चुनाव में कुछ नियम बनाएं हैं जिसको सुप्रीम कोर्ट ने मान्‍यता दी। लेकिन हमारी democracy में qualitative चेंज लाने का जो प्रयास है उसको कुछ राजनीतिक रंग लाने का प्रयास चल रहा है। मतभेद हो सकता है, लेकिन मैं चाहूंगा कि जो लोग इतने बड़ी प्रखरता के साथ कहते हैं जो अशिक्षित रहे उनका क्‍या।

मैं खास करके गुलाम नबी साहब से और उनके साथियों में आग्रह करूंगा कि जो पांच राज्‍यों में चुनाव होने वाले हैं कम से कम 30 % लोगों को अनपढ़ लेागों को टिकट दें, बिलकुल अनपढ़ तो वो जो कह रहे हैं तो उसमें उनका क्‍या commitment है पता तो चलेगा। अनपढ़ की इतनी चिंता है होनी भी चाहिए। लेकिन मैं एक अनुभव शेयर करता हूं। मैं गुजरात में जब था तो हर वर्ष, हर वर्ष जून महीने में 13, 14, 15 जून कन्‍या शिक्षा को ले करके बेटियों को पढ़ाने के लिए ग्रुजरात में एक कैम्‍पेन चलाता था, campaign चलाता था और गुजरात में मई जून में 40-45 तापमान रहता है। पूरी सरकार गांव जाती थी मैं खुद जाता था। तीन-तीन दिन में गांव में रहता था और बेटियों को पढ़ाओ इसके लिए campaign चलाता था। स्‍कूल 15 जून से शुरू होते थे तो उसके पहले एडमिशन्स के लिए लगते थे। वहां मैं मातृ सम्‍मेलन भी करता था। एक गांव में मैं गया । मैंने ऐसे ही पूछा कि आप बता ही दें कि आप में से अनपढ़ कितने हैं। तो कोई 40 साल 45 साल और 50 साल की महिलाओं ने हाथ ऊपर किया कि हम पढ़े लिखे नहीं हैं। लेकिन पांच छह महिलाएं ऐसी थी जिनकी उम्र 80-85 थी। मैंने पूछा आप पढ़े लिखे हैं, तो बोले ये हमारी बहु अनपढ़ है हम पढ़े लिखे हैं। कैसे तो बोले हम जो हैं गायकवाड स्‍टेट के नागरिक हैं, आजादी के पहले की बात है और गायकवाड स्‍टेट में ये नियम था कि अगर बेटी को नहीं पढ़ाते हैं तो एक रूपये दंड होता था और बोले इसके कारण हम पढ़े लिखे हैं। लेकिन बाद में स्‍वतंत्रता आई सरकारें बदल गईं तो बहू हमारी अनपढ़ है। तो ये जो अनपढ़ का कारण है वो आजादी के बाद जो हमारी कमियां रहीं है उससे और इसलिए हमने चिंता शिक्षा की करने की जरूरत है ताकि ये जो कठिनाई है उस कठिनाइयों से हम बाहर आ सकते हैं।

राष्‍ट्रपति जी ने कहा है कि पहले आकाशवाणी में आकाशवाणी रेडियो पर एक कार्यक्रम चलता था और गुजराती में जो शब्‍द था मुझे मालूम नहीं है कि हिन्‍दी में वो ही शब्‍द है क्‍या। बिसराते सुर यानी जो भूले बिरसे गीत हैं उनका कार्यक्रम आखिरी आखिरी तो अब कुछ लोगों का ये tenure पूरा हो रहा है तो स्‍वाभाविक है कि आखिर आखिर में कुछ कहें। तो ये भूले बिसरे सुर आखिर में सुनाई तो देने चाहिए।

सभापति जी, एक प्रकार से upper house है हमारे यहां कहा जाता है - महाजन ये न जतापन था। जहां महापुरूष चलते हैं लोग उसके पीछे चलते हैं। इस सदन में महाजन बैठे हैं। इस सदन से जो होगा जिस प्रकार से होगा उसका असर लोकसभा में होगा। उसका असर assembly होगा। कहीं कहीं कॉरपोरेशन सिटी में भी हो रहा है और इसलिए हम ऐसा कैसा करें ताकि नीचे तक वो माहौल बने जो लोकतंत्र को पुष्‍ट करे।

देश हमारे कई बिल पारित हो, इसका इंतजार कर रहा है। जीएसटी की चर्चा हो रही है बाकी बिल की चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं। बहुत बड़ी मात्रा में अब जो जनप्रतिनिधि चुन करके आए हैं उन्‍होंने तो इसको स्‍वीकार कर लिया है। लेकिन राज्‍यों के जो प्रतिनिधि हैं वहां। अब ये जगह ऐसी है जो अपर हाऊस हमारा, एक chamber of ideas है। यहां देश को मार्गदर्शन मिलेगा, दिशा मिलेगी और इसलिए दोनों सदनों के बीच तालमेल होना बहुत जरूरी है। दोनों सदन वस्‍तुत: उसी structure के भाग हैं और सहयोग एंव सामंजस्‍य की भावना की किसी भी कमी से कठिनाइयां बढ़ेगी और हमारे संविधान के उचित रूप से कार्य करने में बाधा खड़ी होगी। ये चिंता पं0 जवाहर लाल नेहरू जी ने जताई थी। मैं आशा करता हूं कि हम पंडित जी की इस चिंता को महत्‍व दें और हम कोशिश करें कि हमारे यहां यह जो सारे पेंडिंग बिल हैं, इस बार सदन चल रहा है। एक अच्‍छे माहौल में चल रहा है। तो हम चीजों को अगर पारित करें तो देश को गति देने में, ये महाजनों का ग्रो है, वरिष्‍ठ का गृह है। वो बहुत बढ़ा role play कर सकता है। इसलिए मैं आग्रहपूर्वक प्रार्थना करता हूं, सभी मान्‍य सदस्‍यों से जो लोकसभा में जो बिल पारित हुए हैं। उनको हो सके उतना जल्‍दी पारित करके हम देश को गति देने में भूमिका अदा करें।
इस सरकार में राष्‍ट्रपति के अभिभाषण में कुछ बातें आई हैं। ये तो सही है कि देश आजाद हुआ है, सरकारें बनी हैं। लंबे अरसे तक सत्‍ता भोगने का अवसर मिला है, सत्‍ता में रहने का अवसर मिला है। कुछ काम करने का अवसर मिला है और कुछ समय पहले से थोड़ा-थोड़ा बदलाव भी शुरू हुआ है, धीरे-धीरे। इस समय हम लोगों को मौका मिला है और ऐसा तो नहीं है कि कोई काम करना नहीं चाहता, हर कोई करना चाहता है। लेकिन कभी-कभार सवाल यह होता है कि हम इतना बड़ा देश है, इसकी आवश्‍यकताओं की पूर्ति हो, होती है, चलती है, इस प्रकार से करेंगे, तो हम बहुत पीछे चले जाएंगे। हमें incremental improvement से हटकर के एक quantum jump की ओर जाना बहुत जरूरी है और इसलिए शक्‍ति भी जरा ज्‍यादा लगानी पड़ती है और शक्‍ति जोड़नी भी पड़ती है। तो उसकी दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं।

हमने एक बल दिया है good governance पर, और जब मैं good governance की बात करता हूं, सुशासन की बात करता हूं तो उसकी पहली शर्त होती है transparency. हम यह भली-भांति जानते हैं कि इसके पूर्व, हमारे आने से पहले देश और दुनिया में, सही और गलत, इसका अपवाद हो सकता है। लेकिन यह माहौल बना हुआ था, विश्‍वास टूट चुका था। आशंका के दायरे में हम दबे हुए थे और सब ओर भ्रष्‍टाचार, भाई-भतीजावाद, इन चीजों ने हिन्‍दुस्‍तान के मन को झटक दिया था। दुनिया में भी इसके कारण भारत की छवि को गहरा नुकसान हुआ था। देश में विश्‍वास पैदा करने के लिए आवश्‍यक है और लोगों की जिम्‍मेवारी भी है कि transparency, policy driven government , individual के beam पर सरकारें नहीं चल सकती। सरकार नीतियों के आधार पर चलनी चाहिए, इस पर हमारा बल रहा है।

पिछले दिनों चाहे कोयले की चर्चा हो, स्‍पेक्‍ट्रम की चर्चा हो, न-जाने क्‍या-क्‍या बातें उठी, अब तो मामले सारे कोर्ट में भी पड़े हुए हैं। लेकिन हमने transparency पर बल दिया है। उसका परिणाम यह है – कोयला auction में हम गए 3.33 लाख करोड़, स्‍पेक्‍ट्रम में गए 1 लाख करोड़, हम एफएम रेडियो में गए। अभी-अभी चल रहा है। शायद आप लोगों को ज्ञान होगा 6 अन्‍य minerals का और अभी-अभी auction में जो 18 हजार करोड़ रुपया cross कर गया। ये एक कोशिश हमारी कि transparency और मैंने उसके लिए उदाहरण नहीं लिए।
अभी-अभी Forbes magazine, उसने एक बात कही है। हमने जो auction की परंपरा शुरू की है, उसके विषय में Forbes magazine कहता है – “India has just conducted its first auction of a Gold mine. This is exactly the right way to allocate the exploration and exploitation rise of such a natural resources. This is another one of those steps along the road to India coming the much wealthier country it should be”.
अब वो जो Gold mine कहते हैं, उनकी पश्‍चिम की दुनिया में इनके लिए, कोयला वगैरह सबको वो Gold mine के रूप में माना जाता है। उस अर्थ में वो Gold mine लिखा है। हमारे यहां कोई सोना की खदान ही नहीं दी गई है। Forbes magazine ने आगे एक जगह पर अच्‍छी बात कही है, हमने जो प्रयास किया है उस पर उन्‍होंने कहा है। एक ही वाक्‍य मैं अलग से पढ़ना चाहूंगा, This is the way this matter should be handled . मैं समझता हूं इसमें काफी कुछ आ जाता है।

दूसरा पहलू है good governance का accountability. हमें यह मानकर चले कि कुल मिलाकर के जो deterioration आया है उसमें हम खबरों की speed से चलते चले जा रहे हैं, पीछे की चीजें छूटती चली जा रही हैं। खबरें आती हैं जाती हैं, घटनाएं आती हैं जाती हैं, accountability का विषय छूट जाता है। हमने कोशिश की है कि accountability पर बल दिया जाए। मैं लगातार इन दिनों Infrastructure के review कर रहा हूं। इस सदन के सभी माननीय सदस्‍यों को आश्‍चर्य होगा 10-10, 20-20 साल से हमारे बड़े-बड़े प्रोजेक्‍ट लटके पड़े हुए हैं। या तो environment वालों ने रोक दिया होगा, कोर्ट-कचहरी ने रोक दिया होगा, या स्‍थानीय कोई body होगी छोटी, नगरपालिका वो रोककर के बैठ गई होगी। रुका हुआ है, क्‍यों रुका हुआ है, कोई देखता नहीं, पूछता नहीं, इसी कारण, कभी financial कारण भी रहे होंगे लेकिन 10-10, 20-20 साल से रुके हुए प्रोजेक्‍ट। मैंने पिछले दिनों करीब 300 प्रोजेक्‍ट का खुद review किया और उसकी worth है करीब 15 लाख करोड़ रुपया। मैं इस सदन को नम्रतापूर्वक कहता हूं कि वो सारे छोटे-छोटे संकटों में फंसे हुए, ये 15-15, 20 साल पुराने stalled projects आज चालू हो गए है, गति बढ़ रही है।

Good governance का तीसरा पहलू होता है – decentralization. इतना बड़ा देश हम centralized mechanism से नहीं चला सकते। जितनी बड़ी मात्रा में decentralize करेंगे और इसलिए सरकार ने नीतिगत रूप से decentralize करने की दिशा में नीतिगत कदम उठाए हैं जैसे environment. हम environment की हर permission को दिल्‍ली ले आए। एक दफ्तर में ले गए, एक व्‍यक्‍ति के पास ले गए और क्‍या परिणाम आया हम जानते हैं, क्‍या-क्‍या बातें सुनी गई, क्‍या-क्‍या बातें कही गई, किस पर क्‍या-क्‍या लगा सब मालूम हैं। हमने 10 regional offices को strengthen किया ताकि उनको वहां की समस्‍या की समझ है, वो जानते हैं इस चीजों को, उसको हमने किया। कुछ चीजें सरकार की, मैं तो हैरान हूं, एक गांव के बीच में से रेल जा रही है। इधर से पानी उस तरफ ले जाना है तो पाइपलाइन डालने में, पचासों permissions में वो अटकें पड़े हुए थे और बिना पानी को एक इलाका तरसता था। bridge बन गया है, दोनों तरफ road बनाना है, अटका पड़ा है। कभी दोनों तरफ road बन गए है, रेल वाले ऊपर bridge डालने के लिए permission नहीं दे रहे हैं, ऐसी छोटी-छोटी चीजें। हमने रेल, road, पाइपलाइन, बिजली transmission, इसके लिए केन्‍द्र के पास आना ही जरूरी नहीं है, सरकार ने व्‍यवस्‍था कर दी, वहीं पर हो जाएगा। इतना ही नहीं, हमने राज्‍यों के environment clearance के rights बढ़ा दिए, राज्‍यों को अधिकार ज्‍यादा दे दिए ताकि वो भी, हम जितने जिम्‍मेवार है, उतने भी राज्‍य के लोग जिम्‍मेवार है और वो कोई देश को बर्बाद करना नहीं चाहते।

अब जैसे sand. आज हमारे यहां नदी में बालू, housing constructions में से कितनी। हर नदी दिल्‍ली तक इंतजार करती है कि permission मिले। हमने इसको राज्‍य नहीं district level पर दे दिया, district authority उस पर निर्णय करेगा और वो तय करेगी। Online प्रक्रियाओं को लोग देख सकते हैं। पहले रेलवे के टेंडर की सारी प्रक्रिया यहां होती थी। आज हमने उसको zonal general manager के under में डाल दिया, टेंडर प्रक्रिया वही से चल रही है, गति से चल रही है। पहले एक 300 करोड़-500 करोड़ के प्रोजेक्‍ट भी cabinet approval के लिए आते थे, इंतजार करना पड़ता था। हमने तय कर दिया कि वो ministry करेगी। एक हजार करोड़ से ऊपर होगा तभी cabinet में लाना है। decentralization के द्वारा इसको आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

Good governance की एक महत्‍वपूर्ण बात होती है effective delivery. अब जन-धन account की यहां चर्चा हो रही है। हमारे माननीय विपक्ष नेता जी ने भोपाल के अच्‍छे उदाहरण दिए। बहुत आभारी हूं मैं कि एक जो विपक्ष ने करना चाहिए वैसा सटीक काम उन्‍होंने किया है। भोपाल जिले में किस गांव में कौन ‘जन-धन’ account से रह गया है और उसका recording तक करके ले आए। होना यही चाहिए तभी executive accountable बनेगी और ये सदन के सदस्‍यों का यही काम होता है। यह मुद्दा मेरी सरकार, तेरी सरकार नहीं होता है और मैं मानता हूं कि एक सही दिशा का यह प्रयास है। उसमें तथ्‍य क्‍या है, वो तो कल अरुण जी ने कह दिया। मैं तथ्‍य पर चर्चा नहीं करूंगा, मैं इस प्रयास को अच्‍छा मानता हूं। क्‍योंकि कभी-कभार नीचे से, व्‍यवस्‍था से खबर आएगी और मान लेते हैं, लेकिन विपक्ष सजग रहा, देखा और कितनी मेहनत की है। सत्‍ता में इतनी मेहनत की होती तो ‘जन-धन’ account का काम मुझे करना ही नहीं पड़ता। बाल की खाल उधेड़ी। लेकिन फिर भी अच्‍छा किया। साहब आपने microscope लेकर के देखा। मोदी कह रहा है जन-धन होगा, देखो यार कहीं तो होगा कोई कोने में। बहुत microscope लेकर के निकले लेकिन साहब आप इतने साल microscope लेकर के नहीं, अगर binocular से भी देखकर के काम किया होता तो आज यह मेहनत करने का मेरे जिम्‍मे नहीं आता। आज microscope लेकर के घूम रहे हो, अच्‍छा होता जब सत्‍ता में थे binocular से भी देखकर के काम को निपटाने का प्रयास किया होता। मेरे कहने का तात्‍पर्य यही है कि हम effective delivery पर बल दें वरना कभी जो last mile delivery, हमारे यहां जो लोग सरकार में रहे उनको मालूम है। हमें उसमें जितना ही हम पुरुषार्थ करे, हमें करना चाहिए।

हमारे सीताराम जी ने एक विषय छोड़ा था। उन्‍होंने कहा था कि ये targeted subsidy के नाम पर आप subsidy कम कर रहे हैं। वैसे वो उनके nature का विषय नहीं है लेकिन क्‍यों बोल दिए मुझे समझ में नहीं आता है। लेकिन हो सकता है politics में कुछ चीजें करनी भी पड़ती हैं। मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं चंडीगढ़ शहर का। चंडीगढ़ शहर में ज्‍यादातर घरों में बिजली है, ज्‍यादातर घरों में गैस कनेक्‍शन है। उसके बावजूद भी चंडीगढ़ में 30 लाख लीटर केरोसिन जाता था। जबकि उनका कोई उपयोग उनको नहीं था। कुछ परिवार थे जिनके पास गैस नहीं था, शायद उनको उपयोग होगा। 30 लाख लीटर केरोसिन। हमने सोचा कि भई जरा हम JAM योजना को लागू करे। सर्वे किया, आधार का उपयोग किया, गैस कनेक्‍शन का डाटा इकट्ठा किया। कुछ परिवार रह गए हैं जिनके पास गैस कनेक्‍शन नहीं है। हमने एक अभियान चलाया है। आने वाले कुछ दिनों में शायद पूरा हो जाएगा। लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि 30 लाख लीटर केरोसिन जो कि जाता था और धन्‍ना सेठों के द्वारा बाजार में चला जाता था, पूंजीपतियों के पास चला जाता था। ये पूंजीपति लोग उसका black marketing करते थे, डीजल में mix करते थे, environment को बर्बाद करते थे, ये targeted subsidy का परिणाम यह है कि यह जो धन्‍ना सेठ या पूंजीपति लोगों के हाथ में 30 लाख लीटर केरोसिन जाता था बहुत तो बंद हो गया, बाकी भी अब बंद हो जाएगा और इसके कारण देश की करोड़ों रुपयों की subsidy बचेगी।

तीसरा, देश को import करने में भी राहत मिल जाएगी। कहने का हमारा तात्‍पर्य यह है कि हम जब technology के माध्‍यम से इस काम को जो हम कर रहे हैं, इस काम के संबंध में subsidy सही व्‍यक्‍ति को मिले, नियम में जितनी मिलनी चाहिए उतनी मिले, समय पर मिले, उस दिशा में हमारा एक प्रयास है। यह रुपए बचाने का खेल नहीं है। एक व्‍यवस्‍था में transparency लाना नहीं, leakages बंद करने की, दलालों को निकालने का एक उत्‍तम प्रकार का प्रयास है। उसमें भी कुछ कमियां है तो ठीक करनी है और आप लोगों का उसमें सहयोग मिलेगा, कहीं से कोई जानकार मिलेगी तो ठीक करने में सुविधा बढ़ेगी। तो मैं आश्वस्त कर देता हूं सबको कि ऐसी कोई बात ध्‍यान में आए तो जरूर सरकार के ध्‍यान में लाइए ताकि हम इसको कर पाए।

एक विषय है, माननीय हमारे गुलाब नबी साहब ने विषय निकाला – skill development का। आपने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने इसको शुरू किया था, वगैरह-वगैरह। वैसे हमारे देश में skill परंपरागत है लेकिन हर सरकार ने किसी न किसी रूप में प्रयास किया है। अब बात कहा जाकर के अटकती है। अब जैसे मान लीजिए आज हम गंगा सफाई करते हैं तो स्‍वाभाविक से आपसे आवाज उठेगी, ये तो हमने शुरू किया था। सही बात है। श्रीमान राजीव गांधी जी ने उस पर बल दिया, शुरू किया।

अब सवाल यह उठता है कि शुरू किया, उसका credit लेने के उत्‍साह में यह भी तो जवाब देना पड़ेगा कि 30 साल के बाद भी गंदी क्‍यों हैं, अगर शुरू किया था तो 30 साल के बाद गंगा गंदी क्‍यों हैं, क्‍या कमी रह गई? और इसलिए हर बार, ये तो हमारे समय हुआ था, ये उत्‍साह का अपना एक महत्‍व है। श्रेय लेने का प्रयास करने में कुछ बुरा है, ऐसा नहीं है, ये तो आपको मन करेगा। देखिए दुनिया में दो तरह के व्‍यक्‍ति होते हैं - एक वो जो कार्य करते है और दूसरे वे जो उसका श्रेय लेते है। आप इनमें से पहली तरह का व्‍यक्‍ति बनने का प्रयास करें क्‍योंकि इसमें competition बहुत कम है। यह बात श्रीमती इंदिरा जी ने कही थी। अब skill development. देखिए साहब 2008 में, मैं मानता हूं skill development पिछली सरकार में जो चला। उसमें एक skill की mastery आ गई और mastery थी कमेटियां बनाने और कमेटियां बिखरने की। उसमें mastery आ गई, skill development वो हुआ।

2008 में PM’s national council, National skill Development Coordination Board, National Skill Development Corporation फिर 2009 में National Policy on Skill Development, कमेटियां पर कमेटियां, कमेटियां पर कमेटियां और मीटिंगे नहीं होती थी। एक कमेटी की तो मीटिंग शायद ढाई-तीन साल के बाद अचानक एक कर ली गई थी लेकिन वो भी इसलिए कर ली गई थी कि अगली मीटिंग कब करेंगे। आखिरकार, इतनी सारी कमेटियों के बाद 2013 में यह तय कर दिया कि National Skill Development Agency बनाई जाए और बाकी सब दुकानें बंद कर दी जाए। साहब ये skill development का हाल था। Skill Development के विषय में आप अज्ञान नहीं थे, आपको ज्ञान था कि एक जरूरी है, देश में इतनी बड़ी संख्‍या में नौजवान है करना चाहिए। लेकिन कभी-कभार तो महाभारत याद आता है ज्ञानम न धर्मम नचे बिन प्रभुति। ज्ञान तो बहुत था लेकिन करना प्रवृत्‍ति नहीं थी। अब कौन-क्‍या ये मैं ज्‍यादा चर्चा नहीं करता।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल में 2014 में हमने skill development एक अलग ministry बनाई। skill development scheme के लिए common norms तय किए। skill initiatives, consistent quality हासिल करने पर बल दिया गया। NSDC के तहत हमने डेढ़ साल में ढाई गुना उसमें बढ़ोतरी की। Industrial training institutions (ITI) हमने डेढ़ साल के भीतर-भीतर 20% उसमें इजाफा किया। पिछले दो वर्ष में क्षमता 15 लाख 23 हजार सीटों से बढ़कर के 18 lakh 65 thousand कर दी गई, 20% हमने बढ़ोतरी की। 1 लाख 70 हजार प्रतिवर्ष जो तय होते थे उसमें हमने 53 thousand और जोड़ दिए। 10th और 12th उसमें vocational education करीब बारह सौ तेरह सौ स्‍कूल में चलता था। आज हमने उसको एकदम से quantum jump लगाकर के तीन हजार पहुंचा दिया। डेढ़ लाख अतिरिक्‍त छात्रों का लाभ उसके लिए हुआ। International mobility , एक बात मानकर के चलें कि 2030 वो समय आएगा, जब दुनिया की नज़र हिन्‍दुस्‍तान के workforce पर रहने वाली है।
हमने अभी से global standard का workforce तैयार करने की दिशा में हमें काम करना चाहिए। International mobility पर हमें बल देना चाहिए और उसके लिए ऑस्‍ट्रेलिया और UK के जो standards है उसको match होते हुए, कामों को हमने शुरू किया है और भी requirements के अनुसार उस standard को लेने की दिशा में हम काम करना चाहते हैं।

Apprenticeship, किसी न किसी कारण से हमने apprenticeship को एक ऐसी अवस्‍था बना दी कि सब उद्योगकार, व्‍यापारी दरवाजे बंद करके बैठ गए, किसी को घुसने ही नहीं देते और किसी को भी नौकरी चाहिए तो लोग पूछते है experience है क्‍या? Experience लेने जाता है तो दरवाजा बंद है। जब तक हम apprenticeship को बल नहीं देते, हमारे नौजवानों को experience नहीं मिलेगा। experience नहीं मिलेगा तो उनके लिए job opportunity नहीं होगी और उसको ध्‍यान में रखते हुए हमने apprenticeship के trainee जो पहले 3 लाख 12 हजार थे। सवा साल के भीतर-भीतर 2 लाख 70 हजार और उसमें जोड़ दिए, हमने वो व्‍यवस्‍था की है।

पहले हमारे यहां target होता था - कितने बच्‍चों को तैयार किया। उसी को पूरा करने की दिशा में प्रयास था। हमने market में requirement क्‍या है, किस प्रकार के syllabus की जरूरत है, किस प्रकार की training की जरूरत है, उसका सर्वे किया और according to that हमने skill develop किया ताकि job के साथ उसको connect किया जाए और उसको उसका काम मिल जाए और उस दिशा में हमने प्रयास किया है। अब मैं देख रहा हूं कि पिछले दिनों हमारे देश में manufacturing को बल तो देना ही होगा। हम सब जानते हैं कि कोई भी सरकार हो, भाषण के लिए हम कुछ भी कहे लेकिन देना पड़ेगा। इसके कारण हमने FDI पर बल दिया, FDI में बढ़ोतरी हुई, 48% करीब। हमने 2015 में electronic manufacturing में छह गुना बढ़ोतरी हुई है। 2015 में software export सबसे ज्‍यादा हुआ है। हमारे major Ports 2015 में सबसे ज्‍यादा handling हुआ है। 2015 में सबसे ज्‍यादा कार उत्‍पादन हुआ है। 50 नई मोबाइल कंपनियां manufacturing के लिए आई है। यह सारी बातें skill और रोजगार के साथ जुड़ने वाली है और skill और रोजगार की दिशा में ये काम करने वाले हमारे प्रयास है और उसका परिणाम यह होगा कि हमारे देश में रोजगार की संभावनाएं बढेंगी।

Ease of doing business में 12 rank हम quantum jump लगाया है। हम ऊपर गए है। World Economic Forum में Global competitive index में हम 16 स्‍थान ऊपर गए है। Moodys ने जो up gradation दिया हमारे लिए, positive दिया है, जो global environment में भारत की साख को बढ़ाता है, भारत की ताकत की पहचान कराता है। Employment की चर्चा skill development में हो, manufacturing sector में बढ़ावा हो, एक रोजगार के लिए मानदंड के रूप में एक institute को हमने मान्‍यता मिली हुई। Monster Employment Index, ये online recruitment के आधार पर analysis करता है। January 2016 में index 229 था। यह index 2014 में सिर्फ 150 था और आज आप देख सकते हैं 150 से बढ़कर के 229 index को हम प्राप्‍त कर गए है। हमने रोजगारी को बढ़ावा देने के लिए जो micro and small industry है उसको हमने Tax के अंदर सुविधाएं दी हैं। Start Up को बल दिया है। तीन साल के लिए टैक्‍स में हमने रियायत दी है ताकि नौजवानों को Start Up के लिए मौका मिले। मुद्रा बैंक के द्वारा करोड़ों-करोड़ों लोगों को हमने धन दिया है, जो पुराने थे उन्होंने expansion किया है। expansion के कारण उसको एक-दो लोगों को और रोजगार देने का उसको अवसर मिला है और इसमें भी ज्‍यादा SC, ST और women हैं | मुद्रा के लाभार्थी सबसे ज्‍यादा SC, ST, OBC and women है। नए उद्योग जो लगेंगे ही, उसके लिए हमने टैक्‍स को 25% पर रख दिया है और कोई benefit अगर लेना चाहता नहीं है तो ये benefit मिलेगा।

एक महत्‍वपूर्ण निर्णय इस बजट में आपने सुना होगा। हम जो पूंजीपतियों की चर्चा करते हैं। जो लोग first UPA में सरकार का समर्थन करते थे और वो जो पूंजीपतियों का विरोध कर करके गाड़ी चलाते रहते हैं। आप देखिए हमारे देश में बड़े-बड़े मॉल हो, वो तो सात दिन चल सकते हैं, लेकिन गांव के अंदर एक छोटा दुकानदार हो, वो सात दिन खुली नहीं रख सकता है। हमने बजट में इस बार घोषित किया है कि छोटे दुकानदार भी सात दिन चला सते हैं, देर रात चला सकते हैं। इसका परिणाम यह आने वाला है कि हर छोटा दुकानदार भी एक न एक काम करने वाले को रखेगा, एक-एक दुकान पर एक नए व्‍यक्‍ति के रोजगार की संभावना होने वाली है। उस दिशा में महत्‍वपूर्ण काम मैं समझता हूं आने वाले दिनों में रोजगार की दिशा में होने वाला है।
चेयरमैन श्री, मैं अब थोड़ी किसानों के संबंध में बात करना चाहता हूं। जब हमने कहा कि क्‍यों न देश जिसमें किसान हो, progressive किसान हो, राज्‍य सरकारें हो, केन्‍द्र सरकारें हो, हम सब मिलकर के, हमने बहुत जिम्‍मेदारी के साथ इन शब्‍दों का प्रयोग किया हुआ है। सब मिलकर के ये लक्ष्‍य क्‍यों न तय करे कि 2022 में किसान की income double हो और मैं हमारे मनमोहन सिंह जैसा तो अर्थशास्‍त्री नहीं हूं लेकिन जिस अवस्‍था में से पला-बढ़ा हूं तो गरीब किसानों को नजदीक से देखा है और इसलिए मुझे वो बढ़ा ज्ञान तो नहीं है लेकिन छोटी-सी चीजों का पता है। अगर हम सही दिशा में प्रयास करे तो परिणाम आएगा। मैं एक हमारे देश में इस विषय के जानकार है, श्रीमान एम. एस. स्वामीनाथन, उनका एक latest article का quote मैं कहना चाहता हूं “seeds have been sown for agricultural transformation and for attracting and retaining youth in farming. The dawn of a new era in farming is in sight.”

अब किसान की आय दोगुना हो सकती है कि नहीं हो सकती है। किसान मतलब, अगर जो हम soil health card के काम को लेकर के चले है, उसको हम सफलता से लागू करे और किसान soil health card के advices के अुनसार अपनी जमीन का उपयोग करना शुरू करे। productivity बढ़ सकती है, input cost कम हो सकती है। आज किसान की मुसीबत यह है कि पड़ोसी ने अगर लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाल दी तो उसको भी लगता है कि मैं लाल डिब्‍बे वाली दवाई डाल दूं । पड़ोसी ने अगर पीले डिब्‍बे वाली डाल दवाई दी तो वो भी पीले डब्‍बे वाली दवाई डाल देता है। पड़ोसी ने इतने kg यूरिया डाल दिया तो वो भी। उसकी जमीन उसके लिए योग्‍य है कि नहीं है।

अगर हम कोशिश करें। हमारी agriculture universities, agriculture graduates ये सारे लोग इसमें लगे और soil testing का जो काम चला है, उसको अगर खेती के साथ सीधा-सीधा जोड़कर के हम आगे बढ़े परिणाम ला सकते हैं। दूसरी बात, हमारे यहां हम timber import करते हैं। अगर हम हमारे किसानों को जहां उसकी जमीन की सीमा समाप्‍त होती है वहां वो एक-दो मीटर जमीन बर्बाद करता है। बाड़ लगा देता है, एक मीटर इधर वाले की जाती है, एक मीटर उधर वाले की जाती है। अगर वो दोनों मिलकर के timber की खेती करें । पेड लगा दे तो 15-20 साल में permanent income का source बन सकता है और जमीन को कोई नुकसान नहीं होने वाला है। जमीन को अतिरिक्‍त फायदा होने वाला है। उस दिशा में काम कर रहे हैं। हम कृषि के साथ fisheries, poultry , animal husbandry, milk production, दूसरा value addition. Income बढ़ाने के लिए जरूरी नहीं है कि agro product ही बने. Value addition से, अभी हमने एक निर्णय कोका कोला कंपनी पर हमने दबाव डाला, उनसे बातचीत की, laboratory में testing करवाया। हमने आग्रह किया कि आप कोका कोला के अंदर 5% natural orange juice mix करिये और मुझे खुशी है कि अभी महाराष्‍ट्र government के साथ उनका agreement हुआ और विदर्भ के अंदर जो संतरा पैदा होता है वो संतरा अब कोका कोला के अंदर 5% मिक्स होगा तो वि‍दर्भ के कि‍सान का संतरा बि‍कने में कोई दि‍क्‍कत नहीं आएगी।

हमें value addition की दि‍शा में प्रयास करना होगा और इसलि‍ए अगर आलू कि‍सान बेचता है तो कम कमाई होती है लेकि‍न wafer बनाकर के बेचता है तो ज्‍यादा कमाई होती है। हरी मि‍र्च बेचता है तो कम कमाई होती है लेकि‍न लाल मि‍र्च का पाउडर बनाकर के बेचता है तो ज्‍यादा कीमत मि‍लती है। हम लोगों ने value addition पर बल देना शुरू कि‍या है जि‍सके कारण हमारे कि‍सान की income में बढ़ोतरी होना पूरी तरह लाजि‍मी है। उसी प्रकार से blue economy, हमारे जो सागर, जो हमारे fisheries में हमारे fisherman लगे हैं। हमारे समुद्री तट पर seaweed की खेती, पूरी संभावना है आज दुनि‍या में pharmaceuticals के manufacturing में base material के लि‍ए seaweed बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरा है। हमारे fisherman के परि‍वार समुद्री तट पर आराम से seaweed की खेती कर सकते है और वो seaweed की marketing और हमारे pharmaceuticals से हम tie up करे, हमारे fisherman की income भी हम बढ़ा सकते हैं। कहने का तात्‍पर्य यह है कि‍हम जो सोचते हैं कि‍agriculture sector में हम कि‍सानों की आय बढ़ा नहीं सकते, ये नि‍राशा का कोई कारण नहीं है। अगर हम वैज्ञानि‍क तरीके से, उसी प्रकार से National Agriculture Market, आज National Agriculture Market के द्वारा, e-platform के द्वारा, कि‍सान अपने गांव में बैठकर के यह तय कर सकता है कि‍अगर महाराष्‍ट्र के अंदर उसकी पैदावार की कीमत ज्‍यादा है, वहां बेच सकता है। 14 अप्रैल बाबा साहेब आम्‍बेडकर की जन्‍मजयंती पर यह सरकार इसको launch करने जा रही है। कि‍सान अपनी जहां ज्‍यादा कीमत मि‍लेगी, वहां market में जाने के लि‍ए उसको सुवि‍धा मि‍लने वाली है।

दुनि‍या में honey का बहुत बड़ा market है। लेकि‍न भारत में हमारे कृषि‍क्षेत्र में honey bee का वैज्ञानि‍क तरीके से कोई प्रयास नहीं हुआ, registration तक available नहीं है। हमने इस पर बल दि‍या है।
अगर उस पर हमारा किसान काम करता है और हनी बी को बिगड़ने का सवाल ही नहीं होता है लंबे समय अर्से तक रहता है। हमारे किसान की इनकम में अतिरिक्‍त बढ़ोतरी कर सकता है। हमने किसान की income बढ़ाने के लिए और पहलुओं पर बल देने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं।

चैयरमैन श्री, यहां पर स्‍वच्‍छता की चर्चा हुई और ये कहा गया कि ये काम तो हमारे समय में भी चलता था। हमने किसी भी बात नहीं कही है। ये सब आप ही की देन है। हम कभी claim नहीं करते ये आप ही की देन है कि आज हमको दिन रात मेहनत करके स्‍कूलों में चार लाख टॉयलेट बनाने पड़े। आपने अगर बना करके दिया होता तो काम हमारा कम हो जाता और इसिलए कोई ये नहीं कहता कहने का तात्‍पर्य समस्‍याएं पुरानी हैं, समस्‍याएं नई नहीं हैं। समस्‍याओं के समाधान करने के प्रयास अभिरथ चले हैं। हर किसी ने अपने-अपने समय कुछ न कुछ जोड़ने का प्रयास किया है। उस समय की स्‍थिति के अनुसार available resources के अनुसार हमने भी एक प्रयास किया है और यह खुशी की बात है। देखिए 1986 में central rural sanitation programme आया था, तब से लेकर के। रिकॉर्ड पर यह चीजें available है। उसके बावजूद भी हम अभी तक परिणाम प्राप्‍त नहीं कर सके। परिणाम प्राप्‍त करना है तो जन आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा ।

और मैं आज इस बात को संतोष के साथ कह सकता हूं कि‍ आज स्‍वच्‍छता, ये जन आंदोलन बनने की दि‍शा में जा रहा है। हमारी संसद ने देश आजाद होने के बाद कभी भी स्‍वच्‍छता पर debate नहीं की थी। पहली बार इस देश में पार्लि‍यामेंट ने दो-दो, तीन-तीन घंटे तक स्‍वच्‍छता पर चर्चा की। हो सकता है सरकार की आलोचना हुई होगी लेकि‍न कम से कम इस सदन के लोग, उस सदन के लोग इस बात पर sensitize हुए है कि‍अब इसको ऐसे नहीं रहने देना चाहि‍ए, बदलना चाहि‍ए। एक अच्‍छा माहौल बन रहा है। हम सब उसको बल कैसे दे, उस दि‍शा में सोचना है। कोई दावा नहीं करता है कि‍हम ही लाए।

हमारे बाद कोई आएंगे तो वो उसको improve करेंगे। उनके बाद कोई आएगा और improve करेंगे और हो सकता है स्‍थि‍ति‍ऐसी आए करना न पड़े और वो जन सामान्‍य का वि‍षय बन जाए। लेकि‍न हमें करना होगा और जब तक हम इसको नहीं करेंगे। हमने अभी शहरों की एक challenging mode में competition शुरू की है। उसका परि‍णाम यह आया है Urban Development Ministry कर रही है। आज शहरों में उस शहर की elected body पर दबाव पड़ रहा है कि‍भई उन तीन में तुम्‍हारा नाम क्‍यों नहीं है हमारे शहर का नाम क्‍यों नहीं है? मैं बनारस का MP हूं, बनारस के नागरि‍क municipality पर दबाव डाल रहे हैं कि‍क्‍या बात है यह स्‍वच्‍छता के अंदर बनारस नज़र क्‍यों नहीं आ रहा? जनता का pressure बढ़ रहा है। ये बढ़ना चाहि‍ए और मैं तो चाहता हूं आप भी जहां-जहां हो ये pressure बढ़ाइए। सरकार को मजबूर कीजि‍ए। सभी elected bodies को मजबूर कीजि‍ए। हम स्‍वच्‍छता को हमारे देश हि‍त का एक महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम माने। महात्‍मा गांधी का जो सपना था, 2019 में पूरा करना, हम सबका दायि‍त्‍व क्‍यों नहीं हो सकता।

इस सरकार उस सरकार का नहीं हो सकता है मेरे माननीय सभी सदस्‍यगण ये हम सबका होना है। मैं देख रहा हूं मीडिया हाऊस दुनियाभर के विषय में दुनियाभर के विषय में हमारी आलोचना करते हैं। सरकारों की आलोचना करते हैं। ये एक विषय ऐसा है कि देश का मीडिया पार्टनर बना है। कहीं न कहीं मीडिया के लोग इस काम को कर रहे हैं खुद कार्यक्रम कर रहे हैं। खुद उसको promote कर रहे हैं। इसको एक हम सबका कार्यक्रम बनाएंगे तो देश के और देश के Tourism बढ़ाने के लिए काम आएगा और स्‍वच्‍छता जो पूंजीपतियों का विरोध करते हैं, उनके लिए तो सबसे पहले करने जैसा काम है, क्‍योंकि WHO का रिपोर्ट कहता है, इंटर नेशनल एजेंसी का रिपोर्ट कहता है कि गंदगी के कारण गरीबी में जीने वाले परिवारों को सालाना average सात हजार रूपया दवाई में खर्च होता है। अगर ये उसकी बीमारी चली जाए इसके कारण कितनी बड़ी सेवा होगी।

मैं मानता हूं, ये काम ऐसा है जिन्‍होंने किया है उसे हम आगे बढ़ाए। जितना किया है उसको और अधिक करें। अभी मैं छत्‍तीसगढ़ गया था। मैंने एक मां के पैर छुए, आदिवासी मां, पढ़ी-लिखी नहीं 90 प्‍लस उम्र है। उस मां ने अपनी तीन बकरियां बेच करके टॉयलेट बनाया। उस गांव में वो पहली महिला थी जिसे टॉयलेट बनाया। हम लोगों के लिए इससे बडा़ inspiration क्‍या हो सकता है और इसलिए और इसलिए मैं चाहूंगा कि इसको सरकार कार्यक्रम, पक्ष का कार्यक्रम, ये सरकार वो सरकार की सीमाओं में न बांधें। उसको देशहित के लिए सोचें और उसको हम बनाएंगे तो मैं समझता हूं कि बहुत अच्‍छा होगा।

कल हमारे सीताराम जी, जो उनका बेसिक फिलॉस्‍पी है उसको कल प्रकट कर रहे थे कि इतने exemption हैं, इतना फलां, आंकड़ा कहां से लाए। वो तो भगवान जाने। हां, वो आंकड़ा ढूंढा मुझे मिला नहीं। मुझे बाद में दिखा देना जी, लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि मैं वो आंकड़े की बताना चाहता हूं। टेक्‍स exemption है। जरा हम देखें 10 हजार 350 करोड़ रूपये exemption उसमें दाल और सब्‍जी में, क्‍या हम उसका विरोध करेंगे। 5800 करोड़ रूपये exemption किसके लिए चीनी के लिए।

शरद जी जो आपके बगल में बैठे है बाद में समझा देंगे आपको। 19 हजार 120 करो़ड़ रूपये exemption किसके लिए। जम्‍मू कश्‍मीर, हिमाचल, उत्‍तराखंड उनके उद्योगों के लिए। नार्थ ईस्‍ट के लिए, हम उसका भी विरोध करेंगे क्या ।
 
मैं समझता हूं कि कभी-कभार बारीकियों में जाएंगे तो हमें पता चलेगा कि हमारे जो इन बातों को ले करके आपको चिंता हो रही है। यही सरकार है, कल अरूण जी ने आपको विस्‍तार से बताया है finance की चर्चा होगी तो बताएंगे कि हमने टैक्‍स किस पर लगा रहे हैं और टैक्‍स से मु‍क्ति किसको दे रहे हैं। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा और इसके लिए। और जो चीजें हमें विरासत में दी हैं कभी आपने बाहर से समर्थन करके सरकारें चलाई उसने जो हमें विरासत में दी हैं। आज उसी को सफाई करने में हमारा दम उखड़ रहा है और इसलिए समाप्‍त करने से पहले एक मशहूर शायर निदा फाजली की जो आवाज है। अभी अभी उनका स्‍वर्गवास हुआ। उनकी बात कह करके मेरी बात मैं समाप्‍त करूंगा।

सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
किसी के वास्‍ते, राहें कहां बदलती हैं,
किसी के वास्‍ते, राहें कहां बदलती हैं
तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो, चलो
यहां किसी को कोई रास्‍ता नहीं देता
यहां किसी को कोई रास्‍ता नहीं देता
मुझे गिरा के मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो
यही है जिन्दगी , कुछ ख्वाब चंद उम्मीदें
इन्हीं खिलोने से जो तुम भी बहल सको तो चलो |
सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो।
बहुत बहुत धन्यवाद

Sunday, 6 March 2016

PM’s address at the National Conference of Women Legislators


मैं सुमित्रा जी को हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं कि उन्होंने इस कार्यक्रम की योजना की, कल्पना की लेकिन उससे ज्यादा भी बधाई मैं आप सबको देता हूं क्योंकि मैंने जानकारी पाई की किस प्रकार से सत्र हुए, विषय हुए, आप सबका participation रहा, सक्रिय भागीदारी रही और, ज्यादातर लोग उपस्थित रहे। वरना दिल्ली आए तो और भी कुछ काम होते हैं तो ऐसा शायद कम हुआ तो ये अपने आप में, आपके लिए यह समारोह जिज्ञासा से भरा हुआ रहा। जहां आप कार्य करते-करते जो कठिनाइयां भुगत रहे हैं, उसका समाधान चाहते हैं।

जिन सपनों को लेकर के आप सार्वजनिक जीवन में आए। उन सपनों को पूरा करने के लिए अपने आपको सक्षम कैसे बनाया जाए, उसके लिए कहीं से कोई मार्गदर्शन मिले, जानकारी मिले, रास्ता खोजने का प्रयास मिले । इन सारी बातों का परिणाम है कि आप इस डेढ़ दिवस में अनेक विषयों पर सक्रियता से हिस्सा लिया लेकिन मैं एक तीसरे विषय की ओर कहना चाहता हूं कि कभी-कभी इस प्रकार के समारोह में Structured way में जो चीजें मिलती हैं, उससे ज्यादा मेल जोल के समय, चाय के समय, भोजन के समय या आते-जाते, परिचितों से, अपरिचितों से जो बातें होती हैं। उनसे जो अनुभव बांटने का अवसर मिलता है, वो structured programme से भी ज्यादा ताकतवर होता है और वो आप लोगों ने पाया है और उस अर्थ में देशभर के महिला जनप्रतिनिधियों का ये समारोह आने वाले दिनों में आप अपने-अपने क्षेत्रों में जहां जाएंगे, वहां कोई न कोई सकारात्मक भूमिका अदा करेगा और आपको अवश्य सफलता मिलेगी।

यहां पर सुषमा जी के एक quote का उल्लेख हुआ लेकिन मैं उसे महिला और पुरुष के संदर्भ में नहीं कहना चाहता लेकिन एक बात कि ये जो महिला सशक्तिकरण, ये मनोवैज्ञानिक अवस्था को बदलने की आवश्यकता मुझे लगती है। सशक्तिकरण उनका होता है, जिनका सशक्तिकरण नहीं है लेकिन जो सशक्त है, उनका सशक्तिकरण कौन करेगा और ये बात मेरे गले नहीं उतरती कि पुरुष होते कौन हैं जो सशक्त करेंगे लेकिन आवश्यक ये है कि हम स्वंय को पहचानें।

हम अपनी शक्तियों को तब तक नहीं पहचानते हैं, जब तक हमें चुनौतियों से जूझने का अवसर नहीं आता है। जितने भी प्रकार के समाज, जीवन के सर्वे होते हैं उसमें एक बात आती है। अगर पत्नी का स्वर्गवास हो गया, पुरुष अकेला परिवार चलाता है तो न लंबा समय परिवार चला सकता है और न लंबा समय वो जीवित रह सकता है और अगर पुरुष नहीं रहा हो, महिला को परिवार चलाने की जिम्मेवारी आ गई सारा सर्वे कहते हैं कि वह लंबे अरसे तक जीवित भी रहती है और परिवार का लालन-पालन उत्तम तरीके से करके दिखाती है।

ये उस बात सुबूत है कि inherent जो सामर्थ्य और शक्ति ईश्वर प्रदत्त आप लोगों को है, महिलाओं को है। जिसको पहचानना स्वंय में बहुत आवश्यक है। आजकल management की दुनिया में एक शब्द बड़ा प्रचलित है multi star activity ये multi task activity दुनिया के कई देशों में जो व्यक्तित्व का growth हुआ है वो एक single tunnel activity का होता है। अगर उसमें वो चलता रहा तो आगे बढ़ता जाता है, बहुत कुछ contribute करता है लेकिन उस tunnel में कहीं रुकावट आ गई, कहीं और रास्ते पर जाने की नौबत आई तो नहीं कर पाता है। अगर daily उसको lift से जाने की आदत है, 10 वीं मंजिल पर बैठा है और अचानक बिजली चली जाए तो stair case से नीचे उतरना, उसका घंटा लग जाता है क्या करूं, ऐसे लोग होते हैं।

Multi Task activity आज managerial world में एक विशिष्ट शक्ति के रूप में माना जाता है लेकिन हमारे देश में महिलाओं की ओर देखिए। शायद Multi Task activity में इनसे बढ़कर कोई नहीं हो सकता है। वो FM पर गाने भी सुनती होगी, Mobile पर बात भी करती हो और पकाती भी होगी, बच्चे को भी सूचना देती होगी, ये यानि कभी हम थोड़ा dissection करके इस चीज को देखें तो अंदाज आता है क्या सामर्थ्य दिया है, क्या शक्ति दी है। क्या हम इस शक्ति का गौरव करना जानते हैं, इस सामर्थ्य को पहचानते हैं।

ये भी देखिए जहां-जहां महिला को अवसर मिला है, उसका सफलता का स्तर बहुत ऊंचा है। आप पिछले वर्षों से याद कीजिए कौन Foreign Minister थे देश के नाम ही याद नहीं आएगा लेकिन आज सुषमा जी तुरंत याद आती हैं आपको। सामर्थ्य हम अनुभव करते हैं।

हमारे Parliament में कई Speaker आए लेकिन जितने महिला Speaker आए हरेक को ध्यान रहा होगा कि मीरा कुमार थीं, सुमित्रा जी हैं। आजकल राज्यो में भी बहुत बड़ी मात्रा में महिला Speaker role कर रही हैं। जहां-जहां उनको अवसर मिला। अगर मैं नहीं जानता हूं कि किसी ने सर्वे किया है कि नहीं किया है लेकिन अगर सर्वे करे तो शायद पुरुषों को मिले हुए अवसर, उनका success ratio and महिला को मिला अवसर, उनका success ratio, मैं विश्वास से कहता हूं महिलाओं का ऊपर गया होगा। इसका मतलब ये है कि सामर्थ्य है। हमारे देश में ये पहली सरकार ऐसी है जिसमें इतनी बड़ी मात्रा में महिला मंत्रियों का प्रतिनिधित्व है क्योंकि मेरा conviction है कि उनको अगर अवसर मिले तो वो बहुत उत्तम परिणाम दे सकते हैं और आज हम अनुभव भी कर रहे हैं कि परिणाम देते हैं।

आप लोगों ने शायद पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में Africa का एक छोटा सा देश Rwanda, उसकी घटना शायद अगर आपके कान पर आई हो। वहां एक बहुत बड़ा नरसंहार हुआ, लाखों की तादाद में लोग मारे गए और ज्यादातर पुरुष मारे गए। बाद में महिलाओं ने देश की कमान संभाली और हिम्मत के साथ वो मैदान में आईं। आज उनके lower house में करीब 65 percent women representative हैं और इतनी भयंकर आपत्ति से निकले हुए देश को महिलाओं ने leadership दी और महिलाओँ ने देश को बाहर निकाला। आज Rwanda अपने पैरों की ताकत पर खड़ा हो गया। ये अपने आप में एक बहुत बड़ा उदाहरण है कि कठिनाइयों से गुजरने के बाद भी जिनको अवसर मिला, उन्होंने कितना बड़ा परिवर्तन किया, कितना बड़ा परिणाम लाया है और इसलिए लेकिन एक जनप्रतिनिधि के नाते, हम सशक्त हों कि हम राष्ट्र को सशक्त बनाने में कोई extra भूमिका अदा कर सकते हैं क्या, राष्ट्र को सशक्त बनाने में बजट काम नहीं आता है। राष्ट्र को सशक्त बनाने में रोड, रास्ते, port, airport, building, भवन, इमारतें ये काम नहीं आती हैं।

राष्ट्र को सशक्त बनाता है, राष्ट्र का जन-जन राष्ट्र को सशक्त बनाता है। राष्ट्र को सशक्त बनाता है राष्ट्र का नागरिक और कोई नागरिक को कोई सशक्त बनाता है, उसको अगर सामर्थ्यवान बनाता है, उसको अगर चरित्रवान बनाता है तो मां बनाती है, उससे बड़ा राष्ट्र का निर्माण कोई नहीं कर सकता है। उससे बड़ा राष्ट्र का निर्माण, सशक्तिकरण कोई नहीं कर सकता, जो सदियों से माताएं-बहनें करती आई हैं। पीढ़ियों तक उत्तम रत्नों को देकर के समाज, जीवन का सशक्तिकरण का सबसे मूलभूत काम आप ही के द्वारा तो हुआ है लेकिन जो हुआ है उसका अगर गर्व नहीं होगा। हम ही inferiority complex में रहेंगे, हम ही सोचेंगे कि नहीं उन लोगों का ज्यादा अच्छा है तब तो मैं नहीं मानता हूं कि ये आगे बढ़ने का जो आपका इरादा है, उसको पार करने में कोई मददगार होगा।हम स्वंय ही इतने सामर्थ्यवान है, इसका अहसास करेंगे और ये मेरे कहने के कारण है नहीं, आप हैं।

कभी-कभार, नारी के दो रूप घर में अगर वो चूल्हे पर खाना पका रही है, चपाती बना रही है और चपाती बनाते-बनाते उसमें से थोड़ी भाप निकल गई, steam निकल आई और उसकी ऊंगली जल गई तो फूंक मारती है लेकिन उसका ध्यान फिर खाने में नहीं रहता है, पकाने में नहीं रहता है। वो पतिदेव के आने का इंतजार करती है। तीन बार खिड़की में जाकर के देखेगी कहीं आए तो नहीं हैं और उसकी कोशिश रहती है कि वो आते ही सामने ये जलती हुआ ऊंगली का चित्र खड़ा करे। उसको लगता है कि आज मेरे पतिदेव देखें कि मैं आज चपाती बनाते-बनाते मेरी ऊंगली जल गई है। फूंक लगाएगी, पानी मांगेगे, अरे देती हूं पानी, जली है दो घंटे पहले और पति आएंगे, उसको कहेंगे कुछ लगा दीजिये। वो ही नारी चपाती से भाप निकलती है, ऊंगली अगर थोड़ी सी भी जल गई, पति का इंतजार करती है कि पति देखे लेकिन मौहल्ले में आ लग गई, मां गई है बाजार में सब्जी खरीदने के लिए, अच्छा सा discount सेल चल रहा है। 10 percent, 20 percent, साड़ियां आई हैं बहुत बढ़िया और नारी गई है वहां purchasing के लिए, साड़ियां देख रही है और पता चले कि उस मोहल्ले में आग लगी है, वो उन सारी साड़ियों को लात मारकर के दौड़ती है जाकर के।


अड़ोस-पड़ोस के लोग उस घर को आग बुझाने के लिए कोई मिट्टी डाल रहा है, कोई पानी डला रहा है, वो आकर के चीखती है कि मेरा बेटा अंदर है। अड़ोस-पड़ोस के कितने ही मर्द, मूंछों वाले खड़े होंगे, कोई जाने की हिम्मत नहीं करेगा। वो मां जिंदगी और मौत का खेल खेलते हुए आग में उलझ जाएगी और बच्चे को लेकर के बाहर आ जाएगी। चपाती में से निकली भाप के कारण जिसकी ऊंगली जलती है तो उसका एक रूप होता है लेकिन संकटों के सामने जब उसका प्रेम उभर करके आता है, दूसरी ताकत होती है। ये शक्ति के धनी आप लोग हैं और वो ही शक्ति है जो राष्ट्र को ताकतवर बनाती है, राष्ट्र को सामर्थ्यवान बनाती है और इसलिए जनप्रतिनिधि के नाते, मान लीजिए मेरा कितने-कितने प्रकार के role होंगे। हमारा काम है विधायिका में कानून बनाना, क्या मैंने उस कानून को बनाते समय उसका जो draft आया है, उसको उस बारीकी से देखा है कि जो मेरा जो सशक्तिकरण का एजेंडा है, उसमें ये फिट बैठता है कि नहीं बैठता है। कोई शब्द की कमी है कि नहीं है। अगर है तो मैं जागरुक प्रतिनिधि के रूप में उस बात को मनवाने के लिए कोशिश कर रही हूं कि नहीं कर रही हूं। आप देखिए बहुत बड़ा contribution होगा।

आप के कार्यकाल में एकाध ऐसा कानून बनता है। जिस कानून के अंदर आपने एक ऐसे शब्द को लाकर के रख दिया, जो शब्द आने वाली पीढ़ियों का जीवन बदल सकता है। कितना बड़ा contribution है लेकिन क्या मेरा उस प्रकार से प्रयास हो रहा है। जनप्रतिनिधि के नाते ये मेरा दायित्व बनता है कि मैं जो संवैधानिक काम है, उसमें मुख्यतः मेरा काम है और इतना ही नहीं कोई भी परिवार में जब मकान बनता है न कितने ही architecture क्यों न हो, कितने ही design बनाकर के आएं लेकिन आखिर तक तो ठप्पा वो मां लगाती है, नहीं-नहीं kitchen ऐसे जाहिए, toilet यहां चाहिए। मंदिर यहां चाहिए, जूते यहां लगाने होंगे तब जाकर के घर ठीक चलेगा। उसको वो engineer है कि नहीं है, वो architecture है कि नहीं है लेकिन उसको समझ आती है अनुभवों से। उसी प्रकार से जब house के अंदर कानून बनता है। उसी विधा से हम देखते हैं क्या कमियां हैं, क्या अच्छाईयां हैं। आने वाली पीढ़ियों तक क्या प्रभाव पैदा होगा। मैं चाहूंगा थोड़ा सा आप कोशिश कीजिए, आप बहुत बड़ा contribute कर सकते हैं क्योंकि आपके अंदर देखने की, सुनने की और शक्ति दी है। जो आप चीजों को समय से पहले भांप सकते हैं, शायद पुरष नहीं भांप सकते हैं।

उसके क्या Reification होंगे, उसका अंदाजा शायद आपको जल्दी आता है, पुरुष को शायद नहीं आता है। ये ईश्वर दत्त शक्ति आपके पास है। क्या इसका उपयोग विधायिका में हो सकता है क्या, हम जहां बैठे हैं वहां हो सकता है, हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम करेंगे। जनप्रतिनिधि के नाते हमारी अपनी कोई छवि बनी है क्या। मैं मानता हूं कि, आपसे आग्रह करूंगा कि आप carefully प्रयास कीजिए कि आपके क्षेत्र में आपकी एक छवि हो, आपकी पहचान वो बने और ये एक साधना है, एक निरंतरता है तब जाकर के बनती है। जैसा मान लीजिए कोई जनप्रतिनिधि होता है कि भई मंगल और बुध सुबह 8 बजे मेरा इस जगह पर मिलना तय, मतलब है। बारिश हो, धूप हो, कुछ भी आपकी पहचान बन जाएगी। अरे वाह मंगल या बुध यानि हमारे जनप्रतिनिधि यहां होंगे ही होंगे, जरूर मिलेंगे। हम कहेंगे भई ये telephone number पर message दे दीजिए, मैं रहूं या न रहूं वो telephone number आपके जैसी ही ताकतवर बन जाए। ऐसा एक जनप्रतिनिधि के नाते।

हमारे मतदान क्षेत्र में, हम अपनी एक पहचान दर्ज करा सकते हैं क्या और आप देखिए एक बार जनसामान्य में आपकी कार्यशैली की, आपके वाणी, विचार, व्यवहार की एक अगर particular छवि बनी, वो लंबे अरसे तक आपको काम आएगी, लंबे अरसे तक काम आएगी और ये कोशिश करनी चाहिए। जनप्रतिनिधि के नाते कभी-कभार, राजनीति एक competition का खेल होता है, स्पर्धा हर पल होती है लेकिन जब स्पर्धा में ईर्ष्या भाव प्रबल हो जाता है तो मानकर चलिए कि हम आगे जाने के हकदार नहीं रहते हैं और उसके कारण क्या होता है कि अगर हमारे कार्यक्षेत्र में दो-चार और महिलाएं तेजस्वी नजर आएं, ताकतवर नजर आएं तो हमारा हौंसला पस्त हो जाता है, हमें डर लगता है। कहीं यार अगली बार टिकट इसको तो नहीं मिल जाएगी, मेरा क्या होगा। हमें अपने आपको निरंतर able बनाते हुए आगे जाना चाहिए और अगर हम कोशिश करेंगे कि मैं हूं जो हूं लेकिन मैं किसी को आने नहीं दूं तो आप मानकर चलिए कि आने वाले प्रवाह की ताकत इतनी होगी कि वो आपको नीचे गिराकर के ऊपर चले जाएंगे और तब आप इतने नीचे चले जाएंगे कि कभी ऊपर नहीं होंगे। लेकिन अगर आप औरों को आने देते हैं, आने देते हैं। आप ऊपर चले जाएंगे, नीचे आपका बेस बनता चला जाएगा, पिरामिड की तरह आपकी ताकत बढ़ती जाएगी।

ये सार्वजनिक जीवन में जनप्रतिनिधि के नाते मेरी अपनी शक्ति और शख्सियत, इसके लिए मुझे कोशिश करनी चाहिए। हम ये तय करें, हमारे हर एक के कार्यक्षेत्र में, एक-तिहाई महिलाएं नेतृत्व कर रही हैं। कोई गांव का नेतृत्व कर रही हैं, कोई नगर का नेतृत्व कर रही हैं, कोई शहर का कर रही हैं, कोई बड़े शहर, एक तिहाई क्योंकि one-third chairmanship किसी न किसी महिला के हाथ में है। ये एक-तिहाई प्रतिनिधि, बाकी छोड़िए, ये एक-तिहाई प्रतिनिधि वो आपकी सोच, आपके विचार को, जो आपके under में काम करते हैं, आपके कार्यक्षेत्र में हैं। अगर आप विधायक हैं और 100 गांव हैं, अगर उस 100 गांव के अंदर से 30-35 महिलाएं हैं, प्रधान महिलाएं हैं क्या आपने उनको empower किया है, क्या आपने उनका सशक्तिकरण किया है, क्या आपने कभी एक दिन उनके साथ बिताया है।

मैं आपसे आग्रह करूंगा कि जो सुमित्रा जी ने हम सब के लिए यहां पर किया, क्या आप जाकर के अपने लोकसभा क्षेत्र में या अपने विधानसभा क्षेत्र में, वहां जो elected महिलाएं हैं क्या उनका एक दिन का कार्यक्रम आप कर सकते हैं क्या, इस बात को आप ले जा सकते हैं क्या, आप देखिए ये चीज नीचे तक चली जाए तब तो ये सशक्तिकरण की दिशा में एक बहुत बड़ा बदलाव का माहौल बनेगा और किसी भी दल की क्यों न हो इसमें दलबाजी नहीं होनी चाहिए। आपने देखा यहां सभी दल के लोग हैं और मैं तो सुमित्रा जी को बधाई देता हूं उन्होंने इस कार्यक्रम को बनाने के लिए जो कमेटी बनाई थी वो सब दल के लोग थे और करीब-करीब सब Junior MP थे लेकिन उन्होंने बड़े उत्साह के साथ इसे Plan किया। कहने का तात्पर्य है कि हम, हमारी इस इकाई को Empower कैसे करें, ताकतवर कैसे बनाएं, उनके अंदर सामर्थ्य कैसे लाएं। ये सामर्थ्य लाने के तरीकों में हम खुद नेतृत्व कर सकते हैं क्या, अगर हम नेतृत्व करेंगे तो हम बहुत बड़ी परिवर्तन ला सकते हैं।

एक और विषय है जिस पर मैं आपसे आग्रह करूंगा वो है Technology, हम ये मानकर चलें Technology का एक बहुत बड़ा role व्यक्ति के जीवन में, समाज के जीवन में सुनिश्चित हो चुका है। हमने अपने आप को उसके साथ cope up करना पड़ रहा है। मेरा ये मत है कि पुरुषों में Technology को adopt करने की जितनी ताकत है, उससे ज्यादा Technology को adopt करने की ताकत महिलाओं में है। आप देखिए किसी भी kitchen में जाइए आप, Most Modern Gadget Technology के लिए जो kitchen में उपयोग आता है वो महिलाएं आराम से उपयोग करती होंगी। इतना ही नहीं उनके घर में kitchen में मदद करने वाली कोई अनपढ़ भी महिला होगी लेकिन उसको वो सब चलाना आता होगा कैसे चलाना है, क्या कैसे चलाना है, सब कुछ उसे आता होगा। मतलब Technology adopt करने की महिलाओं की एक विशेष शक्ति होती है।

आपने देखा होगा Consumer Product जो करते हैं उनका भी target क्या रहता है कि women centric production कि उसको मालूम है कि market तुरंत मिलेगा क्योंकि वो तुरंत स्वीकार करती है। Technology महिलाओं के लिए कोई नई नहीं होती है, वो स्वीकार करती है लेकिन जनप्रतिनिध के नाते जो बदला हुआ युग है, उसमें हम Technology का कैसे उपयोग कर सकते हैं। हमारे communication के लिए technology का उपयोग कैसे कर सकते हैं। हम अपने कार्यक्षेत्र में, लोक संपर्क के लिए technology का उपयोग कैसे करें, हम जनता का सामान्य बातों को जानने के लिए technology का कैसे उपयोग करें, हमारी अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए technology का उपयोग कैसे करें, उसका भरपूर प्रयास करना चाहिए। आज आपका कोई मतदाता ऐसा नहीं होगा कि जो Mobile Phoneसे connect न हो, 2 percentभी नहीं होंगे लेकिन आप उनसे connect हैं, मतलब something is missingअगर आज यहां के दो दिन के अनुभव आप इस technology के माध्यम से करें तो देश औऱ दुनिया को पता चलेगा कि हां ये कुछ हो रहा है और जानकारियां पाने का उत्तम से उत्तम साधन है।

मेरा तो अनुभव है। मैं ऩरेंद्र मोदी एप पर दखता हूं इतने लोग मेरे से जुड़े हुए हैं, मुझे इतनी जानकारियां देते हैं। हर चीज का immediate पता चलता है। कुछ हुआ तो immediateपता चलता है। इतनी well inform रह सकता हूं काम के अंदर। mygov.in एक platform चलाता हूं PMO से, उसके द्वारा भी मैं जनसामान्य को जोड़ता हूं। आप भी अपने तरीके से ऐसी व्यवस्था कर सकते हैं और मैं तो लोकसभा को, राज्यसभा को एक प्रार्थना करूंगा कि आप women प्रतिनिधि का एक e platform तैयार कर सकते हैं क्या और उनकी जो बातें हैं वो officially लोकसभा, राज्यसभा website को चलाएं। पूरे देश के महिला प्रतिनिधियों के लिए एक अवसर दिया जाए। देखिए technology की अपनी एक ताकत है और मेरा एक अनुभव है। मैं जब गुजरात में मुख्यमंत्री था, कपराडा एक तहसील है। बहुत ही interior बहुत ही Tribal belt है। आमतौर पर किसी मुख्यमंत्री का वहां जाना होता ही नहीं लेकिन मेरा अपने कार्यक्षेत्र में काम का आग्रह रहता था सभी क्षेत्र में स्थानों पर जाऊं, खुद जाने मेरा प्रयास रहता था। लेकिन मेरा वहां जाना बन ही नहीं रहा था। दो-तीन साल चले गए उस इलाके में जाना हुआ ही नहीं। मैंने कहा भई मैं जाऊंगा, कुछ नहीं तो एक पेड़ लगाकर के वापस आऊंगा, लेकिन जाऊंगा।

खैर फिर हमारे अफसरों को भी लगा कि ये तो अब जाना ही है इनको तो आखिरकर उन्होंने एक कार्यक्रम ढूंढा, एक chilling center का उद्घाटन करना था। chilling center क्या होता है, दूध आता है, दूध को थोड़े समय रखने के लिए काम होता है और 50-60 लाख का होता है। अब वो संकोच कर रहे थे कि मुख्यमंत्री 50 लाख रुपए केproject के लिए जाएंगे। मैंने कहा भी मैं जाऊंगा, मुझे जाना है, उस इलाके में मैं गया नहीं, मुझे जाना है। मैं गया तो वो तो forest था पूरा तो जनसभा के लिए जगह भी नहीं थी लेकिन उससे तीन किलोमीटर दूर एक स्कूल के मैदान में उन्होंने public meeting रखी थी लेकिन यहां जहां chilling center पर मैं गया, वहां दूध भरने वाली आदिवासी 30-35 बहनें उन्होंने बुलाकर के रखी थीं,chilling center का उद्घाटन करना था। मैं हैरान था जब मैं वहां कार्यक्रम के लिए गया तो ये सारी Tribal बहनें वो, जो security की fencing की गई थी वहां पर खड़ी थीं। हर एक के हाथ में Mobile Phone था और photo निकालती थीं।

मैं उस इलाके की बात करता हूं जहां CM जाते नहीं हैं forest है, बिल्कुल Tribal लोग हैं। उस समय की बात करता हूं, 10 साल पहले की बात कर रहा हूं। सब photo निकाल रही थीं तो मुझे आश्चर्य हुआ, मैं उनके पास गया, मैंने कहा ये photo निकालकर क्या करोगे आप लोग और उन्होंने जो जवाब दिया वो मैं आज भी भूल नहीं सकता हूं। उन्होंने कहा इसको जाकर के download करा देंगे। वो पढ़ी-लिखी नहीं थीं लेकिन download शब्द उनको मालूम था। Mobile Phone से किसी दुकान में जाकर के download होता है। कहने का तात्पर्य ये है कि ये technology कहां-कहां पहुंची है। क्या हमने अपने आप को उसके साथ connect करने का प्रयास किया है। आपकी अपनी ताकत बढ़ाने की दिशा में आपने प्रयास करना चाहिए।

एक और विषय है communication, मैं ये नहीं कहता हूं कि आपने कोई बहुत बड़े orator बनना चाहिए, जरूर नहीं है, बन सकते हैं, अच्छी बात है लेकिन ये inferiority की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर आप कोशिश करें तो आप अपनी बातों को ढंग से बताने की ताकत आ सकती है।

आप जनप्रतिनिधि हैं, एक काम कर सकें अगर आप technosavy हैं तो अपने mobile पर उपयोग करें या तो एक छोटा सा I pad रख सकते हैं या नहीं है तो diary में लिख सकते हैं। क्या आप लगातार एक diary maintain करते चलें। अखबार में कोई चीज पढ़ी है लिखकर के और उसमें department बना दीजिए Education का, Irrigation का, Urban development का, Rural Development का और उसमें लिखते चले जाइए घटनाएं, जोड़ते चले जाइए। सालभर के बाद देखोगे आप, आपका अपना ज्ञान का भंडार इतना बड़ा होगा कि कहीं पर भी किसी विषय को लेकर के रूबरू हो रहा होगा तो दो मिनट लेगा आपकी diary को नजर कर लिया, आप एक बड़े विश्वास के साथ, facts and figures के साथ चीजें प्रस्तुत कर सकते हैं।

मैं आपसे आग्रह करूंगा कि आपको अपने आपको प्रभावी भी बनाना पड़ेगा और अगर आप अपने आप को प्रभावी बने रहने के लिए जो प्रय़ास करने चाहिए अगर उसको आप नहीं करेंगे तो सिर्फ व्यवस्थाओं बदलने से परिणाम नहीं आता है। Structure में इधर-उधर बदलाव होता रहेगा, समय-समय पर होता भी रहता है। आवश्यकता है उसमें प्राणवान कैसे बनाएं हम अपनी ताकत को कैसे जोड़ें।

हम कोशिश करें कम से कम समय में हम अपनी बात को कैसे रखें, सटीक तरीके से कैसे रखें और अगर इस बात में आपकी ताकत आई तो आप देखिए लोग आपकी बात से सहमत होते जाएंगे, जुड़ते चले जाएंगे। आपकी leadership establishment करने के लिए आपके पास उम्दा व्यक्तित्व जरूरत नहीं है, आपके पास विषयों की जानकारी होना जरूरी है। आप सदन में बोलते हैं। सब लोगों को सब विषयों का ज्ञान हो ये जरूरी नहीं है। क्या कोई प्रधानमंत्री बन गया तो सब विषयों का उसे ज्ञान होता है, कोई आवश्यक नहीं है लेकिन जिसमें आपकी रुचि है, ऐसे एक या दो विषयों पर आपकी मास्टरी होनी चाहिए। हर बात उससे संबंधित जो चींज मिले, उसको collect करते जाना चाहिए। आपको लगता है कि पानी पर मेरी मास्टरी, मेरे क्षेत्र में पानी का problem है तो मैं पानी पर मास्टरी करूं। आपको लगता है कि नहीं-नहीं मैं technology पर मास्टरी करूं, technology पर करूं। आपको लगता है नहीं-नहीं मैं शिक्षा विषय पर।

 एक विषय पकड़िए, जिस विषय पर आप सर्वाधिक grip ले सकते हैं, सरलता से ले सकते हैं, जानकारियां जोड़ सकते हैं। आप देखिए सदन में routine में शायद आपको आपकी पार्टी के लोग बोलने का अवसर न देते हों लेकिन एकाध पर विषय पर आपकी मास्टरी होगी तो वो खोजते हुआ आएंगे, नहीं-नहीं भई मंगल को Parliament-Assembly में जरूर आइए ये विषय है, आपको तो बोलना ही पड़ेगा, आप बोलेंगे तो दम आएगा क्योंकि आपके पास भंडार भरा पड़ा है। आपको किसी कृपा की जरूरत नहीं पडेगी और इसलिए हम स्वंय अपने आप में कैसे सज्ज करें अपने आप को, उसके लिए प्रयास करें और अगर ये प्रयास करें तो हमें उत्तम परिणाम भी मिलता है। समय काफी मैंने लिया है, आप लोगों को भोजन भी करना है और आप लोग photo के लिए भी तैयार होकर के आए हैं तो मैं फिर एक बार सुमित्रा जी को बहुत-बहुत अभिनंदर करता हूं और आप सबको भी, एक और बात मेरे मन में आती है ये जो Parliament की कमेटियां जाती हैं, Assembly की कमेटियां जाती हैं, राज्यो में जाती हैं। आप भी जाते हैं उसमें क्या आप प्रयास कर सकते हैं क्या, आप पूरा कार्यक्रम जो बनेगा, बनेगा लेकिन आप जहां जाएंगे वहां, वहां की महिला जनप्रतिनिधियों के साथ आधा घंटा, एक घंटा जरूर परिचय करेंगे, मिलेंगे, ये कर सकते हैं क्या, आप देखिए आपको इतनी जानकारियां मिलेंगी।

दूसरा मैं विशेषकर के MPs को प्रार्थना करता हूं। यहां कई राज्यों के MLAs के साथ आपका परिचय हुआ है। सदन के अंदर देश के किसी भी कोने की चर्चा आ पड़ती है। क्या आपने telephone पर आपने जहां परिचय हुआ है उस राज्य की किसी MLA से उसको phone करके पूछ सकते हैं कि भई सदन में ये विषय उठने की संभावना है, तुम्हारे राज्य का हुआ है, बताओ न क्या है, वो कहेगी नहीं मैं एक घंटे में ढूंढकर के बताता हूं। देखिए दोनों तरफ फायदा हो जाएगा। वो भी उस घटना पर concentration करेगी, वो भी study करेगी, आपको घंटे भर में report करेगी और आपको भी अखबारों के द्वारा नहीं first-hand information मिलेगी कि भई केरल में, तिरुवनंतपुरम में ये घटना घटी है और वहां की MLA मुझे ये कह रही हैं तो मैं house के अंदर मैं इस बात के अंदर में ये सही बात बताऊंगी।

आप देखिए जानकारियों के स्रोत ये बहुत आवश्यक हैं। इसमें से और कुछ हम साथ ले जाएं या न ले जा पाएं लेकिन ये जो दायरे से आपका परिचय हुआ है, दल कोई भी होगा, आप contact बनाइए आपको जानकारियों के स्रोत आपके बढ़ते जाएंगे तो हम कहीं जाएं दौरे पर, कमेटियां में आग्रह रखें कि हम वहां के जनप्रतिनिधियों से सामूहिक रूप से आधा घंटा, एक घंटा अवश्य मिले। सरकार programme बनाएं या न बनाएं, हम ये प्रयास करें। धीरे-धीरे ये अपने आप में एक शक्ति संफुट बन जाएगा। जो शक्ति संफुट राष्ट्र को सशक्तिकरण करने की प्रक्रिया में एक बहुत बड़ी अहम भूमिका अदा करेगा और वो दिन दूर नहीं होगा कि जब women empowerment तो होता ही होता चला जाएगा लेकिन देश में women development से आगे बढ़कर के women led development की दिशा में आगे बढ़ेगा। इसी एक पूरी श्रद्धा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches 

Friday, 4 March 2016

Prime Minister’s Address during the International Conference on Rule of Law for supporting 2030 Development Agenda


Hon. Chief Justice of India,
Other Dignitaries on the dais,
Judicial minds from India and abroad
Invitees, Delegates, Ladies and Gentlemen!


I am delighted to address the International Workshop on Rule of Law and Sustainable Development. I welcome our friends from abroad and thank them for their active participation.


This workshop is being organized soon after two important international agreements which happened during 2015. One is the Paris Agreement on climate change. The other is the Agreement on Sustainable Development Goals. Therefore, this conference provides a timely and useful opportunity to discuss the way forward. This is important not only in the national context but also in the global context. I hope you will keep in mind the welfare of mankind and the concerns of the international community in your deliberations.

The role of rules and laws in achieving sustainable development goals is going to be very important in the days to come. However, rules should be such that they facilitate the achievement of these goals. Unfortunately, some times, the concern for environment is defined narrowly. We all have to realize that if there is conflict, no one’s purpose will be served. I hope that you will show us the way to build and ensure climate justice across the globe based on legal as well as social frameworks.

Last year, in September, I attended the meeting of the UN General Assembly where the Sustainable Development Goals for 2030 were adopted. These goals reflect our evolving understanding of the social, economic and environmental linkages that define our lives.

This was followed by the COP-21 where we contributed significantly in shaping the narrative. Our commitments at COP-21 underline the Indian ethos which aims at changing human lifestyle along with changes in the manner in which we engage in economic activity. The problems of environment are largely the effect of our consumptive lifestyles. If we want to make a meaningful impact, we all need to look within; before we read the books of law.

Friends!

I have always felt that anything which is not sustainable cannot be called development. In our culture, development means ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनो’ and “लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु’. This cannot happen unless the development process is inclusive and sustainable. Anything which compromises on the ability of future generations to meet their requirements cannot be called development. We in India have always believed in sustainability. For us, the law of nature holds great value. If we all observe it, then many man-made laws will not be required. Only the practice of सह जीवन and सह अस्तित्व will be enough to help us. In modern terminology, there is a word called stakeholder. A path becomes sustainable, if all stakeholders are benefitted. However, I must add a word of caution here. The stake should be natural. It should be inherent. It cannot be stretched to include those who may be working with ulterior motives. Nature is pure. Hence, only pure intentions can keep it intact.

We, in India, have a strong tradition of living in harmony with nature. We worship nature. We worship the sun, the moon, rivers, land, trees, animals, rain, air and fire. These elements of Nature have been given the stature of Gods in our culture. Moreover, in Indian mythology, most of the Gods and Goddesses are associated with an animal and a tree. Thus, respect for Nature is an integral part of our culture, and has been passed across generations. Protection of environment comes naturally to us. This strong tradition has been a guiding principle for all of us.

There is a well-known Sanskrit saying:
ॐ सर्वेशां स्वस्तिर्भवतु । सर्वेशां शान्तिर्भवतु ।
सर्वेशां पुर्णंभवतु । सर्वेशां मङ्गलंभवतु ।।


Which means:

We always pray for welfare, peace, fulfillment and sustainability of all; at all places and for all times.

This is our commitment; not of today but since time immemorial. If we remember this, follow this and act accordingly, India could provide leadership in sustainable development. For example, the practice of Yoga is aimed at balancing contentment and worldly desires, to lead to a path of moderation and sustainable lifestyle. When I talk of yoga, it is not just its physical dimension. Yoga is very comprehensive. The ideas of YAM, NIYAM, PRATYAHAR teach us discipline, austerity and control.

Much before the debate on sustainable development began, Mahatma Gandhi, the Father of our Nation, had said that we should act as ‘trustees’ and use natural resources wisely. It is our moral responsibility to ensure that we leave a healthy planet for future generations.


 Friends! I am sure all of us agree that poverty is the biggest challenge for environment. Therefore, eradication of poverty is one of the fundamental goals of my government. Guided by our core values, we are working towards achieving this goal with sincerity. We want to ensure a conducive environment for 1.25 billion Indians to develop, and prosper. We are encouraging education, skill development, digital connectivity and entrepreneurship to provide an enabling ecosystem for our youth to blossom. We aim to do all this in a sustainable manner.

We realize that fulfilling the demand for energy is vital to the achievement of our development goals. This is why, one of the first challenges that we took up was generation of 175 Giga watts of renewable energy. We are well on our way to achieving this objective.

We have also taken up the Swacch Bharat and Clean Ganga Initiatives. I am happy to note that millions of people across the country have joined the cleanliness drive. I take this opportunity to invite the participants to explore as to how we can strengthen this collective endeavour. I am glad to learn that this workshop will also discuss issues related to pollution and waste management. These are issues that need to be addressed proactively. I look forward to your recommendations towards strengthening such initiatives.

Friends!

The problems we face in India today are not unique. Other civilizations have also faced similar problems and were able to overcome them. I believe that through our collective efforts we will succeed as well. While doing so, we must ensure that we avoid contradictions between our need to develop and develop sustainably. Our culture teaches us Union between the व्यक्ति and समस्ती. If we become one with the universal order, there are no conflicts of interest.

Therefore, my Government is treating the challenge of adapting to climate change as an opportunity rather than a problem. We need to adopt the philosophy of योग: कर्मसु कौशलम्. We must do things in a way that causes minimum damage to the environment. This is कौशल or mastery. This is what I mean when I talk of zero defect and zero effect manufacturing. I have written some of my thoughts on this theme in my book, Convenient Action: continuity for change.

Friends! The rule of law dictates that no one can be punished for another’s misdeed. We need to recognize that there are many people who are least responsible for the problem of climate change. They are also the people who still wait for access to modern amenities. They face the adverse impact of climate change more than anyone else. This includes cyclones, droughts, floods, heat waves, and rising sea levels. The poor, vulnerable and marginalized groups have fewer resources to cope with climate disasters. Unfortunately, their present and future generations are also burdened by laws and agreements on environment. That is why I talk about Climate Justice. Moreover, the rules, laws, practices and principles of one country cannot be applied to another uniformly. Every country has its own challenges and its own ways of dealing with them. If we apply the same set of rules for all countries and for all people; it will not work.

Sustainable development is our responsibility. I am confident that we can achieve it, collectively. I am also confident that we can find ways for development which are in harmony with nature. We can find them along the road travelled by our forefathers. I hope the deliberations during this workshop will help in developing a shared understanding of these imperatives.

I wish this conference a grand success.

Thank you. 

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Importance of roads for a nation, is the same as the importance of arteries and veins in the human body: PM Modi

उपस्थित सभी राज्‍यों से आये हुए प्रतिनिधि मंत्री परिषद के सदस्‍य, सांसदगण के प्रतिनिधि और सभी महानुभाव,

आमतौर पर सरकार एकाध भी bridge बनाती हैं तो एकाध रोड बनाती है तो हमारे देश में एक बहुत बड़ी घटना मानी जाती है। मीडिया का भी ध्‍यान रहता है और उस क्षेत्र के लोग भी उस विषय में ज्‍यादा चर्चा करते हैं क्‍योंकि वर्षों तक जिस चीज की मांग रहती है और बड़ी मुश्किल से 15-15 साल के इंतजार के बाद कुछ होता है, तो ये हम इन चीजों से अनुभव करते हैं। हमने एक comprehensive, integrative approach लिया है। हमें पता है कि भई ये समस्‍याएं हैं, तो उन समस्‍याओं को एक पूरी ताकत के साथ देश को समस्‍या से कैसे बाहर निकाला जाए। Normally सरकारें incremental काम करने की आदत रखती है, पहले पांच करते थे, अब सात करते हैं, सात करते थे दस करते हैं, हमारी कोशिश है quantum jump की, break-through की, पुरानी स्‍पीड और निर्णय करने की प्रक्रियाओं से एकदम से बाहर निकलना। गति बढ़ा देना, quick decision लेना उसमें से ही सारी योजनाएं साकार होती हैं।

सेतु भारतम्, अभी नितिन जी बता रहे थे आपको भी आश्‍चर्य होगा इतनी बड़ी सरकार उसको address मालूम नहीं है कि कौन सा bridge कहां है, यानी कैसे काम किए होंगे और मैं इसमें कोई elected body का दोष नहीं देता हूं कि फलाने प्रधानमंत्री थे, या ढिकरे राज्‍यमंत्री थे। मैं ये नहीं कह रहा हूं। व्‍यवस्‍था का दोष है, हमने ये इन चीजों को प्राथमिकता नहीं दी। और इसलिए सबसे पहला काम किया कि भई एक बार देखो तो सही इस देश में क्‍या है कहां है, क्‍या स्थिति है। अब उसका gradation का काम चल रहा है कि उमर के हिसाब से bridge किस category में आते हैं, लंबाई-चौड़ाई के हिसाब से किस category में आते हैं, material के संदर्भ में, किस प्रकार की डिजाइन है, कितनी पुराने जमाने की डिजाइन हैं, नई ये सारा उसका gradation चल रहा है। और दूसरा उसका address पक्‍का हो रहा है longitude-latitude के माध्‍यम से, Space-Technology का उपयोग करके कहां यहां ये bridge है? हो सकता है कुछ जगह पर कागज पर bridge होगा वहां नहीं होगा वो भी हाथ में आएगा। लेकिन कोशिश ये है।
दूसरा छोटी-छोटी चीजें हैं लेकिन आप लोगों को हैरानी होगी कि हमारे यहां पहले highways बनते थे जमीन तो acquire करते थे। लेकिन जब highway बनता था, तो जमीन के बगल में encroachment हो जाता था और कभी four-lane करना है, six-lane करना है, तो आप चौड़ाई नहीं बढ़ा सकते है। क्‍योंकि ये encroachment था। Encroachment, अब आ नहीं सकते क्‍योंकि हर दूसरे साल चुनाव होते हैं तो कोई-कोई चुनाव सामने दिखता है तो कोई हिम्‍मत नहीं करता है। और फिर कोर्ट-कचहरी से भी तुरंत stay मिल जाते हैं तो ये कई कठिनाईयों से भी रोड बढ़ते ही नहीं है।

हमने छोटा-सा निर्णय किया हमने कहा जब रोड बनाएंगे, तो जो जमीन acquire करेंगे दो छोर पर ups and down का रोड बनाएंगे और बीच में जगह खाली रखेंगे जब expansion करना होगा, तो वो अंदर की तरफ करेंगे, तो encroachment का सवाल नहीं आएगा। अब चीजें छोटी होती हैं, लेकिन ये लंबे अरसे तक सहाय करने वाली है। उसी प्रकार से हमारे यहां जिस प्रकार से देश का विकास हो रहा है, तो बहुत-सी चीजें आवश्‍यक है। क्‍यों न अभी से हम, उसके साथ सामान्‍य मानविकी जो Facilities की जो आवश्‍यकता है, 20 किलोमीटर 30 किलोमीटर क्‍यों न व्‍यवस्‍था करें? Rest-Room वगैरह क्‍यों न साथ में उसके डिजाइन में क्‍यों न हो? उस पर बल दे रहे हैं।

उसी प्रकार से ग्रामीण व्‍यक्तियों को अपना माल शहर में बेचना है, तो क्‍यों न इस बड़े रोड रास्‍तों के नजदीक में ऐसी कोई जगह हो, जहां से वो माल ला करके वहां से बेचने के लिए लाए। यानी एक Comprehensive Development की दिशा में हमारा प्रयास चल रहा है। और उसी के तहत इस काम को करेंगे। एक साथ 1500 bridge, करीब 51 हजार करोड़ रूपये की लागत। कभी तो रेल और रोड उनके बीच में इतने कागज चलते थे, कभी-कभी लगता है कि सारे पत्र व्‍यवहार को इकट्ठा करे, तो एकाद यहां monument bridge बना सकते हैं। हमने कहा ऐसा नहीं भई बैठो, बैठ करके बताइए क्‍या समस्‍या है, अब क्‍या किया फॉर्मूला बना दिया कि रेलवे के ऊपर bridge बनाया तो ऐसा बनेगा, रोड और रेल को क्रोसिंग होता है, तो ऐसा bridge बनेगा, इसकी ये डिजाइन होगी। अब ये डिजाइन आती है, तो तुरंत उसको sanction कर दो। तेज गति से चीजे sanction हो रही हैं, आगे बढ़ रही हैं। उसी का परिणाम है कि आज 1500 bridge, जिसमें repairing का भी है, नए निर्माण का काम भी है और समय सीमा में करने की दिशा में काम करने का सोचा गया है। Land की जरूरत होगी तो उसके लिए राज्‍य सरकारों से बात करके आगे बढ़ना है। कोशिश ये है कि हम बदलाव लाएं और ये बात हम मान के चलें जैसे शरीर में नसों का role है, धमनियों का role है, veins का role है और उसकी जो गतिविधि और काम है उससे वो शरीर को शक्ति भी देते हैं, शरीर को गति भी देते हैं। जो ये नसें veins शरीर में role करती हैं वैसे ही ये Infrastructure इस राष्‍ट्र के शरीर में काम करता है। अगर Road Infrastructure आपका होगा, Rail Infrastructure होगा आप गति बढ़ाएंगे।

युग बदलते ही Infrastructure की परिभाषाएं बदलती हैं। पहले एक मुझे याद है, जब हम छोटे थे, तो ये अकाल जब होता था तो अकाल में मिट्टी का काम निकलता था। तो गांव के लोग चिट्ठियां लिखते थे, के भई हमारे गांव में मिट्टी का करवा दीजिए, ताकि हमको जाने-आने की सुविधा हो जाए। तो अकाल के काम में मिट्टी डलवाते थे, मिट्टी डल गई तो वो कहते वाह, वहां बहुत बड़ा काम किया। हमारे MLA, MP बड़े सक्रिय हैं, बड़ा संतोष हो जाता था। फिर थोड़ा समय आया बोलते साहब थोड़ा Tar-Road बना दीजिए, आज गांव का आदमी भी कहता है साहब Fiber-Road चाहिए। Fiber-Road चाहिए उसको, ये जो बदलाव आया है, हमने भी उसको ने meet करने की दिशा में काम करना पड़ेगा। और उस दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं। ग्रामीण सड़कों पर हमारा बल है।

आपने देखा होगा, इस बार प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में बहुत बड़ी मात्रा में बजट डाला गया। ये Infrastructure है जो मैंने कहा, शरीर में नसों का काम है उसी प्रकार से गति देने वाला काम है। एक जमाना था मैंने कहा, अगर मिट्टी डाल दी है तो संतोष होता था, आज highways भी चाहिए I-ways भी चाहिए। Iways-Information Ways, I-ways और highways, ये साथ-साथ करना हो इसलिए सरकार की कोशिश है। Digital Optical Fiber Network खड़ा करना है, उसी प्रकार से Agriculture Sector के Infrastructure का जो महत्‍व है, जितना हम Irrigation Infrastructure खड़ा करते हैं, उतनी पूरे Agriculture Sector को ता‍कत मिलती है। हम उस पर बल दे रहे हैं।

 
 Railway, पहले क्‍या था? Railway यानी पार्लियामेंट में बेंच पर तालियां बज जाएं। तो ये इस MP को खुश करने के लिए उसके रास्‍ते से निकलने वाली, एक ट्रेन घोषित कर दो, तो उस रास्‍ते पर पड़ने वाले सारे दस-बारह MP खुश हो जाएंगे। ये ही करना, फिर करना-वरना कुछ नहीं, यार देखना पुरानी कई घोषणाएं पड़ी हैं, जिसको अब तक चालू नहीं किया गया। हमने कहा भाई ये तालियां बजाने से देश नहीं चलेगा, रेलवे में आमूल-चूल परिवर्तन लाना चाहिए। रेल, रेल की पटरियां डालो, gaze बदलो, आप, आप उसको डीजल से electrification की तरफ ले जाओ, Environment की दृष्टि से काम करो, गति की दृष्टि से काम करो, एक पूरा, पूरा focus बदल दिया है रेलवे का। अभी तक हमारे देश में अकेले railway में जो reform हो रहे हैं उस पर किसी का ध्‍यान नहीं गया है। वो जो Big Bank की बातें करते हैं, reform की बातें करते हैं, सिर्फ Railway देख लें कि कैसे बदलाव किया है तो उनको अंदाज आ जाए कि कहां से कहां Railway जा सकती है।

चाहे optical fiber network हो, चाहे Railway network हो, चाहे road network हो, चाहे bridges का निर्माण हो। हर एक पूरे देश में और qualitative change। सिर्फ किलोमीटर नहीं बढ़ाने हैं। हमें qualitative change लाना है और एक लंबे अरसे की आवश्‍यकताओं की पूर्ति को ध्‍यान में रख करके लाना है। मुझे विश्‍वास है कि राष्‍ट्र को सशक्‍त बनाने में, राष्‍ट्र को समृद्ध बनाने में, राष्‍ट्र को गति‍शील बनाने में Infrastructure अहम भूमिका अदा करता है। जैसे शरीर की मजबूती का कारण शरीर की नसों का role है, veins का role है, वैसे ही राष्‍ट्र की मजबूती का आधार इस Infrastructure पर है, road network पर है, Rail network पर है, optical fiber network पर है, water connectivity पर है, grid connectivity पर है, electricity generation पर है, electricity supply पर है। ये चीजों पर हम जितना बल देंगे, उतना ही आने वाले दिनों में परिवर्तन आने वाला है। और इसलिए ये सरकार उस दिशा में काम कर रही है।

मैं नितिन जी को बधाई देता हूं कि सेतु भारतम् के माध्‍यम से देश में bridges की तरफ देख रहे हैं। मैं तो चाहूंगा कि हमारी जितनी Universities हैं, खास करके Engineering and Architecture, वे देश में सबसे oldest bridge, उसकी Technology उस पर कोई Phd करे कोई student, दुनिया में क्या हो रहा है उस पर Phd. हम एक इसको एक science के रूप में develop करें। उसी प्रकार से हमारे Engineering और Architecture के students, उनको internship के लिए हम brides पर अवसर दें । बहुत बड़ी मात्रा में रोजगार की भी संभावना होगी, और हमारे यहां qualitative man-power तैयार होगा। तो एक प्रकार से human resource development भी हो, दूसरी प्रकार से Infrastructure भी develop हो, हमारे Institutions की capability बढ़े, उन सारी बातों को एक साथ लेकर के हमें आगे बढ़ना है। मैं फिर एक बार बहुत-बहुत बधाई देता हूं। बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Thursday, 3 March 2016

PM Modi's reply to Motion of thanks to President’s Address in Lok Sabha

अध्‍यक्ष महोदया जी, मैं सबसे पहले, राष्‍ट्रपति जी के प्रति आभार व्‍यक्‍त करना चाहता हूं। उन्‍होंने राष्‍ट्रपति अभिभाषण के माध्‍यम से न सिर्फ सदनों को लेकिन देश और दुनिया को भारत का गौरव, भारत की गरिमा, भारत की उत्‍तम विकास यात्रा और विश्‍व के पास भारत की जो अपेक्षा हैं, वो भारत के सामान्‍य मानव की जो अपेक्षाएं हैं, उसकी पूर्ति करने के प्रयास उसका एक विस्‍तार से बयान, आदरणीय राष्‍ट्रपति जी ने हमारे सामने प्रस्‍तुत किया है। मैं उनके प्रति आदरपूर्वक धन्‍यवाद व्‍यक्‍त करता हूं और धन्‍यवाद करने के लिए मैं खड़ा हूं।

सदन की इस महत्‍वपूर्ण चर्चा में कई आदरणीय सदस्‍यों ने अपने अनुभव का, अपने विचारों का लाभ सदन को और देश को पहुंचाया है। आदरणीय श्री मल्लिकार्जुन जी, श्री वैंकेया नायडू जी, मिनाक्षी लेखी जी, हरसिमरत कौर जी, श्री पी. नागराजन जी, श्रीमान सौगत राय, श्रीमान भर्तृहरि महताब जी, श्रीमान जितेंद्र रेड्डी जी, मोहम्‍मद सलीम जी, सुप्रिया सुले जी, मुलायम सिंह यादव जी, राहुल गांधी जी, अनुप्रिया पटेल जी, श्री रियो जी, श्री ओवैसी जी, कई वरिष्‍ठ आदरणीय महानुभावों ने अपने विचार रखे हैं। उन सभी को मैं धन्‍यवाद कहता हूं, क्‍योंकि इस विचार को उन्‍होंने जनता को सशक्‍त बनाने में, सुरेख बनाने में अपना योगदान दिया है।

मैं आज इस सदन में, हम सभी सांसदों की तरफ से स्‍पीकर महोदय का भी धन्‍यवाद करना चाहता हूं। क्‍योंकि, राष्‍ट्रपति जी के भाषण में संसद की कार्यवाही किस रूप में चलनी चाहिए, कैसी होना चाहिए उसकी अपेक्षाएं व्‍यक्‍त की गई है। और यह अच्‍छी बात है कि हमने अपने बड़ों की सलाह माननी चाहिए, उनसे सलाह लेनी चाहिए। और राष्‍ट्रपति जी हमारे संवैधानिक व्‍यवस्‍था के सबसे बड़े पद पर है। और उनकी सलाह हमने अवश्‍य माननी चाहिए। और मैं स्‍पीकर महोदय का विशेष रूप से इसलिए आभार व्‍यक्‍त करना चाहता हूं कि पिछले कुछ समय में उन्‍होंने कई नये initiative लिए हैं। उन्‍होंने जो SRI योजना प्रस्‍तुत की है Speaker’s Research Initiative. हम सभी सांसदों को अलग-अलग विषय पर research material मिले। हम लोगों का प्रबोधन हो। एक अच्‍छा प्रकल्‍प आपके द्वारा चल रहा है और वो संसद को qualitative change लाने में उपयोगी होगा। मैं इसके लिए आपका आभार व्‍यक्‍त करता हूं।

मैं अध्‍यक्ष महोदया का इस बात के लिए भी अभिनंदन करना चाहता हूं कि उन्‍होंने अगले पांच और छह मार्च को, पूरे देश की elected women members को Assembly and Loksabha उनके एक सर्वदलीय सम्‍मेलन की घोषणा की है। हमारे भूतपूर्व राष्‍ट्रपति जी समेत, सभी महिला leaders का उसमें प्रदर्शन मिलने वाला है। Women empowerment की दिशा में decision making process में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करने की दिशा में आपका एक अहम कदम है और मैं मानता हूं इस हिंदुस्‍तान के संसदीय गतिविधि के साथ एक अच्‍छा कदम आपने उठाया है और सभी दलों ने सहयोग किया है। सबसे बड़ी बात है कि सभी दल के women सांसद मिलकर इसको कार्ययोजना बना रहे हैं। एक बहुत ही अच्‍छा माहौल इसका दायर हुआ है। इसके लिए मैं आपका आभार व्‍यक्‍त करता हूं।

उसी प्रकार से BPST Training programme में जो नये हमारे सांसद चुन करके आए हैं, उनकी लगातार प्रशिक्षा, उसमें भी काफी अच्‍छा आपके द्वारा काम था, Orientation programme चल रहे हैं। मैं इसके लिए भी आपका बहुत-बहुत आभार व्‍यक्‍त करता हूं।

राष्‍ट्रपति जी ने कहा है कि सदन बहस के लिए होता है। हम देख रहे हैं कि देश पिछले दिनों सदन में जो हुआ उससे बहुत पीडि़त भी है, चिंतित भी है। और जब सदन नहीं चलता है, तो सत्‍तापक्ष का नुकसान तो बहुत कम होता है, देश का नुकसान बहुत होता है। लेकिन सबसे ज्‍यादा नुकसान सांसदों का होता है, उसमें भी विपक्ष के सांसदों का होता है। क्‍योंकि उनका जनता की आवाज उठाने से रोका जाता है। और इसलिए, संसद में कितने विरोधी विचार क्‍यों न हो, कितनी ही नाराजगी क्‍यों न हो, लेकिन वो प्रकट होना यह आवश्‍यकता है। सदन एक ऐसा forum है, जहां तर्क रखे जाते हैं, जहां तीखे जवाब दिये जाते हैं। एक ऐसा forum है, जहां सरकार पर सवाल किये जाते हैं। एक ऐसा forum है जहां सरकार को अपना बचाव करना होता है। अपने पक्ष में सफाई देनी होती है। बहस के दौरान किसी को बख्‍शा नहीं जाता और उसकी उम्‍मीद भी नहीं की जानी चाहिए। लेकिन बहस के दौरान अगर सदन की गरिमा और मर्यादा बनी रही तो हम अपनी बात और मजबूती से रख पाएंगे और साथ ही साख भी बना पाएंगे। यह उपदेश नरेंद्र मोदी का नहीं है। यह भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमान राजीव गांधी का है।

राष्‍ट्रपति जी की बात इसलिए महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि उन्‍होंने लम्‍बे अरसे तक इस प्रक्रिया में भी अपने जीवन के महत्‍वपूर्ण वर्ष बिताएं हैं। और उन लोगों के साथ बिताएं हैं कि जिनसे ज्‍यादा अपेक्षा बहुत स्‍वाभाविक है। मैं एक और बात कहना चाहता हूं। मैं इस सदन में मौजूद सभी दलों को अहम बिल पास कराने में मदद का न्‍यौता देता हूं। और जब मैं इस सदन कहता हूं मतलब दोनों सदन। यह बिल लोगों के लिए है। यह बिल इसलिए जरूरी है ताकि system से दलालों को खत्‍म किया जा सके। यह बिल इसलिए है ताकि जमीनी स्‍तर पर जिम्‍मेदारियां बांटी जा सके। यह बिल इसलिए है ताकि प्रशासन को जवाबदेह बनाया जा सके। यह बिल इसलिए है ताकि योजनाओं में आम जनता की भूमिका बढ़ाई जा सके। सामाजिक न्‍याय में, विकास में, उनकी भागीदारी बढ़ाई जा सके। यह बिल इस लोकतंत्र की बुनियाद को मदद करने के लिए है। यह भी नरेंद्र मोदी नहीं कह रहा। यह भी हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमान राजीव गांधी ने कहा है। और हमने बड़ों की बात माननी चाहिए।

सदन को रोकने के संबंध में कुछ बातों की चर्चा जरूरी लगती है। हमारे भूतपूर्व स्‍पीकर और यहां कुछ महानुभाव है जिनके वो guide and philosopher रहे हैं, लम्‍बे अरसे तक- श्रीमान सोमनाथ चटर्जी। उन्‍होंने कहा कि ऐसे मुद्दों पर जिनके बारे में धारणा होती है कि वे महत्‍वपूर्ण है। सदन की बैठकों को रोकना पूरी तरह counter-productive है। दुर्भाग्‍य से राजनीतिक दलों में यह विचार पनपा है कि संसद की कार्रवाई में व्‍यवधान डालने और अंतत: सदन को समय से पहले स्‍थगित कराने से, उस विषय का या मुद्दे का महत्‍व साबित हो जाएगा, जिस पर विभिन्‍न पार्टियां विरोध कर रही है। संसद के कार्यों को बाधित करने को अगर देश के लोगों के खिलाफ युद्ध जैसा नहीं भी माने, तो कम से कम संसदीय प्रणाली में आस्‍था की कमी तो मानना ही चाहिए। दुर्भाग्‍य से लगभग सभी राजनीतिक दल और यहां तक की जो छोटे दल है उनका भी ऐसा ही विश्‍वास और नजरिया दिखाई दे रहा है। यह चिंता श्रीमान सोमनाथ जी ने भी सभी सदस्‍यों के सामने प्रकट की है।

मैं एक और बात को आज कहना चाहता हूं, सदन चलने के संबंध में। यहां हम संसद में जो भारत की Soveign Authority है। भारत के शासन की जिम्‍मेदारी लेकर आए हैं। निश्चित रूप से इस Soveign Body का सदस्‍य होने से, बड़ी जिम्‍मेदारी और बड़ा सौभाग्य कुछ भी नहीं हो सकता। क्‍योंकि यह इस देश की विशाल जनसंख्‍या की नियति के लिए जिम्‍मेदारी है यह सदन। हम में से सभी को, अगर हमेशा नहीं तो जीवन में कभी न कभी, जिम्‍मेदारी का यह बड़ा एहसास जरूर हुआ होगा और जिस destiny के लिए हमें बुलाया गया है, उसे हमने महसूस जरूर किया होगा। हम इस योग्‍य है या नहीं वह अलग मामला है। अत: इन पांच वर्षों के दौरान हम अपने इन कार्यों में न केवल इतिहास के किनारे खड़े रहे, बल्कि कभी-कभी हम इतिहास बनाने की प्रक्रिया में भी शामिल हुए हैं। यह बात सांसदों के संबंध में इतनी ऊंची कल्‍पना हमारे प्रथम प्रधानमंत्री आदरणीय पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने 1957 में व्‍यक्‍त की थी, तब हम में से कोई नहीं थे। हम में से कोई नहीं था, उस समय भी यह चिंता, हम में से और हमारे दल में से तो कोई नहीं था, उस समय आपने यह बात कही थी। मैं इसलिए कह रहा हूं क्‍योंकि यह देश को जानना जरूरी है कि इसी लोकसभा में हो-हल्‍ले के बीच आपकी दृढ़ता के कारण आपके उच्‍च मनोबल के कारण कुछ बिल पास हुए, लेकिन वे आगे नहीं पहुंच पाए।

National Water-way bill, हमारे यहां जल शक्ति का कितना सामर्थ्‍य है, कितना उपयोग है, पानी बह रहा है। उसके लिए यह सरकार एक योजना लेकर काम करना चाहती है। इस तरह उसको रोक करके देश का क्‍या भला कर रहे हैं। मैं चाहूंगा कि जब राष्‍ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में इस बात को कहा है। उसी प्रकार से Whistel-blower Protection Amendment Bill, यह वो विषय है जो हम citizen-centric कह सके। हम जागरूक नागरिकों के अधिकारों की बात कह सकें। और इसलिए उसको रोकने के पीछे मुझे कोई तर्क नजर नहीं आता है। GST बिल हम कल से सुन रहे हैं यह तो हमारा है, यह तो हमारा है, यह तो हमारा है। यह भी आप ही का है। GST Bill आप ही का है। और उसको रोका जा रहा है। Consumer Protection bill, यह consumer कौन है? उसे रोका गया है। Insolvency and Bankruptcy Code. हम सोचे राष्‍ट्रपति जी जो संविधान के सबसे बड़े व्‍यक्ति हैं उनकी सलाह हम जरूर मानेंगे।

और जब मैं संसद की बात कर रहा हूं तो मैं सभी आदरणीय सदस्‍यों से भी, मेरे कुछ विचार रखना चाहता हूं। एक पहली बार सदन में आए हुए एक सांसद के विचार हैं, एक प्रधानमंत्री के विचार के रूप में न लिया जाए लेकिन हो सकता है शायद यह चीजें काम आज जाए।

मेरा एक सुझाव है, आपने पांच और छह की तो एक अच्‍छा कार्यक्रम की रचना की है। इस बार आठ मार्च को हमारा सदन चलता होगा। अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस है, उस समय का आठ मार्च का जो एजेंडा है वो ही रहे, लेकिन हम तय कर सकते हैं कि आठ मार्च को सिर्फ हमारी women member ही बोलेंगे। हम हमारी संसदीय गतिविधि (व्यवधान).

उसी प्रकार से, हम बहुत समय, हमारे समय ऐसा था, आपके समय ऐसा है, आप ऐसे हैं, हम वैसे थे। यह हम करते हैं। और देश को यह अब हमारे विषय में पूरा पता है। इसलिए देश को कोई तकलीफ न हो। हम सब कौन, कहां खड़े हुए हैं, क्‍या सोचते हैं यह देश पूरी तरह जानता है। लेकिन क्‍या, मैं सभी वरिष्‍ठ महानुभव से मार्गदर्शन चाहूंगा कि क्‍या हम वर्ष में दो सत्र के समय या एक सत्र तय करेंगे। उस पूरे सत्र के दौरान एक week ऐसा हो कि जिस week में सिर्फ जो first timer MP है, उन्‍हीं को बोलने के लिए निमंत्रित किया जाए। इसलिए नहीं कि मैं first timer हूं, लेकिन हमें एक ताजगी भरी हवा, इस सदन में विचारों की आवश्‍यकता मुझे महसूस हुई होती है। और मुझे भरोसा है, मैं जानता हूं जिस प्रकारसे आपके कार्यक्रम में यह जो नये MP रूचि ले रहे हैं। इससे मुझे लगता है कि उनको अवसर देना चाहिए। वे देश के लिए बहुत सी चीजें नई हमारे सामने रख सकते हैं। उस पर हम कुछ कर सकते हें।

एक तीसरा मेरा सुझाव है कि हमारे यहां United Nation ने अभी Sustainable Development Goals. सारे विश्‍व ने मिल करके तय किया हमारी सुषमा जी ने उसके लिए बहुत अच्‍छा शब्‍द दिया ‘टिकाऊ विकास लक्ष्‍य’। हिन्‍दी में उन्‍होंने उसका अच्‍छा translation किया, sustainable. यह तय होता है सरकारे जाती हैं। क्‍या कभी सदन के सभी लोग Saturday को एक दिन ज्‍यादा बैठे कभी और एक सत्र के दरमियां एक या दो दिवस हम सब मिल करके अंतर्राष्‍ट्रीय जगत में जो Sustainable Development Goals तय हुए उसमें भारत की जो भूमिका है। उसको चरितार्थ करने के लिए क्‍या कर सकते हैं? हम कोई बहस कर सकते हैं? हमारे अपने एजेंडा के काम बहुत है, लेकिन कोई पल हो जिसमें कोई राजनीति हो सिर्फ राष्‍ट्रनीति, सिर्फ मानवतावाद इसको ले करके कुछ कर सकते हैं क्‍या? मैं आशा करूंगा कि इस पर सोचा जाए।

उसी प्रकार से मैं तीन विषयों को, मैं तीन और बातों को आज आपके सामने प्रस्‍तुत करना चाहता हूं। सरकार यह हो या सरकार वो हो लेकिन यह बात माननी पड़ेगी भले शिक्षा यह राज्‍यों का विषय हो लेकिन हमारी प्राथमिक शिक्षा का स्‍तर, यह बहुत ही चिंता का विषय है, पीड़ा का विषय है। अगर हमारे देश की इन बालकों की जिंदगी पर हम ध्‍यान नहीं देंगे तो क्‍या होगा। उसी प्रकार से हम Environment, Global Warming, CoP-21 यह सब करें, जरूर करें, लेकिन पानी। यह हमारे सामने एक बहुत बड़ा सामाजिक जिम्‍मेदारी का का है। उसी प्रकार से एक विषय जिससे हम सब लोग बहुत डरते हैं, डरने के कारण भी हैं। मैं उसकी गहराई में जाना नहीं चाहता। लेकिन न्‍याय में विलंब, न्‍याय न देने के बराबर भी हम बोलते हैं। आज भी हमारे lower courts में इतनी pendency है, क्‍या कभी सदन में बैठ करके हम उसके रास्‍ते क्‍या हो, कैसे उपाय निकाले, इस प्रकार के एक-दो विषय हम तय कर रहे हैं। और छह महीने के पहले तय करें।

हम expert लोगों के पेपर्स मंगवाएं, पेपर circulate करें और बहुत ही qualitative बहस करके उसमें से कोई actionable point कोई हम निकाल सकते हैं क्‍या ? और वो इस सदन की मालिकी होगी, किसी सरकार की नहीं होगी। सरकार को गौरवगान करने के लिए नहीं होना चाहिए। इस सदन में यहां भी बहुत अनुभवी लोग बैठे हैं, बहुत अनुभवी लोग बैठे हैं। और इसलिए ऐसा एक सामूहिक चिंतन हो। और मुझे मालूम है सतपति जी ने पहले एक बहुत अच्‍छा विषय रखा था कि क्यों न एक दिन सदस्‍यों का... मैं उसी बात को आज थोड़ा structured way में प्रस्‍तुत कर रहा हूं। मूल यह विचार मेरे मन में सतपति जी का भाषण सुना तब आया था। और इसलिए मैं चाहूंगा कि हम अगर इन चीजों को कर सके तो शायद होगा। कभी-कभी सदन को रोकने के संबंध में या हो-हल्‍ला करके काम में रूकावटें करने से, एक सार्वजनिक चर्चा होती है, यह होती है कि हम लोग कहेंगे कि देखो सरकार काम नहीं करने देते, वो लोग कहेंगे कि देखो सरकार हमको सुनती नहीं है। किसी को लगता है कि देखो हमने दिखा दी अपनी ताकत। भले हम कम है, लेकिन हम... यह सब चल रहा है।

लेकिन एक और बात है जिस पर ध्‍यान जाने की आवश्‍यकता है। यह सदन क्‍यों नहीं चलने दिया जाता है। इसलिए नहीं कि सरकार के प्रति रोष है। एक inferiority-complex के कारण नहीं चलने दिया जाता है। क्‍योंकि विपक्ष में भी ऐसे होनहार सांसद हैं, ऐसे तेजस्‍वी सांसद है और मैं मानता हूं उनका सुनना, उनके विचार अपने आप में एक बहुत बड़ी asset है। लेकिन अगर सदन चलेगा तो उनको बोलने का अवसर मिलेगा। अगर वो बनेगे, बोलेंगे तो बहुत उनकी जय जयकार होगी, तब हमारा क्‍या होगा। यह चिंता सता रही है। यह inferiority है कि विपक्ष के सामर्थ्‍यवान सांसद न बोल पाए। विपक्ष के सामर्थ्‍यवान सांसदों की प्रतिभा का परिचय देश को न हो। इसलिए यह सरकार को रोकने वाली बात तो अपनी जगह है। लेकिन विपक्ष में कोई ताकतवर बनना नहीं चाहिए। कोई होनहार दिखना नहीं चाहिए। इस inferiority-complex का परिणाम है। इसलिए, अब इस बार सदन चला तो मैंने देखा कितने तेजस्‍वी लोग हैं हमारे पास, कितने शानदार विचार रखते हैं ये। पिछले दो सदन में उनका कोई लाभ ही नहीं मिला। और इसलिए मैं समझता हूं कि बहुत आवश्‍यक है और मैं देख रहा हूं बहुत study करके आते हैं। हमारे विपक्ष के भी छोटे-छोटे दल के सदस्‍य चार मेम्‍बर होंगे, तीन मेम्‍बर होंगे और कुछ लोग मनोरंजन भी करवाते हैं।

मेरे मन में, जब मैं कुछ पढ़ता रहता हूं तो कुछ बातें अच्‍छी लगती है। हम लोगों को किसी का मजाक नहीं उड़ानी चाहिए। ‘Make in India’ की मजाक उड़ा रहे हैं हम। न न ‘Make in India’ की मजाक उड़ा रहे हैं। यह ‘Make in India’ देश के लिए है। हां, सफल नहीं हुआ तो सफल होने के लिए क्‍या करना चाहिए, सफल होने में क्‍या कमियां है उसकी चर्चा होनी चाहिए। लेकिन मैं एक बात कहना चाहता हूं और मुझे लगता है जाने ऐसा क्‍यों है कि हम लोग अपे देश के image ऐसे बनाते हैं जैसे हम भीख का कटोरा ले करके निकले हो। और जब हम खुद ऐसा कहते हैं, तो दूसरे लोग यही बात और ज्‍यादा चीख करके कहते हैं और ज्‍यादा मजबूती से कहते है। यह मैं नहीं कह रहा हूं श्रीमती इंदिरा गांधी कह रहीं हैं। यह 1974 में इंद्रपस्‍थ कॉलेज में, आप ने, इंदिरा जी ने यह भाषण किया था। और इसलिए यह भी बात है कि हम कोई भी नई योजना लाए, नये तरीके से लाए तो कुछ लोगों को, उम्र तो बढ़ती है लेकिन समझ नहीं बढ़ती है तो समझने में बड़ी देर लगती है। कुछ लोगों का ऐसा रहता है। और इसलिए चीजें समझने में बड़ा समय जाता है। कुछ लोग तो समय बीतने के बाद भी चीजें समझ नहीं पाते हैं। और इसलिए अच्‍छा लगता है कि विरोध करें, तो वो अपना विरोध करने का तरीका ढूंढते रहते हैं। और इसलिए मैं एक पीड़ा कहना चाहता हूं। हमारे देश में बहुत सी दिक्‍कते हैं, ज्‍यादातर ऐसी हैं जो बहुत पुरानी है। गरीबी, पिछड़ापन, अंधविश्‍वास, कुछ गलत परंपराएं। कुछ समस्‍याएं विकास और तरक्‍की के साथ भी आई है, लेकिन इस देश की सबसे बड़ी चुनौती है तेजी से हो रहे बदलाव का विरोध। यह विरोध पढ़े-लिखे तबका भी बहुत मुखर तरीके से करता है। जैसे ही कोई खास काम आगे बढ़ता है सौ कारण बताए जाने लगते हैं कि यह काम क्‍यों नहीं करना चाहिए। मुझे लगता है कि एक मजबूत और ऊंची दीवार ने हम सबको चारों तरफ से घेर के रखा है। कितनी सटीक बात है, यह 1968 में इंदिरा गांधी ने कही थी।

यहां पर कोई भी बात आई तो यह कहा जाता है कि यह तो हमारे समय का है। यह तो हमारी देन है। कुछ बातें ऐसी हैं, जो आप ही की तो देन है। अब हमने एक अभियान चलाया। स्‍कूलों में टॉयलेट बनाने का। अब आपकी बात सही है कि मोदी जी अगर हमने हमारे कार्यकाल में सभी स्‍कूलों में टॉयलेट बना दिये होते तो तुम क्‍या करते? यह तो हमने नहीं बनाए, इसलिए तुमने चार लाख बनाए। यह आप ही की तो देन है।

बांग्‍लादेश की सीमा का विवाद, इतने दशकों के बाद बांग्‍लादेश सीमा का विवाद सुलझा। आप कह सकते है कि देखो हमने अगर हमारे कार्यकाल में कर दिया होता तो मोदी तुम्‍हारा achievement कहां होता। यह तो तुम्‍हारे लिए हम छोड़ करके गए थे, यह तो आप ही तो देन है। 18 हजार गांव, आजादी के इतने सालों बाद अंधेरे में डूबे हुए हो और अगर हम उन गांवों में बिजली पहुंचाएं, तो आप गर्व से कह सकते हो कि मोदी जी यह 18 हजार हमारी ही तो देन है, तभी तो आप कर रहे हो। और इसलिए यह आप ही की देन है। इसका मैं कोई इनकार नहीं कर सकता। 60 साल के यह आपके ही कारोबार का परिणाम है। इसका कोई इनकार नहीं कर सकता। और इसलिए कभी-कभी बड़े गर्व के साथ मनरेगा की चर्चा होती है। मैं जरा कहना चाहता हूं कि इसका इतिहास 50 साल पुराना है। लेकिन उसके पहले भी राजे-रजवाड़ों के जमाने में भी ऐसी कुछ बातें चलती थी। आप देखिए 1972 महाराष्‍ट्र की रोजगार गारंटी योजना, 1972 में आई। 1980 में National Rural Employment Programme (NREP) यह 1980 में उसका recarnation हुआ। 1983 में Rural Landless Employment Guarantee Programme (RLEGP) ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम आया। यह सब recarnation होते गए। योजनाओं का पुनर्जन्‍म होता गया।

उसके बाद 1989 में जवाहर रोजगार योजना (JRY) यह मनरेगा का पिछले जन्‍म का नाम है। लेकिन मैं हैरान हूं बाद में जवाहर लाल जी का नाम निकाल दिया गया। और किसी और ने नहीं निकाला, उसी दल ने निकाला जो हमें कोसते रहते हैं। उसके बाद 1993 में, Employment Insurance Scheme (EIS) सुनिश्चित रोजगार योजना यह आया। उसके बाद भाजपा जी की सरकार आई। तो उस समय इन सभी योजनाओं में से जो भी अच्‍छा था ले ले करके संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (SGRY) यह शुरू हुआ। 2004 में फिर उसमें reincarnation हुआ। National Food for Work programme, ‘काम के बदले अनाज’ का राष्‍ट्रीय कार्यक्रम आया। उसके बाद इसने नया रूप 2006 में लिया मनरेगा। पहले नरेगा और फिर एक नया ज्ञान हुआ तो वो मनरेगा हुआ। तो यह गरीबों की भलाई केलिए कुछ न कुछ लगातार योजनाएं चलती गई। यह बात सही है कि आप बड़े सीना तान करके कह सकते हैं कि मोदी जी चुनाव में भाषण करना अलग चीज है। तुम कहते हो गरीबी हटाओगे लेकिन तुम्‍हें मालूम नहीं हम कौन है। अरे हमने गरीबी की जड़े इतनी जमा दी है, इतनी जमा दी है, मोदी तुम उखड़ जाओगे, लेकिन इसे उखाड़ नहीं पाओगे।

यह बात सही है कि मुझे यहां आने के बाद पता चला कि इतनी जड़े जमाई है आपने। और इसलिए मैंने पछिली बार भी कहा था, इस बात का कोई इनकार नहीं करेगा कि इस देश के 60 साल के कार्यकाल में अगर हम गरीबों का भला कर पाएं होते, तो आज मेरे देश के गरीबों को मिट्टी उठाने के लिए, गड्ढ़ा खोदने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। यह हमारा सफलता का स्‍मारक नहीं है। यह हम सबको स्‍वीकार करना होगा। और इसलिए यह हमारा दायित्‍व भी बनता है कि यह जो क्रमिक विकास चला है इस योजना का उसको और अच्‍छी बनाए और उस जिम्‍मेदारी को निभाने का हम प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यह बात स्‍वीकार करनी होगी कि हम उस हालत पर देश को लाएं हैं कि skilled labour को भी unskilled होने में मजा आने लगा है। और इसलिए मैं जब कहता हूं कि हमारी विफलताओं का स्‍मारक है, इसका मतलब यही है कि गरीबी न होती तो इस नरेगा या मनरेगा की जरूरत नहीं होती। लेकिन यह सच्‍चाई है और मैंने आ करके देखा कि ऐसी गरीबी की जड़ों को जमा दिया गया है कि उसको उखाड़ फेंकने के लिए मुझे भारी मेहनत करनी पड़ रही है और उसके लिए हम अभी जो फिलहाल योजना चली है, उसमें जो कमियां है, उन कमियों को कैसे दूर करना उसकी दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं।

मैं आज आदरणीय खड़गे जी ने कहा था कि मनरेगा में भ्रष्‍टाचार बहुत है। मैं आपके साथ Thousand Percent सहमत हूं। मुझे इसका कोई विरोध नहीं हूं। आप 2012 की CAG की रिपोर्ट को देख लीजिए। क्‍या observation किए हैं कैसे भ्रष्‍टाचार ने इसके साथ जड़ें जमा दी है। कैसे गरीबों के नाम पर रुपये लुटे जो रहे हैं। इसकी उसमें चर्चा है, 2012 की CAG रिपोर्ट में चर्चा है। और इसलिए हमने उसमें से कुछ सीखने का प्रयास ‍किया है। और हम बहुत कुछ सीखना चाहते हैं और सीखने का प्रयास करके उसमें जो चीजें थी उसमें से बाहर निकाल करके full prove कैसे बने, जरूरतमंदों को कैसे मिले, उस पर काम करेंगे। CAG ने एक बहुत बड़ा observation किया है और वो चौंकाने वाला है।

हमारे देश में जिन राज्यों को हम गरीबों की श्रेणी में गिनते हैं। जहां गरीबों की संख्या ज्यादा है। CAG ने लिखा है कि जहां गरीबों की संख्या कम है और कुल मिलाकर के शासन-व्यवस्था सुचारु रूप से चली है, ऐसे राज्यों में नरेगा का, मनरेगा का maximum उपयोग हुआ है। लेकिन जहां सचमुच में गरीबी है, जहां सबसे ज्यादा जरुरत है, वहां इसके कम से उपयोग हुआ है। मतलब ये गरीबों को target करके पहुंचाने में हम उतने सफल नहीं हुए हैं और इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि हम इसको और अधिक perfect कैसे बनाएं ताकि जिन राज्यों में गरीबों की संख्या की मात्रा ज्यादा है, जिन राज्यों की गरीबी ज्यादा है, ये उस तरफ कैसे जाए। समृद्ध राज्यों की क्षमता है इन सारी चीजों को व्यवस्था में करें, हमने उस दिशा में कोशिश करी कि ऐसे राज्यों को ये कैसे पहुंचे। हमने JAM योजना के साथ जनधान, आधार और मोबाइल, ये पैसे direct beneficiary को पाएं, उस दिशा में बड़ा अभियान चलाया है तो उसके कारण बिचौलियों की संख्या नष्ट करने में शायद हमें सफलता मिलेगी।

और इसलिए मैं समझता हूं कि ये जिस मनरेगा की हम इतनी बड़ी तारीफ करते हैं। CAG ने कहा है कि 7 साल के बाद भी 5 राज्य ऐसे थे जिन्होने rules भी नहीं बनाए और दुख इस बात का है, उन 5 राज्यों में 4 वो थे, जो इस मनरेगा के गीत गाते हैं कि जिन्होंने 7 साल के बाद भी rules नहीं बनाए थे और इसलिए even Union Territories उसमें भी ये कठिनाई ध्यान में आई है। उसी प्रकार से 8 ऱाज्यों में, 100 दिन का हमारा लक्ष्य, हम कभी भी पूरा नहीं कर पाए हैं। Average 30 दिन, 40 दिन से गाड़ी अटक जाती है। हमने जिस प्रकार से उसका नया structure बनाने का प्रयास किया है उसमें targeted हो, अधिकतम रोजगार मिले, अधिकतम दिवस तक रोजगार मिले, बिचोलिए समाप्त हो, पाई-पाई का सही उपयोग हो और उसकी audit की व्यवस्था हो इस दिशा में हमने भरपूर प्रयास किया है। और इसलिए मुझे विश्वास है औज श्रमिकों के बैंक/डाकघर खातों में सीधे अंतरण के electronic तरीके से, ये पैसे जाते हैं। 94 percent श्रमिकों को इसी माध्यम से भुगतान करने की दिशा में हम आगे बढ़े हैं।

दूसरी तरफ कभी न कभी ये सदन सिर्फ इस ईर्ष्या भाव से काम करने के लिए नहीं है कि मेरे से तेरी shirt ज्यादा सफेद क्यों है, ये ईर्ष्या भाव के लिए नहीं है। मैं मानता हूं जो आलोचना हो रही है हमारी। माननीय अध्यक्षा जी, आलोचना इस बात के लिए नहीं हो रही है कि हमने कुछ गलत किया है, चिंता इस बात की है तुम हमसे अच्छा क्यों कर रहे हो, कैसे कर रहे हो, ये चिंता का विषय सता रहा है और इसलिए परेशानी हो रही है। जो 60 साल में नहीं कर पाए वो आप कैसे कर लेते हो, ये चिंता का विषय है और योजनाएं कैसी होती हैं, लंबे अर्से तक कैसा लाभ करती हैं।

इस देश के intellectual class को भी मैं निमंत्रित करता हूं कि दो योजनाओं का एक comparative study करने की जरूरत है, एक अटल जी के समय शुरू हुई प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना औऱ दूसरी हमारी मनरेगा। आप analysis देखोगे, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का उन राज्यों को सबसे ज्यादा लाभ मिला है, जो कुल मिलाकर के गरीबी की श्रेणी में आते हैं। road बनता है तो रोजगार भी आता है, road बनता है तो सुविधा भी आती है और उसके कारण education में, health में , wealth में भी एक बदलाव आया है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में भी सरकार के पैसे गए, मनरेगा में भी गए लेकिन asset creation हुआ और इसलिए उसमें से सीखकर के हम मनरेगा को भी asset creation पर बल दे रहे हैं। उसमें भी पानी पर हम सबसे ज्यादा बल दे रहे हैं और उसका परिणाम मिलेगा। ऐसा मैं मानता हूं और हम कोशिश कर रहे हैं।

हमारे मल्लिकार्जुन जी ने Food security bill को लेकर के, act को लेकर के और मैंने देखा है गुजरात की बात आ जाए तो बड़ा ही मजा आ जाता है, बड़ा आनंद आ जाता है और फिर कहने को कुछ होता नही है तो घूम-फिरकर के, तो ये आपकी bankruptcy है, मैं जानता हूं कि आपके पास और कुछ नहीं है लेकिन मैं बताना चाहता हूं जी, जिस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के आप इतने गीत गाते हैं और हमें बार-बार सुनाते हैं कि हम लाए, हम लाए, हम लाए। हम 2014, मई में आए। अध्यक्ष महोदया जी, मई, 2014 तक सिर्फ 11 राज्यों ने हड़बड़ी में, उसमें जो अपेक्षाएं थी, ऐसी किसी व्यवस्था को पूर्ण किए बिना कागज पर लिख दिया था कि स्वीकार कर रहे हैं। जिस बात को लेकर के हम इतनी बातें करते हैं, उसकी ये दुर्दशा थी। इतना ही नहीं, आज जो मैं अभी खड़ा हुआ हूं न तब कि मैं बात बताना चाहता हूं। आज भी चार राज्य ऐसे हैं, कुल आठ। चार राज्य ऐसे हैं जिसमें आज भी ये Food security act का नामोनिशान नहीं है और उसमें आपके द्वारा शासित राज्य हैं केरल, मिजोरम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और इसलिए गुजरात ने अब कर लिया औऱ उन्होंने, उन्होने जिन बारीकियों को पूरा किया है। जरा study करने जाना चाहिए, आपकी एक पूरी टीम भेजिए।

आप केरल में चुनाव में जा रहे हो। आप जिस ताम-झाम से बातें कर रहे हो, केरल की जनता आपसे जवाब मांगेगी कि आपने जिस act को लेकर के इतनी बड़ी बातें की, केरल उस act से वंचित क्यों रखा है, अरुणाचल प्रदेश क्यों रखा था, मिजोरम क्यों रखा था, मणिपुर क्यों रखा था। आठ राज्य बाकी उसमें से चार राज्य आपके हैं और इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि हम कहते बहुत हैं लेकिन कभी-कभार। कभी-कभी आप सभी महानुभाव, जब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की बात आई थी तो वेंकैया जी जब बोल रहे थे तो हमारे सौगत राय जी खड़े हो गए थे। वैसे वो फटाफट खड़े हो जाते हैं और जब वो खड़े हो जाते हैं तो उनके दल वाले भी देखते हैं कि पता नहीं क्या करेंगे।

सौगत राय जी ने कहा कि भई ये किसान फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ये तो सिर्फ 45 district के लिए है तो एक जानकारी के लिए कहना चाहता हूं सौगत राय ये 1 अप्रैल से देश के सभी गांव, सभी किसानों के लिए लागू होगा। इस योजना की एक और beauty है। जिसकी तरफ मैं आपका औऱ जो 45 जिलों में pilot project के रूप में हमने ली है। अब ये pilot project के रूप में इसलिए हैं क्योंकि इसमें सफलता मिले या न मिले, लोगों को पसंद आए या न आए, पचासों विषय होते हैं। हमने ये कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के साथ कोई दो और चीजें insurance में आप जोड़ सकते हैं क्या? और उसके लिए हमने किसानों को 7 alternate इन 45 जिलों में एक प्रायोगिक रूप में देने का तय किया है।

एक प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना, जीवन ज्योति बीमा योजना, दूसरी प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, तीसरी छात्र सुरक्षा योजना, चौथी घर अग्नि दुर्घटना बीमा योजना, पांचवी कृषि संयंत्र पंप सेट बीमा योजना, छठवीं ट्रैक्टर बीमा योजना और सातवीं मोटर बाईक बीमा योजना। ये किसान के साथ जुड़ी हुई 7 चीजें हैं। अगर वो फसल बीमा के साथ क्या उसको suit करता है इसमें से कोई दो चीज लेना तो कम premium में उसको एक अतिरिक्त benefit मिल जाए तो उसके पंप खराब हो जाते हैं इसलिए प्रायोगिक रूप से Insurance company को थोड़ी दिक्कत हो रही है लेकिन मैंने बड़ा आग्रह किया है। एक प्रयोग है, मैं सांसदों से भी आग्रह करुंगा कि इस पर वो तराशे, ठीक लगे तो आगे बढ़ाएंगे नहीं लगेगा तो छोड़ देंगे। लेकिन ये उस दर्श में था 45 district वाला trial वो प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से वो नहीं था।

कभी-कभी कहा जाता है कि ये तो भई हमारा था। मैं कैसे कह सकता हूं, रेल मैंने शुरु की, आप कह सकते हैं, आप तो कुछ भी कह सकते हैं, हम में वो हिम्मत नहीं है और इसलिए यूपीए के 10 साल। रेलवे, सुरेश जी यूं, औसत सालाना खर्च रेलवे के development के लिए 9291 करोड़ रुपए। हमारे इस दो साल में 32587 crore rupees. प्रतिवर्ष औसत लाइनों का commissioning है। हमने लाइनें कितनी बिछाई हैं, यूपीए-1 average है 1477 kilometre, यूपीए-2, थोड़ा सुधार हुआ 1520 kilometre। NDA, 2292... round aboout 2300, काम कैसे होता है, गति कैसे लाई जा सकती है, एक perform करने वाली सरकार कैसी होती है। संसाधन यही थे, रेलवे की पटरियां वही थीं, department वही थे, मुलाजिम वही थे, कानून-व्यवस्थाएं वही थी, ये जीता-जागता उदाहरण है और मैं हर क्षेत्र में ये दिखा सकता हूं लेकिन राष्ट्रपति जी के भाषण के संदर्भ में और अधिक न कहते हुए मैंने ये कहा है।

आदरणीय अध्यक्षा महोदया, एक बात हमेशा ही चर्चा में रहती है Finance के संबंध में, वो ये रहती है कि राज्यों को पैसा कम कर दिया, डिगना किया, फलां किया। एक ऐसी पवित्र जगह कि मुझे देश के सामने ये चीजें रखना जरुरी लगता है। 14वें वित्त आयोग की अनुशंसा के बाद 2015-16 से राज्यों को 2014-15 की तुलना में केंद्र से अधिक वित्तीय संसाधन दिए जा रहे हैं। राज्यों को वित्तीय संसाधन 3 मुख्य heading के अंतर्गत दिए जाते हैं। केंद्रीय करों में राज्य सरकार का हिस्सा, Non plan grants एवं राज्यों के plan के लिए केंद्र की सहायता। केंद्र से राज्य सरकारों को वर्ष 2014-15 में कुल 6,78,819 crore रुपए की राशि दी गई थी। Revised Estimates 2015-16 के अनुसार राज्यों को 8,20,133 crore रुपए की राशि दी गई। 2015-16 की राशि, 2014-15 की राशि से 1 लाख 41 हजार 314 करोड़ रुपए, 1,41,314 crore रुपए ज्यादा है। इन तीनों heading के अंतर्गत मिल रही राशि पिछले वर्ष की तुलना में 20.8 percent ज्यादा है। और इसलिए ये जो बिना कारण हकीकतों को न कहते हुए, मिथ्याकारक चीजें चलने की जो कोशिशें हो रही हैं, मैं समझता हूं कि उसको जरा समझने की आवश्यकता है।

उसी प्रकार से, हमारा देश लोकतंत्र से विश्वास करने वाला देश रहा है, लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध देश रहा है लेकिन हम जानते हैं इस देश में, सार्वजनिक जीवन में हम सब लोग answerable हैं। कोई भी व्यक्ति हमें सवाल पूछ सकता है, पूछने का उसका हक है लेकिन कुछ है जो जवाबदेह नहीं है, न ही कोई उनको पूछने की हिम्मत करता है, न ही उनको कहने की किसी को ताकत है। और जो करने जाते हैं उनका क्या हाल होता है, वो मैं देख चुका हूं। लेकिन मैं घटना का सिर्फ जिक्र करना चाहता हूं, अर्थ आप लोग लगाइए। Russia के राष्ट्र प्रमुख श्रीमान Khrushchev, जब स्टालिन की मृत्यु हो गई, वो उनके साथी थे तो स्टालिन की मृत्यु के बाद ये जहां जाते थे Khrushchev, स्टालिन की बड़ी आलोचना करते थे, बहुत ही कठोर शब्दों में निंदा करते थे, कुछ भी कहते थे और ये वो हर जगह पर करते थे तो एक बार एक सभागृह में Khrushchev अपनी बात बता रहे थे और स्टालिन को उन्होंने जमकर, अपने पूर्व के नेता को, उनकी मृत्यु के बाद बहुत कोसा।

एक नौजवान खड़ो हो गया, पीछे से, उसने कहा Mr. Khrushchev मैं आपसे सवाल करना चाहता हूं, बोले आप स्टालिन को इतनी गालियां दे रहे हो, इतना बदनाम कर रहे हो। जब वो जिंदा थे, आप उनके साथ काम करते थे तब आपने क्या किया, ये जो हालात पैदा हुई आपने क्या किया। सारे सभागृह में सन्नाटा छा गया। जब सभागृह में सन्नाटा छा गया और कुछ पल के बाद Khrushchev ने कहा जिसने सवाल किया वो जरा खड़ा हो जाए, वो खड़े हो गए, उन्होंने कहा तुम्हें जवाब मिल गया। तुम जो आज कर पा रहे हो, स्टालिन की जमाने में मैं चाहता था लेकिन नहीं कर पाता था और इसलिए इसको समझने में देर लगेगी लेकिन इसमें कोई बादाम काम नहीं आएगी, आपको तो शायद थोड़ा समझ आ जाएगा औरों के लिए मैं नहीं कह सकता।

हमारे यहां कभी-कभी शास्त्रों में, लोकोक्तियों में कई बातें बड़ी अच्छी कही जाती हैं और उसमें ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे’। दूसरों को उपदेश देने की कुशलता देने वाले तो बहुत सारे लोग हैं परंतु जो खुद वैसा आचरण करे वैसे लोगों की संख्या बहुत कम है। मैं लगातार आप सब की तरह उपदेश सुनता रहा हूं, सलाह सुनता रहा हूं, आलोचना झेलता रहा हूं, आलोचना से ज्यादा आरोप सह रहा हूं, ये सब चल रहा है और मुझे क्या हुआ है कि 14 साल के काम, काफी कुछ मैं इससे जीना सीख चुका हूं, इससे जीना सीख चुका हूं लेकिन ये देश उस बात को कभी नहीं भुला सकता है। अध्यक्ष महोदया, 27 सितंबर, 2013 हमारे देश के सम्मानीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अमेरीका में थे, अमेरिका के राष्ट्रपति के साथ उनका bilateral talk होना था, देश के सम्मानीय नेता थे। हिंदुस्तान की कैबिनेट, जिसमें फारुख अबदुल्ला साहब बैठते थे, एंटनी साहब बैठते थे, शरद पवार साहब बैठते थे, इस देश के गणमान्य अनुभवी नेता बैठते थे।

उस कैबिनेट में ने जो निर्णय किया। उस निर्णय को 27 सितंबर, 2013 पत्रकार परिषद में फाड़ दिया गया था, ordinance को फाड़ दिया गया था। अपनों से बड़ों का मान-सम्मान, आदर मैं बहुत... आदरणीय अध्यक्ष महोदया मुलायम सिंह जी और हम दो छोर पर खड़े नेता हैं, मेरी एक बात को वो नहीं स्वीकार सकते हैं, मैं उनकी एक बात को नहीं स्वीकार सकता except लोहिया जी के विचार को। क्योंकि मैं ऐसी जगह पर पैदा हुआ हूं, मुझे लोहिया जी पसंद आना बहुत स्वाभाविक थे लेकिन मुलायम सिंह जी ने जनता को वादे करते हुए अपना एक पर्चा निकाला हुआ था कि हम उत्तर प्रदेश के लिए ये करेंगे, ये करेंगे। मुलायम सिंह जी हमें पसंद हो या न हो लेकिन बहुत बड़े वरिष्ठ नेता हैं, सार्वजनिक सभा में मुलायम सिंह जी के वादों को फाड़ दिया गया है और फिर मुझे बार-बार यादा आता है ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे।

आदरणीय अध्यक्षा महोदया जी, देश, लोकतंत्र में आगे बढ़ने के लिए जितना हमारे सामने एक आवश्यकता मुझे लगती है। मैं अभी जो बात करने जा रहा हूं वो शायद, हम सबको पसंद आएगी। मैं छोटा था, तो मैं जिस गांव में बढ़ा हुआ। हमारे यहां एक MLA थे, वो कभी हारते ही नहीं थे, हमेशा जीतते थे लेकिन वो जाते थे ट्रेन में, हम भी कोशिश करते थे उनके चाय पिलाएं वरना कोई मुसीबात आ जाए रेलवे में तो हम उनको संभालते थे। तो हम देख रहे थे कि हमारे देश में उनसे कभी मैंने एक बार शब्द सुना elective. अब हमें elective क्या है, समझ नहीं था लेकिन जब आगे दिन बीतते गुए तो पता चला elective वो था। मैं देख रहा था कोई elective आ गया है तो पूरी government machinery कांप जाती थी, नीचे से ऊपर तक अफसर परेशान रहते थे क्योंकि assembly या संसद में सवाल आ गया, एक घबराहट का माहौल था। सदन में भी कभी किसी subject की debate होती थी तो अफसरों को चिंता रहती थी, पता नहीं क्या होगा। हमारे लोकतंत्र में संसदीय कार्यवाही को हम कहां ले गए। ये आज न हमारे सांसदों के सवालों से, प्रशासन के किसी भी अफसर को पसीना आता हो, चिंता नही होती हो। हमने हमारी इस कार्यवाही को कहां ले गए कि हमारे अफसरों को कोई डर नहीं रहा है। ये सवाल इस सरकार का, उस सरकार का नहीं है। कालक्रम से ये deterioration हुआ है।

जब संसद के अंदर भले ही प्रतिपक्ष का एक ही अकेला सांसद क्यों न हो, उसके दल का औऱ कोई भी सदस्य न हो लेकिन सरकारी मुलाजिमों के लिए government machinery के लिए वो प्रधानमंत्री से कम नहीं हो सकता है। लेकिन आज मैं चाहता हूं हम लोग तय करें। तु-तु, मैं-मैं हम करेंगे, आप मुझे कोसोगे, मैं आपको कोसूंगा और अफसर ताली बजाते हैं, मजा लेते हैं। ये लंबे अर्से की बीमारी आई है। इस सदन में विपक्ष का शब्द की उनके लिए महत्वपूर्ण है, ये जनप्रतिनिधि है, ये देश के लोग हैं। ये स्थिति लानी है तो, ये तु-तु, मैं-मैं करके जो हम Scoring करते हैं, मीडिया में छा जाते हैं। हमको लगता है इन्होंने बहुत कुछ कर लिया लेकिन अफसरशाही की accountability खत्म होती जा रही है। लोकतंत्र में हम लोग तो हर पांच साल में जनता को हिसाब देंगे। आएंगे, नहीं आएंगे चलता रहेगा लेकिन उनका हिसाब लेने के लिए यही एक जगह है। और इसलिए हमारी संसदीय कार्यप्रणाली में, हम सभी को, सभी सदस्यों को एक क्यों न हो, वो प्रधानमं से कम नहीं है और इसलिए ये आवश्यक है कि हमारी executive की accountability कैसे बढ़ाएं। ये जब तक हम मिलकर के नहीं करेंगे, ये accountability संभव नहीं होगी और तब एक सरकार को गालियां पड़ेंगी, दुसरी सरकार आएगी, उनकी मजा लेना बंद नहीं होगा।

हमारे सामने ये चुनौती है, मैं मानता हूं और इस चुनौती को हमने पूरा करने की दिशा में एक सामूहिक प्रयास करने पड़ेगा। इसमें आपको भी ये भुगतना पड़ा है, मैं तो लंबे समय तक इस काम को करके आया हूं क्योंकि मुझे मालूम है। मैं किसी को दोष नहीं देता हूं लेकिन ये हम अखबार में क्या छिपेगा उसकी चिंता मे तु-तु, मैं-मैं में लगे रहते हैं। उसके कारण लाखों मुलाजिम हैं, लाखों मुलाजिम। अरबों-खरबों रुपया का तनख्वाह जा रहा है, योजनाओं की कमी नहीं है। न आपके समय कमी थी, न मेरे समय कमी है। सवाल ये है कि हम वो accountability को कैसे लाए।

इस सदन ने, एक और बात है भारत जैसे लोकतंत्र में हम देश के नागरिकों को अफसरशाही के भरोसे नहीं छोड़ सकते। हमें हमारे सवा सौ करोड़ देशवासियों पर भरोसा करना होगा, उस पर हमने विश्वास करना होगा और एक बार हम सवा सौ करोड़ देशवासियों पर विश्वास करके चलेंगे, मुझे विश्वास है ये देश का नागरिक, हमसे कोई बहुत नहीं मांग रहा है, वो हमारे लिए साथ चलने के लिए तैयार है। हमने उस दिशा में कुछ प्रयास किए, वो बहुत बड़े हैं ऐसा मेरा दावा नहीं है लेकिन उस दिशा में जाना है।

हमने छोटे मुलाजिमों के लिए interview क्यों बंद किया है इसलिए की हमें उस नागरिक पर भरोसा करना सीखना है, हमने नागरिकों को बेचारों को Xerox के जमाने में भी gazetted officer के पास signature के लिए जाना। कभी MP, MLA के घर के पास कतार लगाकर के खड़ा रहना पड़ता था और MP, MLA उसका चेहरा भी नहीं देखता था, एक छोटा सा लड़का होता था ठप्पे मार-मारकर के दे दे रहा था। हमारे उस 10वीं, 12वीं पास बच्चे पर तो भरोसा था लेकिन उस नागरिक पर हमारा भरोसा नहीं था, हमने उसको नष्ट कर दिया क्योंकि नागरिक पर भरोसा होना चाहिए, जब final job लेगा आएगा, अपने दिखाएगा। अभी हमने बजट में बहुत बड़ी अहम बात रखी है कि दो करोड़ रुपए तक हम कुछ नहीं पूछेंगे आप जो चाहो दे दो हम ले लेंगें। विश्वास बढ़ाने का माहौला बढ़ाना है, ऐसे कोई नए सुझाव हैं तो आप जरूर दीजिए।

मैं चाहूंगा कि सरकार आदत डाले, ये सरकार को भी सुधरना चाहिए, इस सरकार में भी सुधार आने चाहिए और आपकी मदद के बिना नहीं आएंगे जी, आपकी मदद चाहिए मुझे, आप लोगों का साथ चाहिए, आपके अनुभव का मुझे लाभ चाहिए। मैं नया हूं, आप अनुभवी लोग हैं, आइए कंधे से कंधा मिलाकर के हम चलें और कुछ अच्छा काम कर करके देश के लिए देकर के जाएं। सरकार आएंगी-जाएंगी, लोग आएंगे-जाएंगे, बिगड़ती-बनती बात चलेगी, ये देश अजर-अमर है, ये देश रहने वाला है और इस देश की पूर्ति के लिए हम काम करें। इसी एक अपेक्षा के साथ फिर एक बार राष्ट्रपति जी को आदरपूर्वक मैं अभिनंदन करता हूं, उनका धन्यवाद करता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches