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Sunday, 24 April 2016

India's strength lies in the villages: PM Narendra Modi

विशाल संख्या में पधारे हुए झारखण्ड के मेरे भाईयों और बहनों और देश भर की पंचायतों से आये हुए सभी पंचायतों के प्रतिनिधि और आज technology के माध्यम से देश भर की लाखों पंचायतों में बैठ कर के इस कार्यक्रम में भागीदार हुए उन सभी ग्रामवासियों को आज पंचायत राज दिवस पर मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

सामान्‍य रूप से पंचायत राज दिवस दिल्‍ली में विज्ञान भवन में हुआ करता था। कुछ प्रतिनिधि आते थे मान-सम्‍मान यही परंपरा चलती थी। हमने आ करके एक प्रयास किया कि देश बहुत बड़ा है। दिल्‍ली ही देश है, इस भ्रम में से बाहर आना चाहिए। और इसलिए हमारी कोशिश रही है कि भारत सरकार को दिल्‍ली से बाहर निकाल करके हिंदुस्‍तान के अलग-अलग इलाकों में ले जाया करे। और इसलिए भारत से कई कार्यक्रम, अब हम दिल्‍ली के बाहर जनता जनारदन के बीच में ले जाने का एक निरंतर प्रयास करते हैं।

जब देश के किसानों के लिए soil health card का प्रारंभ करना था, तो हमने राजस्‍थान चुना था, जहां पर पानी की किल्‍लत रहती है, जहां किसान को बहुत सारा झूझना पड़ता है। जब हमने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान प्रारंभ किया, तो हमने हरियाणा की धरती से किया था। क्‍यों‍ हरियाणा देश में बालकों की तुलना में कम से कम बालिकाओं वाला राज्‍य था। एक बहुत बड़ी चिंता का विषय था और उस एक कार्यक्रम का परिणाम यह आया कि हरियाणा ने साल भर के भीतर-भीतर gender ratio में अमूलचून परिवर्तन कर दिया। बालक और बालिकाओं की संख्‍या बराबर करने की दिशा में वो तेज गति से सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहे हैं। हमें जब सामान्‍य मानव को सुरक्षा देने वाली जीवन योजनाओं का एक नया संस्‍करण सामान्‍य नागरिकों के लिए लाना था। जिन राज्‍यों में अधिकतम गरीबी है उनमें से एक पश्चिम बंगाल में हमने उस कार्यक्रम का आरंभ किया था। और आज मुझे खुशी है कि ‘ग्राम उदय से भारतोदय’, पंयायत राज व्‍यवस्‍था गांवों में बसने वाले हिंदुस्‍तान की ओर भारत सरकार का और भारत का प्रतिबद्धता, commitment इस अवसर को झारखंड की भगवान बिरसा मुंडा की धरती को हमने पसंद किया है। और आज इस धरती से देश के गांववासियों से बातचीत करने का मुझे सौभाग्‍य मिला है।

महात्‍मा गांधी कहा करते थे कि भारत गांवों में बसा हुआ है, लेकिन हम देख रहे हैं कि आजादी के इतने सालों के बाद, गांव और शहर के बीच खाई बढ़ती ही चली गई। जो सुविधाएं शहर में हैं क्‍या गांव उसका हकदार नहीं है क्‍या? अगर बिजली शहर को मिलती है तो बिजली गांव के घर तक जानी चाहिए कि नहीं जानी चाहिए? अगर शहर में बढि़या सड़क है तो गांव के लोगों को भी आने-जाने में काम आ जाए ऐसी तो सड़क मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए? और इन बातों को ले करके अब की बार का आपने बजट देखा होगा, पूरे देशभर में वाह-वाही हो रही है कि आजादी के कई वर्षों के बाद पहली बार गांवों का आदमी जी-जान से कह सके कि यह मेरा बजट है, मेरे लिए बजट है, गांव के लिए बजट है, किसान के लिए बजट है। ऐसा विश्‍वास इस बजट से प्रस्‍तावित हुआ है।

भाईयों-बहनों 14 अप्रैल से 24 अप्रैल यह पंचायत राज दिवस तक ‘ग्राम उदय से भारतोदय’ देश के लाखों गांवों में 10 दिन का एक बड़ा अभियान चलाया गया। 14 अप्रैल को इस अभियान का प्रांरभ मैंने भारत के संविधान निर्माता श्रीमान बा‍बा साहब की जन्‍म स्‍थली मध्‍यप्रदेश के मऊ से किया था। लाखों की तादाद में मध्‍यप्रदेश के नागरिक उसमें सम्मिलित हुए थे। और 14 अप्रैल से आरंभ हुआ यह अभियान पूरे देश में अलग-अलग विषयों पर फोकस करता हुआ, योजनाओ का आरंभ करता हुआ, नये संकल्‍प करता हुआ, जागृति की नई ऊंचाईयों को पार करता हुआ, पूरे देश में चलता रहा। और यह कार्यक्रम इतना व्‍यापक हुआ और मैं चौधरी वीरेंद्र सिंह और उनके विभाग के सभी लोगों को, मैं राज्‍य सरकारों को हृदय से अभिनंदन करना चाहता हूं कि ऐसी चमचमाती धूप में भी, ऐसी गर्मी में भी सरकार के बड़े-बड़े अधिकारी गांव में गए। राजनेता गांव में गए, गांव में कार्यक्रम की भरमार बनी रही और गांव को आगे बढ़ाने का एक माहौल गांव के भीतर पैदा हुआ और अपने बलबूते पर अपने पास जो उपलब्‍ध resources हैं, उन resources के आधार पर गांव को आगे बढ़ाने का संकल्‍प आज हिंदुस्‍तान भर में नजर आ रहा है।

हम देख रहे हैं कि कुछ गांव कल्‍पना बाहर शहरों से भी उत्‍तम कभी-कभी व्‍यवस्‍थाएं बनाने में सफल हुए हैं। अगर गांव की पंचायत व्‍यवस्‍था में बैठे हुए प्रतिनिधि यह संकल्‍प करे कि गावं के लोगों ने पांच साल के लिए मुझ पर भरोसा किया है। क्‍या पांच साल के अंदर मैं गांव को कुछ ऐसा दे करके जाऊं, ताकि आने वाली पीढि़या भी याद करे कि फलाने-फलाने वर्ष में फलाने पंचायत के प्रधान थे, फलाने पंचायत के मेम्‍बर थे, इन्‍होंने हमारे गांव में यह बढि़या काम कर करके गए। हर किसी के मन में सभी जनप्रतिनिधियों के मन में यह संकल्‍प होना चाहिए कि मैं मेरे कार्यकाल में, जिन लोगों का मैं पतिनिधि हूं, उस क्षेत्र की भलाई में कुछ न कुछ उत्‍तम ऐसे काम करके जाऊंगा, जो आने वाले दिनों में गांव को आगे जाने के लिए एक मजबूत नींव का काम करेंगे, एक सही दिशा का काम करेंगे, एक सही गति पर ले जा करके मैं रखूंगा, यह संकल्‍प हर किसी का होना चाहिए।

यह ‘ग्राम उदय से भारतोदय’ यात्रा के द्वारा दुनिया के लोगों को अजूबा लगता है। आज हमारे देश में इन पंचायतों में करीब-करीब 30 लाख चुने हुए प्रतिनिधि बैठे हैं। और उसमें 40 प्रतिशत महिलाएं बैठी हैं। कुछ राज्‍यों ने झारखंड जैसे राज्‍यों ने 50 प्रतिशत किया है, कुछ राज्‍यों में 33 प्रतिशत है। उसके कारण औसत मैं बताता हूं करीब 40 प्रतिशत संख्‍या महिलाओं की है। यह महिलाओं की संख्‍य...अब काफी समय हुआ है। मैं आज इस पंचायती राज दिवस के अवसर पर इन लाखों मेरी महिला प्रतिनिधियों से आग्रह करना चाहता हूं। हाथ जोड़ करके विनती करना चाहता हूं कि मेरी माताएं-बहनें आपके गांव ने आप पर भरोसा रखा है। और आप एक मां हैं, आप एक महिला है। क्‍या आप अपने पंचायत में कुछ बातों के विषय में नेतृत्‍व करे परिवर्तन ला सकती हो क्‍या? अरग 40 प्रतिशत महिलाएं पंचायत में बैठी हो, कानून ने अपना काम कर दिया। मतदाताओं ने मत दे करके अपना काम कर दिया, लेकिन चुने हुए प्रतिनिधि और विशेष करके महिलाएं यह संकल्‍प कर सकती है कि जिस गांव में 40 प्रतिशत बहनें हम पंचायत में जा करके फैसले करते हैं, निणर्य में भागीदार बनते हैं, क्‍या हम यह तय कर सकते है कि हम जिस गांवमें बैठी हैं, अब हमारे गांव में हमारी एक भी माता या बहन या बेटी को खुले में शौचालय के लि एनहीं जाना पड़ेगा। हम शौचालय बना करके रहेंगे। भारत सरकार राज्‍य सरकार की शौचालय बनाने की योजना को हम खुद समय निकाल करके जाएंगे, लागू करके रहेंगे और अगर मैंने कई गांव देखे हैं एक आध बुढि़या मां भी संकल्‍प कर ले कि मैं अब गांव में किसी को खुले में शौच जाने के लिए मजबूर होने दूं, ऐसी स्थिति नहीं रहने दूंगी, तो ऐसे गांव में हर घर में शौचालय बन गए। आज भी मेरी माताओं-बहनों को खुले में शौच के लिए जाना पड़े इससे बड़ी शर्मिंदगी की कोई बात नहीं है। और इसलिए मैं विशेष लाखों की तादाद में चुनी हुई मेरी माताआं-बहनों से मैं आग्रह करता हूं कि आप इस बात पर ध्‍यान दें।

मैं दूसरी बात उनसे करना चाहता हूं कि सरकार की तरफ से बजट मिलता है, स्‍कूलों में बच्‍चों के लिए मध्‍याह्न भोजन चलता है। आप जनप्रतिनिधि है आप चौकसी करे कि सरकार के पाई-पाई का उपयोग अच्‍छा मध्‍याह्न भोजन करके उन छोटे-छोटे बालकों के पेट में जाता है कि नहीं जाता है। बालक तो भगवान का रूप होता है हमारे गांव का बालक कुपोषण से पीडि़त हो यह बात अगर जनप्रतिनिधि एक महिला हो तो मुझे कभी गंवारा नहीं होनी चाहिए। मैं इसमें बदलाव लाने के लिए एक जनप्रतिनिधि के नाते मैं अपने कर्तव्‍य का पालन करूंगी, यह संकल्‍प मेरी उन 40 प्रतिशत माताएं बहनें, एक तिहाई गांव में प्रधान महिलाएं हैं। क्‍या हम यह संकल्‍प कर नहीं सकते। ताकि हमारे गांव में हमारे गरीब से गरीब बालक भी कुपोषण के शिकार न हो, उसके लिए हम चिंता कर सके।

मैं मेरी माताओं-बहनों से एक और काम के लिए अपेक्षा करना चाहता हूं हमारे गांव में हर साल गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाली पांच महिलाएं या दस महिलाएं हर वर्ष उनकी प्रसूति का समय आता होगा। यह प्रसव काल के द‍रमियां मैं जनप्रतिनिधि के नाते अरे गांव में गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले तीन महीनों की प्रसव है या पांच महीनों की है, क्‍या गांव के अंदर एक जन जागृति ला करके नौ महीने तक उसको अच्‍छा आहार मिले, अच्‍छा पोषक खाना मिले, इसके लिए गांव मिल करके इतनी जिम्‍मेवारी उठा सकता है क्‍या? मैं इसलिए नहीं कहतहूं कि सवाल बजट का है, मुद्दा बजट का नहीं होता है, यह जनांदोलन जब बन जाता है, तब हमारी माताएं जो प्रसव पीड़ा के कारण कभी मां मरती है, कभी जन्‍म लेने वाला बच्‍चा मरता है, कभी मां और बच्‍चा दोनों मर जाते हैं। 21वीं सदी के हिंदुस्‍तान में हमारी गांव की माताएं और जब एक प्रसव में जो मां मरती है गांव में, उसकी उम्र क्‍या होती है, 25 साल, 27 साल की वो बेटी जो मां बनने वाली है कितने सपने संजो करके उसने शादी की होगी। कितने सपने संजो करके उस परिवार में वो बहू बन कर आई होगी। और पहली ही प्रसव में अगर वो मौत के शरण हो जाती है,तो वो परिवार कितना तबाह हो जाता होगा। उन परिवारों कीहालत कया होती होगी। जो नौजवान इस उम्र में अपनी पत्‍नी खो देता है उसकी मन:स्थिति क्‍या होती होगी, इतनी बड़ी दर्दनाक पीड़ा, इस पीड़ा से मेरी 40 प्रतिशत माताएं बहनें.. अगर गांव में जनप्रतिनिध हो और उस गांव में प्रसव के कारण मां मरे, बच्‍ची मरे, बेटा मरे, बेटी मरे इस बात को हमें मिटाना है। हम जागरूकता लाए कि हम अब ऐसे गरीब मां-बहनों की प्रसूति है तो उनको आशा-वर्कर से मिलालें। उनकी देखभाल करे और नजदीक के दवाखाने में ही उसकी प्रसूति हो, उसके लिए हम उसको प्रेरित करे। अगर अस्‍पताल में उसकी प्रसूति होती है तो उसकी जान बचने की संभावना बढ़ जाती हैं। मेरी माताएं-बहनें आप जनप्रतिनिधि हैं। आप पंचायत में जाकर के बैठती है और इसके लिए आप कितनी पढ़ी हैं, कितनी नहीं पढ़ी हैं, इसका महत्‍व नहीं है। जिस लगन के साथ आप अपने परिवार को संभालती है वो ही ताकत उस गांव की गरीब महिलाओं के परिवार को संभालने के लिए ताकतवर होती है, उतना अनुभव काफी होता है और उसको लेकर के आप चल सकती हैं।

मैं जनप्रतिनिधियों से भी आग्रह करना चाहता हूं। आज वो स्‍थिति नहीं है। पहले का जमाना था कि गांव के जो एकाध सुखी परिवार होता था, वो पंचायत का प्रधान हुआ करता था। कोई भी सरकारी अफसर आए, गांव में कोई मेहमान आए तो उसी के घर में मीटिंग होती थी, चाय-पान होता था, कभी भोजन होता था। महीने भर में 15-20 मेहमान स्‍वाभाविक होते थे और उसकी आर्थिक स्‍थिति अगर ठीक रही तो लोगों का स्‍वगत वगैरह करता था और गांव वाले भी सोचते थे कि भई इनके जिम्‍मे डाल दो। लेकिन वो तब वो दिन थे जब गांवों के पास अपना कोई बजट नहीं हुआ करता था। गांव को अपने तरीके से ही गुजारा करना होता था। बहुत कम व्‍यवस्‍थाएं साधन की तरफ से होती थी। आज वक्‍त बदल चुका है। आज तो लाखों रुपए हर साल गांव के पास आते हैं और पंचायत प्रधानों के चुनावों में भी जो इतनी स्‍पर्धा आई है, उसका मूल कारण भी ये विपुल मात्रा में धन जो आ रहा है, वो भी एक कारण है। लेकिन मैं चाहता हूं, इस धन का योजनाबद्ध तरीके से अगर जनप्रतिनिधि अपने पांच साल के लिए तय करके, तय करे तो अपने गांव में उत्‍तम से उत्‍तम परिणाम ला सकते हैं।

पिछले 60 साल में जो चीजें आपके गांव में नहीं हो पाई होगी, वो चीजें आप पांच साल के भीतर-भीतर इतने ही धन से कर सकते हैं और इसके लिए हमारी पंचायत व्‍यवस्‍था को हमें मजबूत बनाना चाहिए। नियमित रूप से पंचायत की बैठक हो और मेरा यह विश्‍वास है कि देश का भाग्‍य बदलने के लिए जितना महत्‍व दिल्‍ली की बड़ी से बड़ी संसद का है, उतना ही महत्‍व ये मेरे गांव की संसद का है और इसलिए ग्राम सभा को भी बल देने की आवश्‍यकता है। आज जब ग्राम सभा होती है, तो औसत कितनी संख्‍या आती हैं? एक कहने को, कागज पर लिखने वाली ग्राम सभा होती है। अरे! ग्राम सभा की date पहले से तय हो, उस दिन ग्रामोत्‍सव का माहौल हो, सुबह प्रभात फेरी निकले, बच्‍चे भी ग्राम में जागरूकता लाए, छोटा-मोटा उत्‍सव का माहौल हो और फिर सायं में ग्राम सभा हो तो आज ग्राम सभा में 5%-10%-15% लोग आते हैं, महिलाएं तो बहुत कम आती हैं। कभी-कभी तो जनप्रतिनिधि भी नहीं पहुंचते हैं। क्‍या हम संकल्‍प कर सकते हैं कि हम ऐसी ग्राम सभा करेंगे जिसमें कभी भी गांव की आबादी के 30% लोग absent नहीं रहेंगे, ये हम संकल्‍प करके हम लोगों को लाने का प्रयास कर सकते हैं। और देखिए ग्राम सभा में तय करिए, ये करना है ऐसे करना है, पूरा गांव आपकी मदद करेगा

अगर सफाई का अभियान चलाना है तो गांव उत्‍तम से उत्‍तम सफाई का उदाहरण दे सकता है। आज भी कई गांव है जिन्‍होंने अपने बलबूते पर सफाई का अभियान चलाया है और गांव में जो कूड़ा-कचरा इकट्ठा होता है, वो गांव के बाहर vermin-compost के bed बनाते हैं, गड्ढे बनाते हैं, केंचुएं लाकर डालते हैं और अच्‍छा-सा खाद्य भी मिल जाता है और वे फर्टिलाइजर बेचते हैं, गांव के ही किसान ले जाते हैं। गांव में सफाई भी रहती है और खेत को अच्‍छा खाद भी मिलता है। ये इसलिए नहीं होता है कि पैसे है, इसलिए होता है कि ग्राम पंचायत का प्रधान, गांव के चुने हुए प्रतिनिधि, गांव का शिक्षक, गांव के दो-चार आज्ञावान लोग, ये जब मिलकर के तय करते है, बदलाव आना शुरू हो जाता है। गांव सफाई के विषय में, थोड़े से कदम उठावे, वो आर्थिक रूप से लाभप्रद होता है। ऐसा उत्‍तम खाद्य गांव की सफाई से निकलता है कि हमारे खेतों की हालत को सुधार सकता है।

मैं गांव पंचायत के मेरे प्रधानों से आग्रह करना चाहता हूं। यहाँ हम इतनी बड़ी मात्रा में प्रतिनिधि बैठे हैं। हम चाहते होंगे कि गांव में road बने, गांव में पंचायत का घर बने, ये सब तो चाहते होंगे, लेकिन क्‍या गांव में शिक्षक हो, गांव में स्‍कूल हो। सरकारी बजट खर्च होता है लेकिन उसके बावजूद भी अगर मेरे गांव के बच्‍चे महीने-दो महीने स्‍कूल जाकर के फिर जाना बंद कर दे, तो इसकी चिन्‍ता पंचायत के लोगों को होती है कि नहीं होती है? अगर हमें चिन्‍ता नहीं होती है, तो हम गांव के मुखिया नहीं है। अगर आज एक बच्‍चा उसकी कुल स्‍कूल छूट जाती है, इसका मतलब यह हुआ कि भविष्‍य में अपने गांव में हम एक ऐसा नौजवान तैयार कर रहे है जिसके भविष्‍य में अंधकार लिखा हुआ है। अगर वह बच्‍चा स्‍कूल गया। हर हफ्ते हमने थोड़ी जानकारी ली, पूछताछ की। कोई बच्‍चा अगर स्‍कूल नहीं जाता है तो गांव का प्रधान अगर उसके मॉ-बाप से बात कर लेता है कि देखो भई, मास्‍टर जी आए थे। कह रहे थे कि फलाने का बेटा स्‍कूल नहीं आ रहा है, क्‍या हुआ, बीमार तो नहीं है? इतना-सा अब अगर गांव का प्रधान पूछ ले, पंचायत का सदस्‍य पूछ ले, तो गांव में बच्‍चों को स्‍कूल ले जाने के लिए मॉ-बाप भी जागरूक हो जाएंगे। वो शिक्षक भी अगर उदासीन होगा, उसकी अगर रुचि नहीं होगी लेकिन अगर गांव के पंचायत के लोग जागरूक है, गांव जागरूक है तो वो शिक्षक भी अपनी पूरी ताकत से पढ़ाई के अंदर ध्‍यान देगा और आपके गांव के बच्‍चों की जिन्‍दगी बदल देगा। और इसलिए हम पंचायत के प्रधान के नाते, हम सिर्फ road बना कि नहीं बना, बजट आया कि नहीं आया, इससे सीमित रहते हुए, जनसुविधा की ओर भी ध्‍यान दे।

हमारे यहां पल्‍स पोलियो का खुराक पिलाया जाता है। कितने जनप्रतिनिधि है कि जो हफ्ते पहले से पल्‍स पोलियो के काम को अपने कंधों पर उठा लेते हैं और तय करते हैं कि हमारे गांव का कोई बच्‍चा टीकाकरण से बाकी नहीं रह जाएगा। पोलियो की खुराक से बाकी नहीं रह जाएगा। हम पांच साल, हमारे कार्यकाल के दौरान शत-प्रतिशत टीकाकरण करवा लेते हैं, पोलियो का खुराक पहुंचा देते हैं, तो हमारा सौभाग्‍य होगा कि हमारे गांव में कोई भी ऐसा बच्‍चा नहीं होगा, कोई भी ऐसी बच्‍ची नहीं होगी जिसको कभी लकवा मार जाए, वो जीवन भर दिव्‍यांग के रूप में रहने के लिए मजबूर हो जाए और पूरा गांव जीवन भर उसकी तरफ दया भाव से देखता रहे। हम चाहते हैं कि हमारा गांव स्‍वस्‍थ रहे, तो हमारे बालक स्‍वस्‍थ होने चाहिए, हमारे बालक स्‍वस्‍थ रखने है तो हमें जो सरकार की योजनाएं हैं, एक पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधि के नाते उसे परिपूर्ण करने के लिए हमें जागरूकता दिखानी होगी। हमें स्‍वयं नेतृत्‍व करना होगा।

इंद्रधनुष योजना। पुराने जितने ऐसे बालक छूट गए है, उन बालकों को अब इस health के cover में लाने का बड़ा अभियान है। करोड़ों-करोड़ों बालक अभी भी ऐसे है जो किसी न किसी की कारण से इसका फायदा नहीं ले पाए हैं, या हम फायदा नहीं पहुंचा पाए हैं। मैं पंचायत में चुनकर के बैठा हूं। मेरे गांव में मेरा संकल्‍प होना चाहिए कि अब किसी भी बालक को अपंग होने की, दिव्‍यांग होने की, उसके शरीर का कोई भाग लकवा मार जाए, ऐसी परिस्‍थिति मैं होने नहीं दूं, यह मेरा संकल्‍प होना चाहिए। अगर एक के बाद एक, पंचायत में चुने हुए मेरे प्रतिनिधि मेरे गांव के जीवन को बदलना तय करे।

हम जानते हैं वर्षा पर हमारी खेती निर्भर है। अगर गांव में किसान परेशान है, तो गांव के बाकी कारोबार भी बंद हो जाते हैं। लुहार की कमाई भी बंद हो जाती है, सुधार की भी कम हो जाती है, मोची की भी कम हो जाती है, हर किसी की तकलीफ हो जाती है, पूरा अर्थ कारण गांव का नष्‍ट हो जाता है। लेकिन कृषि भी, क्‍या हम ‘per drop, more crop’. क्‍या ऐसे गांव नहीं हो सकते कि जो संकल्‍प करे कि हमारे गांव के जितने किसान है, उनकी जितनी भी जमीन है, हजार बीघा होगी, दो हजार बीघा होगी, जितनी जमीन होगी। हम पूरा गांव तय करते हैं कि हमारे गांव का एक भी किसान अब ऐसा नहीं होगा कि जो drip irrigation और sprinkler का उपयोग न करता हो। हम पानी बचाएंगे, हम आधुनिक खेती करेंगे, हम Soil health card लेंगे, हम पशुपालन करवाएंगे, हम शहद के लिए मधुमक्‍खी का उपयोग करवाएंगे, जहां मत्‍स्‍य उद्योग होता होगा वहां मछली पालन का करवाएंगे। हम कोशिश करेंगे कि हमारा किसान ये जो योजनाएं हैं, उन योजनाओं का लाभ लेने के लिए आगे कैसे आए।

आपने देखा होगा कि जिस गांव का प्रधान सक्रिय होता है, जिस गांव के चुने हुए प्रतिनिधि सक्रिय होते हैं तो सरकार को भी, सरकारी अधिकारियों को भी, उस गांव में काम करने का जरा मजा आता है, क्‍योंकि उनको भी अपने target पूरे करने होते हैं, अपने लक्ष्‍यार्थ पूरे करने होते हैं। सरकारें उनसे हिसाब मांगती है इसलिए वो भी क्‍या करते हैं कि जो गांव जागरूक है, अच्‍छा कर सकता है, उन्‍हीं गांव के पास जाते हैं और कहते हैं कि देखो ये योजना आई है आप लागू कर दो। उसके कारण होता क्‍या है कि एक इलाके में जो 12-15 बहुत सक्रिय पंचायत हैं, उनको सारे फायदे पहुंच जाते हैं और जो निष्‍क्रिय पंचायते, हैं वहां अफसरों का जाने का मन ही नहीं करता है, सरकार का जाने का मन नहीं करता है और पैसे एक तरफ चले जाते हैं। मेरे भाइयो-बहनों स्‍थिति अच्‍छी नहीं है। आप स्‍वयं जागरूक बनिए, आप सक्रिय बनिए, आप नेतृत्‍व कीजिए। अगर आप सक्रिय बनते हैं, आप नेतृत्‍व करते हैं तो मैं नहीं मानता हूं कि अफसरों को कहीं और जाने का मन करेगा। उनको तो विश्‍वास होगा कि यहां के 20 गांव मेरे जिम्‍मे है, बीसों गांव इतने अच्‍छे हैं कि सारी योजनाएं लागू हो जाएंगी। वो सारी योजनाएं उन बीसों गांव में जाएंगी। आज पैसे की कमी नहीं है, मेरे भाइयो-बहनों। योजनाओं की कमी नहीं है, दृष्‍टि की कमी नहीं है, आवश्‍यकता है कि धरती पर बैठे हुए, मेरे गावं का कल्‍याण करने वाले पंचायत राज व्‍यवस्‍था से जुड़े हुए मेरे पंचायत के भाई-बहन इसके लिए समर्पित भाव से काम करें।

क्‍या हम संकल्‍प कर सकते हैं कि सरकार की योजनाओं के द्वारा गांव की अपनी सफलताओं का एक हिसाब होता है लेकिन पांच साल के लिए गांव पांच कार्यक्रम ले सकता है। एक साल के लिए एक कार्यक्रम। जैसे अगर कोई गांव तय करे कि हम ऐसा गांव बनाएंगे, जो हरित गांव होगा। इस वर्ष में हम गांव में इतने पेड़ लगाएंगे और उस पेड़ को लगाकर के पूरे गांव को हरा-भरा कर देंगे, ये संकल्‍प कर सकते हैं? दूसरे साल कोई संकल्‍प करे कि हम ऐसा गांव बनाएंगे जहां से एक बूंद भी वर्षा का पानी हम बाहर नहीं जाने देंगे। हम बूंद-बूंद पानी को रोकने का प्रबंध करेंगे, हम जल संचय के लिए पूरी तरह काम करेंगे। हम यह तय कर सकते हैं कि हमारे गांव का एक भी किसान ऐसा नहीं रहेगा जिसका Soil health card नहीं होगा। हमारे गांव में ऐसा एक भी किसान नहीं होगा, जिसके खेत में sprinkler या drip irrigation न हो। ऐसा मैं गांव, किसान मित्र गांव बना सकता हूं क्‍या? क्‍या मैं यह सोच सकता हूं कि मेरा गांव जहां पर एक भी बालक dropout नहीं करेगा? मैं ऐसा गांव बना सकता हूं जहां पर मेरा एक भी बालक किसी भी टीकाकरण की व्‍यवस्‍था से बाकी नहीं रह जाएगा, बाहर नहीं रह जाएगा, ये मैं संकल्‍प कर सकता हूं क्‍या? अगर मैं यह योजना बनाऊं कि मेरे गांव में Digital India का जो movement चलने वाला है, मेरे गांव तक fiber का नेटवर्क आने वाला है, मैं मेरे गांव में अभी से यह technology का उपयोग करने वाले नौजवानों की टोली तैयार करके मेरे नगर गांव को भी ई-ग्राम बनाने की दिशा में मैं काम कर सकता हूं क्‍या? मैं संकल्‍प कर सकता हूं क्‍या कि मेरे गांव में एक भी बालक जन्‍म के कारण और जन्‍म के तुरंत बाद मृत्‍यु नहीं होगी, उसकी भी मैं चिन्‍ता करूंगा? मैं यह तय कर सकता हूं कि मेरा गांव यह बाल-मित्र गांव होगा, मेरा गांव यह बालिका-मित्र गांव होगा, मेरा गांव दहेज मुक्‍त गांव होगा। ऐसे-ऐसे सामाजिक संकल्‍प अगर हम गांव के अंदर लेने का एक माहौल बनाए, हर वर्ष गांव का जन्‍मदिन मनाए, हम तय करे कि हमारे गांव का फलाना जन्‍मदिन है और उस समय गांव के जितने लोग शहरों में गए हैं वो खास उस गांव में आने चाहिए, पूरे दिन उत्‍सव चलना चाहिए। गांव एक साल का संकल्‍प करे कि एक साल के अंदर हमें गांव को कहां ले जाना है। पंचायत राज व्‍यवस्‍था एक structure है। पंचायत राज व्‍यवस्‍था एक संवैधानिक व्‍यवस्‍था है। लेकिन जब तक जनप्रतिनिधि और जनसामान्‍य जुड़कर के जन आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए संकल्‍प लेकर के जी-जान से जुटते नहीं है, परिणाम नहीं मिलता है।

भाइयो-बहनों, गांव के अर्थ-कारण को ताकतवर बनाना है। गांव का अर्थ-कारण ताकतवर बनेगा तभी देश का अर्थ कारण ताकतवर बनेगा। जब तक गांव के गरीब की खरीद शक्‍ति नहीं बढ़ती, देश की economy में बल नहीं आता है और इसलिए हमारी कोशिश है कि गांव के सामान्‍य मानविकी की आय कैसे बढ़े? गांव के सामान्‍य मानविकी की खरीद शक्‍ति कैसे बढ़े? हमारी पाई-पाई का उपयोग.. मनरेगा की योजनाएं चलती हैं, लाखों रुपया-करोड़ों रुपया आते हैं, अरबों-खरबों रुपया जाते हैं लेकिन अगर हम तय करे कि हम गांव में मनरेगा के पैसे तो आएंगे, लोगों को काम भी मिलेगा लेकिन उसमें से हम assets निर्माण करेंगे। जल संचय की व्‍यवस्‍थाएं करेंगे, तालाब है तो उसको गहरा करेंगे, पानी ज्‍यादा आए उसकी व्‍यवस्‍था करेंगे, पेड़-पौधे लगाने हैं तो पैसे उसमें लगाएंगे। आप देखिए, पैसों का सही उपयोग भी हमारे गांव के जीवन को बदल सकता है।

और इसलिए मेरे पंचायत के प्‍यारे भाइयो-बहनों, आज जिनको इनाम मिला है। जिन्‍होंने कुछ अच्‍छा करने का प्रयास किया है, उन सबको, सम्‍मान प्राप्‍त करने वाले राज्‍यों को, उन गांवों को और उन अधिकारियों या प्रतिनिधियों का हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं कि उन्‍होंने आज देश के सामने एक उत्‍तम कार्य की मिसाल रखकर के भारत सरकार से सम्‍मान प्राप्‍त किया है। लेकिन मैं आशा करूंगा कि जो उत्‍तम कार्य करके सम्‍मान प्राप्‍त करने वाले लोग है वो वहीं पर न अटके, और नई चीजें सोचें, और नई चीजें करें और देश-दुनिया के सामने एक उत्‍तम उदाहरण प्रस्‍तुत करे।

उसी प्रकार से, गांव के बाकी कामों के साथ हमें गांव की आर्थिक बाबतों को भी देखना होगा। कुछ चौकसी की जरूरत है। मैं जब सरकार में आया तो मैंने पूछा, 18 हजार गांव ऐसे निकले कि जहां बिजली का खंभा भी नहीं पहुंचा, बिजली का तार भी नहीं पहुंचा। अगले साल आजादी के 70 साल हो जाएंगे, 18 हजार गांव में अगर बिजली का तार नहीं पहुंचा है, तो वे 18वीं शताब्‍दी में अंधेरे में जी रहे हैं। हमने बीड़ा उठाया है कि उन 18 हजार गांवों में बिजली पहुंचानी है। एक हजार दिन में मैंने काम करने का तय किया है। मैं बराबर पीछे लगा हूं, भारत सरकार पीछे लगी हैं, राज्‍य सरकारों को भी दौड़ा रहे हैं। काम हो रहा है लेकिन कभी-कभार खबर आ जाती है, जाहिर हो जाता है कि फलाने गांव में बिजली पहुंच गई और कोई अखबार वाला पहुंच जाता है तो पता चलता है कि वहां तो अभी खंभा पहुंचा है। मैं गांव वालों से कहता हूं कि आप जागरूक रहिए। आप देखिए कि अब कोई गलत जानकारी तो नहीं देता है न। अगर आप जागरूक रहे तो मुझे इतनी चिन्‍ता नहीं करनी पड़ेगी। क्‍या मेरी चिन्‍ता का थोड़ा हिस्‍सा मेरे गांव के मेरे साथी नहीं उठा सकते क्‍या? मेरे गांव के प्रतिनिधि इस बात को नहीं उठा सकते? मैं देश के प्रतिनिधियों से कहता हूं कि आइए, कंधे से कंधा मिलाकर के जो एक-एक सपने देखे हैं, उन सपनों को हम पूरा करे।

भाइयो-बहनों, गांव में आज भी हमारी गरीब मॉं लकड़ी का चूल्‍हा जला करके खाना पकाती है। और आप को जान कर के हैरानी होगी, वैज्ञानिको का कहना है की जब एक माँ लकड़ी का चूल्हा जला कर के खाना पकती है, तो उसके शरीर में 400 सिगरेट जितनी धुंआ जाता है। अगर मेरी मां के शरीर में 400 सिगरेट का धुंआ चला जाए, तो उस मां की तबीयत का हाल क्‍या होगा, उन बच्‍चों की तबीयत का क्‍या हाल होगा। क्‍या हम आजादी के इतने सालों के बाद 21वीं सदी में खाना बनाने के कारण हमारी गरीब माताओं को मरने देंगे। भाईयों-बहनों अब यह नहीं चल सकता है। हम उन्‍हें लकड़ी के चूल्‍हे से धुएं से, 400 सिगरेट के जुल्म से मुक्ति दिलानी पड़ेगी और इसलिए हमने बीड़ा उठाया है, आने वाले तीन साल में पांच करोड़ परिवारों में गैस का सिलेंडर देना है। आपके गांव में भी होंगे। आप स्‍वयं गांव में देखें कि सरकार ने जो काम उठाया है, उसका फायदा पहुंच रहा है कि नहीं पहुंच रहा है। सही व्‍यक्ति को पहुंच रहा है कि नहीं पहुंच रहा है। इन गरीबों की मदद करना, आप देखिए कि उनकी जिंदगी में बदलाव आना शुरू हो जाएगा। गांव के बगल के जंगल बच जाएंगे। लकड़ी कटती है, जंगल कटते हैं वो बच जाएंगे। हम पर्यावरण की भी रक्षा करेंगे, माताओं के स्‍वास्‍थ्‍य की भी चिंता करेंगे, बच्‍चों के भविष्‍य की भी चिंता करेंगे। और इसलिए मैं आपसे आग्रह करता हूं कि हम एक भागीदारी के साथ, सहभागिता के साथ कंधे से कंधा मिला करके देश का बड़े से बड़ा मुखिया क्‍यों न हो गांव के बड़े से बड़े मुखिया से कोई बड़ा नहीं होता है। मेरे लिए गांव का मुखिया बहुत बड़ा होता है, क्‍योंकि वो चाहे तो अपने नेतृत्‍व, अपने दिशा-दर्शन से गांव के जीवन को बदल सकता है और एक बार हिंदुस्‍तान के गांव बदलने लग गए, तो इस देश को बदलते हुए देर नहीं लगेगी।

भाईयों-बहनों जो सुविधाएं शहर में हैं वो सुविधाएं गावं को भी मिलनी चाहिए। हमने अभी e-NAM नाम की योजना शुरू की है। यह e-NAM योजना किसानों को बहुत बड़ा भला करेगी। अभी वो प्रारंभिक अवस्‍था में है। अभी थोड़ी कमियां भी होगी, सुधार करते-करते अच्‍छाइयों की ओर जाएंगे भी, लेकिन ईनाम योजना National Agriculture Market अब किसान अपने मोबाइल फोन से तय कर सकता है कि उसने अपनी फसल कहां बेचनी है, अपनी पैदावर कहां बेचनी है, जहां ज्‍यादा पैसा मिलेगा वहां बेचेगा। इसके लिए हमारे में जागरूकता चाहिए। इन चीजों का फायदा उठाने के लिए हमारे पास व्‍यवस्‍था होनी चाहिए, अगर हम उन बातों को करेंगे तो आप देखिए परिणाम आना शुरू हो जाएगा।

और इसलिए मेरे प्‍यारे भाईयों-बहनों, खास करके मेरे गांव के प्‍यारे भाईयों-बहनों हमारी कोशिश है, आज शहरों में डिजिटल नेटवर्क है, जितना महत्‍व highways का है उतना ही महत्‍व I-ways का है। information ways गांव के लोगों को भी वो सारी information चाहिए। और इसलिए optical fibre network गांव-गांव पहुंचाना है। जो गांव जागृत होंगे, खेतों में से वो पाइप डालने के लिए सुविधा दे देंगे। इतनी तेजी से काम होगा कि आपके गांव को भी आधुनिक विश्‍व के साथ जोड़ने में सुविधा बनेगी। गांव स्‍वयं जागरूकता दिखाए, योजनाओं की कमी नहीं है, पैसो की कमी नहीं है। समय-सीमा में काम करने के इरादे में कमी नहीं है, आवश्‍यकता है चारों तरफ सहयोग की, आवश्‍यकता है सक्रियता की, आवश्‍यकता है सही दिशा में मिल करके चलने की। एक बार गांव चल पड़ा तो देश चल पड़ेगा।

इस विश्‍वास के साथ आज पंचायत राज दिवस पर 10 दिन का महाअभियान, पहली बार देश के ढ़ाई लाख गांव में इतना बड़ा अभियान चला है। पूरी सरकार की ताकत लग गई इसके साथ। एक प्रकार से कार्यक्रम का समापन, लेकिन इरादों का आरंभ हो रहा है। संकल्‍प का आंरभ हो रहा है। हमने 10 दिन ग्रामोदय का खाका समझ लिया है। अब शुरू होता है कि आने वाले हमारे कार्यकाल के दरमियां जितने भी वर्ष मुझे मिले हैं अगले वर्ष तक पंचायत के प्रधान के रूप में पंचायत के मेम्‍बर के रूप में एक-एक मिनट का उपयोग, एक-एक पाई का उपयोग, एक-एक पल का उपयोग मैं, मेरे गांव को ग्रामोदय के लिए उत्‍तम से उत्‍तम ग्रामोदय की कल्‍पना करके करूंगा। तभी भारतोदय का मेरा सपना पूरा होगा। इस काम के लिए मैं एक बार आप सबको निमंत्रण देता हूं, आपका सहयोग चाहता हूं।

मैं झारखंड सरकार का भी अभिनंदन चाहता हूं। रघुबर दास जी का अभिनंदन करता हूं कि आप उन्‍होंने बड़े-बड़े शहरों में बड़े-बड़े उद्योगों के लिए single window system की तो चर्चा सुनी है, उद्योगकारों single window system के लिए हर सरकार बात करती है। लेकिन रघुबर दास जो है, किसानों के लिए जीने-मरने वाली सरकार वो कहती है हम किसानों के लिए single window प्रारंभ करेंगे। आज किसानों के लिए single window की जो योजना प्रारंभ किया है, उनकी कल्‍पकता के लिए, उनके इस योजनाबद्ध उपक्रम के लिए मैं रघुबर दास जी को और झारखंड की सरकार को हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं। बहुत-बहुत उनकी बधाई करता हूं।

इतना बड़ा कार्यक्रम में देख रहा हूं आज 40-45 डिग्री temperature है, लेकिन जब मैं आया पूरा stadium चकाचक भरा हुआ था। इतना बड़ा उत्‍साह, उमंग, इतना बड़ा सफल कार्यक्रम करने के लिए मैं श्रीमान रघुबर दास जी और सरकार को और झारखंड की जनता को हृदयपूर्वक बहुत-बहत अभिनंदन देता हूं और देशभर में internet के माध्‍यम से टीवी के माध्‍यम से ग्राम सभा में जो लोग बैठे हैं उनकी किसानों व भाईयों को उन ग्राम सभा के भाईयों, उन ग्राम पंयायत के प्रतिनिधियों को फिर से एक बार आभार व्‍यक्‍त करता हूं अभिनंदन करता हूं और मैं फिर से एक बार आग्रह करता हूं कि ग्रामोदय का बीड़ा उठा लीजिए, ग्रामोदय का संकल्‍प ले करके चल पड़िए। आज से हम शुरू करे, अब रूकना नहीं है, थकना नहीं है। अविराम चलते रहना, गावं के सपनों को पूरा करके रहना है। महात्‍मा गांधी की 2019 में डेढ़ सौ साल होंगे, उस समय गांधी के सपनों का गांव बना करके रहेंगे यह निराधार करके चले, इसी एक अपेक्षा के साथ आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं, धन्‍यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches

Sunday, 6 March 2016

PM’s address at the National Conference of Women Legislators


मैं सुमित्रा जी को हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं कि उन्होंने इस कार्यक्रम की योजना की, कल्पना की लेकिन उससे ज्यादा भी बधाई मैं आप सबको देता हूं क्योंकि मैंने जानकारी पाई की किस प्रकार से सत्र हुए, विषय हुए, आप सबका participation रहा, सक्रिय भागीदारी रही और, ज्यादातर लोग उपस्थित रहे। वरना दिल्ली आए तो और भी कुछ काम होते हैं तो ऐसा शायद कम हुआ तो ये अपने आप में, आपके लिए यह समारोह जिज्ञासा से भरा हुआ रहा। जहां आप कार्य करते-करते जो कठिनाइयां भुगत रहे हैं, उसका समाधान चाहते हैं।

जिन सपनों को लेकर के आप सार्वजनिक जीवन में आए। उन सपनों को पूरा करने के लिए अपने आपको सक्षम कैसे बनाया जाए, उसके लिए कहीं से कोई मार्गदर्शन मिले, जानकारी मिले, रास्ता खोजने का प्रयास मिले । इन सारी बातों का परिणाम है कि आप इस डेढ़ दिवस में अनेक विषयों पर सक्रियता से हिस्सा लिया लेकिन मैं एक तीसरे विषय की ओर कहना चाहता हूं कि कभी-कभी इस प्रकार के समारोह में Structured way में जो चीजें मिलती हैं, उससे ज्यादा मेल जोल के समय, चाय के समय, भोजन के समय या आते-जाते, परिचितों से, अपरिचितों से जो बातें होती हैं। उनसे जो अनुभव बांटने का अवसर मिलता है, वो structured programme से भी ज्यादा ताकतवर होता है और वो आप लोगों ने पाया है और उस अर्थ में देशभर के महिला जनप्रतिनिधियों का ये समारोह आने वाले दिनों में आप अपने-अपने क्षेत्रों में जहां जाएंगे, वहां कोई न कोई सकारात्मक भूमिका अदा करेगा और आपको अवश्य सफलता मिलेगी।

यहां पर सुषमा जी के एक quote का उल्लेख हुआ लेकिन मैं उसे महिला और पुरुष के संदर्भ में नहीं कहना चाहता लेकिन एक बात कि ये जो महिला सशक्तिकरण, ये मनोवैज्ञानिक अवस्था को बदलने की आवश्यकता मुझे लगती है। सशक्तिकरण उनका होता है, जिनका सशक्तिकरण नहीं है लेकिन जो सशक्त है, उनका सशक्तिकरण कौन करेगा और ये बात मेरे गले नहीं उतरती कि पुरुष होते कौन हैं जो सशक्त करेंगे लेकिन आवश्यक ये है कि हम स्वंय को पहचानें।

हम अपनी शक्तियों को तब तक नहीं पहचानते हैं, जब तक हमें चुनौतियों से जूझने का अवसर नहीं आता है। जितने भी प्रकार के समाज, जीवन के सर्वे होते हैं उसमें एक बात आती है। अगर पत्नी का स्वर्गवास हो गया, पुरुष अकेला परिवार चलाता है तो न लंबा समय परिवार चला सकता है और न लंबा समय वो जीवित रह सकता है और अगर पुरुष नहीं रहा हो, महिला को परिवार चलाने की जिम्मेवारी आ गई सारा सर्वे कहते हैं कि वह लंबे अरसे तक जीवित भी रहती है और परिवार का लालन-पालन उत्तम तरीके से करके दिखाती है।

ये उस बात सुबूत है कि inherent जो सामर्थ्य और शक्ति ईश्वर प्रदत्त आप लोगों को है, महिलाओं को है। जिसको पहचानना स्वंय में बहुत आवश्यक है। आजकल management की दुनिया में एक शब्द बड़ा प्रचलित है multi star activity ये multi task activity दुनिया के कई देशों में जो व्यक्तित्व का growth हुआ है वो एक single tunnel activity का होता है। अगर उसमें वो चलता रहा तो आगे बढ़ता जाता है, बहुत कुछ contribute करता है लेकिन उस tunnel में कहीं रुकावट आ गई, कहीं और रास्ते पर जाने की नौबत आई तो नहीं कर पाता है। अगर daily उसको lift से जाने की आदत है, 10 वीं मंजिल पर बैठा है और अचानक बिजली चली जाए तो stair case से नीचे उतरना, उसका घंटा लग जाता है क्या करूं, ऐसे लोग होते हैं।

Multi Task activity आज managerial world में एक विशिष्ट शक्ति के रूप में माना जाता है लेकिन हमारे देश में महिलाओं की ओर देखिए। शायद Multi Task activity में इनसे बढ़कर कोई नहीं हो सकता है। वो FM पर गाने भी सुनती होगी, Mobile पर बात भी करती हो और पकाती भी होगी, बच्चे को भी सूचना देती होगी, ये यानि कभी हम थोड़ा dissection करके इस चीज को देखें तो अंदाज आता है क्या सामर्थ्य दिया है, क्या शक्ति दी है। क्या हम इस शक्ति का गौरव करना जानते हैं, इस सामर्थ्य को पहचानते हैं।

ये भी देखिए जहां-जहां महिला को अवसर मिला है, उसका सफलता का स्तर बहुत ऊंचा है। आप पिछले वर्षों से याद कीजिए कौन Foreign Minister थे देश के नाम ही याद नहीं आएगा लेकिन आज सुषमा जी तुरंत याद आती हैं आपको। सामर्थ्य हम अनुभव करते हैं।

हमारे Parliament में कई Speaker आए लेकिन जितने महिला Speaker आए हरेक को ध्यान रहा होगा कि मीरा कुमार थीं, सुमित्रा जी हैं। आजकल राज्यो में भी बहुत बड़ी मात्रा में महिला Speaker role कर रही हैं। जहां-जहां उनको अवसर मिला। अगर मैं नहीं जानता हूं कि किसी ने सर्वे किया है कि नहीं किया है लेकिन अगर सर्वे करे तो शायद पुरुषों को मिले हुए अवसर, उनका success ratio and महिला को मिला अवसर, उनका success ratio, मैं विश्वास से कहता हूं महिलाओं का ऊपर गया होगा। इसका मतलब ये है कि सामर्थ्य है। हमारे देश में ये पहली सरकार ऐसी है जिसमें इतनी बड़ी मात्रा में महिला मंत्रियों का प्रतिनिधित्व है क्योंकि मेरा conviction है कि उनको अगर अवसर मिले तो वो बहुत उत्तम परिणाम दे सकते हैं और आज हम अनुभव भी कर रहे हैं कि परिणाम देते हैं।

आप लोगों ने शायद पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में Africa का एक छोटा सा देश Rwanda, उसकी घटना शायद अगर आपके कान पर आई हो। वहां एक बहुत बड़ा नरसंहार हुआ, लाखों की तादाद में लोग मारे गए और ज्यादातर पुरुष मारे गए। बाद में महिलाओं ने देश की कमान संभाली और हिम्मत के साथ वो मैदान में आईं। आज उनके lower house में करीब 65 percent women representative हैं और इतनी भयंकर आपत्ति से निकले हुए देश को महिलाओं ने leadership दी और महिलाओँ ने देश को बाहर निकाला। आज Rwanda अपने पैरों की ताकत पर खड़ा हो गया। ये अपने आप में एक बहुत बड़ा उदाहरण है कि कठिनाइयों से गुजरने के बाद भी जिनको अवसर मिला, उन्होंने कितना बड़ा परिवर्तन किया, कितना बड़ा परिणाम लाया है और इसलिए लेकिन एक जनप्रतिनिधि के नाते, हम सशक्त हों कि हम राष्ट्र को सशक्त बनाने में कोई extra भूमिका अदा कर सकते हैं क्या, राष्ट्र को सशक्त बनाने में बजट काम नहीं आता है। राष्ट्र को सशक्त बनाने में रोड, रास्ते, port, airport, building, भवन, इमारतें ये काम नहीं आती हैं।

राष्ट्र को सशक्त बनाता है, राष्ट्र का जन-जन राष्ट्र को सशक्त बनाता है। राष्ट्र को सशक्त बनाता है राष्ट्र का नागरिक और कोई नागरिक को कोई सशक्त बनाता है, उसको अगर सामर्थ्यवान बनाता है, उसको अगर चरित्रवान बनाता है तो मां बनाती है, उससे बड़ा राष्ट्र का निर्माण कोई नहीं कर सकता है। उससे बड़ा राष्ट्र का निर्माण, सशक्तिकरण कोई नहीं कर सकता, जो सदियों से माताएं-बहनें करती आई हैं। पीढ़ियों तक उत्तम रत्नों को देकर के समाज, जीवन का सशक्तिकरण का सबसे मूलभूत काम आप ही के द्वारा तो हुआ है लेकिन जो हुआ है उसका अगर गर्व नहीं होगा। हम ही inferiority complex में रहेंगे, हम ही सोचेंगे कि नहीं उन लोगों का ज्यादा अच्छा है तब तो मैं नहीं मानता हूं कि ये आगे बढ़ने का जो आपका इरादा है, उसको पार करने में कोई मददगार होगा।हम स्वंय ही इतने सामर्थ्यवान है, इसका अहसास करेंगे और ये मेरे कहने के कारण है नहीं, आप हैं।

कभी-कभार, नारी के दो रूप घर में अगर वो चूल्हे पर खाना पका रही है, चपाती बना रही है और चपाती बनाते-बनाते उसमें से थोड़ी भाप निकल गई, steam निकल आई और उसकी ऊंगली जल गई तो फूंक मारती है लेकिन उसका ध्यान फिर खाने में नहीं रहता है, पकाने में नहीं रहता है। वो पतिदेव के आने का इंतजार करती है। तीन बार खिड़की में जाकर के देखेगी कहीं आए तो नहीं हैं और उसकी कोशिश रहती है कि वो आते ही सामने ये जलती हुआ ऊंगली का चित्र खड़ा करे। उसको लगता है कि आज मेरे पतिदेव देखें कि मैं आज चपाती बनाते-बनाते मेरी ऊंगली जल गई है। फूंक लगाएगी, पानी मांगेगे, अरे देती हूं पानी, जली है दो घंटे पहले और पति आएंगे, उसको कहेंगे कुछ लगा दीजिये। वो ही नारी चपाती से भाप निकलती है, ऊंगली अगर थोड़ी सी भी जल गई, पति का इंतजार करती है कि पति देखे लेकिन मौहल्ले में आ लग गई, मां गई है बाजार में सब्जी खरीदने के लिए, अच्छा सा discount सेल चल रहा है। 10 percent, 20 percent, साड़ियां आई हैं बहुत बढ़िया और नारी गई है वहां purchasing के लिए, साड़ियां देख रही है और पता चले कि उस मोहल्ले में आग लगी है, वो उन सारी साड़ियों को लात मारकर के दौड़ती है जाकर के।


अड़ोस-पड़ोस के लोग उस घर को आग बुझाने के लिए कोई मिट्टी डाल रहा है, कोई पानी डला रहा है, वो आकर के चीखती है कि मेरा बेटा अंदर है। अड़ोस-पड़ोस के कितने ही मर्द, मूंछों वाले खड़े होंगे, कोई जाने की हिम्मत नहीं करेगा। वो मां जिंदगी और मौत का खेल खेलते हुए आग में उलझ जाएगी और बच्चे को लेकर के बाहर आ जाएगी। चपाती में से निकली भाप के कारण जिसकी ऊंगली जलती है तो उसका एक रूप होता है लेकिन संकटों के सामने जब उसका प्रेम उभर करके आता है, दूसरी ताकत होती है। ये शक्ति के धनी आप लोग हैं और वो ही शक्ति है जो राष्ट्र को ताकतवर बनाती है, राष्ट्र को सामर्थ्यवान बनाती है और इसलिए जनप्रतिनिधि के नाते, मान लीजिए मेरा कितने-कितने प्रकार के role होंगे। हमारा काम है विधायिका में कानून बनाना, क्या मैंने उस कानून को बनाते समय उसका जो draft आया है, उसको उस बारीकी से देखा है कि जो मेरा जो सशक्तिकरण का एजेंडा है, उसमें ये फिट बैठता है कि नहीं बैठता है। कोई शब्द की कमी है कि नहीं है। अगर है तो मैं जागरुक प्रतिनिधि के रूप में उस बात को मनवाने के लिए कोशिश कर रही हूं कि नहीं कर रही हूं। आप देखिए बहुत बड़ा contribution होगा।

आप के कार्यकाल में एकाध ऐसा कानून बनता है। जिस कानून के अंदर आपने एक ऐसे शब्द को लाकर के रख दिया, जो शब्द आने वाली पीढ़ियों का जीवन बदल सकता है। कितना बड़ा contribution है लेकिन क्या मेरा उस प्रकार से प्रयास हो रहा है। जनप्रतिनिधि के नाते ये मेरा दायित्व बनता है कि मैं जो संवैधानिक काम है, उसमें मुख्यतः मेरा काम है और इतना ही नहीं कोई भी परिवार में जब मकान बनता है न कितने ही architecture क्यों न हो, कितने ही design बनाकर के आएं लेकिन आखिर तक तो ठप्पा वो मां लगाती है, नहीं-नहीं kitchen ऐसे जाहिए, toilet यहां चाहिए। मंदिर यहां चाहिए, जूते यहां लगाने होंगे तब जाकर के घर ठीक चलेगा। उसको वो engineer है कि नहीं है, वो architecture है कि नहीं है लेकिन उसको समझ आती है अनुभवों से। उसी प्रकार से जब house के अंदर कानून बनता है। उसी विधा से हम देखते हैं क्या कमियां हैं, क्या अच्छाईयां हैं। आने वाली पीढ़ियों तक क्या प्रभाव पैदा होगा। मैं चाहूंगा थोड़ा सा आप कोशिश कीजिए, आप बहुत बड़ा contribute कर सकते हैं क्योंकि आपके अंदर देखने की, सुनने की और शक्ति दी है। जो आप चीजों को समय से पहले भांप सकते हैं, शायद पुरष नहीं भांप सकते हैं।

उसके क्या Reification होंगे, उसका अंदाजा शायद आपको जल्दी आता है, पुरुष को शायद नहीं आता है। ये ईश्वर दत्त शक्ति आपके पास है। क्या इसका उपयोग विधायिका में हो सकता है क्या, हम जहां बैठे हैं वहां हो सकता है, हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम करेंगे। जनप्रतिनिधि के नाते हमारी अपनी कोई छवि बनी है क्या। मैं मानता हूं कि, आपसे आग्रह करूंगा कि आप carefully प्रयास कीजिए कि आपके क्षेत्र में आपकी एक छवि हो, आपकी पहचान वो बने और ये एक साधना है, एक निरंतरता है तब जाकर के बनती है। जैसा मान लीजिए कोई जनप्रतिनिधि होता है कि भई मंगल और बुध सुबह 8 बजे मेरा इस जगह पर मिलना तय, मतलब है। बारिश हो, धूप हो, कुछ भी आपकी पहचान बन जाएगी। अरे वाह मंगल या बुध यानि हमारे जनप्रतिनिधि यहां होंगे ही होंगे, जरूर मिलेंगे। हम कहेंगे भई ये telephone number पर message दे दीजिए, मैं रहूं या न रहूं वो telephone number आपके जैसी ही ताकतवर बन जाए। ऐसा एक जनप्रतिनिधि के नाते।

हमारे मतदान क्षेत्र में, हम अपनी एक पहचान दर्ज करा सकते हैं क्या और आप देखिए एक बार जनसामान्य में आपकी कार्यशैली की, आपके वाणी, विचार, व्यवहार की एक अगर particular छवि बनी, वो लंबे अरसे तक आपको काम आएगी, लंबे अरसे तक काम आएगी और ये कोशिश करनी चाहिए। जनप्रतिनिधि के नाते कभी-कभार, राजनीति एक competition का खेल होता है, स्पर्धा हर पल होती है लेकिन जब स्पर्धा में ईर्ष्या भाव प्रबल हो जाता है तो मानकर चलिए कि हम आगे जाने के हकदार नहीं रहते हैं और उसके कारण क्या होता है कि अगर हमारे कार्यक्षेत्र में दो-चार और महिलाएं तेजस्वी नजर आएं, ताकतवर नजर आएं तो हमारा हौंसला पस्त हो जाता है, हमें डर लगता है। कहीं यार अगली बार टिकट इसको तो नहीं मिल जाएगी, मेरा क्या होगा। हमें अपने आपको निरंतर able बनाते हुए आगे जाना चाहिए और अगर हम कोशिश करेंगे कि मैं हूं जो हूं लेकिन मैं किसी को आने नहीं दूं तो आप मानकर चलिए कि आने वाले प्रवाह की ताकत इतनी होगी कि वो आपको नीचे गिराकर के ऊपर चले जाएंगे और तब आप इतने नीचे चले जाएंगे कि कभी ऊपर नहीं होंगे। लेकिन अगर आप औरों को आने देते हैं, आने देते हैं। आप ऊपर चले जाएंगे, नीचे आपका बेस बनता चला जाएगा, पिरामिड की तरह आपकी ताकत बढ़ती जाएगी।

ये सार्वजनिक जीवन में जनप्रतिनिधि के नाते मेरी अपनी शक्ति और शख्सियत, इसके लिए मुझे कोशिश करनी चाहिए। हम ये तय करें, हमारे हर एक के कार्यक्षेत्र में, एक-तिहाई महिलाएं नेतृत्व कर रही हैं। कोई गांव का नेतृत्व कर रही हैं, कोई नगर का नेतृत्व कर रही हैं, कोई शहर का कर रही हैं, कोई बड़े शहर, एक तिहाई क्योंकि one-third chairmanship किसी न किसी महिला के हाथ में है। ये एक-तिहाई प्रतिनिधि, बाकी छोड़िए, ये एक-तिहाई प्रतिनिधि वो आपकी सोच, आपके विचार को, जो आपके under में काम करते हैं, आपके कार्यक्षेत्र में हैं। अगर आप विधायक हैं और 100 गांव हैं, अगर उस 100 गांव के अंदर से 30-35 महिलाएं हैं, प्रधान महिलाएं हैं क्या आपने उनको empower किया है, क्या आपने उनका सशक्तिकरण किया है, क्या आपने कभी एक दिन उनके साथ बिताया है।

मैं आपसे आग्रह करूंगा कि जो सुमित्रा जी ने हम सब के लिए यहां पर किया, क्या आप जाकर के अपने लोकसभा क्षेत्र में या अपने विधानसभा क्षेत्र में, वहां जो elected महिलाएं हैं क्या उनका एक दिन का कार्यक्रम आप कर सकते हैं क्या, इस बात को आप ले जा सकते हैं क्या, आप देखिए ये चीज नीचे तक चली जाए तब तो ये सशक्तिकरण की दिशा में एक बहुत बड़ा बदलाव का माहौल बनेगा और किसी भी दल की क्यों न हो इसमें दलबाजी नहीं होनी चाहिए। आपने देखा यहां सभी दल के लोग हैं और मैं तो सुमित्रा जी को बधाई देता हूं उन्होंने इस कार्यक्रम को बनाने के लिए जो कमेटी बनाई थी वो सब दल के लोग थे और करीब-करीब सब Junior MP थे लेकिन उन्होंने बड़े उत्साह के साथ इसे Plan किया। कहने का तात्पर्य है कि हम, हमारी इस इकाई को Empower कैसे करें, ताकतवर कैसे बनाएं, उनके अंदर सामर्थ्य कैसे लाएं। ये सामर्थ्य लाने के तरीकों में हम खुद नेतृत्व कर सकते हैं क्या, अगर हम नेतृत्व करेंगे तो हम बहुत बड़ी परिवर्तन ला सकते हैं।

एक और विषय है जिस पर मैं आपसे आग्रह करूंगा वो है Technology, हम ये मानकर चलें Technology का एक बहुत बड़ा role व्यक्ति के जीवन में, समाज के जीवन में सुनिश्चित हो चुका है। हमने अपने आप को उसके साथ cope up करना पड़ रहा है। मेरा ये मत है कि पुरुषों में Technology को adopt करने की जितनी ताकत है, उससे ज्यादा Technology को adopt करने की ताकत महिलाओं में है। आप देखिए किसी भी kitchen में जाइए आप, Most Modern Gadget Technology के लिए जो kitchen में उपयोग आता है वो महिलाएं आराम से उपयोग करती होंगी। इतना ही नहीं उनके घर में kitchen में मदद करने वाली कोई अनपढ़ भी महिला होगी लेकिन उसको वो सब चलाना आता होगा कैसे चलाना है, क्या कैसे चलाना है, सब कुछ उसे आता होगा। मतलब Technology adopt करने की महिलाओं की एक विशेष शक्ति होती है।

आपने देखा होगा Consumer Product जो करते हैं उनका भी target क्या रहता है कि women centric production कि उसको मालूम है कि market तुरंत मिलेगा क्योंकि वो तुरंत स्वीकार करती है। Technology महिलाओं के लिए कोई नई नहीं होती है, वो स्वीकार करती है लेकिन जनप्रतिनिध के नाते जो बदला हुआ युग है, उसमें हम Technology का कैसे उपयोग कर सकते हैं। हमारे communication के लिए technology का उपयोग कैसे कर सकते हैं। हम अपने कार्यक्षेत्र में, लोक संपर्क के लिए technology का उपयोग कैसे करें, हम जनता का सामान्य बातों को जानने के लिए technology का कैसे उपयोग करें, हमारी अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए technology का उपयोग कैसे करें, उसका भरपूर प्रयास करना चाहिए। आज आपका कोई मतदाता ऐसा नहीं होगा कि जो Mobile Phoneसे connect न हो, 2 percentभी नहीं होंगे लेकिन आप उनसे connect हैं, मतलब something is missingअगर आज यहां के दो दिन के अनुभव आप इस technology के माध्यम से करें तो देश औऱ दुनिया को पता चलेगा कि हां ये कुछ हो रहा है और जानकारियां पाने का उत्तम से उत्तम साधन है।

मेरा तो अनुभव है। मैं ऩरेंद्र मोदी एप पर दखता हूं इतने लोग मेरे से जुड़े हुए हैं, मुझे इतनी जानकारियां देते हैं। हर चीज का immediate पता चलता है। कुछ हुआ तो immediateपता चलता है। इतनी well inform रह सकता हूं काम के अंदर। mygov.in एक platform चलाता हूं PMO से, उसके द्वारा भी मैं जनसामान्य को जोड़ता हूं। आप भी अपने तरीके से ऐसी व्यवस्था कर सकते हैं और मैं तो लोकसभा को, राज्यसभा को एक प्रार्थना करूंगा कि आप women प्रतिनिधि का एक e platform तैयार कर सकते हैं क्या और उनकी जो बातें हैं वो officially लोकसभा, राज्यसभा website को चलाएं। पूरे देश के महिला प्रतिनिधियों के लिए एक अवसर दिया जाए। देखिए technology की अपनी एक ताकत है और मेरा एक अनुभव है। मैं जब गुजरात में मुख्यमंत्री था, कपराडा एक तहसील है। बहुत ही interior बहुत ही Tribal belt है। आमतौर पर किसी मुख्यमंत्री का वहां जाना होता ही नहीं लेकिन मेरा अपने कार्यक्षेत्र में काम का आग्रह रहता था सभी क्षेत्र में स्थानों पर जाऊं, खुद जाने मेरा प्रयास रहता था। लेकिन मेरा वहां जाना बन ही नहीं रहा था। दो-तीन साल चले गए उस इलाके में जाना हुआ ही नहीं। मैंने कहा भई मैं जाऊंगा, कुछ नहीं तो एक पेड़ लगाकर के वापस आऊंगा, लेकिन जाऊंगा।

खैर फिर हमारे अफसरों को भी लगा कि ये तो अब जाना ही है इनको तो आखिरकर उन्होंने एक कार्यक्रम ढूंढा, एक chilling center का उद्घाटन करना था। chilling center क्या होता है, दूध आता है, दूध को थोड़े समय रखने के लिए काम होता है और 50-60 लाख का होता है। अब वो संकोच कर रहे थे कि मुख्यमंत्री 50 लाख रुपए केproject के लिए जाएंगे। मैंने कहा भी मैं जाऊंगा, मुझे जाना है, उस इलाके में मैं गया नहीं, मुझे जाना है। मैं गया तो वो तो forest था पूरा तो जनसभा के लिए जगह भी नहीं थी लेकिन उससे तीन किलोमीटर दूर एक स्कूल के मैदान में उन्होंने public meeting रखी थी लेकिन यहां जहां chilling center पर मैं गया, वहां दूध भरने वाली आदिवासी 30-35 बहनें उन्होंने बुलाकर के रखी थीं,chilling center का उद्घाटन करना था। मैं हैरान था जब मैं वहां कार्यक्रम के लिए गया तो ये सारी Tribal बहनें वो, जो security की fencing की गई थी वहां पर खड़ी थीं। हर एक के हाथ में Mobile Phone था और photo निकालती थीं।

मैं उस इलाके की बात करता हूं जहां CM जाते नहीं हैं forest है, बिल्कुल Tribal लोग हैं। उस समय की बात करता हूं, 10 साल पहले की बात कर रहा हूं। सब photo निकाल रही थीं तो मुझे आश्चर्य हुआ, मैं उनके पास गया, मैंने कहा ये photo निकालकर क्या करोगे आप लोग और उन्होंने जो जवाब दिया वो मैं आज भी भूल नहीं सकता हूं। उन्होंने कहा इसको जाकर के download करा देंगे। वो पढ़ी-लिखी नहीं थीं लेकिन download शब्द उनको मालूम था। Mobile Phone से किसी दुकान में जाकर के download होता है। कहने का तात्पर्य ये है कि ये technology कहां-कहां पहुंची है। क्या हमने अपने आप को उसके साथ connect करने का प्रयास किया है। आपकी अपनी ताकत बढ़ाने की दिशा में आपने प्रयास करना चाहिए।

एक और विषय है communication, मैं ये नहीं कहता हूं कि आपने कोई बहुत बड़े orator बनना चाहिए, जरूर नहीं है, बन सकते हैं, अच्छी बात है लेकिन ये inferiority की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर आप कोशिश करें तो आप अपनी बातों को ढंग से बताने की ताकत आ सकती है।

आप जनप्रतिनिधि हैं, एक काम कर सकें अगर आप technosavy हैं तो अपने mobile पर उपयोग करें या तो एक छोटा सा I pad रख सकते हैं या नहीं है तो diary में लिख सकते हैं। क्या आप लगातार एक diary maintain करते चलें। अखबार में कोई चीज पढ़ी है लिखकर के और उसमें department बना दीजिए Education का, Irrigation का, Urban development का, Rural Development का और उसमें लिखते चले जाइए घटनाएं, जोड़ते चले जाइए। सालभर के बाद देखोगे आप, आपका अपना ज्ञान का भंडार इतना बड़ा होगा कि कहीं पर भी किसी विषय को लेकर के रूबरू हो रहा होगा तो दो मिनट लेगा आपकी diary को नजर कर लिया, आप एक बड़े विश्वास के साथ, facts and figures के साथ चीजें प्रस्तुत कर सकते हैं।

मैं आपसे आग्रह करूंगा कि आपको अपने आपको प्रभावी भी बनाना पड़ेगा और अगर आप अपने आप को प्रभावी बने रहने के लिए जो प्रय़ास करने चाहिए अगर उसको आप नहीं करेंगे तो सिर्फ व्यवस्थाओं बदलने से परिणाम नहीं आता है। Structure में इधर-उधर बदलाव होता रहेगा, समय-समय पर होता भी रहता है। आवश्यकता है उसमें प्राणवान कैसे बनाएं हम अपनी ताकत को कैसे जोड़ें।

हम कोशिश करें कम से कम समय में हम अपनी बात को कैसे रखें, सटीक तरीके से कैसे रखें और अगर इस बात में आपकी ताकत आई तो आप देखिए लोग आपकी बात से सहमत होते जाएंगे, जुड़ते चले जाएंगे। आपकी leadership establishment करने के लिए आपके पास उम्दा व्यक्तित्व जरूरत नहीं है, आपके पास विषयों की जानकारी होना जरूरी है। आप सदन में बोलते हैं। सब लोगों को सब विषयों का ज्ञान हो ये जरूरी नहीं है। क्या कोई प्रधानमंत्री बन गया तो सब विषयों का उसे ज्ञान होता है, कोई आवश्यक नहीं है लेकिन जिसमें आपकी रुचि है, ऐसे एक या दो विषयों पर आपकी मास्टरी होनी चाहिए। हर बात उससे संबंधित जो चींज मिले, उसको collect करते जाना चाहिए। आपको लगता है कि पानी पर मेरी मास्टरी, मेरे क्षेत्र में पानी का problem है तो मैं पानी पर मास्टरी करूं। आपको लगता है कि नहीं-नहीं मैं technology पर मास्टरी करूं, technology पर करूं। आपको लगता है नहीं-नहीं मैं शिक्षा विषय पर।

 एक विषय पकड़िए, जिस विषय पर आप सर्वाधिक grip ले सकते हैं, सरलता से ले सकते हैं, जानकारियां जोड़ सकते हैं। आप देखिए सदन में routine में शायद आपको आपकी पार्टी के लोग बोलने का अवसर न देते हों लेकिन एकाध पर विषय पर आपकी मास्टरी होगी तो वो खोजते हुआ आएंगे, नहीं-नहीं भई मंगल को Parliament-Assembly में जरूर आइए ये विषय है, आपको तो बोलना ही पड़ेगा, आप बोलेंगे तो दम आएगा क्योंकि आपके पास भंडार भरा पड़ा है। आपको किसी कृपा की जरूरत नहीं पडेगी और इसलिए हम स्वंय अपने आप में कैसे सज्ज करें अपने आप को, उसके लिए प्रयास करें और अगर ये प्रयास करें तो हमें उत्तम परिणाम भी मिलता है। समय काफी मैंने लिया है, आप लोगों को भोजन भी करना है और आप लोग photo के लिए भी तैयार होकर के आए हैं तो मैं फिर एक बार सुमित्रा जी को बहुत-बहुत अभिनंदर करता हूं और आप सबको भी, एक और बात मेरे मन में आती है ये जो Parliament की कमेटियां जाती हैं, Assembly की कमेटियां जाती हैं, राज्यो में जाती हैं। आप भी जाते हैं उसमें क्या आप प्रयास कर सकते हैं क्या, आप पूरा कार्यक्रम जो बनेगा, बनेगा लेकिन आप जहां जाएंगे वहां, वहां की महिला जनप्रतिनिधियों के साथ आधा घंटा, एक घंटा जरूर परिचय करेंगे, मिलेंगे, ये कर सकते हैं क्या, आप देखिए आपको इतनी जानकारियां मिलेंगी।

दूसरा मैं विशेषकर के MPs को प्रार्थना करता हूं। यहां कई राज्यों के MLAs के साथ आपका परिचय हुआ है। सदन के अंदर देश के किसी भी कोने की चर्चा आ पड़ती है। क्या आपने telephone पर आपने जहां परिचय हुआ है उस राज्य की किसी MLA से उसको phone करके पूछ सकते हैं कि भई सदन में ये विषय उठने की संभावना है, तुम्हारे राज्य का हुआ है, बताओ न क्या है, वो कहेगी नहीं मैं एक घंटे में ढूंढकर के बताता हूं। देखिए दोनों तरफ फायदा हो जाएगा। वो भी उस घटना पर concentration करेगी, वो भी study करेगी, आपको घंटे भर में report करेगी और आपको भी अखबारों के द्वारा नहीं first-hand information मिलेगी कि भई केरल में, तिरुवनंतपुरम में ये घटना घटी है और वहां की MLA मुझे ये कह रही हैं तो मैं house के अंदर मैं इस बात के अंदर में ये सही बात बताऊंगी।

आप देखिए जानकारियों के स्रोत ये बहुत आवश्यक हैं। इसमें से और कुछ हम साथ ले जाएं या न ले जा पाएं लेकिन ये जो दायरे से आपका परिचय हुआ है, दल कोई भी होगा, आप contact बनाइए आपको जानकारियों के स्रोत आपके बढ़ते जाएंगे तो हम कहीं जाएं दौरे पर, कमेटियां में आग्रह रखें कि हम वहां के जनप्रतिनिधियों से सामूहिक रूप से आधा घंटा, एक घंटा अवश्य मिले। सरकार programme बनाएं या न बनाएं, हम ये प्रयास करें। धीरे-धीरे ये अपने आप में एक शक्ति संफुट बन जाएगा। जो शक्ति संफुट राष्ट्र को सशक्तिकरण करने की प्रक्रिया में एक बहुत बड़ी अहम भूमिका अदा करेगा और वो दिन दूर नहीं होगा कि जब women empowerment तो होता ही होता चला जाएगा लेकिन देश में women development से आगे बढ़कर के women led development की दिशा में आगे बढ़ेगा। इसी एक पूरी श्रद्धा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्यवाद।

Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches