प्रगतिशील राष्ट्र की गतिशील रेलवे के लिए एक विचारशील बजट प्रस्तुत करने
के लिए, मैं रेलमंत्री सुरेश प्रभु को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।
इस बजट में गरीबों की गरिमा, महिलाओं का गौरव, युवाओं का उत्साह एवं मध्यम वर्ग की मुस्कान बढ़ाने का भरसक प्रयास किया गया है।
पिछले वर्ष के बजट में जो वादे किए गए थे, उसका पूरा-पूरा हिसाब देते हुए
यह बजट, आगे की आशावान रणनीति बनाता है। इस दिशा में पिछले एक साल में काफी
हद तक हमें सफलता मिली है, उसे और बेहतर बनाने का पूरा प्रयास इस बजट में
प्रस्तुत किया गया है।
साफ-सफाई एवं यात्री सुविधा या
Technology-Up gradation पिछले दो रेल बजटों का मूल मंत्र रहा है। साथ ही
साथ रेलवे Projects को मात्र Completion से नहीं बल्कि commissioning इससे
परिभाषित किया, मैं समझता हूँ कि ये नीतिगत बदलाव देश की अर्थ व्यवस्था
में एक Paradigm shift है। गरीबों के लिए Super-fast train की विशेष
व्यवस्था करते हुए अंत्योदय एक्सप्रेस एवं दीनदयालु रेल डब्बों की
शुरूआत हमारी सरकार की गरीबों के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट करती है।
रेलवे में IT सहित नई Technology, अधिक पूँजी निवेश एवं अमलीकरण को असरदार
बनाते हुए यह रेल बजट देश की अर्थ व्यवस्था में दूरगामी सकारात्मक
योगदान करेगा।
देश के पिछड़े क्षेत्रों में, खासकर उत्तर पूर्वी
राज्यों में North-East में रेलवे Connectivity बढ़ाने का सरकार का वादा
पूरा करने की दिशा में, उत्तम कदम उठाए गए हैं। साथ ही साथ, हमारे रेल
मार्गों की ऐतिहासिक समस्या जोकि क्षमता-हीनता के कारण थी उसे पिछले एक
साल में काफी हद तक दूर किया गया है। और इस दिशा में यह रेल बजट और भी
पुख्ता इंतजाम करता है।
श्रीमान सुरेश प्रभु जी के पहले, जो बजट
आए वो हमने देखे हैं। मैं उनकी आलोचना करना नहीं चाहता हूँ, लेकिन अगर मैं
गत-सरकार के पॉंच वर्ष के बजट को देखूँ, तो सुरेश प्रभु जी के बजट में ढाई
गुना निवेश के साथ एक बहुत बड़ा jump लगाया गया है। ये बजट देश के
नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी होगा। सबसे अच्छी बात यह है कि
हमारे रेलवे के विकास में राज्य सरकारें भी उत्साह से भाग लेने जा रही
हैं। उसका विस्तृत road-map प्रस्तुत किया गया है। साथ ही यात्रियों एवं
रेल कर्मचारियों का सहयोग लेने का प्रयास भी किया गया है। खर्च में
अनुशासन, प्रबंधन में दक्षता एवं उपभोगता के प्रति जवाबदेही हमारी सरकार का
focus है जिसे यह रेल बजट पूर्णरूप से दर्शाता है।
मैं फिर एक
बार रेलमंत्री श्रीमान सुरेश प्रभु जी को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ, रेलवे
परिवार को बधाई देता हूँ, टीम रेलवे को बधाई देता हूँ।
The Prime Minister, Shri Narendra Modi, today interacted with 181 IAS probationers of the 2015 batch.
The Prime Minister exhorted the IAS
probationers to recall Mahatma Gandhi’s talisman of keeping in mind the
welfare of the poorest of the poor, while taking decisions.
Noting that several of the probationers
had worked in the private sector before joining the IAS, he said that
while their earlier assignments were “jobs”, they are now going to
undertake “service.”
Stressing the importance of progress and
connectivity in the North-East, the Prime Minister said that if the
North-East developed, the entire country would march forward.
In response to a question, Shri Narendra
Modi said that his extensive travels across India for over four
decades, and his experience as Chief Minister of a State, had helped him
in his work as Prime Minister.
आज संसद का बजट सत्र प्रांरभ हो रहा है।
देश के सवा सौ करोड़ देशवासियों की निगाहें संसद पर, संसद की कार्यवाही पर,
रेल एवं जनरल बजट पर केंद्रित है।
आज भारत की वैश्विक अर्थव्यवस्था में जो स्थिति बनी है उसके कारण विश्व
का ध्यान भी भारत के इस बजट सत्र पर है। पिछले कई दिनों से लगातार सभी
दलों से विचार-विमर्श चल रहा है। औपचारिकता से ऊपर उठ करके विचार-विमर्श चल
रहा है। one-to-one भी काफी बातें हो रही है। और यह विश्वास मेरा है, कि
संसद का समय का सदुपयोग होगा, सार्थकचर्चाएं होगी। देश के सामान्य
नागरिकों की जो आशाएं-अपेक्षाएं हैं, उन पर गहन चिंतन होगा।
अब तक
जितनी भी मीटिंगे हुई हैं, सभी विपक्ष के साथियों ने जो सकारात्मक रुख
दिखाया है, आज से प्रांरभ हो रहे सत्र में, और आने वाले दिनों में, उसका
पूरा-पूरा एहसास देशवासयिों को जरूर होगा।
मैं आशा करता हूं कि
सदन का उपयोग गहन विचार-विमर्श के लिए होना चाहिए। सरकार की भी भरपूर
आलोचना होनी चाहिए। सरकार की कमियां भी उजागर होनी चाहिए। और वही एक मार्ग
है लोकतंत्र को मजबूत बनाने का, जन-सामान्य की आशा-आकांक्षाओं को परिपूर्ण
करने का।
सभी विद्यार्थी दोस्तों और उनके अभिभावकों, यहां के सभी faculty के members, उपस्थित सभी महानुभाव!
दीक्षांत
समारोह में जाने का अवसर पहले भी मिला है। कई स्थानों पर जाने का अवसर
मिला है लेकिन एक विश्वविद्यालय की शताब्दी के समय दीक्षांत समारोह में
जाने का सौभाग्य कुछ और ही होता है। मैं भारत रत्न महामना जी के चरणों
में वंदन करता हूं कि 100 वर्ष पूर्व जिस बीज उन्होंने बोया था वो आज इतना
बड़ा विराट, ज्ञान का, विज्ञान का, प्रेरणा का एक वृक्ष बन गया।
दीर्घदृष्टा
महापुरुष कौन होते हैं, कैसे होते हैं? हमारे कालखंड में हम समकक्ष
व्यक्ति को कभी कहें कि यह बड़े दीर्घदृष्टा है, बड़े visionary है तो
ज्यादा समझ में नहीं आता है कि यह दीर्घदृष्टा क्या होता है visionary
क्या होता है। लेकिन 100 साल पहले महामना जी के इस कार्य को देखें तो पता
चलता है कि दीर्घदृष्टा किसे कहते हैं, visionary किसे कहते हैं। गुलामी
के उस कालखंड में राष्ट्र के भावी सपनों को हृदयस्थ करना और सिर्फ यह देश
कैसा हो, आजाद हिंदुस्तान का रूप-रंग क्या हो, यह सिर्फ सपने नहीं है
लेकिन उन सपनों को पूरा करने के लिए सबसे प्राथमिक आवश्यकता क्या हो सकती
है? और वो है उन सपनों को साकार करे, ऐसे जैसे मानव समुदाय को तैयार करना
है। ऐसे सामर्थ्यवान, ऐसे समर्पित मानवों की श्रृंखला, शिक्षा और संस्कार
के माध्यम से ही हो सकती है और उस बात की पूर्ति को करने के लिए महामना जी
ने यह विश्वविद्यालय का सपना देखा।
अंग्रेज यहां शासन करते थे,
वे भी यूनिवर्सिटियों का निर्माण कर रहे थे। लेकिन ज्यादातर presidencies
में, चाहे कोलकाता है, मुंबई हो, ऐसे स्थान पर ही वो प्रयास करते हैं। अब
उस प्रकार से मनुष्यों का निर्माण करना चाहते थे, कि जिससे उनका कारोबार
लंबे समय तक चलता रहे। महामना जी उन महापुरुषों को तैयार करना चाहते थे कि
वे भारत की महान परंपराओं को संजोए हुए, राष्ट्र के निर्माण में भारत की
आजादी के लिए योग्य, सामर्थ्य के साथ खड़े रहे और ज्ञान के अधिष्ठान पर
खड़े रहें। संस्कारों की सरिता को लेकर के आगे बढ़े, यह सपना महामना जी ने
देखा था।
जो काम महामना जी ने किया, उसके करीब 15-16 साल के बाद
यह काम महात्मा गांधी ने गुजरात विद्यापीठ के रूप में किया था। करीब-करीब
दोनों देश के लिए कुछ करने वाले नौजवान तैयार करना चाहते थे। लेकिन आज हम
देख रहे हैं कि महामना जी ने जिस बीज को बोया था, उसको पूरी शताब्दी तक
कितने श्रेष्ठ महानुभावों ने, कितने समर्पित शिक्षाविदों ने अपना ज्ञान,
अपना पुरूषार्थ, अपना पसीना इस धरती पर खपा दिया था। एक प्रकार से जीवन के
जीवन खपा दिये, पीढ़ियां खप गई। इन अनगिनत महापुरूषों के पुरूषार्थ का
परिणाम है कि आज हम इस विशाल वट-वृक्ष की छाया में ज्ञान अर्जित करने के
सौभाग्य बने हैं। और इसलिए महामना जी के प्रति आदर के साथ-साथ इस पूरी
शताब्दी के दरमियान इस महान कार्य को आगे बढ़ाने में जिन-जिन का योगदान
है, जिस-जिस प्रकार का योगदान है जिस-जिस समय का योगदान है, उन सभी
महानुभवों को मैं आज नमन करता हूं।
एक शताब्दी में लाखों युवक
यहां से निकले हैं। इन युवक-युवतियों ने करीब-करीब गत 100 वर्ष में दरमियान
जीवन के किसी न किसी क्षेत्र में जा करके अपना योगदान दिया है। कोई
डॉक्टर बने हुए होंगे, कोई इंजीनियर बने होंगे, कोई टीचर बने होंगे, कोई
प्रोफेसर बने होंगे, कोई सिविल सर्विस में गये होंगे, कोई उद्योगकार बने
हुए होंगे और भारत में शायद एक कालखंड ऐसा था कि कोई व्यक्ति कहीं पर भी
पहुंचे, जीवन के किसी भी ऊंचाई पर पहुंचे जिस काम को करता है, उस काम के
कारण कितनी ही प्रतिष्ठा प्राप्त क्यों न हो, लेकिन जब वो अपना परिचय
करवाता था, तो सीना तानकर के कहता था कि मैं BHU का Student हूं।
मेरे
नौजवान साथियों एक शताब्दी तक जिस धरती पर से लाखों नौजवान तैयार हुए हो
और वे जहां गये वहां BHU से अपना नाता कभी टूटने नहीं दिया हो, इतना ही
नहीं अपने काम की सफलता को भी उन्होंने BHU को समर्पित करने में कभी संकोच
नहीं किया। यह बहुत कम होता है क्योंकि वो जीवन में जब ऊंचाइयां प्राप्त
करता है तो उसको लगता है कि मैंने पाया है, मेरे पुरुषार्थ से हुआ, मेरी
इस खोज के कारण हुआ, मेरे इस Innovation के कारण हुआ। लेकिन ये BHU है कि
जिससे 100 साल तक निकले हुए विद्यार्थियों ने एक स्वर से कहा है जहां गये
वहां कहा है कि यह सब BHU के बदौलत हो रहा है।
एक संस्था की ताकत
क्या होती है। एक शिक्षाधाम व्यक्ति के जीवन को कहां से कहां पहुंचा सकता
है और सारी सिद्धियों के बावजूद भी जीवन में BHU हो सके alumni होने का
गर्व करता हो, मैं समझता हूं यह बहुत बड़ी बात है, बहुत बड़ी बात है। लेकिन
कभी-कभी सवाल होता है कि BHU का विद्यार्थी तो BHU के गौरव प्रदान करता है
लेकिन क्या भारत के कोने-कोने में, सवा सौ करोड़ देशवासियों के दिल में यह
BHU के प्रति वो श्रद्धा भाव पैदा हुआ है क्या? वो कौन-सी कार्यशैलियां
आई, वो कौन से विचार प्रवाह आये, वो कौन-सी दुविधा आई जिसने इतनी महान
परंपरा, महान संस्था को हिंदुस्तान के जन-जन तक पहुंचाने में कहीं न कहीं
संकोच किया है। आज समय की मांग है कि न सिर्फ हिंदुस्तान, दुनिया देखें
कि भारत की धरती पर कभी सदियों पहले हम जिस नालंदा, तक्षशिला बल्लभी उसका
गर्व करते थे, आने वाले दिनों में हम BHU का भी हिंदुस्तानी के नाते गर्व
करते हैं। यह भारत की विरासत है, भारत की अमानत है, शताब्दियों के
पुरुषार्थ से निकली हुई अमानत है। लक्षाविद लोगों की तपस्या का परिणाम है
कि आज BHU यहां खड़ा है और इसलिए यह भाव अपनत्व, अपनी बातों का, अपनी
परंपरा का गौरव करना और हिम्मत के साथ करना और दुनिया को सत्य समझाने के
लिए सामर्थ्य के साथ करना, यही तो भारत से दुनिया की अपेक्षा है।
मैं कभी-कभी सोचता हूं योग। योग, यह कोई नई चीज नहीं है। भारत में सदियों
से योग की परंपरा चली आ रही है। सामान्य मानविकी व्यक्तिगत रूप से योग के
आकर्षित भी हुआ है। दुनिया के अलग-अलग कोने में, योग को अलग-अलग रूप में
जिज्ञासा से देखा भी गया है। लेकिन हम उस मानसिकता में जीते थे कि कभी हमें
लगता नहीं था कि हमारे योग में वह सामर्थ्य हैं जो दुनिया को अपना कर
सकता है। पिछले साल जब United nation ने योग को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस
के रूप में स्वीकार किया। दुनिया के 192 Country उसके साथ जुड़ गये और
विश्व ने गौरव ज्ञान किया, विश्व ने उसके साथ जुड़ने का आनंद लिया। अगर
अपने पास जो है उसके प्रति हम गौरव करेंगे तो दुनिया हमारे साथ चलने के लिए
तैयार होती हैं। यह विश्वास, ज्ञान के अधिष्ठान पर जब खड़ा रहता है, हर
विचार की कसौटी पर कसा गया होता है, तब उसकी स्वीकृति और अधिक बन जाती है।
BHU के द्वारा यह निरंतर प्रयास चला आ रहा है।
आज जिन छात्रों का
हमें सम्मान करने का अवसर मिला, मैं उनको, उनके परिवार जनों को हृदय से
बधाई देता हूं। जिन छात्रों को आज अपनी शिक्षा की पूर्ति के बाद दीक्षांत
समारोह में डिग्रियां प्राप्त हुई हैं, उन सभी छात्रों का भी मैं हृदय से
बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं। यह दीक्षांत समारोह है, हम यह कभी भी मन में न
लाएं कि यह शिक्षांत समारोह है। कभी-कभी तो मुझे लगता है दीक्षांत समारोह
सही अर्थ में शिक्षा के आरंभ का समारोह होना चाहिए। यह शिक्षा के अंत का
समारोह नहीं है और यही दीक्षांत समारोह का सबसे बड़ा संदेश होता है कि हमें
अगर जिन्दगी में सफलता पानी है, हमें अगर जिन्दगी में बदलते युग के साथ
अपने आप को समकक्ष बनाए रखना है तो उसकी पहली शर्त होती है – हमारे भीतर का
जो विद्यार्थी है वो कभी मुरझा नहीं जाना चाहिए, वो कभी मरना नहीं चाहिए।
दुनिया में वो ही इस विशाल जगत को, इस विशाल व्यवस्था को अनगिनत आयामों
को पा सकता है, कुछ मात्रा में पा सकता है जो जीवन के अंत काल तक
विद्यार्थी रहने की कोशिश करता है, उसके भीतर का विद्यार्थी जिन्दा रहता
है।
आज जब हम दीक्षांत समारोह से निकल रहे हैं तब, हमारे सामने एक
विशाल विश्व है। पहले तो हम यह कुछ square किलोमीटर के विश्व में गुजारा
करते थे। परिचितों से मिलते थे। परिचित विषय से संबंधित रहते थे, लेकिन अब
अचानक उस सारी दुनिया से निकलकर के एक विशाल विश्व के अंदर अपना कदम रखने
जा रहे हैं। ये पहल सामान्य नहीं होते हैं। एक तरफ खुशी होती है कि चलिए
मैंने इतनी मेहनत की, तीन साल - चार साल - पांच साल इस कैंपस में रहा।
जितना मुझसे हो सकता था मैं ले लिया, पा लिया। लेकिन अब निकलते ही, दुनिया
का मेरी तरफ नजरिया देखने का बदल जाता है।
जब तक मैं विद्यार्थी
था, परिवार, समाज, साथी, मित्र मेरी पीठ थपथपाते रहते थे, नहीं-नहीं बेटा
अच्छा करो, बहुत अच्छा करो, आगे बढ़ो, बहुत पढ़ो। लेकिन जैसे ही
सर्टिफिकेट लेकर के पहुंचता हूं तो सवाल उठता है बताओ भई, अब आगे क्या
करोगे? अचानक, exam देने गया तब तक तो सारे लोग मुझे push कर रहे थे, मेरी
मदद कर रहे थे, प्रोत्साहित कर रहे थे। लेकिन सर्टिफिकेट लेकर घर लौटा तो
सब पूछ रहे थे, बेटा अब बताओ क्या? अब हमारा दायित्व पूरा हो गया, अब
बताओ तुम क्या दायित्व उठाओगे और यही पर जिन्दगी की कसौटी का आरंभ होता
है और इसलिए जैसे science में दो हिस्से होते हैं – एक होता है science और
दूसरा होता है applied science. अब जिन्दगी में जो ज्ञान पाया है वो
applied period आपका शुरू होता है और उसमें आप कैसे टिकते है, उसमें आप
कैसे अपने आप को योग्य बनाते हैं। कभी-कभार कैंपस की चारदीवारी के बीच
में, क्लासरूम की चारदीवारी के बीच में शिक्षक के सानिध्य में, आचार्य के
सानिध्य में चीजें बड़ी सरल लगती है। लेकिन जब अकेले करना पड़ता है, तब
लगता है यार अच्छा होता उस समय मैंने ध्यान दिया होता। यार, उस समय तो
मैं अपने साथियों के साथ मास्टर जी का मजाक उड़ा रहा था। यार ये छूट गए।
फिर लगता है यार, अच्छा होता मैंने देखा होता। ऐसी बहुत बातें याद आएगी।
आपको जीवन भर यूनिवर्सिटी की वो बातें याद आएगी, जो रह गया वो क्या था और न
रह गया होता तो मैं आज कहा था? ये बातें हर पल याद आती हैं।
मेरे
नौजवान साथियों, यहां पर आपको अनुशासन के विषय में कुलाधिपति जी ने एक
परंपरागत रूप से संदेश सुनाया। आप सब को पता होगा कि हमारे देश में शिक्षा
के बाद दीक्षा, यह परंपरा हजारों साल पुरानी है और सबसे पहले तैतृक उपनिषद
में इसका उल्लेख है, जिसमें दीक्षांत का पहला अवसर रेखांकित किया गया है।
तब से भारत में यह दीक्षांत की परंपरा चल रही है और आज भी यह दीक्षांत
समारोह एक नई प्रेरणा का अवसर बन जाता है। जीवन में आप बहुत कुछ कर पाएंगे,
बहुत कुछ करेंगे, लेकिन जैसा मैंने कहा, आपके भीतर का विद्यार्थी कभी मरना
नहीं चाहिए, मुरझाना नहीं चाहिए। जिज्ञासा, वो विकास की जड़ों को मजबूत
करती है। अगर जिज्ञासा खत्म हो जाती है तो जीवन में ठहराव आ जाता है। उम्र
कितनी ही क्यों न हो, बुढ़ापा निश्चित लिख लीजिए वो हो जाता है और इसलिए
हर पल, नित्य, नूतन जीवन कैसा हो, हर पल भीतर नई चेतना कैसे प्रकट हो, हर
पल नया करने का उमंग वैसा ही हो जैसा 20 साल पहले कोई नई चीज करने के समय
हुआ था। तब जाकर के देखिए जिन्दगी जीने का मजा कुछ और होता है। जीवन कभी
मुरझाना नहीं चाहिए और कभी-कभी तो मुझे लगता है मुरझाने के बजाए अच्छा
होता मरना पसंद करना। जीवन खिला हुआ रहना चाहिए। संकटों के सामने भी उसको
झेलने का सामर्थ्य आना चाहिए और जो इसे पचा लेता है न, वो अपने जीवन में
कभी विफल नहीं जाता है। लेकिन तत्कालिक चीजों से जो हिल जाता है, अंधेरा
छा जाता है। उस समय यह ज्ञान का प्रकाश ही हमें रास्ता दिखाता है और इसलिए
ये BHU की धरती से जो ज्ञान प्राप्त किया है वो जीवन के हर संकट के समय
हमें राह दिखाने का, प्रकाश-पथ दिखाने का एक अवसर देता है।
देश और
दुनिया के सामने बहुत सारी चुनौतियां हैं। क्या उन चुनौतियों में भारत
अपनी कोई भूमिका अदा कर सकता है क्या? क्यों न हमारे ये संस्थान, हमारे
विद्यार्थी आने वाले युगों के लिए मानव जाति को, विश्व को, कुछ देने के
सपने क्यों न देखे? और मैं चाहूंगा कि BHU से निकल रहे छात्रों के
दिल-दिमाग में, यह भाव सदा रहना चाहिए कि मुझे जो है, उससे अच्छा करू वो
तो है, लेकिन मैं कुछ ऐसा करके जाऊं जो आने वाले युगों तक का काम करे।
समाज
जीवन की ताकत का एक आधार होता है – Innovation. नए-नए अनुसंधान सिर्फ
पीएचडी डिग्री प्राप्त करने के लिए, cut-paste वाली दुनिया से नहीं। मैं
तो सोच रहा था कि शायद यह बात BHU वालों को तो पता ही नहीं होगी, लेकिन
आपको भली-भांति पता है। लेकिन मुझे विश्वास है कि आप उसका उपयोग नहीं करते
होंगे। हमारे लिए आवश्यक है Innovation. और वो भी कभी-कभार हमारी अपनी
निकट की स्थितियों के लिए भी मेरे मन में एक बात कई दिनों से पीड़ा देती
है। मैं दुनिया के कई noble laureate से मिलने गया जिन्होंने medical
science में कुछ काम किया है और मैं उनके सामने एक विषय रखता था। मैंने
कहा, मेरे देश में जो आदिवासी भाई-बहन है, वो जिस इलाके में रहते हैं। उस
belt में परंपरागत रूप से एक ‘sickle-cell’ की बीमारी है। मेरे आदिवासी
परिवारों को तबाह कर रही है। कैंसर से भी भयंकर होती है और व्यापक होती
है। मेरे मन में दर्द रहता है कि आज का विज्ञान, आज की यह सब खोज, कैंसर के
मरीज के लिए नित्य नई-नई चीजें आ रही हैं। क्या मेरे इस sickle-cell से
पीड़ित, मेरे आदिवासी भाइयो-बहनों के लिए शास्त्र कुछ लेकर के आ सकता है,
मेरे नौजवान कुछ innovation लेकर के आ सकते हैं क्या? वे अपने आप को खपा
दे, खोज करे, कुछ दे और शायद दुनिया के किसी और देश में खोज करने वाला जो
दे पाएगा, उससे ज्यादा यहां वाला दे पाएगा क्योंकि वो यहां की रुचि,
प्रकृति, प्रवृत्ति से परिचित है और तब जाकर के मुझे BHU के विद्यार्थियों
से अपेक्षा रहती है कि हमारे देश की समस्याएं हैं। उन समस्याओं के
समाधान में हम आने वाले युग को देखते हुए कुछ दे सकते हैं क्या?
आज
विश्व Global warming, Climate change बड़ा परेशान है। दुनिया के सारे देश
अभी पेरिस में मिले थे। CoP-21 में पूरे विश्व का 2030 तक 2 डिग्री
temperature कम करना है। सारा विश्व मशक्कत कर रहा है, कैसे करे? और अगर
यह नहीं हो पाया तो पता नहीं कितने Island डूब जाएंगे, कितने समुद्री तट के
शहर डूब जाएंगे। ये Global warming के कारण पता नहीं क्या से क्या हो
जाएगा, पूरा विश्व चिंतित है। हम वो लोग है जो प्रकृति को प्रेम करना,
हमारी रगों में है। हम वो लोग है जिन्होंने पूरे ब्रह्मांड को अपना एक
पूरा परिवार माना हुआ है। हमारे भीतर, हमारे ज़हन में वो तत्व ज्ञान तो
भरा पड़ा है और तभी तो बालक छोटा होता है तो मां उसे शिक्षा देती है कि
देखो बेटे, यह जो सूरज है न यह तेरा दादा है और यह चांद है यह तेरा मामा
है। पौधे में परमात्मा देखता है, नदी में मां देखता है। ये जहां पर
संस्कार है, जहां प्रकृति का शोषण गुनाह माना जाता है। Exploitation of
the nature is a crime. Milking of the nature यही हमें अधिकार है। यह जिस
धरती पर कहा जाता है, क्या दुनिया को Global warming के संकट से बचाने के
लिए कोई नए आधुनिक innovation के साथ मेरे भारत के वैज्ञानिक बाहर आ सकते
हैं क्या, मेरी भारत की संस्थाएं बाहर आ सकती हैं क्या? हम दुनिया को
समस्याओं से मुक्ति दिलाने का एक ठोस रास्ता दिखा सकते हैं क्या? भारत
ने बीड़ा उठाया है, 2030 तक दुनिया ने जितने संकल्प किए, उससे ज्यादा हम
करना चाहते हैं। क्योंकि हम यह मानते हैं, हम सदियों से यह मानते हुए आए
हैं कि प्रकृति के साथ संवाद होना चाहिए, प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं होना
चाहिए।
अभी हमने दो Initiative लिए हैं, एक अमेरिका, फ्रांस, भारत
और बिल गेट्स का NGO, हम मिलकर के Innovation पर काम कर रहे हैं। Renewal
energy को affordable कैसे बनाए, Solar energy को affordable कैसे बनाए,
sustainable कैसे बनाए, इस पर काम कर रहे हैं। दूसरा, दुनिया में वो देश
जहां 300 दिवस से ज्यादा सूर्य की गर्मी का प्रभाव रहता है, ऐसे देशों का
संगठन किया है। पहली बार दुनिया के 122 देश जहां सूर्य का आशीर्वाद रहता
है, उनका एक संगठन हुआ है और उसका world capital हिन्दुस्तान में बनाया
गया है। उसका secretariat, अभी फ्रांस के राष्ट्रपति आए थे, उस दिन
उद्घाटन किया गया। लेकिन इरादा यह है कि यह समाज, देश, दुनिया जब संकट झेल
रही है, हम क्या करेंगे?
हमारा उत्तर प्रदेश, गन्ना किसान
परेशान रहता है लेकिन गन्ने के रास्ते इथनॉल बनाए, petroleum product के
अंदर उसको जोड़ दे तो environment को फायदा होता है, मेरे गन्ना किसान को
भी फायदा हो सकता है। मेरे BHU में यह खोज हो सकती है कि हम maximum इथनॉल
का उपयोग कैसे करे, हम किस प्रकार से करे ताकि मेरे उत्तर प्रदेश के
गन्ने किसान का भी भला हो, मेरे देश के पर्यावरण और मानवता के कल्याण का
काम हो और मेरा जो vehicle चलाने वाला व्यक्ति हो, उसको भी कुछ महंगाई
में सस्ताई मिल जाए। यह चीजें हैं जिसके innovation की जरूरत है।
हम
Solar energy पर अब काम कर रहे हैं। भारत ने 175 गीगावॉट Solar energy का
सपना रखा है, renewal energy का सपना रखा है। उसमें 100 गीगावॉट Solar
energy है, लेकिन आज जो Solar energy के equipment हैं, उसकी कुछ सीमाएं
हैं। क्या हम नए आविष्कार के द्वारा उसमें और अधिक फल मिले, और अधिक
ऊर्जा मिले ऐसे नए आविष्कार कर सकते हैं क्या? मैं नौजवान साथियों को आज
ये चुनौतियां देने आया हूं और मैं इस BHU की धरती से हिन्दुस्तान के और
विश्व के युवकों को आह्वान करता हूं। आइए, आने वाली शताब्दी में मानव
जाति जिन संकटों से जूझने वाली है, उसके समाधान के रास्ते खोजने का,
innovation के लिए आज हम खप जाए। दोस्तों, सपने बहुत बड़े देखने चाहिए।
अपने लिए तो बहुत जीते हैं, सपनों के लिए मरने वाले बहुत कम होते हैं और जो
अपने लिए नहीं, सपनों के लिए जीते हैं वही तो दुनिया में कुछ कर दिखाते
हैं।
आपको एक बात का आश्चर्य हुआ होगा कि यहां पर आज मेरे अपने
personal कुछ मेहमान मौजूद है, इस कार्यकम में। और आपको भी उनको देखकर के
हैरानी हुई होगी, ये मेरे जो personal मेहमान है, जिनको मैंने विशेष रूप से
आग्रह किया है, यूनिवर्सिटी को कि मेरे इस convocation का कार्यक्रम हो,
ये सारे नौजवान आते हो तो उस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए उनको बुलाइए।
Government schools सामान्य है, उस स्कूल के कुछ बच्चे यहां बैठे हैं,
ये मेरे खास मेहमान है। मैंने उनको इसलिए बुलाया है और मैं जहां-जहां भी अब
यूनिवर्सिटी में convocation होते हैं। मेरा आग्रह रहता है कि उस स्थान
के गरीब बच्चे जिन स्कूलों में पढ़ते हैं ऐसे 50-100 बच्चों को आकर के
बैठाइए। वो देखे कि convocation क्या होता है, ये दीक्षांत समारोह क्या
होता है? ये इस प्रकार की वेशभूषा पहनकर के क्यों आते हैं, ये हाथ में
उनको क्या दिया जाता है, गले में क्या डाला जाता है? ये बच्चों के सपनों
को संजोने का एक छोटा-सा काम आज यहां हो रहा है। आश्चर्य होगा, सारी
व्यवस्था में एक छोटी-सी घटना है, लेकिन इस छोटी-सी घटना में भी एक बहुत
बड़ा सपना पड़ा हुआ है। मेरे देश के गरीब से गरीब बच्चे जिनको ऐसी चीजें
देखने का अवसर नहीं मिलता है। मेरा आग्रह रहता है कि आए देखे और मैं
विश्वास से कहता हूं जो बच्चे आज ये देखते है न, वो अपने मन में
बैठे-बैठे देखते होंगे कि कभी मैं भी यहां जाऊंगा, मुझे भी वहां जाने का
मौका मिलेगा। कभी मेरे सिर पर भी पगड़ी होगी, कभी मेरे गले में भी पांच-सात
गोल्ड मेडल होंगे। ये सपने आज ये बच्चे देख रहे हैं।
मैं
विश्वास करूंगा कि जिन बच्चों को आज गोल्ड मेडल मिला है, वो जरूर इन
स्कूली बच्चों को मिले, उनसे बातें करे, उनमें एक नया विश्वास पैदा करे।
यही तो है दीक्षांत समारोह, यही से आपका काम शुरू हो जाता है। मैं आज जो
लोग जा रहे हैं, जो नौजवान आज समाज जीवन की अपनी जिम्मेवारियों के कदम
रखते हैं। बहुत बड़ी जिम्मेवारियों की ओर जा रहे हैं। दीवारों से छूटकर के
पूरे आसमान के नीचे, पूरे विश्व के पास जब पहुंच रहे है तब, यहां से जो
मिला है, जो अच्छाइयां है, जो आपके अंदर सामर्थ्य जगाती है, उसको हमेशा
चेतन मन रखते हुए, जिन्दगी के हर कदम पर आप सफलता प्राप्त करे, यही मेरी
आप सब को शुभकामनाएं हैं, बहुत-बहुत धन्यवाद।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्रीमान केसरी नाथ जी त्रिपाठी, त्रिपुरा के
राज्यपाल, श्रीमान तथागत राय, केन्द्र में मंत्री परिषद में मेरे साथी
श्रीमान बाबुल सुप्रियो जी, पश्चिम बंगाल के मंत्री श्रीमान हकीम जी,
गौड़िया मिशन अध्यक्ष श्रीमंत भक्ति शौर्य परिराज गोस्वामी महाराज जी,
मायापुर से चैतन्य मठ के आचार्य, श्रीमंत भक्ति प्रज्ञानज्योति महाराज जी,
भजन कुटीर वृंदावन के आचार्य श्रीमान भक्ति गोपनन्द बोन महाराज जी,
देवानन्द गौड़िया मठ के आचार्य श्रीमंत भक्ति वेदांत प्रजाटक महाराज जी,
गौड़िया मिशन के सचिव भक्ति सुंदर सन्यासी महाराज जी, गौड़िया संघ के
आचार्य श्रीमत भक्ति प्रसून साधू महाराज, नई दिल्ली के पहाड़गंज से गौड़िया
मठ के भक्ति विष्णु विचार विष्णु महाराज जी, श्यामवेदी गौड़िया मठ
विजयवाड़ा के प्रभारी भक्ति, विदभगता भागवत महाराज जी और विशाल संख्या में
पधारे हुए गौड़िया मठ के सभी अनुयायी भक्तजन।
कुछ समय पहले महाराज
जी मेरे पास आए थे। उनका आग्रह था कि शताब्दी वर्ष का समारोह है, आप
उसमें आइए। मेरा ये बड़ा सौभाग्य है कि मुझे इस महान परम्परा के सभी
प्रतिनिधियों का एक साथ दर्शन करने का मुझे सौभाग्य मिला है। भारत दुनिया
के लोगों को एक अचरज रहा है क्या कारण है इतने घाव और इतने आघातों के बाद
भी यह देश आज भी खड़ा है। इस जहां से पता नहीं कौन-कौन मिट गए सारी हम
कविताएं पढ़ते रहते हैं। क्या बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। काल के
प्रहारों के बीच वो ही टिक पाता है, जिसके भीतर एक अंतर्भुत आत्मिक शक्ति
होती है। इस विशाल भारत की अंतर्भुत आत्मिक शक्ति तो उसका अध्यात्म है।
शायद दुनिया में ऐसी आध्यात्मिक परम्परा कहीं नजर नहीं आएगी, जहां पर इस
महान विचार को मानने वाले, स्वीकार करने वाले, इतनी विविधताओं से भरे हुए
हों। ये समाज इतना विशाल है, व्यापक है, गहन है, गहरा है कि जहां मूर्ति
पूजा को मानने वाला भी उसका गौरव गान करता है और मूर्ति पूजा का घोर विरोध
करने वाला भी उसकी प्रशंसा करता है।
जो साकार को स्वीकार करता है
वो भी इस राह पर चलता है, जो निराकार को समर्पित है वो भी उसी प्रकार से चल
रहा है। जो परमात्मा की पूजा करता है वो भी इसे शिरोधार्य मानता है। जो
प्रकृति की पूजा करता है वो भी इसे शिरोधार्य मानता है। और ऐसी कौन सी ताकत
है? वो ताकत पूजा पाठ सिर्फ नहीं है, सिर्फ ग्रंथ नहीं है, सिर्फ वाणी
नहीं है। वो ताकत हमारी आध्यात्मिक चेतना में है। हम सम्प्रदायों से बंधे
हुए लोग नहीं हैं। समय रहते सम्प्रदाय आते हैं, जाते हैं, पंथ और परम्पराएं
विकसित होती हैं। लेकिन हम अध्यात्मता के एक अटूट नाते के साथ जुड़े हुए
लोग हैं और वही शक्ति है, जो हमें सतकर्म की ओर प्रेरणा देती है। चैतन्य
महाप्रभू भक्ति के प्रणेता थे। भक्ति युग के पुरोधा थे। भक्त बनना आसान
नहीं होता है। हाथ में माला है। मुंह में ईश्वर का जाप है। इतने मात्र से
दुनिया की नजर में तो हम भक्त बनते हैं। लेकिन भक्त बनना है, तो भक्त वही
होता है, जो विभक्त नहीं होता। जहां मुझ में और मुझ को बनाने वाले के बीच
कोई विभक्त नहीं है। मैं और वो दोनों ही एकरूप हैं, तब मैं भक्त बनता हूं
और चैतन्य महाप्रभु भक्त थे। जहां कोई विभक्त को स्थान नहीं था, वे कृष्ण
में डूबे हुए थे। कृष्ण उनमें समाहित हो चुका था और तब जाकर के ये भक्ति
आंदोलन खड़ा होता है। भारत की विशेषता रही है कि अनेक आक्रांत आए, शासकीय
व्यवस्थाओं में जय-पराजय की घटनाएं घटती रही। अत्याचार, जुल्म चलते रहे।
लेकिन उसके बावजूद भी देश की आध्यात्मिक धारा को खरोंच तक नहीं आई।
अगर हम भारत के आजादी के आंदोलन को देखें तो आजादी की लड़ाई लड़ने वाले
महापुरुष हमारे सामने आते हैं। उनका बलिदान, उनका त्याग, तपस्या को कोई कम
नहीं आंक सकता है। लेकिन इस बात को हम भूल नहीं सकते कि भारत के आजादी के
आंदोलन की पीठिका अगर किसी ने तैयार की थी, तो इस भक्ति आंदोलन ने की थी।
चाहे चैतन्य महाप्रभू हों, चाहे आचार्य शंकर देव हों, चाहे तिरुवल्लुवर
हों, चाहे बश्वेश्वर हों। अनगिनत ऐसे संत पुरुषों, ऐसे भक्ति मार्गी
आध्यात्मिक चेतना से भरे हुए दिव्यांश ऐसे हमारे महात्मा, जिन्होंने भक्ति
आंदोलन के माध्यम से भारत की उस आध्यात्मिक धारा को सदा-सर्वदा चेतनमंत
रखा। उसको खरोंच तक नहीं आने दी और उसके स्वाभिमान को टिकाए रखा उसके सत्व
को टिकाए रखा। और तभी जाकर के जब आजादी के आंदोलन ने विराट रूप लिया, तो ये
ताकत उसके साथ एक बहुत बड़ी पीठिका के रूप में काम आ गई।
कभी-कभी
हम लोग यहां वैष्णव आंदोलन की चर्चा कर रहे हैं। लेकिन जब हम ‘वैष्णव जन
तो तेने रे कहिये’ ये जब गाते हैं या सुनते हैं, हम में से कभी किसी को
विचार नहीं आया होगा कि जो ‘वैष्णव जन तो तेने रे कहिये’ मैं गा रहा हूं
जिसको मैं सुनता हूं तो मुझे परिचित लगता है। वो किस भाषा में लिखा गया है।
ये सवाल कभी किसी के मन में उठा नहीं है। यहां बैठे हुए लोगों को भी मैं
दावे से कहता हूं आपके मन में भी ‘वैष्णव जन तो तेने रे कहिये’ ये सुनने
के बाद कभी ये सवाल नहीं उठा होगा कि किस भाषा में लिखा गया है? कहने का
तात्पर्य यह है कि उसके भाव के साथ हम इतने घुल-मिल गये हैं, उसमें हम इतने
विलीन हो चुके हैं कि भाषा हमारे लिए कारण नहीं रही है। भाव ही हैं जो
हमें प्रेरणा देते रहते हैं। और ये ‘वैष्णव जन तो तेने रे कहिये‘ उसी काल
में लिखा गया जब चैतन्य महाप्रभू जिस आंदोलन को चलाते थे, गुजरात की धरती
पर नरसिंह मेहता, अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ाई लड़ते थे। और उन्होंने गीत
लिखा और महात्मा गांधी को बहुत प्रिय था। लेकिन मैंने कुछ उसमें छेड़छाड़
करने कोशिश की थी कभी। हक़ तो नहीं है मुझे। सैंकड़ों साल पहले जो महापुरुष
पैदा हुए, उन्होंने जो बात कही उसको हाथ लगाने का हक़ तो नहीं है, लेकिन
लोगों को समझाने के लिए मुझे सरल रहता था। तो मैं कभी उसका उपयोग करता था
पहले। मैं कहता था ‘वैष्णव जन तो तेने रे कहिये जो पीर पराई जाने रे, पर
दुखे उपकार करे तोहे मन अभिमान ना आने रे।‘ तो मैंने कहा कि जो आज
जनप्रतिनिधि हैं ये वैष्णव जन की जगह प्रतिनिधि शब्द लिख देना चाहिए।
‘जनप्रतिनिधि तेने रे कहिए जो पीड़ पराई जाने रे, पर दुखे उपकार करे तोहे
मन अभिमान ना आने रे।‘ वाछ-काछ मन निश्चल राखे, पर धन नवजाले हाथ रे।‘ यानी
चार सौ साल पहले भी करप्शन की चिंता थी। पर धन नवजाले हाथ रे, लोक
प्रतिनिधि तो तेने रे कहिए। वैष्णव की बात नरसिंह मेहता जी की बात गांधी
जी को क्यों इतनी प्यारी लगी होगी तो मुझे उसके एक-एक शब्द में ताकत नजर
आती है। और कृष्णा एक ऐसा विराट रूप, न जाने कितना कुछ लिखा गया है। न जाने
कितना कुछ कहा गया है। उसमें शास्त्र की भी अनुभूति होती है और शस्त्र का
भी अहसास होता है। कोई ऐसा व्यक्तित्व जिसके हर रूप को भक्त पसंद करते हों
और हर रूप की अलग भक्त धारा हो। कुछ लोग हैं जिनको मक्खन चोरी करने वाला ही
कन्हैया प्यारा लगता है। तो कुछ लोग हैं जिनको सुदर्शनधारी से नीचे कृष्ण
अच्छा नहीं लगता है। उनको तो सुदर्शन चक्रधारी चाहिए। और कुछ लोग हैं जो
बांसुरी बजाने वाला, राधा के साथ गोपियों के साथ रास करने वाला कृष्ण पसंद
आता है। कितनी विविधता है कितने स्वरूप और हर किसी को मानने वाला एक तबका
एक जीवन की ऐसी प्रेरणा दे सकता है, उसका हम अंदाज कर सकते हैं और जिस गीता
की रचना हुई, शायद विश्व में ऐसी कोई रचना नहीं है, जो युद्ध भूमि में रची
गई हो। यानी निर्लिप्त जीवन क्या होता है अपने पास पड़ोस में क्या चल रहा
है, उससे भी परे एक व्यक्तित्व की ऊंचाई क्या होती है कि जहां युद्ध होता
हो, अपने मरते हों अपने को मरते देखते हो और उस समय एक शास्त्र का सृजन
होता हो ये कौन सी ताकत होगी कि जो युद्ध भूमि में पैदा हुई और इसलिए और
युद्ध के समय भी जहां जय और पराजय के संघर्ष के बावजूद भी अलिप्तता की
चर्चा जिस संदेश में कही गई हो। गीता का संदेश वो ताकत तो देता है। और उस
अर्थ में गौड़िया मिशन के द्वारा वैश्णव परम्परा को जीवित रखते हुए और आखिर
ये परम्परा जैसा अभी महाराज जी बता रहे थे। दरीद्र नारायण की सेवा, ‘सेवा
परमो धर्मः’ यही तो हमारा जीवन का उद्देश्य रहा होना चाहिए। जो औरों के लिए
जीना जानता है। जो औरों के लिए अपने आपको आहूत करना जानता है। जो औरों के
लिए अपने आपको खपाना जानता है। और हमारे देश के महान महापुरुषों की सारी
माला देख लें, उस माला में यही तो संदेश है। हम कभी-कभी एक चिंतन सुनते हैं
दुनिया में Live and let Live ‘जिओ और जीने दो।‘ ये देश उससे एक कदम आगे
है। ये कहता है जिओ और जीने दो और अगर उसके जीने की क्षमता नहीं है, तो
उसको जीने के लिए मदद करो। गुजराती में बहुत अच्छा शब्द है ‘जीवो अने
जिवाड़ो।‘ औरों को जीने के लिए हम जो कुछ भी कर सकते हैं करें। सिर्फ उसको
उसके नसीब पर न छोड़ें। इस महान विचार और चिंतन को लेकर के हम निकले हुए
लोग हैं और वैष्णव एक प्रकार से विश्व को अपने-आप में समाने की बात करता
है। ‘वसुधैव कुटम्बकम’ ये मंत्र उसी बात का परिचायक है कि जिसमें पूरे
ब्रह्माण्ड को अपने में समाने की चर्चा होती है। ऐसी इस महान परम्परा को
मैं प्रणाम करता हूं। दुनिया में समय रहते व्यक्ति में जैसे दोष आते हैं,
व्यवस्था में जैसे दोष आते हैं, वैसे समाज में भी दोष आते हैं, बहुत सी
पुरानी बातें समाज के लिए कालबाह्य होती है। और कभी-कभी उसको लेकर के चलना
समाज के लिए बोझ बन जाता है। समाज के लिए संकट बन जाता है। लेकिन बहुत कम
समाज ऐसे होते हैं कि जहां अपने अंदर आ रही बीमारियों को पहचान पाएं, अपने
अंदर आ रही बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत करें और समाज में भी
ऊंचाई देखिए कि समाज के भीतर घुसी हुई बुराइयों के खिलाफ लड़ने वालों को
समाज आध्यात्मिक रूप में स्वीकार करता है, उनकी पूजा करता है। भारत में हर
सदी में आपने देखा होगा कि समाज की कोई न कोई बुराई के खिलाफ हिन्दू समाज
में से ही कोई सुधारक पैदा हुआ। उसने उस समाज को रोका, टोका, बुराइयों से
बचने के लिये निकलने के लिए कहा और प्रारंभ में उसको सहना पड़ा। यही तो
बंगाल की धरती है। राजा राममोहन राय सती प्रथा के खिलाफ इतनी बड़ी लड़ाई
लड़े। ईश्वर चंद विद्यासागर समाज की बुराइयों के प्रति कितनी जागरूकता लाए
थे। ये हमारी सदियों पुरानी परम्परा रही है कि हर कालखंड में जब-जब समाज
में विकृति आई, समाज में दोष आए बुराइयां आईं। कोई न कोई महापुरुष निकला,
इसी समाज में से निकला और उसने समाज को कोसा, डांटा, सुधारने का प्रयास
किया और समाज ने उसको महात्मा के रूप में स्वीकार किया, महापुरुष के रूप
में स्वीकार किया। दोनों तरफ ताकत नजर आती है। जो समाज सुधार को स्वीकार
नहीं करता है। जो समाज कालबाह्य बोझ से मुक्ति पाने का सामर्थ्य नहीं रखता
है, वो समाज कभी टिक नहीं सकता, जी नहीं सकता, न कभी प्राणवान अवस्था में
रह सकता है। एक मुर्दे की तरह वो समय बिताता है।
हमारे समाज में
हर कालखंड में, हर भू-भाग में बुराइयों के खिलाफ लड़ने वाले चैतन्य पुरुष
मिले हैं हमें। और यही तो हमारी ताकत है। इसी ने तो इस समाज को चैतन्यवत
रखा है। और इसलिये गौड़िया संगठन, गौड़िया मिशन को शताब्दी का पर्व एक
प्रकार से सामाजिक सुधार के आंदोलन की शताब्दी है। समाज में भक्ति चेतना
जगाने के आंदोलन की शताब्दी है। समाज में ‘सेवा परमो धर्म’ को साकार करने
का संस्कार अविरत चलाए रखने का, प्रज्जवलित रखने का उस महान कार्य की
शताब्दी है। ऐसी महान व्यवस्था को, महान परम्परा को इन सभी संतो, महंतो की
जिन्दगी को, जिसके कारण ये सतत् परम्परा चली है, मैं आदर पूर्वक नमन करता
हूं। चैतन्य महाप्रभू का पुण्य स्मरण करता हूं। इस महान परम्परा के सभी
योगी पुरुषों का मैं नमन करता हूं। आप सब का बहुत-बहुत धन्यवाद। Ref: http://www.narendramodi.in/category/speeches
मेरे प्यारे भाइयो बहनों, आज मैं सुबह नया रायपुर में था। नया रायपुर में
जब भी आता हूं कई नई चीजें देखने को मिलती हैं। लगता है दिन में जितना नया
रायपुर बढ़ता है उससे ज्यादा रात में बढ़ता है। आज मैंने नया रायपुर में
शहरों में जो गरीब होते हैं, उन गरीबों के आवास की योजना का शिलान्यास
किया। और अभी मैं आपके बीच आया हूं। कार्यक्रम तो इन मेरे आदिवासी
भाई-बहनों के बीच में है, जो दिल्ली से बहुत दूर है। राजनंद गांव के एक
इलाके की छोटी सी जगह पर है। लेकिन कार्यक्रम बहुत बड़ा है और पूरे
हिंदुस्तान के लिए है।
पहले सरकार को आदत थी, कि जो कुछ भी करना है वो दिल्ली में से ही करना है।
विज्ञान भवन में दो सौ-चार सौ लोग आ जाएं, दीप जलाएं, मीडिया वालों की
मित्रता काम आ जाए, टीवी पर 24 घंटे पता चल जाए कि इतना बड़ा काम हो गया
है। मैंने सरकार को दिल्ली से बाहर निकाल करके जन-जन के बीच में लाकर खड़ा
कर दिया है। आदिवासियों के बीच में लाया हूं, किसानों के बीच में लाया
हूं, गांव के बीच में लाया हूं। सरकार के अधिकारियों की फौज गांव के बीच
में जाने लग गई है और विकास की एक नई दिशा चल पड़ी है। और इसलिए आज इस छोटे
से स्थान पर इतने लाखों लोगों का जनसागर, मैं हैरान हूं इतनी बड़ी संख्या
में लोग, जहां भी मेरी नजर पहुंची है, लोग ही लोग नजर आते हैं। मैं उधर
पहाड़ी पर नजर कर रहा हूं पहाड़ी में भी जैसे जान आ गई है, पत्थर नहीं लोग
नजर आ रहे हैं। क्या अद्भुत दृश्य देख रहा हूं मैं। मेरे प्यारे
भाइयो-बहनों ये जनता-जनार्दन के आर्शीवाद इस देश को नई ऊंचाई पर
पहुंचाएंगे। ये मेरा विश्वास हर दिन पक्का होता जाता है। हर दिन नया
विश्वास पैदा होता है। ऐसा प्यार जो आप लोग दे रहे हैं, उससे मुझे आपके
लिए ज्यादा दौड़ने की ताकत मिलती है, ज्यादा मेहनत करने की ताकत मिलती
है, पसीना बहाने की प्रेरणा मिलती है।
आज मुझे यहां 104 साल की
उम्र की मां कुंवरबाई का आर्शीवाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। जो लोग
अपने-आप को नौजवान मानते हैं, वो जरा तय करें क्या उनकी सोच भी जवान है
क्या? मैं ये इसलिए कह रहा हूं कि 104 साल की मां कुंवरबाई न टीवी देखती
है न अखबार पढ़ती है न वो पढ़ी-लिखी मां है, दूर-सुदूर गांव में रहती है,
और उसको पता चला कि देश के प्रधानमंत्री कहते हैं कि शौचालय बनाओ। बस इस
मां के कान में पड़ गया, उसने अपनी बकरियां बेच दीं और शौचालय बना दिया।
104 साल की मां के मन में विचार, ये ही हिंदुस्तान के बदलाव का संकेत दे
रहा है। देश बदल रहा है, इसका सबूत दूर-सुदूर गांव में बैठी हुई मेरी एक
आदिवासी 104 साल की मां जब शौचालय बनाने का संकल्प करे, और संकल्प करे
इतना ही नहीं, पूरे गांव वालों को शौचालय बनाने के लिए मजबूर करे, इतना ही
नहीं, गांव में अब कोई भी व्यक्ति खुले में शौचालय नहीं जाएगा ये पक्का
करवा ले, इससे बड़ी प्ररेणा क्या हो सकती है। मैं आज देशवासियों को कहता
हूं, मैं मीडिया वालों से भी प्रार्थना करता हूं, कि मेरा ये भाषण नहीं
दिखाओगे तो चलेगा, लेकिन मेरी ये मां कुवरबाई की बात जरूर देश को बताना। ये
ही तो बातें हैं जो समाज की ताकत बनती हैं। और आज मुझे मां कुंवरबाई का
स्वागत करने का सम्मान करने का अवसर मिला।
मुझे आज यहां के
आदिवासी क्षेत्र के दो विकास खंडों के सेवाभावी नौजवान माताएं, बहनों और
भाइयों का सम्मान करने का अवसर मिला। अम्बागढ़ चौकी और छुरिया इस दो
ब्लॉक, सामाजिक जागरुकता से, ये जागरुक नागरिकों के अथक प्रयास से ये दो
ब्लॉक open Defection free हो गए हैं। ये दो ब्लॉक खुले में शौचलाय जाना
वहां बंद हो गया और हर किसी ने शौचालय बना लिया। स्वचछ्ता, ये छोटी बात
नहीं है। हिंदुस्तान के कोने-कोने में जन-जन के मन-मन में शौचालय स्वभाव
बनाना है, शौचालय, स्वच्छता, बीमारी से मुक्ति, स्वस्थ भारत, सशक्त भारत इस
सपनों को पूरा करने के लिए अगर कोई पहली कोई महत्वपूर्ण पंक्ति, कदम है तो
वो स्वच्छता है। आज मुझे उनका सम्मान करने का अवसर मिला है। अम्बागढ़ चौकी
ब्लॉक के ग्रामीण लोगों को मैं विशेषकर बधाई देता हूं। कभी-कभी देश का
प्रधानमंत्री भी टैक्स लगाने से डरता है, उसको चिंता रहती है कि अरे ये
करुंगा तो क्या होगा। लेकिन अम्बागढ़ चौकी के नागरिकों को मैं सलाम करता
हूं कि उन्होंने खुले में कोई शौच जाए दंड करने का प्रावधान किया है और दंड
करते हैं। ये बहुत बड़ी हिम्मत की बात है। समाज के लिए निर्णय़ कडवा हो तो
भी करने की ताकत इन अम्बागढ़ चौकी के मेरे आदिवासी भाइयों ने आज हमें
सिखाया है। उन्होंने open Defection free, खुले में शौच जाने की सदियों
पुरानी आदत से लोगों को मुक्ति दिलाई है और ये जब आप खुले में शौच जाने
वाला बंद कराते हैं तो वो सबसे पहले माताओं-बहनों के सम्मान का काम होता
है। आज मजबूरन उनको खुले में, जंगलों में शौच के लिए जाना पड़ता है। अगर हम
हमारी माताओं-बहनों को इस मुसीबत से मुक्त करा दें तो देश की कोटि-कोटि
माताओं-बहनों का आशीर्वाद ये भारत को एक महान शक्तिशाली देश बना देगा और उस
काम को यहां के हमारे आदिवासी भाईयों-बहनों ने करके दिखाया है, 104 वर्ष
की मां ने करके दिखाया है। इससे बड़ा सफलता का मार्ग क्या हो सकता है। मैं
इन सभी को सार्वजनिक रूप से सर झुका करके नमन करता हूं, मैं उनका बहुत-बहुत
वंदन करता हूं, उनका हृदय से अभिंनंदन करता हूं।
आज यहां एक
योजना का और भी आरंभ हुआ, जन औषधि भंडार। गरीब व्यक्ति को, परिवार मेहनत
करके गुजारा करता हो, सोचता हो 5 साल के बाद ये करेंगे, 10 साल के बाद ये
करेंगे। कभी सोचता हो साईकिल लाएंगे, कभी सोचता हो बच्चों के लिए कोई अच्छे
से कपड़े ले आएंगे लेकिन परिवार में अगर एक व्यक्ति को बीमारी आ जाए तो
गरीब के लिए तो 10 साल का पूरा planning गड्ढे में चला जाता है, आर्थिक बोझ
बन जाता है, कर्जदार बन जाता है। गरीब को सस्ती दवाई मिले, गरीब को दवाई
के बिना मरने की नौबत न आए इसलिए पूरे देश में जन औषधि भंडारों को अभियान
चलाया है। आज मैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और उनकी पूरी टीम को बधाई देता
हूं कि आज जन औषधि भंडार खोलने का आज मेरे हाथों से, मुझे करने का उन्होंने
अवसर दिया, मैं इसके लिए उनका बहुत आभारी हूं।
आज Rurban Mission इसको हम प्रारंभ कर रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं Smart
City तो Smart Village क्यों नहीं, ये जो Rurban Mission है ना, वही Smart
Village है। हमारे चौधरी साहब, हमारे मंत्री हैं उस विभाग के, वे अभी
विस्तार से बता रहे थे। ये बात सही है कि हमारे शहरों की ओर जाना बहुत तेजी
से बढ़ रहा है। लोग अपने बेटों को शहरों में भेज रहे हैं, बूढ़े मां-बाप
गांव में रहते हैं, नौजवान शहरों में चले जा रहे हैं, उनको एक अच्छी जिंदगी
जीनी है, एक quality of life, जहां अच्छी शिक्षा हो, अच्छी अस्पताल हो,
बिजली आती हो, Internet चलता हो, कहीं शाम को परिवार से साथ पलभर
घूमने-फिरने जाना हो तो अच्छी जगह हो, ये उसके मन में रहता है और इसलिए वो
शहर की ओर चल पड़ता है लेकिन शहरों के हाल हम देख रहे हैं कि वहां पर
झुग्गी-झोंपड़ियां बढ़ती चली जाती हैं। शहरों का विकास, पिछले कई वर्षों से
लोग आते गए और शहर को बढ़ाते गए। शहर में बैठे हुए लोगों ने या राज्य
सरकार चलाने वाले लोगों ने, ये लोग आएंगे तो कहां रहेंगे, उनको पानी कहां
से पहुंचेगा, बिजली कहां से मिलेगी, उनका drainage का क्या होगा, उनको
दैनिक जीवन क्रियाएं करनी हैं तो कहां करेंगे, कोई सोचता नहीं, लोग आते
हैं। कभी एक लाख जनसंख्या होगी, थोड़े समय में डेढ़ लाख हो जाएगी, फिर दो
लाख हो जाएगी, फिर तीन लाख हो जाएगी और व्यवस्था वैसी की वैसी रहेगी। पानी
का टंका वही रहेगा जो पहले एक लाख लोगों के लिए था। अब पांच लाख लोगों को
पानी कहां से पहुंचेगा और इसलिए पिछले कई वर्षों से पूर्वानुमान लगाकर के,
विकास का नक्शा तैयार करके कि अगर शहर बढ़ेगा तो इस तरफ बढ़ाएंगे, मकान नए
बनाने हैं तो इस तरफ बनाएंगे, Planning ऐसा करेंगे, ये सोचा नहीं गया। और
सोचा गया है तो बहुत कम जगह पर सोचा गया और उसके कारण शहरों में जाना भी
लोगों के लिए दुष्कर हो गया है। इसका उपाय क्या है, क्या लोगों को उनके
नसीब पर छोड़ दिया जाए, झुग्गी-झोंपड़ी में जीने के लिए मजबूर किया जाए जी
नहीं, इसका उपाय सोचना चाहिए और इस सरकार ने सोचा है और उसी में से ये
Rurban Mission बना है। Rurban का सीधा-सीधा अर्थ है Rural-Urban दोनों को
मिला दिया Rurban, ग्रामीण और शहरी दोनों को एक साथ मिला दिया वो है
Rurban, जिसका मतलब है कि विकास ऐसा हो, जिसकी आत्मा गांव की हो और सुविधा
शहर की हो, ऐसा गांव। अगर हम देखते हैं कुछ 5-7 गांवों के बीच में एकाध
गांव होता है। जहां पर लोग कुछ खरीदी करने आते हैं, कुछ छोटी-मोटी चीज
खरीदने आते हैं लेकिन वो गांव ही होता है। इस सरकार ने सोचा क्या देश में
ऐसे जो गांव हैं, जिसके अगल-बगल में 5-7 गांव होते हैं और ये गांव
धीरे-धीरे बढ़ रहा है क्या वो शहर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, अपने
आप बढ़ रहा है, लोग धीरे-धीरे वहां आने लगे। पढ़ने के लिए आ गए, व्यापार
करने के लिए आए, नौकरी करने के लिए आए हैं। पहले 10 हजार संख्या थी, देखते
ही देखते 20 हजार संख्या हो गई, देखते ही देखते 25 हजार हो गई। क्या अभी से
ऐसे जो अभी से तेज गति से बढ़ रहे हैं, ऐसे गांवों को केंद्रित करके,
अगल-बगले के 5-7 गावों को जोड़कर के, 25,30,40 हजार की जनसंख्या की सुविधा
के लिए एक Cluster Approach से ये Rurban Mission को लागू किया जा सकता है।
पूरे देश में ऐसे 300 Rurban Center ख़ड़े करने की कामना से अभी काम
प्रारंभ किया है। इस वर्ष 100 ऐसे Rurban Cluster खड़े करने की कल्पना है।
जिसका विकास शहर बनने वाला है, वो ध्यान में रखा जाएगा लेकिन उसके अंदर का
जो गांव है, दिल में जो गांव का भाव है, उसको जिंदा रखने के लिए पूरा
प्रयास होगा। एक ऐसी रचना जो भारत के स्वभाव के साथ जुड़ती है, भारत की
प्रकृति के साथ जुड़ती है।
दूसरी बात भारत के आर्थिक विकास को भी
5-50 बड़े शहरों के आधार पर नहीं चलाया जा सकता है। सवा सौ करोड़ का देश,
कश्मीर से कन्याकुमारी, कच्छ से कामरोप, इतना विशाल देश, अगर लोगों को
रोजगार देना है, आर्थिक प्रगति करनी है तो हमें विस्तार नीचे तक ले जाना
पड़ेगा। ये Rurban जो कल्पना है, उसमें उसको Growth Center बनाने की कल्पना
है। आर्थिक विकास की गतिविधि का केंद्र बिंदु बनाने की कल्पना है।
छोटे-छोटे बाजार होंगे, कारोबार अगल-बगल के 5-10 गावों के लिए चलता होगा तो
धीरे-धीरे वो Rurban बन जाएंगे। हमारे यहां जो Tribal belt है, उन Tribal
belt में आदिवासी विस्तारों में अगर हम सोचकर के Growth Centre develop किए
होते, एक-एक ब्लॉक में अगर Growth Centre develop किया होता तो हमारे
आदिवासी क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए इतने साल जो बीत गए, नहीं बीतते
और इसलिए सुविधाएं मिलें, शिक्षा मिले, आधुनिकता मिले, साथ-साथ आर्थिक
गतिविधि भी मिले। इन सारी बातों को जोड़कर के ये Rurban की योजना बनाई है।
आज छोटे गांव में डॉक्टर जाते नहीं हैं, छोटे गांव में शिक्षक नहीं जाता
लेकिन अगर Rurban बना दिया तो लोग वहां जाएंगे और नजदीक में 5,10,15
किलोमीटर दूरी पर दवाई सेवाओं के लिए जाना है या शिक्षा के लिए जाना है तो
आराम से जाएगा, आएगा और इसलिए अगल-बगल के भी अनेक गांवों की quality of
life में बहुत बड़ा बदलाव आएगा।
इस vision के साथ आज छत्तीसगढ़
में चार ऐसे संकूल के लिए प्रारंभ हो रहा है। मैं छत्तीगढ़ सरकार को बधाई
देता हूं कि एक महत्वपूर्ण काम की योजना वो भी आदिवासियों के बीच बैठ
करके देश के लिए प्रारंभ हो रही है, इसका लाभ हिंदुस्तान के हर कोने को
मिलने वाला है। और देखते ही देखते शहरों पर दबाव कम होगा। गांवों से बाहर
जाने वालों के लिए एक अच्छी जगह उपलब्ध हो जाएगी, नए शहरों का निर्माण हो
जाएगा। ये नए शहर व्यवस्थित होगे, आयोजित होंगे, आर्थिक गतिविधि के साथ
जुड़े हुए होंगे। इस कल्पना को ले करके ये Rurban का कार्यक्रम आज प्रारंभ
कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि एक साथ देश में जब योजना चलेगी,
करोड़ों-करोड़ों लोगों को इसका लाभ होने वाला है।
भाइयों, बहनों
यहां बहुत बड़ी मात्रा में मेरे किसान भाई-बहन हैं। मैं दो दिन पहले एक
किसी पत्रकार ने लिखा था, फीचर को मैं पढ़ रहा था, उसने लिखा कि कई वर्षों
के बाद किसानों के लिए भरोसे पात्र विश्वास पैदा करने वाली योजना पहली बार
आई हैं, जो किसानों में एक नया विश्वास पैदा करेंगी। ये योजना है
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। हमारे देश में ज्यादातर खेती ईश्वर पर आधीन
है। अगर वर्षा हो गई तो ठीक, वर्षा नहीं हुई तो सूखा, ज्यादा हो गई तो
पानी में डूब गया। प्रकृति अगर रूठ जाए तो सबसे पहला नुकसान किसान को होता
है। ऐसी स्थिति में किसान को सुरक्षा मिलना जरूरी है। एक नया विश्वास
मिलना जरूरी है। और इस बात को ध्यान में रखते हुए पहली बार देश में
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ला रहे हैं, जो पहले की योजनाओं से बिल्कुल
अलग है। पहले तो किसान premium लेने के लिए तैयार ही नहीं होता था। उसको
लगता था इतने रुपये अगर में premium दूंगा तो फिर बीज कहां से लाऊंगा, खाद
कहां से लाऊंगा, पानी खेती में कहां से पिलाऊंगा, पशु को चारा कहां से
खिलाऊंगा, वो देता ही नहीं था और एक बार अगर दे दिया तो पता चलता था दो-दो
साल तक बीमा का पैसा ही नहीं आता है, कभी पता चलता था आया तो बीमा तो 30
हजार का लिया था लेकिन 6 हजार रुपया ही मिला। और बीमा तो उसको मिला जिसको
बैंक का लोन मिला था, तो सीधे बैंक वाले को चला गया, किसान के पास तो कुछ
आता ही नहीं था। ये जितनी बीमारियां थीं, सारी बीमारियों को हमने खत्म कर
दिया। एक नई ताकत वाली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लाए जिसमें अब उसको
प्रीमियम भी ज्यादा नहीं देना पड़ेगा। डेढ़ पर्सेंट, दो पर्सेंट पड़ा वो।
वरना पहले तो कुछ इलाकों में 52-52 प्रतिशत प्रीमियम गया है। 8, 10, 14, 15
प्रतिशत तो Routine चलता था। हमने पक्का कर दिया कि दो पर्सेंट से
ज्यादा नहीं, डेढ़ पर्सेंट से ज्यादा नहीं। ये पक्का कर दिया और इसलिए
अब किसान को ज्यादा देना नहीं पड़ेगा।
दूसरा फसल खेत में से
तैयार हो गई। अच्छी बारिश हुई, अच्छी फसल हो गई, और फसल काट करके खेत में
ढेर पड़ा हुआ है। ट्रैक्टर मिल जाए ले जाने के लिए इंतजार हो रहा है।
इतने में अचानक बारिश आ गई, तो उस बेचारे को एक पैसा नहीं मिलता था। बारिश
आने तो उसका तो बरबाद हो गया, ढेर किसी काम का नहीं ऐसा ही ढेर देखने का।
इस सरकार ने निर्णय किया कि फसल काटने के बाद खेत में अगर ढेर करके पड़ा
है, और 14 दिन के भीतर-भीतर अगर कोई आपत्ति आ गई और नुकसान हो गया, तो उसको
भी फसल बीमा मिलेगा।
ये बहुत बड़ा निर्णय किया है। पहले बहुत बड़े इलाके में तय होता था कि यहां
वर्षा हुई तो इसका हिसाब लगाया जाता था। इसके कारण क्या होता था, पांच
गांव में अच्छी बारिश हुई हो, दस गांव बेचारे सूखे में पड़े हों, उनको
मिलता नहीं था। हमने कह दिया, कि छोटी इकाई को भी अगर उसका नुकसान हुआ है,
तो उसको भी भरपाई हो जाएगा, उसको फसल का बीमा मिल जाएगा। इतना ही नहीं,
दो-दो साल तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। उसको technology के माध्यम से
तत्काल पैसे मिल जाएं इसका प्रबंध किया जा रहा है। कभी-कभार किसान तय करता
है कि जून महीने में बारिश आने वाली है, सब ready रखता है, लेकिन जब तक
बारिश नहीं आती, वो बोवनी नहीं कर पाता है, जून महीना चला जाए वो बेचारा
बारिश की इंतजार कर रहा है, जुलाई महीना चला जाए वो इंतजार कर रहा है,
अगस्त महीना चला जाए वो इंतजार कर रहा है, बारिश आई नहीं। तो ऐसा किसान
क्या करेगा? जिसको बेचारे को बारिश आई ही नहीं, बोवनी का ही मौका नहीं
मिला। तो सरकार ने कहा है, इस फसल बीमा योजना के तहत अगर वो फसल बो भी नहीं
पाया और उसका नुकसान हो गया, तो भी उसको 25 प्रतिशत उसका साल भर पेट भरने
के लिए तुरंत पैसा दे दिया जाएगा।
भाइयो, बहनों हिंदुस्तान के
इतिहास में किसानों के लिए इतना बड़ा सुरक्षा कवच अगर किसी ने दिया है तो
पहली बार दिल्ली में आपने हमें बिठाया और हमने आपकी सेवा में रखा है।
भाइयो, बहनों ये सरकार गरीबों के लिए है। ये सरकार दलितों के लिए है। ये
सरकार आदिवासियों के लिए है। ये सरकार पीडि़तों के लिए है। ये सरकार
वंचितों के लिए है। समाज में आखिरी छोर पर जो बैठे हैं, उनके कल्याण के
लिए एक संकल्प करके ये सरकार आई है, और इसलिए चाहे घर बनाने की योजना हो,
चाहे जन औषधि भंडार करना हो, चाहे Rurban mission हो, चाहे फसल बीमा योजना
हो, चाहे स्वच्छता का अभियान हो, चाहे खुले में शौच बंद कराने का प्रयास
हो, ये सारी बातें सिर्फ और सिर्फ गरीब के लिए हैं। गरीब की जिंदगी में
बदलाव लाने के लिए हैं।
भाइयों, बहनों ये ही बातें हैं जो आने
वाले दिनों में परिणाम लाने वाली हैं। और मेरा तो विश्वास जब 104 साल की
मां कुंवरबाई आर्शीवाद दें तो मेरा विश्वास लाखों गुना बढ़ जाता है, लाखों
गुना बढ़ जाता है। ये ही रास्ता है, इसी रास्ते से देश का कल्याण होने
वाला है, और उस रास्ते पर हम चल पड़े हैं। फिर एक बार मैं आपका बहुत-बहुत
आभार व्यक्त करता हूं, आप सबको नमन करता हूं, आप सबको धन्यवाद करता हूं।
भारत माता की जय।
मंच पर विराजमान सभी वरिष्ठ महानुभाव, उपस्थित भाइयों और बहनों, साईं राम
वेकैंया जी ने मेरा काम सरल कर दिया कि अब किसी का नाम बोलना नहीं है। न
कभी चिंता रहती है किसी का नाम छूट जाता है। वेंकैया जी का सुपर फास्ट
एक्सप्रेस की तरह भाषण सुन लिया आपने।
अभी रमन सिंह वर्णन कर रहे थे कि 6 बजे निकले हैं मोदी जी संडे होलीडे होता
है। तो मेरे लिये real sense में होलीडे होता है। मैं होलीडे के संबंध में
कहता हूं पवित्र दिवस। सारे काम जितने कर सकते हैं करना चाहिए। और मैं जब
शाम को बिस्तर पर जाऊंगा तब तक पांच राज्यों का आज मेरा दौरा हो गया होगा।
दिल्ली से चला हूँ छत्तीसगढ़ आया हूं यहां से ओड़िशा जाऊंगा, ओड़िशा से
पश्चिम बंगाल जाऊंगा फिर वहां से उत्तर प्रदेश जाकर के सो जाऊंगा।
जनता जनार्दन जब कोई जिम्मेदारी देती है तो उसको पूरे मनो योग से पूर्ण
करने का प्रयास करना चाहिए। और हर किसी ने कोशिश करनी चाहिए। आज यहां मुझे
साईं बाबा की प्रतिमा का लोकार्पण करने का अवसर मिला। ये अस्पताल गरीबों की
निःशुल्क सेवा करने का काम करती है, खासकर के बालकों के हृदय का ऑपरेशन,
जो लोग पुट्टापर्थी गये होंगे वहां एक बहुत बड़ा अस्पताल और साईं बाबा का
जो सामाजिक काम था उस चीज पर लोगों का बहुत कम ध्यान जाता है। चमत्कारों की
चर्चा बहुत होती है। लेकिन उन्होंने जो पानी में काम किया है। शिक्षा में
काम किया है। स्वास्थ में जो काम किया है। ये सचमुच में बहुत प्रेरक है। एक
भी चमत्कार की चर्चा न करें तो भी ये काम अपने आप में बहुत बड़ा चमत्कार
है। मैं बाबा के इस महान सामाजिक कामों को प्रणाम करता हूं। आज यहां एक नई
नीति का प्रारूप आपके सामने प्रस्तुत किया गया। innovation and
Entrepreneurship के संबंध में। मैं रमण सिंह जी उनकी सरकार को बधाई देता
हूं कि उन्होंने इस दिशा में सोचा और सरकार क्या करेगी, क्या कर सकती है
लोगों को क्या करना चाहिए और सरकार और लोग मिलकर के क्या कर सकते हैं। इसका
उसमें एक खाका है। दुनिया में पिछले 50 वर्ष में जिन देशों ने प्रगति की
है। अगर उसकी तरफ हम नजर करें तो हमें ध्यान में आता है। उन देशों के
प्रगति के मूल में एक बात है innovation अनेक नई चीजों को लेकर के आए। अनेक
नई कल्पना को लेकर के आए, जिसको दुनिया ने स्वीकार किया। और वो innovation
समाज हितकारी बना लेकिन वो उस राष्ट्र के लिये आर्थिक उन्नती का कारण बन
गया। और innovation नहीं होता है तो एक ठहराव आ जाता है। रुकावट आ जाती है।
जीवन समाज का एक सहज स्वभाव होना चाहिए वो युगानुकूल परिवर्तन करता रहे।
आविष्कार की परम्परा निभाए रखे। और नये -नये आविष्कारों को समाज उपयोगी,
जनोपयोगी कैसे बनाएं उस दिशा में प्रयास करे। Entrepreneurship, हमारे देश
65 प्रतिशत जहां पर नौजवान हैं demographic division ये भारत के एक बहुत
बड़ी शक्ति के रूप में दुनिया देख रहा है। लेकिन अगर हम इस demographic
division के सिर्फ माला जपते रहेंगे कि हमारे पास 65 प्रतिशत जनसंख्या 35
साल से कम उम्र की है, तो बात बनने वाली नहीं है। ये 65 प्रतिशत जनसंख्या
उसके हाथों में हुनर हो। अपना कौशलय दिखाने के लिए वो आर्थिक व्यवस्था का
प्रबंधन हो। सरकार की नीतियां ऐसे छोटे-छोटे उद्यमकारों को प्रोत्साहित
करने वाले हों। हमारा युवा जॉब सीकर से जॉब क्रिएटर बनें। वो खुद नौकरी
खोजने कि बजाय मैं खुद दो चार लोगों को नौकरी दूंगा। ये सपने लेकर के काम
करे। और ये एक माहौल देश में बन सकता है। सरकार ने जो योजना बनाई है। वो
सारी योजनाएं इन बातों को बल देती है। ग्रेजुएट होना, सर्टिफिकेट लेकर के
दर दर भटकते रहना। ये मेरे देश के युवा की जिन्दगी नहीं हो सकती है। मेरे
देश के युवा की जिन्दगी उसके सपनों को साकार करने के लिए अनुकूल माहौल बना
कर के उस सपनों को पूरा करने वाले होने चाहिए। और दिशा में सरकार के एक के
बाद एक कदम उस स्थितियों को प्राप्त करने के लिए है।
स्किल डेवलपमेंट देश के नौजवानों को हुनर का अवसर देता है। मुद्रा योजना
ऐसे नए Entrepreneur हैं, और पुराने भी हैं जो विस्तार करना चाहते हैं।
उनके लिए है without कोई गारंटी देश के सामान्य लोग जो कभी बैंकिंग के
दरवाजे तक जा नहीं सकते थे। साहुकार जिनको लूटते थे। ब्याज बेशुमार होता
था। और कभी-कभी उसे गांव छोड़कर भागना पड़ता था या संसार छोड़ कर चला जाना
पड़ता था। इस चंगुल से उसे बचाने के लिए। छोटे-छोटे लोग, धोबी हो, नाई हो,
बर्तन बेचने वाले हो, कपड़े बेचने वाले हो, मोमबत्ती, अगरबत्ती बेचने वाले
हो, पूजा का सामान बेचने वाले हो या सामान्य लोग हों। उनको पांच हजार या दस
हजार रुपये चाहिए तो भी वो साहूकार के यहां जाकर के एक प्रकार से अपने
आपको गिरवी रखना पड़ता था। मुद्रा योजना के तहत 50 हजार से लेकर के दस लाख
तक without गारंटी ऐसे लोगों को पैसा देने का प्रबंध शुरू कर दिया है। अब
तक दो करोड़ लोगों को राशि दे दी गई है। और करीब-करीब एक लाख करोड़ से
ज्यादा राशि दे दी गई है। किसी भी प्रकार की गारंटी मांगे बिना दे दी गई
है। और इरादा यह है कि वो अपने कारोबार को बढ़ाएं। ताकि उसमें गरीबों को
रोजगार दें। एक को दें, दो को दें, चार को दें। लेकिन इसी से काम बढ़ने
वाला है। और इसलिए दुनिया में प्रचलित मान्यता रही है कि आर्थिक विकास के
लिए एक प्राइवेट सैक्टर, दूसरा पब्लिक सैक्टर यानी Government के PSUs
होंगे या कॉर्पोरेट हाउसेस होंगे। भारत जैसे देश में तीसरी विधा की
आवश्यकता है। उस तीसरी विधा में मैं बल दे रहा हूं और वो है परसनल सैक्टर।
प्राइवेट सैक्टर का आपना उपयोग है, पब्लिक सैक्टर का आपना उपयोग है, लेकिन
परसनल सैक्टर जहां हर व्यक्ति एक Entrepreneur बनें। और ये जो नीति लेकर
के आज छत्तीसगढ़ आया है। उसमें उसकी झलक है। मुद्रा योजना से उसको फाइनेन्स
मिले। स्किल डेवलप से उसको स्किल मिले। और मार्केट पॉजिटिव मार्केट का एक
Environment Create हो जाए। मुझे खुशी है कि ये जो दो करोड़ लोगों को मदद
मिली है। उसमें करीब-करीब 70 प्रतिशत SCs, STs या OBCs के लोग हैं बहुत
बड़ी मात्रा में महिला Entrepreneur आगे आई हैं। ये जो ताकत खड़ी हो रही
है। वो जो इस नीतियों को लेकर के छत्तीसगढ़ आए हैं। मैं मानता हूं उसके साथ
जुड़ कर के ये दोनों की शक्ति काम आएगी। और केन्द्र सरकार और राज्य सरकार
की शक्ति मिलती है तो फिर तेजी बहुत बढ़ जाती है। और मुझे विश्वास है कि
छत्तीसगढ़ के नौजवानों को इसका लाभ मिलेगा।
आज प्रधानमंत्री आवास
योजना का भी आरंभ हो रहा है। देश की आजादी के इतने सालों के बाद पांच करोड़
परिवार ऐसे हैं। जिनके लिए आवास निर्माण आवश्यक है।
करीब दो
करोड़ शहरों में हैं, तीन करोड़ गावों में हैं और ये वो लोग हैं कि अपने बल
बूते पर मकान बना पाएं संभव नहीं है। न उसके पास जमीन है न उसके पास पैसा
है। विकास के लिए व्यवस्थाएं कभी कभी बहुत बड़ा रोल प्ले करतीं हैं।
गरीब से गरीब व्यक्ति होगा। झुग्गी झोंपड़ी में जीता होगा, तो वो जीने के
तरीके ऐसे ढूंढ लेता है कि रात को सोने के लिए आता है फिर दिन को चला जाता
है। न उसके परिवार का माहौल बनता है न उस व्यक्ति के सपने सजते हैं।
लेकिन अगर उसको छोटा सा मकान भी दिया जाए, तो वो पैसे भरने के लिए तैयार
होता है। सरकार अगर मदद करे, बैंक अगर मदद करे, पब्लिक प्राइवेट
partnership मॉडल से आगे बढ़े।
एक बार मकान हो जाता है दूसरा मन
कर जाता है। मेहमान आते हैं तो घर में प्रवेश जहां होता है तो पैर पोछने के
लिए भी कुछ रखना चाहिए। तो सोचता है कि यार दस रूपये बचा लो तो कुछ ला
करके रखना चाहिए। फिर उसको लगता है कि लोग आते हैं झुग्गी झोंपड़ी में तो
चलता था अब थोड़ा दरी वरी लानी पड़ेगी थोड़ा पैसे बचाता है एक दरी लेता है
अगले महीने। फिर थोड़े दिन हो जाते हैं तो उसको लगता है कि बच्चों को
पढ़ना चाहिए। तो बच्चों को पढ़ने के लिए सोचने लगता है।
एक बार चारदीवारी आ जाती है, छत आ जाती है तो उसके सपनों में जान आ जाती है और वो नई नई चीजें करने लग जाता है।
और इसलिए ये प्रधानमंत्री आवास योजना वो Infrastructure नहीं है। ये
प्रधानमंत्री आवास योजना, ये उन दीवारों को खड़ी करने के लिए नहीं है। किसी
को जगह दे देंगे वो उन सपनों को जान भरने का एक बहुत बड़ा कार्यक्रम है।
जो हिन्दुस्तान के गरीब से गरीब व्यक्ति को अपना और इंसान जो सामान्य
व्यक्ति के मन की जो इच्छा होती है जो कहीं भी रहता हो यार अपना घर हो तो
अच्छा हो, हर किसी की इच्छा रहती है। लेकिन उस गरीब की इच्छा पूरी नहीं
होती। कोई गरीब मरने के बाद अपने बच्चों को विरासत में गरीबी देना नहीं
चाहता है। और गरीब से गरीब मां बाप भी अपने बच्चों को गरीबी विरासत में
नहीं देना चाहता है। वो भी उसको कुछ दे करके जाना चाहता है। सरकार ने सपना
देखा है।
2022 भारत की आजादी को 75 साल होंगे। क्या अभी से देश
का हर नागरिक, देश की सभी सरकारें, देश की स्थानीय स्वराज की सभी
संस्थाएं, जो-जो भी सार्वजनिक जीवन में या वैक्तिगत जीवन में सोचने वाले
लोग हैं। उन सब ने 2022 के लिए संकल्प मन में लेना चाहिए कि 2022 जब देश
की आजादी के 75 साल होंगे जिन महापुरूषों ने इस देश की आजादी के लिए बलिदान
दिया। जवानी जेलों में खपाई, फांसी के फंदे पर लटक गये, पीठ पर पुलिस के
डंडे खाए, उन लोगों ने जिन्होंने इतना त्याग किया, तपस्या की और हमें
आजादी दी उनको आजादी के 75 साल के वर्ष पर हम क्या दे सकते हैं उसका
संकल्प हर देशवासी का होना चाहिए। हम उनको कैसा भारत दें। भारत की आजादी
के दीवानों को आजादी के 75 साल पर कैसा भारत दें। ये सपना देखना चाहिए।
हमने ये सपना देखा है कि जब आजादी के 75साल हों हिन्दुस्तान के गरीब के
गरीब का भी अपना घर हो।
2022 तक पांच करोड़ घर बनाने हैं। काम
बहुत बड़ा हैं मैं जानता हूं। मानव संसाधन लगेंगे। लेकिन इससे रोजगार भी
बढ़ेगा। सीमेंट बिकेगा, लोहा बिकेगा मेन्शन के काम करने वालों को काम
मिलेगा। ईंट माटी, भट्टा,चूना सब काम करने वालों को काम मिलने वाला है। देश
के अन्दर एक बहुत बड़ी आर्थिक प्रवृत्ति ये भी देश के युवा पीढ़ी के काम
आने वाली है। जीवन बदलने वाला है और इसलिए उस कार्यक्रम का आज यहां पर आरंभ
होने वाला है। पूरे देश में सभी सरकारें आगे आएं जितना हो सके जल्दी अपने
यहां जमीन के संबंध में जगह तय करें। भारत सरकार इस काम को आगे बढ़ाने के
लिए तैयार है। राज्य और केन्द्र मिलकरके इस काम को करेंगे और देश के गरीब
से गरीब को हम एक छत्त देंगे। जिस छत के सहारे उसके सपनों को जान देंगे।
और वो जानदार सपनों से देश 2022 में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा। इसी एक
विश्वास के साथ मैं फिर एक बार रमन सिंह जी को उनकी टीम को बहुत-बहुत
शुभकामनाएं देता हूं। श्रीमन वेंकैया जी, इस विभाग के मंत्री हैं दिन रात
उन्होंने इस काम के पीछे लगे रहे हैं और मुझे विश्वास है कि ये सपना
साकार होकर रहेगा।